Pretika › Haunted Places › चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
भाग 7: क्लॉक टॉवर का खूनी पेंडुलम और रानी राजेश्वरी का मायाजाल
Piyashi Atma · Haunted Places · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 7 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2640
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
हवेली की पश्चिमी मीनार से गूंजती घड़ी के घंटों की भयानक प्रतिध्वनि ने पूरी घाटी के सन्नाटे को तार-तार कर दिया था। डोंग... डोंग... डोंग... हर आघात के साथ ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समय की सुइयां आगे बढ़ने के बजाय उल्टी दिशा में दौड़ रही हों।
डॉ. अनिकेत की टूटी पसलियां हर सांस के साथ भाले की तरह चुभ रही थीं, जबकि कबीर की दोनों हथेलियां अग्नि-वेदी की तपिश से झुलसकर लाल और काली पड़ चुकी थीं। चमड़ी उधड़ चुकी थी और नसों में ऐसा तीखा खिंचाव था कि उंगलियों को मोड़ना भी किसी यातना से कम नहीं था। लेकिन कबीर की आंखों में जो ज्वाला जल रही थी, वह दैहिक पीड़ा से कहीं अधिक प्रचंड थी।
"कबीर... घड़ी देखो," अनिकेत ने अपने होंठों पर जमे सूखे खून को पोंछते हुए कहा। उसकी आवाज में बेबसी और खौफ का मिला-जुला स्वर था।
कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर डाली। सुइयां बेरहमी से समय निगल रही थीं—02:41 AM।
"हमारे पास केवल उन्नीस मिनट बचे हैं, अनिकेत," कबीर ने दांत भींचते हुए कहा। "उन्नीस मिनट बाद पाताल शिला का पूर्ण जागरण हो जाएगा। तीसरी कील उस मीनार पर है... और जब तक वह नहीं उखड़ेगी, हम तहखाने के मुख्य शैतान को छू भी नहीं पाएंगे।"
"पश्चिमी मीनार 'वायु तत्व' और 'काल चक्र' (समय) का केंद्र है," अनिकेत ने अपनी फटी हुई जेब से सिद्ध भस्म की आखिरी पुड़िया निकालते हुए समझाया। "वहां रानी राजेश्वरी का साया है। वह ठाकुर से भी अधिक खतरनाक है, कबीर। ठाकुर लालच में मरा था, लेकिन राजेश्वरी अपने पति के धोखे और अपनी संतानों के कत्ल के असहनीय प्रतिशोध की आग में जली थी। उसका साया केवल देह पर नहीं, इंसान के मस्तिष्क पर वार करता है। वह तुम्हें वही दिखाएगी जिससे तुम सबसे ज्यादा डरते हो।"
कबीर ने सुनैना की उस प्राचीन लकड़ी की गुड़िया को अपनी छाती के पास कसकर बांध लिया। अनिकेत ने अपने तांबे के त्रिशूल को लाठी की तरह जमीन पर टिकाया और दोनों हवेली के पश्चिमी खंड की ओर दौड़ पड़े।
हवेली का पश्चिमी भाग मुख्य इमारत से सटा हुआ एक विशाल, पुराना गॉथिक परकोटा था। वहां पहुंचते ही हवा का वेग अचानक दस गुना बढ़ गया। बर्फीली आंधी किसी अदृश्य चाबुक की तरह उनके चेहरों पर पड़ रही थी। हवा में सूखी पत्तियों, धूल और बर्फ के साथ-साथ किसी औरत के खुले बालों की सड़ांध तैर रही थी।
सामने मीनार का संकरा, लोहे का जंग लगा दरवाजा था। दरवाजे पर कोई कुंडी नहीं थी; वह हवा के दबाव से बार-बार दीवार से टकराकर 'धड़ाम-धड़ाम' की आवाज कर रहा था।
कबीर और अनिकेत ने अंदर कदम रखा।
अंदर का दृश्य किसी अंधेरे कुएं के भीतर झांकने जैसा था। मीनार के भीतर कोई मंजिल नहीं थी; केवल गोलाकार पथरीली दीवार के सहारे-सहारे लोहे की एक बेहद संकरी, सर्पिलाकार (Spiral) सीढ़ी ऊपर 70 फीट की ऊंचाई पर स्थित क्लॉक-रूम की ओर जा रही थी। सीढ़ियों के नीचे केवल गहरा, अथाह अंधकार था।
"सावधानी से कबीर... एक गलत कदम और सीधे पाताल में गिरोगे," अनिकेत ने चेतावनी दी।
दोनों ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया। हर कदम के साथ लोहे की सीढ़ियां कराह उठती थीं—चर्रर्र... खट... चर्रर्र...
