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भाग 2: अंधेरे का शिकंजा और बंद तहखाना
Piyashi Atma · Haunted Places · 5 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 2 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 5 min
- Words
- 975
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
घोर अंधकार में कबीर की सांसें थम चुकी थीं। उसकी गर्दन के ठीक पीछे महसूस हो रही बर्फ जैसी ठंडी सांसों ने उसके पूरे जिस्म को सुन्न कर दिया था। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने बर्फ का एक बड़ा सा टुकड़ा उसकी रीढ़ की हड्डी पर रख दिया हो। कमरे में सड़ी हुई गंध इतनी तीव्र हो गई थी कि सांस लेना भी दूभर हो रहा था।
कबीर ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने पैंट की पिछली जेब से अपना पुराना मेटल लाइटर निकाला और थरथराते अंगूठे से उसका पहिया घुमाया।
चिक... चिक... भक!
पीली, कांपती हुई लौ जली। रोशनी की उस नन्हीं सी किरण में कबीर ने धीरे से अपनी गर्दन पीछे घुमाई।
वहां कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर, ठीक उसी जगह जहां वह खड़ा था, ताजे गीले पैरों के काले निशान बने हुए थे—उल्टे पैर, जिनकी एड़ियां आगे और उंगलियां पीछे की तरफ थीं।
लाइटर की लौ अचानक फड़फड़ाने लगी, मानो कमरे में मौजूद कोई अनदेखा साया उस पर फूंक मार रहा हो। कबीर ने बिना एक पल गंवाए अपने कंधे पर लटके बैग से स्पेयर एलईडी टॉर्च निकाली और उसका स्विच दबाया। दूधिया रोशनी का तेज पुंज सामने की दीवार पर पड़ा।
कमरे की दीवारें अब पहले जैसी नहीं थीं। दीवारों का पुराना वॉलपेपर उखड़ चुका था और उन पर कोयले या शायद सूखे खून से अनगिनत अजीबोगरीब तांत्रिक प्रतीक और उल्टे त्रिकोण बने हुए थे। पियानो की चाबियों पर अब खून जैसे लाल रंग के धब्बे ताजा दिखाई दे रहे थे।
कबीर ने दरवाजे के हैंडल को दोनों हाथों से पकड़कर पूरी ताकत से खींचा।
चर्रर्र... खट!
दरवाजा भारी आवाज के साथ थोड़ा सा खुला। कबीर ने अपना कंधा अड़ाया और खुद को बाहर गलियारे में धकेल दिया। बाहर आते ही उसने दरवाजे को पीछे से बंद करने की कोशिश की, मगर गलियारे में फैली धुंध देखकर उसके कदम वहीं जम गए।
पहली मंजिल का लंबा गलियारा अब घने, नीले कोहरे से भर चुका था। गलियारे की दोनों दीवारों पर लगी पुरानी पेंटिंग्स की आंखें टॉर्च की रोशनी में चमक रही थीं। कबीर को लगा जैसे तस्वीरों में कैद वो चेहरे उसे ही देख रहे हों।
तभी, गलियारे के दूसरे छोर से एक भारी धातु की चेन घिसटने की आवाज आई।
झन... झन... घसीट...
आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ रही थी। उस आवाज के साथ-साथ किसी औरत के सिसकने और दर्द में कराहने की आवाज भी गूंजने लगी:
"मुझे मत बांधो... मुझे छोड़ दो... आग मत लगाओ..."
