PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 4: दोराहे का मायाजाल, रोती हुई गुड़िया और खूनी कुआं

Piyashi Atma · Haunted Places · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
4 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
13 min
Words
2458
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

भूमिगत सुरंग के भीतर का अंधकार इतना घना और भारी था कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कबीर किसी विशालकाय अजगर के पेट में चल रहा हो। दीवारों से टपकती पानी की बूंदों की 'टप... टप...' ध्वनि सन्नाटे को और अधिक भयावह बना रही थी। कबीर के हाथ में मौजूद एलईडी टॉर्च की लाल बत्ती लगातार झपझपा रही थी, जो इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि कुछ ही मिनटों में रोशनी का यह आखिरी सहारा भी उसका साथ छोड़ देगा।

कबीर ठीक उस दोराहे पर खड़ा था जहाँ सुरंग दो अलग-अलग दिशाओं में बंट रही थी।

बाएं रास्ते से घुटनों तक भरे ठंडे पानी के बहने की और दूर किसी भारी चीज के गिरने की गड़गड़ाहट आ रही थी, जिसके साथ गंधक और सड़े हुए मांस की असहनीय बदबू हवा में तैर रही थी। दूसरी ओर, दाहिना रास्ता अपेक्षाकृत सूखा था, लेकिन वहां से आने वाली आवाज किसी के भी कलेजे को कंपाने के लिए काफी थी। वह किसी सात-आठ साल की छोटी बच्ची के सुबकने, रोने और दर्द भरी धीमी चीखों की आवाज थी:
"अम्मा... मुझे बहुत ठंड लग रही है... बापू, मुझे इस अंधेरे से बाहर निकालो..."

कबीर की पेशानियों पर ठंडे पसीने की बूंदें छलक आईं। एक खोजी पत्रकार के रूप में उसने कई भुतहा दावों की पड़ताल की थी, लेकिन इस वीरान हवेली की गहराई में जो कुछ घट रहा था, वह इंसानी सोच और विज्ञान की हर सीमा से परे था। उसके अंदर की मानवीय संवेदना ने जोर मारा—भले ही वह कोई रूह हो या कोई छलावा, उस मासूम आवाज को नजरअंदाज करना उसके लिए असंभव था।

उसने अपने बैकपैक के स्ट्रैप को सीने पर कसकर बांधा, हाथ में पकड़े लोहे के नुकीले डंडे को मजबूती से थामा और दाहिने रास्ते की ओर अपने कदम बढ़ा दिए।

दाहिनी सुरंग बेहद संकरी थी। छत इतनी नीची थी कि कबीर को झुककर चलना पड़ रहा था। दीवारों पर नुकीले काले पत्थर उभरे हुए थे, जिनसे टकराकर उसकी जैकेट जगह-जगह से फट गई। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, तापमान में अप्रत्याशित गिरावट आ रही थी। कबीर की हर सांस से निकलता सफेद धुआं टॉर्च की कमजोर रोशनी में तैर रहा था।

अचानक, उसके जूते के नीचे कोई गोल और कुरकुरी चीज टूटकर बिखरी। कबीर ने टॉर्च नीचे की। वह किसी छोटे जानवर की नहीं, बल्कि इंसानी पसलियों की सूखी हड्डियां थीं। हड्डियों के उस ढेर पर मकड़ियों के घने जाले बुने हुए थे।

कबीर ने अपना थूक निगला और आगे बढ़ा। लगभग पचास कदम चलने के बाद सुरंग अचानक एक गोलाकार, पुराने कमरे में जाकर खुली।

यह कमरा किसी पुराने दौर के बच्चों के कमरे जैसा सजा हुआ था, लेकिन समय और शैतानी सायों ने इसे नर्क के कोने में तब्दील कर दिया था। दीवारों पर लगा रेशमी वॉलपेपर सड़कर लटक रहा था। कमरे के बीचों-बीच लोहे का एक पुराना झूला छत से लटकी जंजीरों के सहारे टंगा था। सबसे खौफनाक बात यह थी कि कमरे में हवा का एक भी झोंका न होने के बावजूद, वह झूला बहुत धीमी गति से आगे-पीछे झूल रहा था—चर्रर्र... चर्रर्र... चर्रर्र...

