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भाग 6: रक्त-वृक्ष का संहार और अस्तबल की जलती बलि-वेदी
Piyashi Atma · Haunted Places · 11 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 6 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2042
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बर्फीले बगीचे में मौत का तांडव अपने चरम पर था। दस फीट ऊपर हवा में लटके डॉ. अनिकेत की पसलियों से 'कड़कड़ाहट' की आवाज आ रही थी। उस विशाल देवदार के महावृक्ष की कांटेदार शाखाएं किसी खूंखार अजगर की तरह अनिकेत के सीने को भींचती जा रही थीं। अनिकेत के मुंह से खून की लाल बूंदें टपककर नीचे की सफेद बर्फ पर गिर रही थीं, और हर गिरती बूंद के साथ वह रक्त-वृक्ष और अधिक उन्माद से कांप रहा था।
"कबीर... कील...!" अनिकेत का स्वर अब केवल एक धीमी घुरघुराहट बनकर रह गया था।
कबीर के पास सोचने या योजना बनाने के लिए एक सांस का भी समय नहीं था। उसके सामने उस दैत्य-रूपी वृक्ष की वह विशाल, काली जड़ थी, जिसके भीतर से गाढ़ा, बदबूदार काला खून उबल रहा था। जड़ के ठीक मध्य में वह दो फीट लंबी तांत्रिक कील धंसी हुई थी, जिसके शीर्ष पर बना नरमुंड अपनी लाल आंखों से कबीर को घूर रहा था।
कबीर ने अपनी दोनों मुट्ठियों में सुनैना की वह प्राचीन, सिद्ध तांबे की चाबी थामी और पूरी ताकत से जड़ की ओर छलांग लगा दी।
सटाक!
कबीर का शरीर बर्फीली, काई जमी जड़ से टकराया। उसी क्षण, पेड़ के मुख्य तने पर बने उस विकृत इंसानी चेहरे की भयानक आंखें नीचे कबीर की ओर घूमीं।
"तुच्छ कीड़े! तू इस बंधन को नहीं छू सकता!" पेड़ के तने से निकली गूंजती हुई आवाज ने कबीर के कान के पर्दे फाड़ दिए।
पेड़ की तीन नुकीली शाखाएं हवा में किसी भाले की तरह सीधी हुईं और कबीर की पीठ की ओर लपकीं। कबीर ने बिजली की फुर्ती से खुद को बाईं ओर लुढ़काया। शाखाएं बर्फ और पत्थर को चीरती हुई जमीन में छह इंच गहरी धंस गईं। कबीर ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपने दोनों हाथों से उस तांबे की चाबी की नोक को सीधे उस तांत्रिक कील के जोड़ (उसकी दरार) में फंसा दिया।
छनन्नन... भभक!
जैसे ही तांबे की उस पवित्र चाबी का स्पर्श उस शैतानी कील से हुआ, तांबे पर उकेरा गया 1939 का राजचिह्न नीली दिव्य अग्नि से प्रज्वलित हो उठा। सुनैना की मासूम आत्मा का पवित्र तेज उस अशुद्ध लोहे के भीतर किसी तेजाब की तरह उतरने लगा।
कील के चारों तरफ से काला, बदबूदार धुआं फुफकारते हुए निकलने लगा।
कबीर ने अपने दोनों हाथ चाबी के हत्थे पर रखे और अपने पैरों को पेड़ के तने पर टिकाकर पूरी दैहिक ताकत से पीछे की ओर खींचा। उसकी बांहों की नसें फटने को हो गईं, हथेलियों की त्वचा लोहे के घर्षण से छिल गई और उसका अपना खून उस चाबी पर बहने लगा।
"हे महाकाल... इस पाताल के बंधन को तोड़ दो!" कबीर अपनी पूरी आत्मा की शक्ति से चीख पड़ा।
चर्रर्र... खट-खट... कड़ाक!
एक कानफोड़ू धमाके के साथ वह दो फीट लंबी भारी तांत्रिक कील जड़ के सीने को फाड़ती हुई बाहर आ गिरी!
कील के बाहर आते ही उस महावृक्ष के भीतर से किसी हजार इंसानों के एक साथ गले कटने जैसी असहनीय, खौफनाक चीख निकली:
"आssssह! हमारा पहला पहरा टूट गया...!"