जब वे लगभग बीस सीढ़ियां चढ़ चुके, तो कबीर को एक अजीब सा अहसास हुआ। उसने नीचे देखा। दरवाजा अब भी उतनी ही दूरी पर था जितना पहली सीढ़ी पर था। उसने ऊपर देखा, क्लॉक-रूम भी उतनी ही ऊंचाई पर नजर आ रहा था। वे पिछले पांच मिनट से लगातार दौड़ रहे थे, उनके फेफड़े फूल रहे थे, लेकिन वे एक इंच भी आगे नहीं बढ़े थे!
"अनिकेत! यह क्या हो रहा है? हम आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे?" कबीर ने हांफते हुए चिल्लाकर पूछा।
अनिकेत के कदम भी थम गए। उसने दीवार पर हाथ रखा। दीवार का पत्थर स्पंदन कर रहा था, जैसे किसी जीवित प्राणी की नसें फड़क रही हों।
"यह 'काल-भ्रम' (Time Dilation) है!" अनिकेत ने अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए कहा। "राजेश्वरी ने इस सीढ़ी को समय के एक अनंत लूप में बांध दिया है। हम यहीं दौड़ते-दौड़ते थककर मर जाएंगे, लेकिन ऊपर कभी नहीं पहुंच पाएंगे!"
तभी, मीनार के खाली खोखलेपन में एक मीठी, सुरीली लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाली लोरी गूंजने लगी:
"सो जा रे चंदा... सो जा रे लाल... रक्त की नदिया... हड्डियों की पाल..."
आवाज के साथ ही मीनार की गोल दीवारों पर सैकड़ों पुराने शीशे और तस्वीरें अपने आप उभरने लगीं।
कबीर ने एक शीशे में देखा। उस शीशे में उसका अपना चेहरा नहीं था। उसमें उसका पुराना घर दिखाई दे रहा था—वह रात जब उसकी मां की अस्पताल में सांसें थम गई थीं और कबीर एक सड़क हादसे के कारण समय पर नहीं पहुंच पाया था। शीशे के भीतर से उसकी मां का मृत शरीर उठा और उसने कबीर की तरफ अपने सड़े हुए हाथ फैला दिए: "तू मुझे बचाने नहीं आया कबीर... तू कायर है... तू सबको मरने के लिए छोड़ देता है!"
"नहीं! यह सच नहीं है!" कबीर ने अपनी दोनों हथेलियों से अपने कान दबा लिए। उसकी खोपड़ी के भीतर हजारों सुइयां चुभने लगीं। उसकी अंतरात्मा अपराधबोध के असहनीय दलदल में धंसने लगी।
वहीं दूसरी ओर, अनिकेत भी घुटनों के बल गिर पड़ा था। उसके सामने की दीवार पर 1939 के उस तांत्रिक ग्रंथ के जले हुए पन्ने तैर रहे थे, और उन पन्नों से निकलती काली परछाइयां अनिकेत का गला घोंट रही थीं: "तू ज्ञान का दंभ भरता है अनिकेत... लेकिन आज तू अपनी ही विद्या की चिता पर जलेगा!"
