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भाग 5: रात 2 बजे का खूनी ऑडियो और प्राचीन पांडुलिपि का रहस्य
Piyashi Atma · Haunted Places · 12 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 5 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2241
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बर्फीली हवा के थपेड़ों के बीच देवदार के विशाल वृक्ष किसी मूक पहरेदार की तरह सिर उठाए खड़े थे। कबीर के हाथ में मौजूद मोबाइल फोन की स्क्रीन से नीली, अलौकिक रोशनी निकलकर उसके और डॉ. अनिकेत के चेहरों पर पड़ रही थी। फोन पिछले कई घंटों से पूरी तरह बंद था, उसकी बैटरी शून्य थी, फिर भी इस समय स्क्रीन पर समय चमक रहा था—02:00 AM।
स्क्रीन के बीचों-बीच एक ऑडियो फ़ाइल का आइकॉन धड़क रहा था, जैसे कोई इंसानी दिल धड़कता है। प्रेषक के नाम की जगह सिर्फ चार अंक दर्ज थे—1940।
"कबीर, इसे मत खोलो!" अनिकेत ने कबीर की कलाई को कसकर पकड़ते हुए फुसफुसाया। अनिकेत के माथे पर इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी पसीने की बूंदें चमक रही थीं। "यह कोई साधारण डिजिटल सिग्नल नहीं है। तंत्र-शास्त्र में इसे 'प्रेत-ध्वनि' कहते हैं। ये वो तरंगे हैं जो किसी अतृप्त आत्मा के चरम संताप से जन्म लेती हैं और धातु तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से जीवित इंसानों के मस्तिष्क पर सीधा प्रहार करती हैं।"
"अनिकेत, हम अब उस मोड़ पर हैं जहाँ पीछे मुड़ने का हर रास्ता बंद हो चुका है," कबीर की आवाज में एक अजीब सा ठहराव और दृढ़ता थी। "उस तहखाने में ठाकुर की बेटी सुनैना की रूह ने मुझे बताया कि हवेली का सच 1940 के उस दस्तावेज में दफन है। अगर यह संदेश 1940 से आया है, तो इसमें इस शैतानी चक्रव्यूह को तोड़ने की कोई न कोई कड़ी जरूर होगी।"
कबीर ने बिना एक पल गंवाए अपनी कांपती उंगली से स्क्रीन पर बने 'Play' बटन को छू दिया।
खड़-खड़... सर्रर्र...
शुरुआत में फोन के छोटे से स्पीकर से एक पुराने ग्रामोफोन के तवे पर सुई के घिसटने जैसी भारी चरचराहट की आवाज आई। फिर, बैकग्राउंड में दर्जनों औरतों और बच्चों के एक साथ रोने और दीवारों को पीटने की खौफनाक ध्वनियां उभरने लगीं। ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों लोग किसी जलते हुए कमरे के भीतर से मदद के लिए चीख रहे हों।
और फिर... एक भारी, थरथराती और पश्चाताप से भरी मर्दानी आवाज गूंजी।
"मैं ठाकुर विक्रम सिंह... आज 13 जनवरी 1940 की रात, अपने होश-ओ-हवास में यह अंतिम संदेश छोड़ रहा हूँ... यदि भविष्य में कोई जीवित मनुष्य इस भूमि पर कदम रखे, तो मेरी इस अंतिम चेतावनी को अपने लहू से लिख ले!"
