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भाग 1: वापसी
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 1 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3248
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अर्थी उठने से पहले ही विक्रम को अंदाज़ा हो गया था कि शिवगढ़ में कुछ गलत है।
गलत इस मायने में नहीं कि उसके पिता मर गए थे। वह तो उसे फ़ोन पर बता चुके थे, कल रात, जब वह दिल्ली के उस किराए के कमरे में बैठा बिजली के बिल और बब्लू जैट के मैसेज गिन रहा था। गलत इस मायने में कि सुबह की आठ बजने वाली थीं, गाँव की मुख्य गली में अंतिम संस्कार का जुलूस निकलने वाला था, और पूरी गली पर एक भी इंसान नहीं दिख रहा था।
बस में उसके बगल वाली सीट पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी, जो पूरे रास्ते तुलसी की माला जपती रही। जब बस शिवगढ़ के बोर्ड के पास पहुँची, उस औरत ने पहली बार विक्रम की तरफ़ देखा। उसने माला रोक दी।
"तू रघुवीर का बेटा है?"
विक्रम ने हाँ में सिर हिलाया।
औरत ने अपनी माला बगैचे में डाली, आँचल ओढ़ा, और बस रुकने से पहले ही उतरने की तैयारी करने लगी। उतरते वक़्त उसने रुककर विक्रम के कान में कहा, "तेरे बाप की अर्थी से पहले उसका चेहरा देख लेना। और अगर कुछ अजीब लगे, तो किसी से मत पूछना। यहाँ सवाल पूछने वालों को जवाब नहीं, जिम्मेदारी मिलती है।"
वह उतर गई। विक्रम बस में बैठा रहा, उसके शब्द उसके कान में गूँजते रहे।
बस से उतरते ही वह खालीपन उसके सीने में उतर गया था। बस अड्डे पर चाय की दुकान बंद थी, जो उसके बचपन में सुबह चार बजे से खुल जाती थी। चायवाले रामू की दुकान के शटर पर किसी ने लकड़ी की पट्टी ठोक दी थी, और पट्टी पर लाल रंग से कुछ लिखा था। विक्रम ने पास जाकर पढ़ा।
"शम्भु नाथ की दुकान बंद है। चार दिन बाद खुलेगी।"
शम्भु नाथ। रामू का असली नाम। विक्रम को बचपन में ही पता चल गया था कि गाँव में हर दूसरे आदमी का कोई न कोई ऐसा नाम है जो दुकान के बोर्ड पर नहीं लिखा होता। पर यह पट्टी, यह लाल रंग, यह "चार दिन" की सटीक गिनती, यह सब कुछ उसे अजीब लगा।
उसका फ़ोन बजा। स्क्रीन पर "बब्लू जैट" लिखा था। विक्रम ने कॉल काट दिया। एक मिनट बाद मैसेज आया।
"पंद्रह दिन बचे हैं, शेरे। तेरे बाप का शोक मना ले, फिर हिसाब दे। नहीं तो अगली अर्थी तेरी होगी, और उसमें उठाने वाले भी नहीं मिलेंगे।"
विक्रम ने फ़ोन जेब में डाला। अठारह लाख। पंद्रह दिन। और उसकी जेब में कुल मिलाकर तीन हज़ार रुपये थे।
उसने बैग कंधे पर डाला और हवेली की तरफ़ चल पड़ा।
गली के आख़िरी मोड़ पर ही उसने पहली औरत देखी। वह अपने आंगन में झाड़ू लगा रही थी, या ऐसा दिखने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि झाड़ू एक ही जगह आगे-पीछे चल रहा था और उसकी आँखें विक्रम पर ठहरी हुई थीं। विक्रम ने हाथ उठाया, नमस्ते की मुद्रा में। औरत ने जवाब नहीं दिया। झाड़ू रुक गया। वह औरत बिना पलक झपकाए उसे देखती रही, जैसे उसकी छाल के रंग से कोई निशान पढ़ रही हो।
