PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 3: 1940 की काली रात का सच और खूनी परछाइयां

Piyashi Atma · Haunted Places · 5 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
3 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
5 min
Words
947
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

पत्थर की उन संकरी और फिसलन भरी सीढ़ियों को देखकर कबीर के रोंगटे खड़े हो गए। सीढ़ियों की दीवारों पर मशालों के पुराने, जले हुए स्टैंड लगे थे और उन पर जमी काई से अजीब सा हरा धुआं रिस रहा था। 'स्वागत है कबीर'—खून से लिखे इन ताजे शब्दों ने यह साबित कर दिया था कि हवेली में जो कुछ भी था, वह कबीर के हर कदम से वाकिफ था।

कबीर ने लाइब्रेरी का दरवाजा देखा। बाहर गलियारे से लगातार लोहे की चेन घिसटने और दरवाजों को पीटने की आवाजें आ रही थीं। पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं था। हवेली ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था।

कबीर ने गहरी सांस ली, अपने कैमरे को सीने के स्ट्रैप पर मजबूती से कसा और अपनी टॉर्च की रोशनी नीचे अंधेरी सीढ़ियों पर डाली।

एक... दो... तीन...

कबीर एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहा था। हर कदम के साथ हवा में सड़ांध और गंधक (सल्फर) की बदबू बढ़ती जा रही थी। सीढ़ियों पर पानी की बूंदें टपक रही थीं। जब वह 12वीं सीढ़ी पर पहुंचा, तो उसे ठाकुर विक्रम सिंह की डायरी की चेतावनी याद आई—“13वीं सीढ़ी के नीचे कभी मत जाना।”

कबीर ने 13वीं सीढ़ी को ध्यान से देखा। वह पत्थर बाकी सीढ़ियों से अलग था; उस पर एक अजीब खोपड़ी का निशान खुदा हुआ था। कबीर ने सावधानी से अपना पैर 13वीं सीढ़ी के पार रखकर सीधे 14वीं सीढ़ी पर रखा।

जैसे ही उसका पैर आगे पड़ा, पूरी सीढ़ी थरथरा उठी और पीछे की 13वीं सीढ़ी अपने आप नीचे धंस गई, जिसके नीचे नुकीले लोहे के त्रिशूल लगे हुए थे। कबीर के माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें छलक आईं। अगर उसने जरा सी भी जल्दबाजी की होती, तो वह उसी क्षण मौत के मुंह में समा जाता।

सीढ़ियां खत्म होते ही कबीर एक बहुत बड़े भूमिगत तहखाने में पहुंच गया।

यह तहखाना किसी प्राचीन कालकोठरी जैसा था। बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार चबूतरा बना था, जिसके चारों तरफ लोहे की मजबूत जंजीरें लटकी हुई थीं। चबूतरे के केंद्र में एक आदमकद काला पत्थर रखा था, जिस पर अजीबोगरीब लाल रंग की नसें जैसी लकीरें दौड़ रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो वह पत्थर सांस ले रहा हो और उसके अंदर कोई दिल धड़क रहा हो।

तहखाने के कोनों में कई पुराने लोहे के पिंजरे लटके थे। जब कबीर ने टॉर्च की रोशनी उन पिंजरों पर डाली, तो खौफ से उसकी चीख निकल गई।

पिंजरों के अंदर इंसानी कंकाल बंद थे। उनके गले में पुराने जमाने के तांबे के लॉकेट लटके थे। वे ठाकुर के परिवार और नौकरों के अवशेष थे, जिन्हें 1940 की उस खूनी रात को यहां बलि चढ़ाया गया था।

तभी, तहखाने के सन्नाटे में एक भारी, गूंजती हुई मर्दानी आवाज गूंजी:
"तुमने चेतावनी नहीं मानी, लड़के..."