"कबीर... अपने दिमाग को रोको..." अनिकेत ने जमीन पर तड़पते हुए अपनी उंगलियां पत्थरों में गड़ा दीं। "यह... यह राजेश्वरी का भ्रमजाल है... अगर तुमने इसे सच मान लिया... तो तुम्हारी आत्मा यहीं शरीर छोड़ देगी!"
कबीर की आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था। उसकी मां की लाश शीशे से बाहर निकलकर उसका गला दबाने ही वाली थी कि तभी कबीर के सीने पर बंधी सुनैना की गुड़िया अचानक अत्यंत गर्म हो गई।
गुड़िया की अकेली कांच की आंख से नीली रोशनी का एक प्रचंड धमाका हुआ।
तड़ाक!
वह दिव्य नीली रोशनी पूरे मीनार के खोखलेपन में बिजली की तरह कौंध गई। सुनैना की मासूम, दर्दभरी आवाज कबीर के अंतर्मन में गूंज उठी:
"कबीर भैया! आंखें खोलो! मां पागल हो चुकी हैं... वे तुम्हें अपना शत्रु समझ रही हैं... सत्य को देखो!"
उस नीली रोशनी के पड़ते ही दीवारों पर बने सारे शीशे एक साथ चकनाचूर हो गए। कबीर की मां का साया धुएं की तरह उड़ गया। कबीर ने एक लंबी, झटकेदार सांस ली, जैसे कोई डूबता हुआ इंसान पानी की सतह पर आकर सांस लेता है।
मायाजाल टूट चुका था। कबीर ने देखा कि वे सीढ़ियों के सबसे ऊपरी पायदान पर खड़े थे और उनके सामने क्लॉक-रूम का भारी ओक की लकड़ी का दरवाजा मौजूद था!
कबीर ने तुरंत झुककर अनिकेत को उठाया। अनिकेत की नाक से खून बह रहा था, लेकिन उसकी चेतना लौट आई थी।
"कबीर... गुड़िया ने हमें बचा लिया," अनिकेत ने लड़खड़ाते हुए कहा।
"अब खत्म करने का वक्त आ गया है," कबीर ने अपने दोनों जले हुए हाथों से उस भारी लकड़ी के दरवाजे को पूरी ताकत से लात मारी।
धड़ाम!
दरवाजा टूटकर अंदर जा गिरा। अंदर का दृश्य देखकर कबीर और अनिकेत की आंखें फटी की फटी रह गईं।
यह 70 फीट ऊंची मीनार का विशाल क्लॉक-रूम (यंत्र-कक्ष) था।
कमरे के बीचों-बीच पीतल और फौलाद के विशालकाय गियर (चक्के) लगे थे, जिनमें से प्रत्येक चक्का एक इंसान के कद जितना बड़ा था। वे गियर 80 साल से बिना किसी तेल या बिजली के घूम रहे थे—क्योंकि उन दांतों के बीच इंसानी बाल, हड्डियां और सूखा खून फंसा हुआ था जो किसी ग्रीस की तरह काम कर रहा था। घड़-घड़... चर्रर्र... टिक-टिक... की भयानक धातुई आवाजें कमरे में गूंज रही थीं।
कमरे की सामने वाली दीवार पूरी तरह से कांच की बनी थी—वह हवेली की विशाल घड़ी का मुख्य डायल था, जिसके पार बाहर की पूरी बर्फीली नील घाटी और खून जैसा लाल चांद दिखाई दे रहा था।
और उस विशाल घड़ी के बीचों-बीच... छत से लटकता हुआ एक 10 फीट लंबा, भारी लोहे का पेंडुलम पागलों की तरह एक सिरे से दूसरे सिरे तक झूल रहा था।
सननन... सननन!
