PretikaYakshini Storiesयक्षिणी: कदंब का श्राप

भाग 2: बंद कमरा

Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
यक्षिणी: कदंब का श्राप
Chapter
2 of 14
Category
Yakshini Stories
Reading time
17 min
Words
3237
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हवेली के पिछले हिस्से में एक कमरा था जिस पर विक्रम ने बचपन में कभी ताला खुलते नहीं देखा था।

उसे याद था कि एक बार, जब वह नौ साल का था, उसने उस दरवाज़े पर लगे पीतल के ताले को हिलाया था, और उसके पिता ने उसे इतनी ज़ोर से उठाकर दूर किया था कि उसकी पीठ दीवार से टकराई थी। उस दिन पिता ने उसे मारा नहीं था। मारने से ज़्यादा डरावनी चीज़ की थी। उन्होंने उसके सामने घुटनों पर बैठकर, उसके कंधे पकड़कर, उसकी आँखों में देखकर कहा था, "इस दरवाज़े की तरफ़ कभी मत देखना, विक्रम। कभी नहीं। अगर यह दरवाज़ा कभी खुला मिले, तो हवेली छोड़कर भाग जाना, बिना पीछे मुड़े।"

उस दिन के बाद विक्रम ने उस दरवाज़े की तरफ़ कभी नहीं देखा था। आज तक।

आज वह उसी दरवाज़े के सामने खड़ा था, हाथ में पिता की चाबियों का गुच्छा लिए, और उसके गले पर सिंदूर की हथेली का निशान अब भी जल रहा था।

सुबह हो चुकी थी। दादी माँ कहीं नहीं मिलीं। उनका कमरा अब भी बंद था, पर इस बार कुंडी अंदर से लगी थी, जैसे कोई अंदर हो। विक्रम ने दरवाज़ा खटखटाया, आवाज़ लगाई, पर कोई जवाब नहीं आया। उसने खिड़की से झाँकने की कोशिश की। अंधेरा था, बस इतना दिखा कि खाट खाली थी।

"दादी?" उसने फिर पुकारा।

कमरे के अंदर से एक आवाज़ आई। लोहे का किसी चीज़ पर टकराना, जैसे कोई चाबी या चेन गिरी हो। फिर खामोशी।

विक्रम ने सोचा कि शायद वह पागल हो रहा है। रात की घटना, पेड़ के नीचे वह आकृति, वह संदूक़, वह सब शायद एक सपना था। उसने अपनी गर्दन छुई। निशान अब भी था। सुबह की रोशनी में वह फीका पड़ गया था, पर गायब नहीं हुआ था।

उसने फैसला किया। अगर इस हवेली में कुछ छिपा है, तो वह इसी कमरे में होगा।

उससे पहले उसने पूरी हवेली देखी। रसोई में रात का खाना जैसा का तैसा पड़ा था, अनछुआ। आंगन की खाटें अब भी बिछी थीं, और उनमें से एक पर, उस खाट पर जिस पर उसके पिता लेटे थे, चादर पर राख का एक निशान पड़ गया था, जलने की आकृति में, जैसे किसी ने चिता की जलती लकड़ी उस पर रखी हो। विक्रम ने चादर उठाकर फेंक दी।

मंदिर वाले कमरे में, जहाँ घर की पूजा होती थी, उसने एक तस्वीर देखी जो उसने कभी नहीं देखी थी। एक औरत, युवा, सफ़ेद साड़ी में, गले में चांदी का हार। उसका चेहरा... विक्रम ने उस चेहरे को पहले कहीं देखा था। फिर उसे याद आया। यह उसकी माँ थी। उसकी माँ, जो उसे जन्म देकर मर गई थी। उसने अपनी माँ की तस्वीर पहले कभी नहीं देखी थी। पिता ने कभी दिखाई नहीं थी। "दर्द देती है," बस इतना कहते थे।

