PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

धुंध का बुलावा और खौफनाक दहलीज

Piyashi Atma · Haunted Places · 8 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
1 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
8 min
Words
1478
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सर्दियों की वह रात आम रातों जैसी बिल्कुल नहीं थी। हिमाचल की ऊंची और वीरान पहाड़ियों के बीच बसी ‘नील घाटी’ पर घने काले बादलों ने ऐसा डेरा डाला था मानो आसमान से रोशनी का नामो-निशान मिटा दिया गया हो। बाहर बर्फीली हवाएं चीड़ और देवदार के पेड़ों से टकराकर सांय-सांय की ऐसी भयानक आवाजें पैदा कर रही थीं, जैसे हजारों अतृप्त आत्माएं एक साथ विलाप कर रही हों।
कबीर ने अपनी पुरानी जीप के वाइपर तेज कर दिए, लेकिन सामने का कांच लगातार जमती सफेद बर्फ और घने कोहरे की वजह से धुंधला ही बना रहा। कबीर पेशे से एक खोजी लेखक और पैरानॉर्मल डॉक्युमेंट्री मेकर था। देश भर की रहस्यमयी और भुतहा जगहों पर जाकर उनके पीछे के सच को कैमरे में कैद करना उसका जुनून था। लेकिन आज, जिस जगह की ओर वह बढ़ रहा था, उसके बारे में स्थानीय लोग दिन के उजाले में भी बात करने से कांपते थे—'देवदार हवेली'।
हवेली का इतिहास 1940 के दशक से जुड़ा था। कहा जाता था कि ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बने इस विशाल महल में रहने वाले ठाकूर विक्रम सिंह और उनके पूरे परिवार की एक ही रात में रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई थी। किसी के शरीर पर घाव का एक निशान तक नहीं था, फिर भी सबके चेहरे पर असहनीय खौफ और चीखती हुई आंखें जम चुकी थीं। उस खौफनाक घटना के बाद से उस हवेली की दहलीज लांघने की हिम्मत किसी ने नहीं की। जो कोई भी गलती से या शर्त लगाकर वहां गया, वह या तो हमेशा के लिए गायब हो गया या फिर अपनी मानसिक संतुलन खो बैठा।
घाटी के मोड़ पर बने आखिरी छोटे से ढाबे पर जब कबीर ने शाम को चाय के लिए गाड़ी रोकी थी, तो वहां के बूढ़े दुकानदार मंगलू ने उसके इरादे जानकर हाथ जोड़ लिए थे।
"साहब, लौट जाओ," मंगलू की आवाज में सिर्फ डर नहीं, एक अजीब सी बेबसी थी। "आज चौदस की रात है... कल अमावस है। उस हवेली के आसपास हवा में भी जहर घुल जाता है। 80 साल से वहां कोई इंसान नहीं बचा। वहां जो रहता है, वो इंसान नहीं है... वो वो साए हैं जो अपने दर्द का हिसाब मांगते हैं।"
कबीर ने तब उसकी बात को अंधविश्वास समझकर मुस्कुराते हुए टाल दिया था। लेकिन अब, रात के ठीक ग्यारह बजे, जब जीप का इंजन अचानक एक हिचकी लेकर बंद हो गया, तो कबीर के दिल की धड़कन अनायास ही तेज हो गई।
चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सन्नाटा था—एक ऐसा भारी सन्नाटा जो कानों में सीटी की तरह बज रहा था। कबीर ने चाबी घुमाकर गाड़ी स्टार्ट करने की तीन-चार बार कोशिश की, मगर डैशबोर्ड की लाइटें बुझ चुकी थीं। कबीर ने एक गहरी सांस ली। गाड़ी का दरवाजा खोलते ही हड्डी कंपा देने वाली सर्द हवा का एक झोंका उसके चेहरे से टकराया।