पेंडुलम का निचला हिस्सा किसी विशाल, अर्धचंद्राकार कुल्हाड़ी की तरह धारदार था। वह इतनी तेजी से हवा को काट रहा था कि उसके गुजरने से कमरे में हवा का एक बवंडर बन रहा था।
और उस पेंडुलम के ठीक मध्य में, एक बड़ी लोहे की डिस्क पर, तीसरी तांत्रिक रक्त-कील धंसी हुई थी! उस कील के चारों तरफ से सफेद, तूफानी धुआं निकल रहा था जो कमरे के गियरों को गति दे रहा था।
तभी, कमरे की विशाल कांच की दीवार पर बाहर से एक सफेद साया आकर चिपक गया।
तड़-तड़-तड़!
कांच पर दरारें पड़ गईं। वह साया कांच को चीरता हुआ कमरे के भीतर हवा में तैरने लगा।
वह रानी राजेश्वरी थी।
उसका चेहरा कभी बेहद सुंदर रहा होगा, लेकिन अब वह एक कंकाल के ऊपर तनी हुई सफेद, सड़ी हुई चमड़ी जैसा दिख रहा था। उसके लंबे, खुले काले बाल कमरे की छत तक फैले हुए थे, जैसे सैकड़ों काले जहरीले नाग हवा में लहरा रहे हों। उसने 1940 के दौर का राजसी सफेद रेशमी लहंगा पहना था, जो कमर से नीचे पूरी तरह काले खून से सना हुआ था। उसकी आंखों की जगह केवल दो सुलगते हुए नीले गड्ढे थे, जिनमें से प्रतिशोध की ज्वाला निकल रही थी।
"तुम दोनों ने मेरी सुनैना की रूह को छूने की हिम्मत कैसे की?" राजेश्वरी की आवाज किसी बवंडर की तरह गूंजी।
कमरे के भारी लोहे के औजार, नट-बोल्ट और टूटे हुए शीशे हवा में उड़ने लगे और किसी गोलियों की बौछार की तरह कबीर और अनिकेत की ओर लपके।
"अनिकेत, पीछे हटो!" कबीर चिल्लाया।
अनिकेत ने अपनी बची हुई पूरी शक्ति लगाकर तांबे के त्रिशूल को आगे किया और चिल्लाया:
"ॐ वायु-पुत्राय नमः... वातं संहारय संहारय!"
त्रिशूल ने हवा में एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी। उड़ते हुए नुकीले औजार उस दीवार से टकराकर नीचे गिरने लगे, लेकिन राजेश्वरी के क्रोध का वेग इतना प्रचंड था कि अनिकेत का त्रिशूल हाथ में ही थरथराने लगा। अनिकेत की पीठ पीछे की दीवार से जा टकराई और वह खून की उल्टी करते हुए बैठ गया।
"कबीर... मैं इसे... ज्यादा देर नहीं रोक पाऊंगा!" अनिकेत ने चीखते हुए कहा। "पेंडुलम... पेंडुलम की गति देखो! तुम्हें सही सेकंड में छलांग लगानी होगी... एक इंच की भी चूक हुई तो वह कुल्हाड़ी तुम्हें दो टुकड़ों में काट देगी!"
कबीर ने पेंडुलम की गति को ध्यान से देखा।
बाएं... दाएं... बाएं... दाएं...
पेंडुलम हर दो सेकंड में एक चक्कर पूरा कर रहा था। उसके केंद्र में वह कील चमक रही थी। कबीर के दोनों हाथ जले हुए थे, उंगलियों में पकड़ने की ताकत लगभग खत्म हो चुकी थी। लेकिन उसके पास सोचने का समय नहीं था। घड़ी की सुई 02:47 AM पर पहुंच चुकी थी।
केवल तेरह मिनट!
कबीर ने अपनी सांस रोकी। उसने अपने दोनों पैरों को फर्श पर जमाया।
जैसे ही पेंडुलम बाईं ओर जाकर अपने उच्चतम बिंदु पर एक मिलीसेकंड के लिए धीमा हुआ, कबीर ने अपनी पूरी जान लगाकर हवा में छलांग लगा दी!