पेड़ के तने पर बना वह भयानक चेहरा राख की तरह बिखरने लगा। पेड़ की छाल से काले खून का एक विशाल फव्वारा फूटा और कुछ ही पलों में वह हरा-भरा, विशाल देवदार का वृक्ष अंदर से जलकर कोयले का एक सूखा, काला कंकाल बन गया।
ऊपर हवा में जकड़ी शाखाएं एक झटके में निर्जीव होकर टूट गईं।
धड़ाम!
डॉ. अनिकेत दस फीट की ऊंचाई से सीधे नीचे बर्फ के ढेर पर आ गिरे। कबीर तेजी से घुटनों के बल रेंगता हुआ अनिकेत के पास पहुंचा। अनिकेत की आंखें अधखुली थीं, उनका चश्मा टूट चुका था और सांसें बेहद उखड़ी हुई थीं।
"अनिकेत! आंखें खोलो अनिकेत!" कबीर ने अपनी जैकेट उतारकर अनिकेत के सीने पर रखी और उसके मुंह से बहते खून को अपनी आस्तीन से साफ किया।
अनिकेत ने लड़खड़ाते हाथों से कबीर का कंधा पकड़ा और दर्द से कराहते हुए कहा, "क... कबीर... शाबाश... उत्तर दिशा... जल तत्व का बंधन टूट गया। लेकिन... लेकिन हमारे पास वक्त नहीं है। घड़ी देखो..."
कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। उस पर समय की सुइयां बेरहमी से आगे बढ़ रही थीं—02:28 AM।
हवेली के अंतिम जागरण में अब केवल 32 मिनट बचे थे।
"अनिकेत, तुम्हारी हालत बहुत खराब है। तुम्हारी पसलियां टूटी हुई हैं। तुम यहीं रुको, बाकी कीलें मैं अकेले निकालूंगा!" कबीर ने दृढ़ता से कहा।
"नहीं कबीर... तुम अकेले तंत्र के इस चक्रव्यूह को नहीं समझ पाओगे," अनिकेत ने दांत भींचकर खुद को बर्फ से ऊपर उठाया। उसने बर्फ में गिरे अपने तांबे के त्रिशूल को कांपते हाथों से थामा। "दूसरी कील पूर्व दिशा में है... हवेली की पुरानी घुड़साल (अस्तबल) में। वह अग्नि तत्व से बंधी है। वहां कापालिक अघोरानंद की सबसे क्रूर तांत्रिक माया पहरा दे रही है। मुझे तुम्हारे साथ चलना ही होगा... अगर मैं गिर भी जाऊं, तो भी तुम्हें रुकना नहीं है!"
कबीर ने अनिकेत के जज्बे को देखकर अपना सिर हिलाया और उसका एक हाथ अपने कंधे पर रखकर उसे सहारा दिया। दोनों लड़खड़ाते कदमों से हवेली के पूर्वी हिस्से की ओर बढ़ने लगे।
बगीचे के पार, देवदार के घने कुहासे के बीच पुरानी घुड़साल की जर्जर, काली इमारत खड़ी थी।
यह अस्तबल 1940 में लकड़ी और लाल ईंटों से बना था, लेकिन उस खूनी रात को लगी आग के बाद इसके केवल जले हुए खंभे और छत के टूटे हुए शहतीर बचे थे। चारों तरफ हवा में जले हुए मांस, सड़े हुए चमड़े और सल्फर की तीखी गंध भरी हुई थी। जमीन पर सूखी राख और बर्फ का एक अजीब, स्लेटी रंग का कीचड़ जमा था।
जैसे ही कबीर और अनिकेत ने अस्तबल के टूटे हुए लकड़ी के दरवाजे के भीतर कदम रखा, दरवाजे की चौखट पर बंधी दर्जनों पुरानी लोहे की नालें अपने आप आपस में टकराने लगीं—टन... टन... टन...
अस्तबल के दोनों तरफ बने घोड़ों के तबेले (Stalls) अंधकार में डूबे थे।
तभी, उन खाली तबेलों के भीतर से घोड़ों के जोर-जोर से हिनहिनाने और उनकी खुरों के जमीन पर पटकने की भयानक आवाजें आने लगीं। कबीर ने अपनी टॉर्च की रोशनी उन तबेलों पर डाली।
वहां जीवित घोड़े नहीं थे।
वहां लोहे की भारी जंजीरों में बंधे घोड़ों के दर्जनों जल चुके, कंकाल रूपी ढांचे खड़े थे। उनकी खोपड़ियों के भीतर से पीली आग की लपटें निकल रही थीं। वे सब एक साथ अपनी गर्दनें घुमाकर कबीर और अनिकेत को देखने लगे और उनके मुंह से झाग की जगह काला धुआं निकलने लगा।
"इन पर ध्यान मत दो कबीर, यह केवल दृष्टि-भ्रम (Illusion) है!" अनिकेत ने हांफते हुए चेतावनी दी। "सीधे केंद्र की ओर देखो!"