आवाज में सांसों का भारीपन और भयानक दर्द साफ झलक रहा था।
"कापालिक अघोरानंद ने मुझे छल लिया! उसने कहा था कि पाताल शिला से निकलने वाला अमृत मुझे अमर कर देगा... लेकिन वह अमृत नहीं, साक्षात महाविनाश का बीज था। उस पत्थर ने मेरी पत्नी राजेश्वरी का रक्त पिया, मेरी नन्हीं सुनैना के प्राण खींचे... और अब वह मेरी आत्मा को अपनी बेड़ियों में जकड़ रहा है। मैंने अपनी अंतिम बची हुई तांत्रिक शक्ति से हवेली की चार दिशाओं में चार 'रक्त-कीलें' गाड़ दी हैं ताकि यह शैतान नील घाटी के बाहर न फैल सके।"
"पर याद रखना... हर 86 वर्ष बाद, जब महा-अमावस्या और खूनी चंद्र ग्रहण का संयोग बनता है, यह शिला अपने पूर्ण रूप में जागती है। आज से ठीक 86 साल बाद... कबीर और अनिकेत... तुम दोनों इस चौखट पर आओगे! यदि तुम रात 3 बजे से पहले उन चार कीलों को उखाड़कर शिला के केंद्र को नष्ट नहीं कर पाए... तो यह शैतान पूरे संसार को श्मशान बना देगा!"
धमाका... चीख... और ऑडियो अचानक एक लंबी, कानफाड़ू सीटी के साथ समाप्त हो गया!
कबीर और अनिकेत दोनों सन्न रह गए। जंगल के सन्नाटे में दोनों की तेज-तेज चलती सांसों के अलावा कोई आवाज नहीं थी। 86 साल पहले, 1940 में रिकॉर्ड हुई एक आवाज में कबीर और अनिकेत का नाम लिया जाना किसी भी तर्क, विज्ञान और बुद्धि की समझ से परे था।
"उसे... उसे हमारा नाम कैसे पता था?" कबीर का गला सूख चुका था।
"क्योंकि पाताल शिला समय के बंधन में नहीं बंधी है, कबीर," अनिकेत ने अपनी भारी, चमड़े की जिल्द वाली प्राचीन किताब को जीप के बोनट पर रखते हुए कहा। "जब कोई शैतानी शक्ति पाताल लोक से इस धरती पर आती है, तो वह भूत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ देख सकती है। ठाकुर विक्रम सिंह ने मरते वक्त भविष्य के उस कालखंड को देखा था जब इस अभिशाप का अंतिम निर्णय होना था... और वह कालखंड आज की रात है।"
अनिकेत ने लालटेन की बत्ती थोड़ी तेज की। पीली रोशनी में उसने अपनी किताब का एक पन्ना खोला। वह पन्ना भोजपत्र का बना था, जिस पर संस्कृत और तिब्बती भाषा की पुरानी लिपि में लाल स्याही (जो संभवतः सिंदूर और रक्त का मिश्रण थी) से एक नक्शा और कई मंत्र उकेरे गए थे।
"यह क्या है अनिकेत?" कबीर ने नक्शे की ओर झुकते हुए पूछा।
"यह 'काल-भैरव तंत्र' की वह दुर्लभ प्रतिलिपि है जिसे 1939 में ब्रिटिश सरकार के एक पुरातत्व अधिकारी ने देवदार हवेली की घटना के तुरंत बाद गुप्त रूप से जब्त किया था," अनिकेत ने पन्ने पर अपनी उंगली फिराते हुए समझाना शुरू किया। "इस दस्तावेज के अनुसार, देवदार हवेली की नींव में दबा वह काला पत्थर कोई सामान्य उल्कापिंड या चट्टान नहीं है। इसे 'अंध-शिला' या 'पाताल शिला' कहा जाता है। हजारों साल पहले, जब पाताल के असुरों को देवताओं ने परास्त किया था, तो उनके सबसे क्रूर सेनापति की आत्मा को इस शिला में कैद करके हिमालय की सबसे गहरी गर्त में गाड़ दिया गया था।"
अनिकेत ने नक्शे के चार अलग-अलग बिंदुओं पर इशारा किया:
