PretikaHaunted Placesदरवाज़े के उस पार , Season 1

एपिसोड 8 — शांति

firoj saifi · Haunted Places · 2 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
दरवाज़े के उस पार , Season 1
Chapter
8 of 8
Category
Haunted Places
Reading time
2 min
Words
339
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सूरज निकलने लगा था।

आसमान पर हल्की लालिमा फैल रही थी।

अंतिम संस्कार पूरा हो चुका था।

बच्ची की अस्थियाँ विधि-विधान से नदी में प्रवाहित कर दी गई थीं।

हवेली के अंदर अब अजीब खामोशी थी।

कई सालों से जो घर दर्द और डर से भरा हुआ था, उसमें पहली बार हवा सामान्य लग रही थी।

तहखाने में कनक की परछाई धीरे-धीरे धुंधली होने लगी।

वह माही की तरफ देख रही थी।

फिर उसकी नजर रीवा और अरमान पर गई।

उसके चेहरे पर अब कोई क्रोध नहीं था।

सिर्फ शांति थी।

उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

"धन्यवाद..."

रीवा की आँखों में आँसू आ गए।

कनक ने आखिरी बार माही की तरफ देखा।

"मेरी बेटी अब आराम से है..."

उसकी आवाज़ हवा में घुलने लगी।

"...और मैं भी।"

उसकी आकृति धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

और फिर...

पूरी तरह गायब हो गई।

उसी क्षण तहखाने की ठंडी हवा बदल गई।

जैसे किसी ने सालों से रुकी हुई साँस आखिरकार छोड़ दी हो।

कुछ हफ्ते बाद हवेली बिल्कुल बदल चुकी थी।

अब कोई फुसफुसाहट नहीं होती थी।

कोई परछाई नहीं दिखाई देती थी।

माही फिर से पहले जैसी हँसने लगी थी।

एक शाम वह आँगन में खेल रही थी।

रीवा ने मुस्कुराकर उसे देखा।

माही अचानक रुक गई।

वह हवेली के काले दरवाज़े की तरफ देखने लगी।

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली,

"माँ..."

"क्या हुआ?"

माही ने कहा,

"कनक दीदी ने कहा है... धन्यवाद।"

रीवा कुछ पल चुप रही।

फिर उसने बेटी को अपने पास बुलाकर गले लगा लिया।

उस शाम रामदीन काले दरवाज़े के सामने एक छोटा-सा दीया जलाने आया।

अरमान ने पूछा,

"हर दिन क्यों जलाते हो?"

रामदीन ने दीये की लौ को देखते हुए कहा,

"ताकि वो आत्मा फिर कभी अकेली महसूस न करे।"

अरमान ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

अब वहाँ कोई डर नहीं था।

सिर्फ एक पुरानी कहानी की खामोश याद थी।

एक ऐसी कहानी...

जिसे सालों तक दीवारों के पीछे छुपाया गया था।

लेकिन आखिरकार उसे सुनने वाला कोई मिल गया था।

हवेली अब भी पुरानी थी।

उसकी दीवारें अब भी वही थीं।

वही गलियारे।

वही सीढ़ियाँ।

वही काला दरवाज़ा।

लेकिन अब उसके पीछे कोई चीख नहीं थी।

कोई इंतज़ार नहीं था।

कोई बदला नहीं था।

सिर्फ शांति थी।

और शायद...

हर पुरानी दीवार के पीछे एक कहानी दबी होती है।

कुछ दर्द की।

कुछ इंतज़ार की।

बस उसे सुनने वाला कोई चाहिए।

लेकिन बात अभी खत्म नहीं हुई ?
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