फिर उसने धीरे से अपना दुपट्टा सिर पर खींचा, आँचल को मुँह पर रखा, और आंगन के अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ गली में गूँजी।
विक्रम का कदम रुका। उसने अपने कपड़े देखे। जींस, काली शर्ट, धूल भरे जूते। कुछ भी ऐसा नहीं जो किसी को डरा दे। फिर उसने अपना चेहरा छुआ, जैसे चेहरे पर कुछ उग आया हो, कोई दाग़, कोई निशान।
कुछ नहीं था। बस पसीना था, और बस की रात भर की थकान।
उसने चलना जारी किया। गाँव में अब लोग दिखने लगे थे, पर सब एक ही तरह से दिख रहे थे। दरवाज़ों के पीछे से, खिड़कियों की जालियों के पार से, आँचल और गमछे के अंदर से। कोई सामने नहीं आ रहा था। कोई नमस्ते नहीं कर रहा था। कुछ बच्चे गली में खेलते हुए रुक गए, उनमें से एक ने अपनी गेंद उठाई और घर के अंदर भागा, और उसकी माँ ने बाहर आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और विक्रम को देखा। उस औरत की आँखों में विक्रम ने वह चीज़ देखी जो वह कल शाम से अपने अंदर महसूस कर रहा था।
डर नहीं। चिंता भी नहीं। कुछ और, जिसका नाम वह नहीं जानता था, पर जो उसके पेट में एक ठंडी गाँठ बना रहा था।
हवेली का दरवाज़ा खुला था। आंगन में बाँस की खाटें बिछी थीं, सफ़ेद चादरें, घी के दीये, और बीच में, चंदन की लकड़ियों के ऊपर, उसके पिता लेटे थे।
विक्रम ने बैग नीचे रखा। उसके हाथ ठंडे हो गए थे, गर्मी की इस सुबह में भी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। गमछे में लिपटे कुछ लोग, जो शायद रिश्तेदार थे, उसे देखते हुए पीछे हट गए। उन्होंने उसका नाम नहीं लिया। उन्होंने "आ गया" भी नहीं कहा। बस रास्ता छोड़ दिया, जैसे कोई अंतिम परीक्षा देने जा रहा हो और सबको पता हो कि परीक्षा का नतीजा पहले से लिखा जा चुका है।
विक्रम ने पिता का चेहरा देखा।
रघुवीर सिंह साठ साल के थे। उनकी मौत "हृदयाघात" बताई गई थी, फ़ोन पर, रात में। पर जो चेहरा विक्रम के सामने था, उसमें किसी हृदयाघात की शांति नहीं थी। आँखें बंद थीं, यह अच्छी बात थी। पर होंठ आधे खुले थे, और ज़बान काली पड़ गई थी, और गले के ऊपरी हिस्से में, ठीक उस जगह जहाँ शर्ट का बटन खुला था, त्वचा पर एक धुंधला निशान था। लाल नहीं, गुलाबी नहीं। कुछ बीच का रंग, जैसे पुराना मेहंदी या सूखा खून या कुछ और।
विक्रम ने झुककर देखा। निशान पाँच उंगलियों जैसा था, फैला हुआ, जैसे किसी ने हथेली दबाकर रखी हो। पर हथेली सामने से नहीं, बल्कि गले के पीछे की तरफ़ से आगे की ओर लगाई गई थी, और उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।
"यह क्या है?"
उसने पूछा। किसी ने जवाब नहीं दिया।
उसने सिर उठाकर आसपास देखा। एक बूढ़ा आदमी, जिसे वह पहचानता था, सरपंच के पिता, राम अवतार चाचा, उसने नज़रें चुराते हुए कहा, "मिट्टी का दाग होगा, बेटा। पेड़ के नीचे मिले थे, रघुवीर भाई। मिट्टी का दाग होगा।"
"किस पेड़ के नीचे?"