हवा में तैरते हुए...
कबीर का दाहिना हाथ पेंडुलम के लोहे की छड़ से टकराया। जलती हुई हथेली के लोहे से टकराते ही असहनीय दर्द की एक लहर कबीर के मस्तिष्क में कौंध गई। कबीर के मुंह से चीख निकल गई, लेकिन उसने अपनी उंगलियों को उस लोहे के चारों ओर जकड़ लिया।
कबीर अब उस 10 फीट लंबे, झूलते हुए पेंडुलम के साथ हवा में उड़ रहा था!
सननन!
पेंडुलम पूरी गति से दाईं ओर गया। नीचे का फर्श तीस फीट नीचे चक्कर खा रहा था। हवा का दबाव कबीर के चेहरे को फाड़ देने पर आमादा था। कबीर ने अपने दूसरे हाथ को भी आगे बढ़ाया और पेंडुलम के मध्य में लगी उस तांत्रिक कील के पास अपनी पकड़ बना ली।
तभी, रानी राजेश्वरी का भयानक, विकृत चेहरा हवा में तैरता हुआ सीधे कबीर के सामने आ गया।
उसके सड़े हुए पंजों ने कबीर के गले को जकड़ लिया। उसकी ठंडी, जहरीली सांसें कबीर के चेहरे पर पड़ने लगीं:
"तू इस कील को नहीं छूएगा! यह हवेली मेरा मकबरा है... और तू यहीं मेरे साथ दफन होगा!"
कबीर का दम घुटने लगा। उसकी आंखों के आगे लाल और काले धब्बे तैरने लगे। उसके फेफड़ों में हवा खत्म हो रही थी। उसका एक हाथ पेंडुलम से छूटने लगा।
उसी अंतिम, डूबते हुए क्षण में, कबीर ने अपनी बची हुई चेतना से अपनी जैकेट की ज़िप खोली।
उसने सुनैना की उस लकड़ी की गुड़िया को बाहर निकाला और सीधे राजेश्वरी के चेहरे के सामने कर दिया।
"राजेश्वरी देवी... देखिए!" कबीर ने घुटती हुई आवाज में अपनी पूरी शक्ति से कहा। "यह सुनैना है! आपकी बेटी! वह 80 साल से इस अंधेरे में तड़प रही है... क्या आप अपनी ही बेटी को इस नर्क में हमेशा के लिए बांधना चाहती हैं?!"
राजेश्वरी के पंजे अचानक ठिठक गए।
उसकी सुलगती हुई नीली आंखों ने उस लकड़ी की गुड़िया को देखा। गुड़िया की अकेली आंख से आंसू की एक बूंद टपकी। और उसी पल, गुड़िया के भीतर से सुनैना की नन्हीं, सिसकती हुई आवाज उभरी:
"अम्मा... मुझे बहुत दर्द हो रहा है... बापू के शैतान को रोक लो अम्मा... मुझे अपने सीने से लगा लो..."
'अम्मा' शब्द सुनते ही रानी राजेश्वरी के चेहरे का शैतानी खौफ पिघलने लगा। उसके चेहरे पर 80 साल पुराना एक मां का असीम, हृदयविदारक दर्द लौट आया। उसकी आंखों से काले खून के आंसू बहने लगे। उसके जो बाल काले नागों की तरह लहरा रहे थे, वे शांत होकर नीचे गिर गए।
राजेश्वरी ने कांपते हुए अपनी धुंधली उंगलियों से उस गुड़िया के गाल को छुआ।
फिर, उसने अपनी नजरें कबीर पर टिकाईं। उसकी आवाज में अब कोई क्रोध नहीं था, केवल एक मां की अंतिम याचना थी:
"मेरी बच्ची को मुक्त कर दो, कबीर... इस पापी हवेली की नींव को राख में मिला दो!"