कमरे के एक कोने में शीशम की एक छोटी सी मेज थी और उसके ऊपर धूल से ढका एक टूटा हुआ आईना रखा था। फर्श पर पुराने, चीथड़े बन चुके कपड़े और बच्चों के खिलौने बिखरे पड़े थे।

और ठीक झूले के नीचे... वह बैठी थी।

वह कोई जीवित इंसान नहीं, बल्कि लकड़ी और मिट्टी से बनी एक पुरानी पहाड़ी गुड़िया थी। गुड़िया ने लाल रंग का घाघरा पहना हुआ था, जिस पर चांदी के गोटे का काम था। लेकिन उसका चेहरा देखकर कबीर के रोंगटे खड़े हो गए। गुड़िया की बाईं आंख कांच की थी जो स्थिर थी, लेकिन उसकी दाहिनी आंख की जगह केवल एक गहरा, काला छेद था... और उस छेद से गाढ़ा, ताजा लाल खून टपक रहा था जो फर्श पर बूंद-बूंद गिर रहा था।

टप... टप... टप...

कमरे में रोने की आवाज अब बिल्कुल स्पष्ट थी। वह आवाज उसी गुड़िया के भीतर से आ रही थी।

कबीर सम्मोहित सा दो कदम आगे बढ़ा। उसने कांपते हाथों से गुड़िया की ओर हाथ बढ़ाया। जैसे ही उसकी उंगलियां गुड़िया के ठंडे, लकड़ी के कंधे से छुईं, झूले का झूलना एक झटके में रुक गया।

कमरे की पूरी हवा बर्फ की तरह जम गई। कबीर के मुंह से निकलने वाली सांसें तक जमने लगीं।

गुड़िया की लकड़ी की गर्दन में 'कड़कड़ाहट' की आवाज हुई और उसने अपना सिर धीरे-धीरे पूरा 180 डिग्री घुमाकर सीधे कबीर के चेहरे की ओर कर दिया। उसकी अकेली कांच की आंख में एक अजीब सी नीली रोशनी जल उठी।

गुड़िया के निर्जीव लकड़ी के होंठ हिले और कमरे की चारों दीवारों से एक साथ एक बच्ची की गूंजती हुई आवाज सुनाई दी:
"तुम कौन हो? क्या बापू ने तुम्हें भी बलि चढ़ाने के लिए भेजा है?"

कबीर पीछे की ओर गिरा। उसकी पीठ दीवार से जा टकराई। उसने थरथराते हुए कहा, "न... नहीं! मैं कबीर हूं। मैं तुम्हें नुकसान पहुंचाने नहीं आया। तुम कौन हो? क्या तुम सुनैना हो?"

'सुनैना' नाम सुनते ही कमरे के कोने में बंधी नीली धुंध तेजी से घूमने लगी। धुंध ने धीरे-धीरे एक नन्हीं बच्ची की पारदर्शी, चमकती हुई आकृति का रूप ले लिया। उसके चेहरे पर मासूमियत थी, लेकिन उसकी आंखों में असीम दर्द और खौफ का समंदर तैर रहा था। उसके नन्हे हाथों और पैरों में भारी लोहे की जंजीरें बंधी थीं, जिनके सिरे कमरे की जमीन में धंसे हुए थे।

"हां... मैं सुनैना हूं," उस रूह ने सिसकते हुए कहा। उसकी आवाज सीधे कबीर के दिमाग के भीतर गूंज रही थी। "80 साल हो गए कबीर... 80 साल से मैं इस अंधेरे तहखाने में अपनी गुड़िया के साथ कैद हूं। जिस रात बर्फ का सबसे बड़ा तूफान आया था, उस रात बापू (ठाकुर विक्रम सिंह) और उस काले लबादे वाले तांत्रिक ने मुझे यहां लाकर बांध दिया था।"

"उन्होंने ऐसा क्यों किया, सुनैना?" कबीर ने अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए पूछा। उसके अंदर का डर अब उस मासूम बच्ची के दर्द के आगे धीरे-धीरे पिघल रहा था।