राम अवतार चाचा ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपना गमछा ठीक किया और दूसरी तरफ़ देखने लगे।
विक्रम ने फिर से पिता के गले की तरफ़ देखा। निशान साफ़ था, अब और भी साफ़, जैसे उसकी आँखें उसे पढ़ने लगी हों। पाँच उंगलियाँ। हथेली का तल। और हथेली के बीच में, एक छोटा सा गोल निशान, जैसे किसी ने सिंदूर में डुबोकर छाप लगाई हो।
सिंदूर।
विक्रम का गला सूख गया। उसने अपने पिता की ओर हाथ बढ़ाया, निशान छूने के लिए, और उसी पल एक हाथ उसकी कलाई पर आकर रुक गया।
ठंडा हाथ। बहुत ठंडा।
"मत छू।"
आवाज़ उसकी दादी की थी। विक्रम ने पलटकर देखा। दादी माँ उसके पीछे खड़ी थीं, सफ़ेद साड़ी में, सिर ढका हुआ, और उनकी आँखें इतनी लाल थीं जैसे वह रात भर रोती रही हों। पर उनकी आँखों में आँसू नहीं थे। डर था।
"दादी, यह निशान—"
"मत छू," दादी ने फिर कहा, और उनकी आवाज़ में वह दरार थी जो विक्रम ने आज तक नहीं सुनी थी। "कफ़न लपेटते वक़्त मैंने ख़ुद देखा था। मिट्टी नहीं है यह। मिट्टी नहीं है।"
"तो क्या है?"
दादी ने उसका हाथ पकड़कर उसे खींचा, शव से दूर, आंगन के कोने में, जहाँ पुराना पीपल हवेली की दीवार के ऊपर झुका हुआ था। उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि विक्रम को अपनी कलाई में दर्द हुआ। दादी के हाथ ठंडे थे, असामान्य रूप से ठंडे, और विक्रम ने पहली बार ग़ौर किया कि उनके हाथों में कोई चूड़ी नहीं थी। दादी तो हमेशा कांच की हरी चूड़ियाँ पहनती थीं। आज कलाई नंगी थी।
"तेरे पिता ने कुछ शुरू किया था," दादी ने धीरे से कहा, उनकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट में बदल गई थी। "जो बंद हो चुका था, उसने उसे फिर से खोला। और अब—"
"अब क्या, दादी?"
दादी ने उसकी आँखों में देखा। उनकी आँखों में विक्रम ने अपनी परछाई देखी, और उस परछाई के पीछे, आंगन में लेटे अपने पिता को, और उनके गले पर वह लाल-भूरा निशान।
"अब वह लौट आई है," दादी ने कहा।
"कौन?"
दादी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और रसोई की तरफ़ चल दीं, और विक्रम देखता रहा कि उनके पैर ज़मीन पर कैसे पड़ रहे थे, धीरे-धीरे, बिना आवाज़ किए, जैसे वह चल नहीं रही थीं बल्कि तैर रही थीं।
अंतिम यात्रा निकलते वक़्त विक्रम ने एक और बात ग़ौर की। अर्थी उठाने वाले चारों आदमी अपने कंधों पर रुमाल बाँधे हुए थे, और उनमें से हर एक की गर्दन पर काला धागा बँधा था, जिसमें कुछ भरा हुआ था, शायद लोहे का टुकड़ा। और पूरे रास्ते, श्मशान तक, उनमें से किसी ने एक शब्द नहीं कहा। "राम नाम सत्य" का उच्चारण भी नहीं हुआ, जो हर अंतिम यात्रा में होता है। बस पैरों की आवाज़ थी, और कहीं दूर किसी घर में बजती रेडियो की धुंधली धुन।
रास्ते में विमल काका, जो श्मशान में चिता बनाते थे और जिनके हाथों में हमेशा तिल और राख की गंध रहती थी, विक्रम के पास आकर चलने लगे।
"तेरे बाप को मैंने कफ़न में लपेटा था, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, आँखें सामने रखकर। "तीस साल से मुर्दों को कफ़न में लपेट रहा हूँ। पर ऐसा शव पहली बार देखा।"
"कैसा शव, काका?"
विमल काका ने अपनी आवाज़ और नीची की। "जिसके पैर की उंगलियाँ अंदर की तरफ़ मुड़ी हुई थीं। और जिसकी नाभि में चंपा का फूल भरा हुआ था। और जिसे..." उन्होंने अपने होंठ चबाए। "जिसे हमने कदंब के नीचे से उठाया था। सुबह चार बजे। तेरी दादी ने ही पहचान की थी। उस वक़्त से तेरी दादी कुछ ठीक नहीं लग रहीं, बेटा। बातें तो करती हैं, पर..."
"पर क्या?"