उत्तर दिशा (जल तत्व): "पहली कील देवदार के उस प्राचीन महावृक्ष की जड़ों में गाड़ी गई है, जो हवेली के पिछले बगीचे में स्थित है। इसे 'रक्त-वृक्ष' कहा जाता है क्योंकि इसकी जड़ें सीधे पाताल के पानी से जुड़ी हैं।"
पूर्व दिशा (अग्नि तत्व): "दूसरी कील हवेली की पुरानी घुड़साल (अस्तबल) के ठीक बीच में बनी बलि-वेदी के नीचे है, जहाँ तांत्रिक अघोरानंद ने पहला नरबलि का हवन किया था।"
पश्चिम दिशा (वायु तत्व): "तीसरी कील हवेली की पश्चिमी मीनार पर बनी टूटी हुई घड़ी (क्लॉक टॉवर) के विशाल पेंडुलम के ठीक पीछे ठोंकी गई है, जो समय के चक्र को बांधती है।"
दक्षिण एवं केंद्र (पृथ्वी तत्व): "चौथी और अंतिम महा-कील सीधे मुख्य तहखाने में उस पाताल शिला के नीचे धंसी हुई है, जो इस पूरे अभिशाप का केंद्र है।"
"और इसे नष्ट करने की विधि क्या है?" कबीर ने पूछा। उसकी नजरें लगातार जीप के डैशबोर्ड पर लगी घड़ी पर जा रही थीं। समय तेजी से भाग रहा था—02:14 AM। उनके पास 45 मिनट से भी कम का समय बचा था।
अनिकेत ने अपने थैले से शुद्ध तांबे का बना एक भारी, प्राचीन त्रिशूल निकाला। उस त्रिशूल के तीनों भालों पर गुप्त मंत्र खुदे हुए थे और उसके मध्य भाग में गंगाजल और सिद्ध भस्म से भरा एक छोटा सा ताबीज जड़ा हुआ था।
"विधि अत्यंत कठिन और प्राणलेवा है," अनिकेत ने गंभीर स्वर में कहा। "हमें पहले तीनों दिशाओं—उत्तर, पूर्व और पश्चिम की कीलों को एक-एक करके उखाड़ना होगा। जैसे ही बाहरी तीन कीलें उखड़ेंगी, पाताल शिला का सुरक्षा-घेरा टूट जाएगा और उसकी सारी शैतानी ऊर्जा सीधे चौथे केंद्र पर केंद्रित हो जाएगी। उसके बाद, ठीक 3:00 बजे, जब शिला अपना मुंह खोलेगी, हमें इस सिद्ध तांबे के त्रिशूल को पवित्र अग्नि में तपाकर सीधे शिला की मध्य लाल आंख के भीतर उतारना होगा। यदि 03:00 AM से एक सेकंड की भी देरी हुई, तो शिला की ऊर्जा विस्फोटित हो जाएगी और यह पूरी घाटी पाताल में समा जाएगी।"
अभी अनिकेत की बात पूरी ही हुई थी कि अचानक पूरी घाटी में एक असहनीय, तीखी दुर्गंध फैल गई—जैसे सैकड़ों सड़े हुए शवों को एक साथ आग के हवाले कर दिया गया हो।
सर्रर्र... फड़-फड़-फड़!
पेड़ों पर बैठे सैकड़ों काले कौवे और चमगादड़ एक साथ चीखते हुए आसमान की ओर उड़ने लगे। आसमान में काले बादलों के बीच से झांकता हुआ चांद अचानक गहरे खूनी लाल रंग में तब्दील हो गया।
"कबीर! सुरक्षा घेरा बनाओ!" अनिकेत चिल्लाया।
तभी जीप की चारों खिड़कियों के शीशों पर बाहर से जोर-जोर से थप-थप की आवाजें आने लगीं।
धप... धप... धप!
कबीर और अनिकेत ने खौफ से देखा कि जीप के पारदर्शी शीशों पर बाहर से खून से लथपथ अनगिनत इंसानी हथेलियों के ताजे छापे पड़ रहे थे। कोई बाहर नहीं था, लेकिन कांच पर उंगलियों के निशान और उनसे बहता हुआ लाल खून साफ दिखाई दे रहा था।
तापमान इतनी तेजी से गिरा कि जीप के अंदर रखी पानी की बोतल का पानी कुछ ही पलों में ठोस बर्फ बन गया। सांस लेना ऐसा लग रहा था मानो फेफड़ों में कांच के बारीक टुकड़े भर रहे हों।
कड़कड़ाहट... चर्रर्र!