सुनैना की रूह ने अपनी नन्हीं उंगली कमरे के फर्श की ओर उठाई।

"बापू को अमर होना था," सुनैना ने रोते हुए बताया। "तांत्रिक ने कहा था कि अगर हवेली की नींव में सोई 'पाताल शिला' को राजघराने के खून से नहलाया जाए, तो वह पत्थर बापू को कभी न खत्म होने वाली दौलत और अमरता देगा। बापू ने पहले मेरी मां... रानी राजेश्वरी को जहर दिया। फिर मुझे और मेरे छोटे भाई को इस कमरे में लाकर जीवित दीवारों में चुनवाने की कोशिश की। लेकिन..."

सुनैना का चेहरा अचानक भयानक खौफ से विकृत हो गया। उसके पारदर्शी शरीर के आर-पार लाल रंग की लकीरें चमकने लगीं।

"लेकिन क्या, सुनैना?" कबीर ने उत्सुकता और बेचैनी से पूछा।

"लेकिन वह पत्थर कोई वरदान नहीं था, कबीर!" सुनैना लगभग चीख उठी। "वह एक प्राचीन शैतान का कारागार था। जैसे ही पहला खून उस पत्थर पर गिरा, पत्थर से निकली काली लपटों ने सबसे पहले उस तांत्रिक का सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर बापू की आत्मा को खींचकर उस पत्थर ने अपना गुलाम बना लिया। उस रात हवेली में मौजूद 40 नौकर, दरबान, रसोइये... किसी को बाहर भागने का मौका नहीं मिला। हवेली के चारों कोनों पर तांत्रिक कीलें ठोक दी गईं ताकि कोई भी रूह इस परिसर से बाहर न जा सके।"

सुनैना ने आगे बढ़कर कबीर की आंखों में देखा। उसकी ठंडी, धुंधली उंगलियों ने कबीर के गाल को छुआ, जिससे कबीर के पूरे शरीर में बिजली का एक झटका सा दौड़ा।

"कबीर... बापू की आत्मा अब इंसान नहीं रही। वह उस पाताल शिला की भूख बन चुके हैं। जब भी कोई जीवित इंसान इस घाटी की सीमा में कदम रखता है, बापू का साया उसे खींचकर हवेली के अंदर ले आता है ताकि उसका खून शिला को पिलाकर अपनी मुक्ति की झूठी उम्मीद को पूरा कर सके। पिछले 80 सालों में दर्जनों मुसाफिर, चरवाहे और शिकारी इस हवेली में आए... और कोई कभी वापस नहीं लौटा!"

"इस अभिशाप को कैसे तोड़ा जा सकता है, सुनैना? मैं तुम्हें और इन सभी आत्माओं को यहां से मुक्त कराना चाहता हूं!" कबीर ने दृढ़ स्वर में कहा।

सुनैना ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया। "इस गुड़िया के सीने के अंदर एक तांबे की प्राचीन चाबी छिपी है। वह चाबी हवेली के पिछले बगीचे में बने 'बलि के कुएं' के गुप्त दरवाजे की है। लेकिन तुम्हें बहुत जल्दी करनी होगी... बापू को पता चल चुका है कि तुम मेरे कमरे में हो!"

उसी क्षण, पूरी सुरंग और वह गोल कमरा किसी भयानक भूकंप की तरह कांपने लगा।

छत से बड़े-बड़े पत्थर टूटकर नीचे गिरने लगे। कमरे की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों से गाढ़ा, बदबूदार काला तरल रिसने लगा। सुरंग के मुख्य द्वार से एक भयानक, गूंजती हुई दहाड़ सुनाई दी:
"सुनैना! तूने हमारे कुल के राज को एक अजनबी के सामने खोल दिया... अब यह भी यहीं सड़ेगा!"