कबीर चौंककर घूमा। चबूतरे के पास, धुंध के बीच एक लंबा साया उभरने लगा। वह साया धीरे-धीरे एक ठोस रूप लेने लगा। वह 1940 के दौर के राजसी कुर्ते और चूड़ीदार पजामे में खड़ा एक शख्स था। उसका चेहरा आधा जला हुआ था, लेकिन उसकी मूंछें और तीखी आंखें बिल्कुल वैसी ही थीं जैसी हॉल में लगी ठाकुर विक्रम सिंह की तस्वीर में थीं।

"ठाकुर विक्रम सिंह?" कबीर की आवाज कांपी।

"ठाकुर विक्रम सिंह तो उसी रात मर गया था," वह साया एक भयानक हंसी हंसा। उसकी आवाज में एक साथ कई मर्दों और औरतों की आवाजें मिली हुई थीं। "अब मैं केवल इस हवेली का दर्द और भूख हूं। 80 साल पहले इस घाटी के राजा ने अपनी सत्ता और अमरता के लिए इस पाताल शिला को जगाया था। लेकिन इस शिला को अमरता देने के बदले... खून चाहिए था!"

साया धीरे-धीरे कबीर की तरफ हवा में तैरते हुए बढ़ने लगा।

"उस रात मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे वफादार नौकर... सब इस शिला की भेंट चढ़ गए। और जब तांत्रिक ने हमें इस हवेली के भीतर कील दिया, तो हमारी आत्माएं इसी अंधकार में सड़ने के लिए छोड़ दी गईं। हमें यहां से मुक्ति चाहिए... और मुक्ति का रास्ता केवल एक जीवित इंसान के ताजा लहू से खुल सकता है!"

कबीर ने हिम्मत जुटाकर चिल्लाया, "मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं! मुझे बताओ कि इस अभिशाप को कैसे तोड़ा जाए!"

"मदद?" ठाकुर का साया चिल्लाया। उसकी आंखें अंगारों की तरह दहक उठीं। "कोई इंसान शैतान की भूख को शांत नहीं कर सकता!"

उसी पल, तहखाने के चारों कोनों से लटके कंकालों में हरकत होने लगी। हड्डियों के जुड़ने की 'कट-कट' आवाज के साथ पिंजरे अपने आप खुल गए और वो कंकाल जमीन पर रेंगते हुए कबीर की तरफ बढ़ने लगे।

कबीर ने अपने बैग से इमरजेंसी फ्लेयर (आग का गोला) निकाला और उसका पिन खींच दिया।

फूssssश!

एक तेज, लाल रोशनी का धमाका हुआ और भयंकर आग का शोला भड़क उठा। आग की तेज रोशनी पड़ते ही कंकाल और ठाकुर का साया दर्द से चीख उठे और पीछे हटने लगे। आत्माएं रोशनी और पवित्र अग्नि को सहन नहीं कर पा रही थीं।

कबीर को भागने का एक मौका मिल गया। तहखाने के दूसरे छोर पर लोहे का एक छोटा सा जंग लगा दरवाजा था जो शायद बाहर जाने वाली किसी पुरानी गुप्त सुरंग का था।

कबीर पूरी ताकत से उस दरवाजे की तरफ दौड़ा। कंकालों के हाथ उसके पैरों और जैकेट को नोचने की कोशिश कर रहे थे। कबीर ने अपने बूट की जोरदार ठोकर मारकर दरवाजे को तोड़ा और अंधेरी सुरंग में छलांग लगा दी।

पीछे तहखाने से ठाकुर के साए की भयानक गर्जना गूंज रही थी:
"तुम इस घाटी से कभी जिंदा बाहर नहीं जा सकोगे, कबीर! अमावस की रात शुरू हो चुकी है..."

सुरंग संकरी और गीली थी। कबीर हांफते हुए आगे भाग रहा था, लेकिन कुछ ही दूरी पर जाकर सुरंग दो रास्तों में बंट गई।

बाएं रास्ते से पानी के बहने की आवाज आ रही थी, जबकि दाहिने रास्ते से किसी छोटे बच्चे के रोने और 'बचाओ... बचाओ...' की आवाज आ रही थी।

कबीर दोराहे पर रुक गया। उसकी टॉर्च की बैटरी अब लाल बत्ती दिखाकर झपझपाने लगी थी...

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