राजेश्वरी ने कबीर के गले से अपने हाथ हटा लिए और अपने दोनों हाथों से उस झूलते हुए पेंडुलम को हवा में ही थाम लिया!
पेंडुलम एक झटके में बीच में ही रुक गया।
कबीर ने बिना एक पल की भी देरी किए, अपने दोनों जले हुए हाथों से पेंडुलम के केंद्र में धंसी उस तीसरी तांत्रिक कील को दोनों तरफ से पकड़ लिया। उसने सुनैना की तांबे की चाबी को कील के पीछे फंसाया और अपने पूरे शरीर का वजन पीछे की ओर झोंक दिया।
"हर हर महादेव!" कबीर की गर्जना क्लॉक-रूम में गूंज उठी।
चर्रर्र... तड़ाक!
विशाल चिंगारियों और सफेद धुएं के बवंडर के साथ वह तीसरी तांत्रिक कील पेंडुलम की छाती को चीरती हुई बाहर आ गिरी!
कील के उखड़ते ही एक महा-विनाशकारी घटना घटी।
घड़ी के सारे विशालकाय पीतल के गियर एक साथ टूटकर बिखर गए। कमरे की विशाल कांच की डायल पूरी तरह चकनाचूर होकर बाहर घाटी में गिर गई।
रानी राजेश्वरी का साया धीरे-धीरे एक शांत, दिव्य सफेद रोशनी में बदलने लगा। उसने अपनी बेटी की गुड़िया की ओर देखकर मुस्कुराया और कबीर से कहा:
"कबीर... चौथी कील पाताल शिला के ठीक नीचे है... ठाकुर अब अपने पूर्ण दैत्य रूप में आ चुका है... वह किसी पर दया नहीं करेगा..."
इन अंतिम शब्दों के साथ राजेश्वरी की आत्मा एक चमकीली किरण बनकर आसमान की ओर विलीन हो गई।
कमरे की छत चरमराने लगी। कबीर पेंडुलम से नीचे फर्श पर कूदा और तेजी से अनिकेत के पास पहुंचा।
"अनिकेत! उठो! तीसरी कील निकल चुकी है!" कबीर ने अनिकेत को सहारा देकर खड़ा किया।
लेकिन तभी, पूरी देवदार हवेली की नींव में एक ऐसा भयानक भूकंप आया कि 70 फीट ऊंची मीनार एक तरफ झुकने लगी। नीचे मुख्य हवेली से पत्थरों के गिरने और दीवारों के फटने की कानफोड़ू आवाजें आने लगीं।
नीचे तहखाने की गहराई से एक ऐसी अमानवीय, गूंजती हुई दहाड़ सुनाई दी जिससे पूरी नील घाटी के पहाड़ कांप उठे।
कबीर ने अपनी घड़ी देखी।
समय हो रहा था—02:52 AM।
अंतिम प्रलय में केवल आठ मिनट बाकी थे।
हवेली के तीनों बाहरी रक्षा-कवच (उत्तर, पूर्व और पश्चिम) टूट चुके थे। अब पाताल शिला की सारी शैतानी ऊर्जा सीधे मुख्य तहखाने में केंद्रित हो चुकी थी। हवेली का मुख्य हॉल टूटकर पाताल के उस गड्ढे में समा रहा था।
"कबीर... अब कोई मंत्र... कोई सुरक्षा घेरा काम नहीं करेगा," अनिकेत ने अपने हाथ में पकड़े तांबे के त्रिशूल को देखा जो अब लाल अंगारे की तरह चमक रहा था। "अब केवल एक ही रास्ता है... उस तहखाने के नर्क में सीधे कूदना और 03:00 बजे से पहले उस त्रिशूल को शैतान के सीने के पार उतारना... या तो हम जीतेंगे, या हमारी राख भी इस घाटी से बाहर नहीं जाएगी!"
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा और ढहती हुई सीढ़ियों से नीचे उस पाताल रूपी तहखाने की ओर दौड़ लगा दी...