विमल काका ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में राख जैसा सफ़ेदपन था। "पर उनके हाथ बहुत ठंडे हो गए हैं। जैसे उन्होंने रात भर कुएँ के पानी में डुबोए रखे हों। मुर्दों के हाथ भी इतने ठंडे नहीं होते, बेटा।"
विक्रम कुछ कह नहीं पाया। विमल काका चिता की तरफ़ बढ़ गए, और उनकी बात विक्रम के कानों में घूमती रही।
दाह संस्कार दोपहर को हुआ। श्मशान तालाब के किनारे था, और जब चिता की आग उठी, तब विक्रम ने पहली बार उस पेड़ को देखा।
कदंब का पेड़ श्मशान से कुछ दूर, शिव मंदिर के पीछे खड़ा था। विक्रम ने बचपन में उस पेड़ को देखा था, पर याद नहीं था कि वह इतना बड़ा था। तना इतना चौड़ा था कि चार आदमी मिलकर भी उसे नाप न सकते। पर पेड़ में एक अजीब बात थी। पत्ते नहीं थे। जून का महीना था, हरियाली का मौसम, और गाँव का हर पेड़, आम, नीम, पीपल, हरा-भरा था। पर कदंब की डालियाँ सूखी थीं, काली, नंगी, जैसे कोई आग लगी हो जो अंदर से जल रही हो और बाहर धुआँ तक न दिखा रही हो।
पर सबसे अजीब बात यह थी कि पेड़ के नीचे, उस सूखी जड़ों की गुफा के पास, ताज़े चंपा के फूल बिखरे थे।
चंपा इस मौसम में नहीं खिलते। विक्रम को यह बात उसी पल याद आई, और उसकी रीढ़ में एक ठंडी लहर उठी।
"वह पेड़," उसने राम अवतार चाचा से पूछा, जो पास में खड़े आग को देख रहे थे। "उसके नीचे फूल किसने रखे?"
राम अवतार चाचा ने पेड़ की तरफ़ देखा, और उनका चेहरा, जो अभी तक सिर्फ़ उदास था, अब सफ़ेद पड़ गया।
"कोई नहीं रखता, बेटा," उन्होंने कहा। "वे फूल ख़ुद आते हैं। हर बार, जब भी इस गाँव में कोई... जब भी कोई जाता है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब यहीं कि तू अब इस हवेली में अकेला रहेगा, और अकेले आदमी के कान सबसे ज़्यादा काम करते हैं।" राम अवतार चाचा ने अपना गमछा कंधे पर डाला। "रात को जो भी सुनै दे, पेड़ की तरफ़ मत जाना। यही कहने आया था मैं। अंतिम संस्कार की बात तो बहाना था।"
वह चले गए। विक्रम चिता की राख को देखता रहा, और उसके कानों में राम अवतार चाचा की आवाज़ घूमती रही।
"रात को जो भी सुनै दे।"
रात आई। विक्रम ने खाना नहीं खाया। दादी ने उसके लिए रोटी और दाल रखी थी, पर उसका पेट भरा हुआ था, डर से और सवालों से।
खाना रखते वक़्त दादी ने एक अजीब काम किया। उन्होंने थाली विक्रम के सामने रखी, फिर थाली के चारों ओर ज़मीन पर कुछ बिखेरा। विक्रम ने देखा। चावल के दाने थे, और उनमें कुछ काला मिला हुआ था, शायद राई।
"यह क्या है, दादी?"
"खा ले पहले," दादी ने कहा। "सवाल बाद में।"
विक्रम ने रोटी तोड़ी, पर खा नहीं पाया। उसने रोटी का टुकड़ा प्लेट में रखा और कहा, "दादी, पिताजी के गले पर वह निशान था। आपने कहा वह लौट आई है। कौन लौट आई है?"