उसने टॉर्च जलाई। रोशनी की पतली किरण को चीरते हुए उसने देखा कि वह ठीक उसी जगह खड़ा था जहां सड़क खत्म हो जाती थी और आगे लोहे का एक विशाल, जंग लगा फाटक नजर आ रहा था। फाटक के दोनों खंभों पर पत्थर के गरुड़ बने हुए थे, जिनके पंख टूटे हुए थे और आंखें अंधकार में घूरती हुई प्रतीत हो रही थीं। फाटक के ठीक ऊपर लोहे की टेढ़ी-मेढ़ी तख्ती लटकी थी—देवदार एस्टेट।
फाटक आधा खुला हुआ था, मानो किसी अनदेखे साए ने उसके स्वागत के लिए उसे खोल रखा हो।
कबीर ने अपना भारी बैकपैक, कैमरा और टॉर्च संभाली। बर्फ पर उसके जूतों के दबने की 'चर्र-चर्र' आवाज के अलावा पूरी घाटी में कोई दूसरी ध्वनि नहीं थी। जैसे ही उसने मुख्य फाटक को पार किया, एक तेज हवा का बवंडर उठा और पीछे का भारी लोहे का फाटक 'धड़ाम' की भयानक गूंज के साथ अपने आप बंद हो गया।
कबीर चौंककर पीछे पलटा। उसने फाटक को धकेलने की कोशिश की, मगर वह ऐसे जाम हो चुका था जैसे किसी ने उसे अंदर से वेल्ड कर दिया हो।
"शांत रहो कबीर... यह सिर्फ हवा का दबाव है," उसने खुद को तसल्ली दी। लेकिन उसके अंदर का छठा अहसास चीख-चीख कर कह रहा था कि वापसी का रास्ता अब बंद हो चुका है।
आगे लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर देवदार के विशाल पेड़ों के बीच वह हवेली खड़ी थी। गॉथिक शैली में बनी तीन मंजिला यह इमारत किसी विशालकाय दैत्य की तरह अंधकार में सिर उठाए खड़ी थी। खिड़कियों के कांच टूटे हुए थे और हवेली की दीवारों पर काली काई और सूखी बेलें इस कदर फैली थीं जैसे किसी कंकाल पर नसें चढ़ी हों।
हवेली की सीढ़ियां चढ़ते हुए कबीर ने महसूस किया कि तापमान अचानक शून्य से कई डिग्री नीचे गिर गया था। उसकी हर सांस सफेद धुएं की तरह हवा में तैर रही थी। मुख्य दरवाजे पर लकड़ी की बारीक नक्काशी थी, जिसके बीच में पीतल का एक बड़ा सा मुखौटा लगा था। कबीर ने जैसे ही अपना हाथ दरवाजे के हैंडल पर रखा, दरवाजा बिना किसी आवाज के धीरे-धीरे खुद-ब-खुद अंदर की ओर खुलता चला गया।
अंदर कदम रखते ही एक अजीब सी, सड़ी हुई पत्तियों और पुराने बंद कमरों की बासी गंध ने कबीर का स्वागत किया। हवेली का मुख्य हॉल विशाल था। बीच में एक भव्य सीढ़ी ऊपर की मंजिल की तरफ जा रही थी, जिस पर कभी लाल मखमली कालीन बिछा रहा होगा, जो अब धूल और जालों से सड़ चुका था। छत पर लगा भारी झूमर हवा न होने के बावजूद बहुत धीमी गति से झूल रहा था।
कबीर ने हॉल के एक कोने में अपनी टॉर्च घुमाई। वहां धूल से ढकी एक विशाल आदमकद तस्वीर लटकी थी। कबीर ने आगे बढ़कर अपनी आस्तीन से तस्वीर की धूल साफ की। तस्वीर ठाकुर विक्रम सिंह और उनकी पत्नी की थी। ठाकुर के चेहरे पर एक अजीब, तीखी मुस्कान थी, लेकिन उसकी पत्नी की आंखों में गजब का खौफ दिखाई दे रहा था। तस्वीर के नीचे लिखा था—1939।
अचानक, सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज आई।
टिप... टिप... टिप...