कबीर का दिमाग कह रहा था कि यह किसी भी वैज्ञानिक समझ से परे है, लेकिन उसका पत्रकार वाला साहस अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। उसने अपना कैमरा सीने पर टिकाया और गलियारे के दाहिनी ओर बने एक बड़े दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे पर पीतल की प्लेट पर लिखा था—'लाइब्रेरी' (पुस्तकालय)।
कबीर ने धक्का दिया और अंदर घुसकर तुरंत भारी कुंडी चढ़ा दी।
लाइब्रेरी विशाल थी। फर्श से लेकर ऊंची छत तक पुरानी लकड़ी की अलमारियां किताबों से भरी थीं। हवा में पुरानी कागजों की सीलन भरी खुशबू थी। कमरे के बीच में शीशम की एक भारी मेज रखी थी, जिस पर एक पुराना पीतल का लैंप, स्याही की दवात और धूल से ढकी एक मोटी डायरी रखी थी।
कबीर तेजी से मेज की तरफ बढ़ा। उसने अपनी आस्तीन से डायरी की जिल्द साफ की। भूरे चमड़े की जिल्द पर सुनहरे अक्षरों में उकेरा गया था:
'ठाकुर विक्रम सिंह — निजी दैनंदिनी (1938–1940)'
कबीर के हाथ अनजाने ही कांप उठे। यह वही डायरी थी जिसे पिछले 80 सालों से कोई नहीं देख पाया था। उसने पहला पन्ना पलटा। पन्ने पीले पड़ चुके थे और लिखावट उर्दू और पुरानी हिंदी के मिले-जुले रूप में थी।
पहला पन्ना सामान्य था, जिसमें जमींदारी और मौसम का जिक्र था। लेकिन जैसे-जैसे पन्ने आगे बढ़े, लिखावट में एक अजीब सा पागलपन और डर साफ झलकने लगा।
14 अक्टूबर, 1939:
"राजेश्वरी की बीमारी अब कोई साधारण रोग नहीं रही। वह रात को उठकर अंधेरे में दीवारों से बातें करती है। वह कहती है कि हवेली के नीचे कोई जागा है... कोई ऐसा जो सदियों से भूखा था। आज मैंने तिब्बत से आए उस तांत्रिक की बात मानकर तहखाने का गुप्त दरवाजा खोल दिया है। हमने उस काले पत्थर को बाहर निकाल लिया है..."
29 नवंबर, 1939:
"हमने बहुत बड़ी गलती कर दी। वो पत्थर नहीं है... वो एक दरवाजा है। राजेश्वरी अब मेरी पत्नी नहीं रही। उसकी आंखों का रंग लाल हो चुका है और उसकी परछाईं दो दिखाई देती हैं। हवेली के नौकर एक-एक करके गायब हो रहे हैं। कल रात रसोई के लड़के का शव बगीचे के कुएं में मिला... उसके शरीर में खून की एक बूंद भी नहीं बची थी।"
कबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे और आखिरी प्रविष्टि पर पहुंचा।
13 जनवरी, 1940 (अमावस्या की रात):
"आज सब खत्म हो जाएगा। हवेली की चारों दिशाओं को तांत्रिक कीलों से बांध दिया गया है ताकि यह शैतान बाहर घाटी में न फैल सके। हम सब अंदर कैद हैं। अगर कोई भविष्य में इस डायरी को पढ़े, तो याद रखना—तहखाने की 13वीं सीढ़ी के नीचे कभी मत जाना। वह आज भी वहीं जिंदा है..."
डायरी का पन्ना यहीं खत्म हो गया था। नीचे खून का एक सूखा हुआ पंजा छपा था।
तभी लाइब्रेरी की छत से धूल झड़ने लगी। मेज पर रखा पीतल का लैंप थरथराने लगा। कबीर ने टॉर्च ऊपर की ओर उठाई।
लाइब्रेरी के विशाल लकड़ी के फर्श के नीचे से धमक की आवाजें आने लगीं—धम... धम... धम... मानो कोई बहुत भारी चीज नीचे से फर्श को तोड़कर ऊपर आने की कोशिश कर रही हो।
अचानक, लाइब्रेरी के कोने में रखी किताबों की एक बड़ी अलमारी अपने आप खिसकने लगी। लकड़ी के चरचराने की तेज आवाज के साथ अलमारी एक तरफ हो गई, और उसके पीछे एक अंधेरा, संकरा रास्ता खुल गया।
वह नीचे तहखाने की ओर जाने वाली पत्थर की सीढ़ियां थीं।
उन सीढ़ियों से नीचे से बर्फीली हवा और किसी के भारी-भारी सांस लेने की आवाज ऊपर आ रही थी। और सीढ़ियों की पहली पायदान पर ताजे लाल रंग से लिखा हुआ था:
"स्वागत है कबीर..."