अस्तबल के ठीक बीचों-बीच, जहां कभी घोड़ों के पानी पीने का बड़ा हौज था, अब एक विशाल, अष्टकोणीय (Octagonal) अग्नि-वेदी बनी हुई थी। वह वेदी काले पत्थरों से बनी थी और उसके चारों कोनों पर इंसानी खोपड़ियों के ढेर लगे थे।
हवा में कोई लकड़ी या ईंधन नहीं था, फिर भी उस वेदी के भीतर से हरे और लाल रंग की भयानक आग की लपटें छह फीट ऊंची उठ रही थीं।
और उस धधकती अग्नि-वेदी के ठीक केंद्र में, आग की लपटों के बीच, लाल गर्म होकर चमकती हुई दूसरी तांत्रिक कील गड़ी हुई थी। वह कील आग की गर्मी से पिघलते लोहे जैसी लाल हो चुकी थी।
अचानक, उस अग्नि-वेदी के भीतर से आग की लपटें एक बवंडर की तरह घूमीं और हवा में एक विकृत, विशाल साया उभर आया।
यह साया ठाकुर विक्रम सिंह का नहीं था।
यह साया एक ऐसे तांत्रिक का था जिसका सिर उसके धड़ पर नहीं था! उसका कटा हुआ सिर उसकी बाईं कांख में दबा हुआ था, जिसकी दाढ़ी खून से सनी थी और आंखें पूरी तरह सफेद थीं। उसके बिना सिर वाले धड़ के सीने पर एक भयानक, दांतों से भरा मुंह बना हुआ था, जो जोर-जोर से हंस रहा था।
वह 1940 का वही दुष्ट तांत्रिक था—कापालिक अघोरानंद!
"हाहाहाहा! अभागे इंसानों!" अघोरानंद के कटे हुए सिर के होंठ हिले, लेकिन आवाज पूरे अस्तबल की छत को हिलाती हुई गूंजी। "तुमने उस मूर्ख ठाकुर की बेटी की मदद से पहली कील निकाल ली... लेकिन अग्नि के इस कुंड में तुम दोनों की हड्डियां तक भस्म हो जाएंगी! आज रात पाताल भैरव का सिंहासन सजेगा और तुम्हारी खोपड़ियां मेरी वेदी की शोभा बनेंगी!"
कापालिक के साए ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया।
अग्नि-वेदी से आग के तीन विशाल, जलते हुए गोले निकले और सीधे कबीर और अनिकेत की ओर लपके।
"कबीर, नीचे झुको!" अनिकेत ने कबीर को धक्का दिया और खुद आगे बढ़कर अपने तांबे के त्रिशूल को दोनों हाथों से थामकर आगे कर दिया।
अनिकेत ने अपने सूखे गले से पूरी शक्ति के साथ 'अग्नि-स्तंभन मंत्र' का उद्घोष किया:
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे... अग्निं स्तंभय स्तंभय स्वाहा!"
त्रिशूल के तीनों भालों से नीली रोशनी का एक विशाल अर्धचंद्राकार कवच बना। आग के गोले उस कवच से टकराए और भयानक विस्फोट के साथ चारों दिशाओं में बिखर गए। अस्तबल के लकड़ी के पुराने खंभों में आग लग गई। चारों तरफ लपटें उठने लगीं और दम घोंटने वाला धुआं भर गया।
अनिकेत इस महा-मंत्र के प्रभाव और अपनी टूटी पसलियों के दर्द को ज्यादा देर नहीं संभाल सके। उनके मुंह से खून की उल्टी हुई और वे घुटनों के बल गिर पड़े। नीली रोशनी का सुरक्षा कवच टूटने लगा।
"कबीर... मैं इस साए को केवल एक मिनट के लिए बांध सकता हूँ..." अनिकेत ने कांपते हाथों से त्रिशूल को जमीन में गाड़ते हुए कहा। "तुम्हें उस जलती वेदी के अंदर कूदना होगा... वह कील अत्यंत गर्म है... अपने हाथों की परवाह मत करना... उसे उखाड़ो कबीर!"