कमरे के प्रवेश द्वार पर ठाकुर विक्रम सिंह का विशाल, जलता हुआ साया प्रकट हुआ। उसकी आंखें खून के अंगारे की तरह दहक रही थीं और उसके हाथों की उंगलियां नुकीले खंजरों जैसी लंबी हो चुकी थीं। उसके पीछे दर्जनों काली, बिना चेहरे वाली परछाइयां तैर रही थीं।

"कबीर, भागो!" सुनैना की रूह पूरी ताकत से चिल्लाई। उसने अपने दोनों हाथ आगे किए और नीली रोशनी का एक सुरक्षा चक्र कबीर के चारों ओर बना दिया। "गुड़िया को उठाओ और बाएं रास्ते की तरफ भागो! वह रास्ता सीधे बलि के कुएं तक जाता है... रुकना मत कबीर!"

कबीर ने बिना एक सेकंड गंवाए जमीन पर पड़ी उस खून रिसती गुड़िया को उठाया और अपने जैकेट के अंदर दबा लिया।

ठाकुर का साया हवा में चीरता हुआ आगे बढ़ा। जैसे ही उसने कबीर पर वार करने के लिए अपने पंजे आगे बढ़ाए, सुनैना के सुरक्षा चक्र ने उसे जोरदार झटका देकर पीछे धकेल दिया। ठाकुर दर्द और क्रोध से दहाड़ उठा।

कबीर पूरी ताकत से कमरे से बाहर निकला और मुख्य दोराहे की ओर भागा। पीछे से दीवारों के टूटने, पत्थरों के गिरने और सैकड़ों रूहों के चीखने की आवाजें आ रही थीं।

दोराहे पर पहुंचकर कबीर बिना रुके बाएं रास्ते में कूद गया।

बाएं रास्ते में कदम रखते ही बर्फीला, काला पानी उसकी कमर तक आ गया। पानी इतना ठंडा था कि कबीर के पैरों की नसें खिंचने लगीं। लेकिन रुकने का मतलब सिर्फ और सिर्फ मौत थी। वह पानी को चीरता हुआ पागलों की तरह आगे बढ़ रहा था।

पानी के भीतर अचानक हलचल शुरू हो गई। कबीर को महसूस हुआ कि पानी के नीचे से अनगिनत ठंडे, सड़े हुए हाथ उसके पैरों को पकड़कर नीचे खींचने की कोशिश कर रहे हैं।

छपाक... छपाक!

कबीर ने अपने हाथ में मौजूद लोहे के डंडे से पानी के नीचे वार किया। एक कंकाल का हाथ टूटकर सतह पर तैरने लगा। कबीर ने अपनी सारी बची हुई ताकत लगा दी और आगे की ओर छलांग लगाई।

लगभग बीस मीटर आगे जाकर पानी खत्म हुआ और सुरंग एक विशाल, गहरे कुएं के तल में जाकर खुली।

ऊपर की ओर देखने पर कबीर को लगभग चालीस फीट ऊपर बादलों से ढका रात का धुंधला आसमान और उसमें चमकता हुआ अधूरा चांद दिखाई दिया। कुएं की गोलाकार, काई जमी पथरीली दीवारों पर लोहे के जंग लगे पुराने सरिए (सीढ़ियां) लगे हुए थे।

लेकिन सबसे भयावह दृश्य कुएं के तल पर था।

कुएं का तल हड्डियों और खोपड़ियों के एक विशाल ढेर से भरा पड़ा था। और कुएं के बीचों-बीच बने एक गोल पत्थर के चबूतरे से लाल रंग का पानी किसी फव्वारे की तरह उबल रहा था। उस उबलते लाल पानी के अंदर से उन दर्जनों अभागे लोगों के विकृत चेहरे उभर रहे थे, जो पिछले दशकों में इस हवेली की भेंट चढ़े थे। वे सब एक सुर में विलाप कर रहे थे:
"हमें बाहर निकालो... हमें शांति दो..."

कबीर ने अपनी जैकेट से गुड़िया को निकाला। गुड़िया के सीने पर एक छोटा सा तांबे का ढक्कन बना था। कबीर ने अपनी कांपती उंगलियों से उसे खोला। उसके अंदर से एक भारी, हरी काई जमी तांबे की प्राचीन चाबी निकली, जिस पर 1939 का राजचिह्न खुदा हुआ था।

कबीर ने चाबी को अपनी जेब में सुरक्षित रखा और कुएं की दीवार पर लगे लोहे के पहले सरिए को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

चर्रर्र...