दादी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी रुक गईं। उनकी पीठ विक्रम की तरफ़ थी। कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रहीं, फिर बोलीं, "तू सो जा। और सुन, अगर रात में तेरा नाम कोई पुकारे, तो जवाब मत देना। नाम लेकर बुलाने वाला जब तक ख़ुद सामने न आए, तू अपना नाम किसी को मत देना।"
"यह कैसी बातें हैं—"
"शपथ ले," दादी ने कहा। अब उनकी आवाज़ में रोना था। "अपनी मरी हुई माँ की शपथ ले, विक्रम। जवाब नहीं देगा।"
विक्रम ने कुछ कहा नहीं। दादी ने उसकी खामोशी को हाँ मान लिया, और अपने कमरे में चली गईं। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई, फिर लकड़ी की कुंडी लगने की आवाज़, और फिर, विक्रम को यक़ीन नहीं हुआ कि उसने सही सुना, दरवाज़े के बाहर से किसी ने मंत्र पढ़ने की आवाज़ शुरू की। दादी अंदर से दरवाज़ा बंद करके बाहर से... नहीं। यह मुमकिन नहीं था। विक्रम ने कान लगाकर सुना। मंत्र दादी के कमरे से आ रहे थे, पर कुंडी बाहर से लगी थी।
उसने सोचा कि वह थका हुआ है। उसने सोचा कि रात भर की बस यात्रा का असर है। उसने अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गया, पंखे की घरघराहट सुनता रहा, और सोचता रहा कि कल सुबह वह पिता का बैंक खाता देखेगा, कर्ज़ की फ़ाइल देखेगा, और फिर दिल्ली लौट जाएगा। बब्लू जैट ने उसे पंद्रह दिन दिए थे। पंद्रह दिन में उसे अठारह लाख चाहिए थे, या उसकी टांगें।
पिता की यह हवेली, यह ज़मीन, यह कुछ भी, इन सबकी कीमत मिलाकर भी शायद आठ लाख बने। बाकी दस लाख का क्या होगा?
उसने आँखें मूँदीं।
और तभी उसने वह सुना।
पहले उसे लगा कि हवा है। कदंब की सूखी डालियाँ आपस में टकरा रही हैं। पर फिर उसने महसूस किया कि हवा बिल्कुल नहीं चल रही। पंखे की हवा कमरे में घूम रही थी, पर बाहर की हवा ठहरी थी। खिड़की के पर्दे स्थिर थे।
आवाज़ फिर आई। इस बार साफ़।
"विक्रम..."
उसका नाम। कोई उसका नाम ले रहा था। आवाज़ दूर से आ रही थी, हवेली के पिछले हिस्से से, जहाँ आंगन के पार, दीवार के उस पार, वह कदंब का पेड़ था।
विक्रम उठकर बैठ गया। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने खिड़की की तरफ़ देखा। खिड़की बंद थी, पर आवाज़ खिड़की से नहीं, दीवारों से आती हुई लग रही थी, जैसे वह हवेली की इंटों में घुसकर आगे बढ़ रही हो।
"विक्रम... आओ..."
आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि विक्रम को अपने पेट में ऐंठन हुई। यह किसी औरत की आवाज़ थी, पर ऐसी औरत की जो बहुत दूर से बुला रही हो और फिर भी साफ़ सुनाई दे रही हो, जैसे वह उसके कान के भीतर बैठी हो।
उसने राम अवतार चाचा की बात याद की। "रात को जो भी सुनै दे, पेड़ की तरफ़ मत जाना।"
उसने अपने पैर ज़मीन पर रखे। उसका शरीर उसकी मर्ज़ी के बिना उठ रहा था, जैसे आवाज़ में कोई हुक्म था जिसे उसकी रीढ़ समझ गई थी, भले ही उसका दिमाग़ न समझे।
उसने दरवाज़ा खोला। आंगन अंधेरे में डूबा था। दादी का कमरा बंद था। विक्रम ने आंगन पार किया, पिछला दरवाज़ा खोला, और बाहर निकला।
कदंब का पेड़ ठीक सामने था, मंदिर की दीवार के पार, और उसके नीचे, उस गुफा जैसी जड़ों के बीच, कोई बैठा था।
विक्रम का दम रुक गया।
कोई नहीं, कुछ। वह आकृति इंसानी थी, पर इतनी लंबी और इतनी ठिठुरी हुई कि वह औरत हो या पुरुष, यह कहना मुश्किल था। उसका सिर झुका हुआ था, और उसके हाथ, लंबे, सफ़ेद, घुटनों पर रखे हुए थे। उसकी उंगलियाँ इतनी लंबी थीं कि वे घुटनों के नीचे तक आ रही थीं।
और उसके गले में, विक्रम ने देखा, चांदी की पायल जैसी कोई चीज़ थी, जो बिना हिले टन-टन बज रही थी।
"विक्रम," आकृति ने कहा, और इस बार आवाज़ उसके अंदर से आई, उसके सीने के बीच से, जैसे वह ख़ुद अपना नाम ले रहा हो। "तू आया। मैं जानती थी तू आएगा। तेरे पिता ने कहा था तू आएगा।"
विक्रम ने पीछे हटने की कोशिश की। उसके पैर नहीं हिले।
"मैं... मैं कौन हूँ तुम्हारे लिए?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तुम कौन हो?"