कबीर ने देखा कि कापालिक का साया दोबारा आग के नए गोले तैयार कर रहा था। अनिकेत अपनी जान की बाजी लगाकर उस साए की ऊर्जा को त्रिशूल के जरिए सोख रहे थे।
कबीर के पास कोई विकल्प नहीं था।
उसने अपनी दोनों हथेलियों पर अपनी मोटी चमड़े की जैकेट का कपड़ा लपेटा, अपनी सांस रोकी और सीधे उस धधकती अग्नि-वेदी के पत्थरों पर छलांग लगा दी!
सड़ssss!
वेदी के भीतर कदम रखते ही असहनीय ताप ने कबीर का स्वागत किया। उसके जूतों के तलवे पिघलने लगे। जैकेट का चमड़ा एक ही सेकंड में जलकर राख हो गया। लेकिन कबीर की नजरें केवल उस लाल-तप्त कील पर थीं।
उसने अपने नंगे, कांपते हाथों से उस दहकती हुई लोहे की कील को पकड़ लिया!
छपाक... फुस्स!
मांस के जलने की भयानक गंध हवा में फैली। कबीर के मुंह से एक अमानवीय, दर्दनाक चीख निकल गई:
"आaaaaaaह!"
उसकी हथेलियों की चमड़ी उस जलते लोहे से चिपक गई थी। असहनीय, जानलेवा दर्द उसके दिमाग की नसों को फाड़ रहा था। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। लेकिन उसी अंधेरे में उसे सुनैना का मासूम रोता हुआ चेहरा और अनिकेत की गिरती हुई देह दिखाई दी।
"मैं पीछे नहीं हटूंगा!" कबीर ने अपने पैरों को वेदी के जलते अंगारों में जमाया और अपनी रीढ़ की हड्डी की पूरी ताकत झोंकते हुए उस दहकती कील को ऊपर की ओर खींचा।
चर्रर्र... खटाक!
पत्थरों को चीरती हुई वह दूसरी तांत्रिक कील वेदी के सीने से बाहर निकल आई!
कील के उखड़ते ही एक अजूबा हुआ। वेदी की सारी हरी और लाल आग एक सेकंड में बुझ गई।
कापालिक अघोरानंद का बिना सिर वाला साया हवा में छटपटाने लगा। उसके कटे हुए सिर से खून के फव्वारे छूटे और वह दर्द से चीखता हुआ हवा में धुएं की तरह विलीन हो गया:
"नहीं! तीसरी कील समय के चक्र में बंधी है... तुम कभी मीनार तक नहीं पहुंच पाओगे... कभी नहीं!"
अस्तबल में अचानक गहरा, ठंडा सन्नाटा छा गया।
कबीर जलती हुई हथेलियों के साथ वेदी से बाहर बर्फ पर गिर पड़ा। उसकी दोनों हथेलियां पूरी तरह जलकर काली और लाल हो चुकी थीं। अनिकेत ने लड़खड़ाते हुए आकर अपनी जेब से गंगाजल और औषधीय भस्म निकाली और कबीर के जले हुए हाथों पर उड़ेल दी, जिससे कबीर को थोड़ी ठंडक मिली।
"कबीर... तुमने कर दिखाया... पूर्व दिशा, अग्नि तत्व का बंधन समाप्त हुआ," अनिकेत ने हांफते हुए कहा।
लेकिन इससे पहले कि वे दोनों संभल पाते, पूरी घाटी में एक भारी, धातुई ध्वनि गूंज उठी।
डोंग... डोंग... डोंग...
हवेली की सबसे ऊंची पश्चिमी मीनार पर लगी 80 साल पुरानी बंद घड़ी (Clock Tower) का विशाल घंटा अपने आप बजने लगा था। वह घंटा ठीक बारह बार बजा, जबकि रात के बज रहे थे—02:40 AM।
समय के 20 मिनट बचे थे।
कबीर और अनिकेत ने सिर उठाकर हवेली की उस 70 फीट ऊंची पश्चिमी मीनार की ओर देखा। मीनार के शीर्ष पर लगी विशाल घड़ी के कांच के पीछे से एक खून जैसा लाल प्रकाश निकल रहा था। और उस घड़ी के विशाल पेंडुलम पर, जो पागलों की तरह तेजी से इधर-उधर झूल रहा था, तीसरी तांत्रिक कील चमक रही थी।
और उस मीनार की टूटी हुई बालकनी में, हवेली की मालकिन रानी राजेश्वरी का सफेद लिबास में लिपटा, खून से लथपथ साया खड़ा था, जो नीचे खड़े कबीर और अनिकेत की ओर देखकर एक उन्मादी, रूह कंपा देने वाली हंसी हंस रही थी...