जीप के चारों तरफ खड़े देवदार के विशाल पेड़ों की शाखाएं अपने आप नीचे झुकने लगीं। उन शाखाओं से बर्फ नहीं, बल्कि लटके हुए कंकाल नीचे गिरने लगे। वे कंकाल जमीन पर गिरते ही किसी जीवित मकड़ी की तरह अपने हाथ-पैरों के बल रेंगते हुए जीप की तरफ बढ़ने लगे। उनकी खोपड़ियों की खाली आंखों में हरी आग जल रही थी और उनके जबड़े 'कट-कट-कट' की आवाज करते हुए आपस में टकरा रहे थे।
"वे हमें पहली कील तक नहीं पहुंचने देना चाहते!" कबीर ने अपनी जैकेट के भीतर से सुनैना की वह पुरानी लकड़ी की गुड़िया निकाली।
गुड़िया की अकेली आंख से निकलने वाली नीली रोशनी अब और भी तेज हो चुकी थी। कबीर ने देखा कि जैसे ही गुड़िया की रोशनी जीप के शीशों पर पड़ी, बाहर बने खून के निशान भाप बनकर उड़ने लगे।
"अनिकेत, इस गुड़िया में सुनैना की पवित्र आत्मा का वास है! यह हमें उन सायों से बचा सकती है!" कबीर ने कहा।
अनिकेत ने तुरंत अपनी जेब से कपूर की टिकिया और शुद्ध पीली सरसों निकाली। उसने मंत्र पढ़ते हुए जीप के दरवाजे को थोड़ा सा खोला और बाहर जलता हुआ कपूर और सरसों फेंक दी।
भभक!
जमीन पर नीली और पीली आग की एक दीवार खड़ी हो गई। रेंगते हुए कंकाल आग की लपटों से छूते ही दर्दनाक चीखें मारते हुए पीछे हटने लगे।
"कबीर, अब भागने का वक्त है! उत्तर दिशा का महावृक्ष यहाँ से केवल 100 मीटर दूर है!" अनिकेत ने हाथ में तांबे का त्रिशूल और लालटेन उठाई।
दोनों ने जीप का दरवाजा खोला और उस जलते हुए सुरक्षा-घेरे को चीरते हुए बर्फीले बगीचे की ओर दौड़ लगा दी।
चारों तरफ का दृश्य किसी भयानक दुस्वप्न जैसा था। हवा इतनी तेज थी कि आगे बढ़ना दूभर हो रहा था। बर्फ के नीचे से बार-बार कंकालों के हाथ निकलकर उनके जूतों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कबीर आगे-आगे गुड़िया की नीली रोशनी दिखाता जा रहा था, जिससे वे हाथ जलकर राख हो रहे थे।
लगभग पचास मीटर दौड़ने के बाद वे बगीचे के उत्तरी छोर पर पहुंचे।
वहां एक ऐसा देवदार का पेड़ खड़ा था जिसे देखकर किसी भी इंसान का कलेजा दहल जाए। वह पेड़ सामान्य देवदार से तीन गुना ज्यादा मोटा और पुराना था। उसकी छाल काली पड़ चुकी थी और उसकी विशाल जड़ों के बीच से गाढ़ा, लाल रंग का गोंद नहीं, बल्कि साक्षात खून रिस रहा था।
पेड़ की विशाल शाखाओं से 80 साल पुराने लोहे के फंदों में छह इंसानी साए लटके हुए थे, जो हवा में धीरे-धीरे झूल रहे थे।
"यही है वह 'रक्त-वृक्ष'!" अनिकेत ने हांफते हुए पेड़ की सबसे मुख्य जड़ की ओर इशारा किया। "देखो कबीर, उस मुख्य जड़ के बीच में वह क्या चमक रहा है!"