आकृति ने सिर उठाया।
अंधेरे में, उसके चेहरे की जगह, विक्रम ने सिर्फ़ दो चीज़ें देखीं। दो आँखें, अंबर रंग की, बिल्ली की तरह चमकती हुईं। और एक मुस्कान, जो इतनी चौड़ी थी कि वह चेहरे के दोनों कानों तक फैली हुई थी।
"मैं वह हूँ जो तेरे घर की है," आकृति ने कहा। "और अब, जब तेरे पिता चले गए हैं, मैं तेरी हूँ।"
विक्रम ने अपनी गर्दन पर हाथ रखा। उसके गले में, ठीक उसी जगह जहाँ पिता के गले पर निशान था, एक जलन उठी थी। गर्म, जैसे किसी ने सिंदूर की गरम हथेली रख दी हो।
उसने आँखें मूँदीं, और जब खोलीं, पेड़ के नीचे कोई नहीं था। बस चंपा के फूल बिखरे थे, और हवा में एक गंध थी, सिंदूर की, और कुछ पुरानी, मिट्टी से भी पुरानी।
विक्रम भागा। वह हवेली के अंदर घुसा, दरवाज़ा बंद किया, और दीवार से लगकर खड़ा रहा, साँसें भरता हुआ। उसका गला जल रहा था। उसने आईने में देखा, बाथरूम की टूटी रोशनी में।
उसकी गर्दन पर, पाँच उंगलियों का निशान उभर आया था। लाल नहीं, गुलाबी नहीं। वही बीच का रंग, जैसे पुराना मेहंदी या सूखा खून।
और हथेली के बीच में, एक छोटा सा गोल निशान, सिंदूर की छाप।
विक्रम ने अपनी कलाई देखी, जहाँ दोपहर को दादी ने उसे पकड़ा था। वहाँ भी अब वही निशान उभर रहा था, धीरे-धीरे, जैसे त्वचा के नीचे से कोई ऊपर आ रहा हो।
उसने दादी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं आया। उसने दरवाज़ा खोला।
कमरा खाली था। खाट पर सफ़ेद चादर बिछी थी, बिल्कुल सीधी, बिना किसी सिलवट के, जैसे किसी ने उसे आज सुबह बिछाया हो और फिर कभी छुआ न हो। दादी माँ कहीं नहीं थीं।
विक्रम ने रसोई में देखा, आंगन में, बाथरूम में। कहीं नहीं।
उसने फिर से पिछला दरवाज़ा खोला। कदंब का पेड़ अब शांत था, सूखी डालियाँ स्थिर, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर पेड़ की जड़ों के पास, उस गुफा के अंदर, कुछ चमका। विक्रम ने टॉर्च निकाली, अपने फ़ोन की, और उसे उस तरफ़ फेंका।
रोशनी में उसने देखा कि गुफा के अंदर, जड़ों के बीच, एक पुराना लकड़ी का संदूक़ दबा हुआ था, और संदूक़ के ढक्कन पर, लाल रंग से, उसका अपना नाम लिखा था।
विक्रम।
और उसके नीचे, एक और पंक्ति, जो धुंधली थी, पर जिसे वह पढ़ सका, क्योंकि वह उसी भाषा में थी जिसमें उसकी माँ उसे बचपन में कहानियाँ सुनाती थी, उस भाषा में जो उसकी रगों में बोलती थी।
"जो इसे खोलेगा, वह मुझे बाँधेगा। और जो मुझे बाँधेगा, वह ख़ुद बँध जाएगा।"
विक्रम ने फ़ोन नीचे कर लिया। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने अपनी गर्दन छुई, जहाँ निशान अब गर्म हो रहा था, और उसने सुना, दूर से, शायद पेड़ से, शायद उसके अपने सीने से, एक हँसी।
मीठी हँसी। किसी औरत की। जो अब बहुत पास थी।