लोहा बेहद पुराना और कमजोर था, लेकिन कबीर के पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उसने एक-एक कदम ऊपर बढ़ाना शुरू किया।

जब वह कुएं के आधे रास्ते (लगभग 20 फीट) पर पहुंचा, तो नीचे कुएं का पूरा पानी खौलने लगा। उबलते लाल पानी में से एक विशाल, काले धुएं का बवंडर उठा और ठाकुर विक्रम सिंह का विकृत चेहरा उस बवंडर के बीच में उभर आया।

"तू इस कुएं से बाहर नहीं जा सकता, कबीर!" ठाकुर की आवाज कुएं की दीवारों में गूंज उठी।

काले धुएं के हाथों ने कबीर के दोनों टखनों को जकड़ लिया। खिंचाव इतना जबरदस्त था कि कबीर के हाथ से लोहे का सरिया लगभग छूटने ही वाला था। कबीर के कंधे की नसें फटने लगीं।

कबीर ने दांत भींचकर अपनी जेब से वह तांबे की चाबी निकाली। चाबी पर सुनैना की पवित्र रूह का स्पर्श था। कबीर ने पूरी ताकत से उस चाबी को अपने टखने को जकड़े उस काले धुएं के साए पर दे मारा।

छनन्नन!

एक तेज नीली चिंगारी निकली और ठाकुर का साया दर्द से चीखता हुआ नीचे खौलते पानी में जा गिरा।

कबीर ने अपनी बची-खुची जान लगाकर ऊपर की ओर छलांग लगाई और कुएं की मुंडेर को दोनों हाथों से पकड़कर खुद को बाहर जमीन पर खींच लिया।

वह हांफते हुए बर्फीली जमीन पर गिर पड़ा। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। वह हवेली के पीछे बने घने, वीरान देवदार के बगीचे में था। चारों तरफ विशाल पेड़ काली परछाइयों की तरह खड़े थे और जमीन पर सफेद बर्फ की मोटी चादर बिछी थी।

कबीर ने राहत की सांस ली ही थी कि बगीचे के पेड़ों के पीछे से सूखी पत्तियों और बर्फ पर किसी के भारी कदमों की 'चर्र-चर्र' आवाज आने लगी।

कबीर ने तुरंत उठकर लोहे का डंडा आगे कर दिया।

सामने घने कोहरे को चीरती हुई दो तेज हेडलाइट्स की पीली रोशनी चमकी। एक पुरानी महिंद्रा थार जीप पेड़ों के बीच आकर रुकी। जीप का दरवाजा खुला और ड्राइविंग सीट से एक लंबा, चश्मा पहने शख्स हाथ में लालटेन और एक भारी प्राचीन किताब लिए बाहर निकला।

कबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं।

वह कोई और नहीं, बल्कि उसका सबसे पुराना दोस्त और प्राचीन तंत्र-इतिहास का विशेषज्ञ डॉ. अनिकेत था!

अनिकेत के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। उसने कबीर को लहूलुहान और बर्फ से ढका देखकर दौड़कर उसे सहारा दिया।

"कबीर! भगवान का शुक्र है तुम जिंदा हो!" अनिकेत ने हांफते हुए कहा। उसकी आवाज में गहरा डर था। "मुझे दिल्ली के नेशनल आर्काइव्स से 1939 की वह सीक्रेट फाइल मिल गई है... कबीर, तुम जिस खतरे के बीच खड़े हो, वह केवल एक हवेली का भूत नहीं है! वह पाताल शिला आज रात 3 बजे पूरी तरह जागने वाली है... और अगर हमने 40 मिनट के अंदर इसे नहीं रोका, तो इस घाटी का कोई इंसान कल का सूरज नहीं देख पाएगा!"

कबीर ने अनिकेत की आंखों में देखा। तभी कबीर की जेब में रखा उसका फोन, जो पिछले पांच घंटों से पूरी तरह डेड था, अचानक जोर-जोर से वाइब्रेट करने लगा।

स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।

स्क्रीन पर केवल एक समय चमक रहा था—'02:00 AM'... और नीचे एक नया ऑडियो मैसेज आया था!

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