कबीर ठिठक गया। आवाज हॉल के ठीक ऊपर, पहली मंजिल के किसी कमरे से आ रही थी। ऐसा लगा जैसे कोई नंगे पैरों से धीरे-धीरे फर्श पर चल रहा हो। कदमों की आहट बहुत धीमी थी, लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि हर कदम की थाप कबीर की छाती पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी।
कबीर ने तुरंत अपना नाइट-विजन कैमरा ऑन किया और रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। उसने हॉल के बीच खड़े होकर आवाज दी, "वहां कोई है? मैं एक शोधकर्ता हूं... मुझे सिर्फ रात बिताने के लिए आसरा चाहिए!"
उसकी आवाज हवेली के खाली कमरों में गूंजकर वापस लौट आई। लेकिन उसके बोलते ही कदमों की आवाज अचानक रुक गई।
अगले ही पल, ऊपरी मंजिल के गलियारे में एक पुराने पियानो की बेसुरी और धीमी धुन बजने लगी। वह धुन इतनी उदास और भयानक थी कि कबीर की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। हवेली में बिजली नहीं थी, कोई इंसान नहीं था, फिर 80 साल पुराने बंद कमरे में पियानो कौन बजा रहा था?
कबीर ने अपने डर पर काबू पाने की कोशिश की और सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी उसके वजन से कराह उठती थी। जैसे-जैसे वह पहली मंजिल के करीब पहुंच रहा था, पियानो की आवाज और तेज होती जा रही थी। गलियारे में पहुंचते ही टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि दूर कोने वाले कमरे का दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था और उस कमरे के अंदर से हल्की नीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी।
कबीर दबे पांव उस कमरे की ओर बढ़ा। उसने अपने कैमरे का लेंस आगे किया और धीरे से दरवाजे को धक्का दिया।
कमरे के अंदर का दृश्य देखकर कबीर के होश उड़ गए। धूल भरे कमरे के बीचों-बीच एक पुराना पियानो रखा था। उसकी चाबियां अपने आप ऊपर-नीचे हो रही थीं, जैसे कोई अदृश्य उंगलियां उन पर थिरक रही हों। लेकिन उससे भी ज्यादा खौफनाक चीज पियानो के ठीक सामने रखे बड़े शीशे में दिख रही थी।
शीशे के सामने कोई नहीं बैठा था, लेकिन शीशे के प्रतिबिंब में... सफेद लिबास पहने एक औरत बैठी नजर आ रही थी, जिसके लंबे काले बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे।
कबीर की सांसें गले में ही अटक गईं। उसने टॉर्च की रोशनी सीधे पियानो की कुर्सी पर डाली—वहां कोई नहीं था। लेकिन जब उसने दोबारा शीशे में देखा, तो उस औरत ने पियानो बजाना बंद कर दिया था। उसने धीरे-धीरे अपनी गर्दन 180 डिग्री के कोण पर घुमाई और सीधे शीशे के पार कबीर की आंखों में देखा।
उसका चेहरा पूरी तरह सफेद था, गालों पर सूखे खून के निशान थे और जहां आंखें होनी चाहिए थीं, वहां केवल दो गहरे, काले और सुलगते हुए गड्ढे थे।
उस साए के होंठ हिले, और कमरे की दीवारों में एक फुसफुसाहट गूंज उठी:
"तुम बहुत देर से आए, कबीर... हम 80 साल से तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे..."
उसी क्षण कमरे की खिड़की का कांच जोरदार धमाके के साथ चकनाचूर हो गया। बर्फीली हवा के साथ कमरे का दरवाजा कबीर के पीछे पूरी ताकत से बंद हो गया और कबीर की टॉर्च की रोशनी एक झटके में बुझ गई।
घोर अंधकार में, कबीर को अपनी गर्दन के बिल्कुल पीछे किसी की बर्फ जैसी ठंडी सांसों का अहसास हुआ...

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