कबीर ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस मोटी जड़ के बीच डाली।
जड़ के ठीक मध्य में, लकड़ी के रेशों को चीरती हुई, लगभग दो फीट लंबी एक भारी, काले लोहे की तांत्रिक कील धंसी हुई थी। उस कील के शीर्ष पर एक नरमुंड की आकृति बनी थी और उसके चारों तरफ से लाल रंग का धुआं निकल रहा था।
"कबीर, उस कील को उखाड़ना होगा!" अनिकेत चिल्लाया। "मैं रक्षा मंत्र पढ़ता हूँ, तुम लोहे की रॉड से उस पर प्रहार करो!"
अनिकेत ने जमीन पर बैठकर भोजपत्र खोला और उच्च स्वर में वैदिक रक्षा मंत्रों का पाठ शुरू कर दिया। उसके मंत्रोच्चार के साथ ही त्रिशूल से सुनहरी तरंगे निकलकर पेड़ के चारों ओर एक घेरा बनाने लगीं।
कबीर ने अपने दोनों हाथों से लोहे की मजबूत रॉड पकड़ी और उस विशाल पेड़ के तने की ओर बढ़ा।
जैसे ही कबीर का पैर पेड़ की मुख्य जड़ पर पड़ा, पूरे जंगल में एक भयानक, कानफोड़ू चीख गूंज उठी।
आssssह!
वह आवाज किसी इंसान की नहीं, बल्कि उस साक्षात पेड़ की थी!
पेड़ की काली छाल में हलचल हुई और छाल के रेशे फटने लगे। कुछ ही पलों में पेड़ के मुख्य तने पर एक विशाल, विकृत और भयानक इंसानी चेहरा उभर आया। उस चेहरे की आंखें अंगारों जैसी जल रही थीं और उसका विशाल मुंह खुल गया, जिसके अंदर नुकीले लकड़ी के दांत थे।
"मूर्ख इंसानों! तुम महाकाल के दूत को जगाने आए हो?" पेड़ के तने पर बने उस विकृत चेहरे ने भयानक गर्जना की।
उसी क्षण, पेड़ की दो विशाल, कांटेदार शाखाएं किसी भूखे अजगर की तरह हवा में लहराईं। कबीर कुछ समझ पाता, इससे पहले ही एक शाखा ने कबीर के हाथ से लोहे की रॉड को झटके से छीनकर दूर बर्फ में फेंक दिया, और दूसरी शाखा ने पीछे मंत्र पढ़ रहे डॉ. अनिकेत की कमर को जकड़ लिया!
"अनिकेत!" कबीर चीखा।
शाखा ने अनिकेत को जमीन से दस फीट ऊपर हवा में उठा लिया और उसकी पसलियों को पूरी ताकत से भींचने लगी। अनिकेत के मुंह से खून की एक पतली धार निकल आई और उसके हाथ से तांबे का त्रिशूल छूटकर नीचे बर्फ में गिर गया।
"कबीर... मेरी परवाह मत करो..." अनिकेत ने दर्द से कराहते हुए हांफती आवाज में कहा। "कील... कील को उखाड़ो... समय नहीं बचा है... केवल 30 मिनट!"
पेड़ की शाखाएं अब कबीर की ओर भी लपक रही थीं। कबीर के पास कोई हथियार नहीं था। उसके सामने केवल वह खून रिसती हुई विशाल जड़ थी, जिसमें वह काली तांत्रिक कील धंसी हुई थी।
कबीर ने अपनी जैकेट के अंदर हाथ डाला। उसकी उंगलियां सुनैना की उस प्राचीन तांबे की चाबी से टकराईं, जो उसने बलि के कुएं से निकाली थी।
कबीर की आंखों में आग उतर आई। उसने अपनी पूरी जान की बाजी लगाते हुए उस महावृक्ष की खूनी जड़ की ओर छलांग लगा दी...