तस्वीर में माँ मुस्कुरा रही थीं, पर उनकी आँखें कहीं और देख रही थीं, कैमरे के बाईं तरफ़, जैसे किसी को देख रही हों जो तस्वीर में नहीं था। और उनके माथे पर, सिंदूर की जगह, एक छोटा सा लाल निशान था, गोल, ठीक बीच में।

विक्रम ने तस्वीर दीवार पर वापस लटका दी। उसके हाथ ठंडे हो रहे थे।

पहली चाबी नहीं लगी। दूसरी भी नहीं। तीसरी चाबी में दरवाज़ा "कड़क" की आवाज़ के साथ खुला, और अंदर से एक गंध आई जिसने विक्रम को दो क़दम पीछे धकेल दिया।

सिंदूर की गंध नहीं थी। यह कुछ और था। पुरानी, गली-सड़ी, मीठी-सी बदबू, जैसे कोई फूल बहुत दिनों तक पानी में सड़ा हो। और उसके साथ लोबान की गंध, और कुछ और, जो विक्रम की नाक में चुभी, जैसे जलती हुई राख।

कमरा छोटा था। बिना खिड़की का। दीवारों पर पीले हो चुके नक्शे चिपके थे, और ज़मीन पर, बीच में, एक लकड़ी की मेज़ थी जिस पर एक मोटी डायरी रखी थी। डायरी के बगल में एक पीतल का दीया था, जिसका तेल सूख चुका था, और एक छोटी सी चांदी की कटोरी, जिसमें कुछ भूरा-सा पड़ा था, सूखा हुआ, शायद पुराना खून।

विक्रम ने डायरी उठाई।

पहला पन्ना खोलते ही उसकी साँस रुक गई। ऊपर, तारीख़ लिखी थी। तारीख़ तीस साल पुरानी थी। और नीचे, पिता की लिखावट में, जिसे विक्रम कहीं भी पहचान सकता था, लिखा था:

"मैं रघुवीर सिंह, शिवगढ़ का अंतिम ठाकुर, यह लिख रहा हूँ कि मैंने वह काम शुरू कर दिया है जो मेरे पुरखों ने शुरू किया था और जो मुझे ख़त्म करना है। अगर मैं मर जाऊँ, तो यह डायरी उसी के हाथ लगेगी जिसे मैंने बचाने की कसम खाई थी। और अगर उसके हाथ लगे, तो भगवान उसकी रक्षा करे, क्योंकि अब मैं नहीं कर सकता।"

विक्रम ने अगला पन्ना पलटा।

"पहली रात। साधना के नियम सुनने में आसान लगते हैं। इक्कीस रात। हर रात अमावस्या के समय, पेड़ के नीचे बैठकर उसका नाम लेना है। हर रात उसे कुछ देना है। और बदले में, वह एक मुराद पूरी करेगी। पर हर मुराद की कीमत है, और कीमत हमेशा खून में चुकती है।"

तीसरे पन्ने पर नियम लिखे थे, गिनकर, एक से इक्कीस तक। विक्रम ने उन्हें पढ़ा, और उसका हाथ काँपने लगा।

"नियम एक: साधना शुरू करने के बाद इक्कीस रात तक हवेली नहीं छोड़ सकते। छोड़ने पर कीमत दोगुनी हो जाती है, और वह कीमत तुम नहीं, तुम्हारा सबसे प्रिय व्यक्ति चुकाता है।"

"नियम दो: जो मुराद माँगो, वह साफ़ माँगो। अधूरी मुराद अधूरी कीमत नहीं, अधूरा विनाश लाती है।"

"नियम तीन: उसके दिए हुए को भी मत खाओ, मत पियो, मत छुओ। वह जो देती है, वह उसका बंधन होता है।"

"नियम चार: अगर उसकी आँखों में देख लो, तो उससे झूठ कभी मत बोलना। वह झूठ सूँघ लेती है, और झूठ की सज़ा जीभ है।"

"नियम पाँच: रात में पेड़ के नीचे कभी अकेले मत जाओ। पहली बार उसने तुझे बुलाया, तो यह तेरी साधना की शुरुआत नहीं, उसकी शिकार की शुरुआत थी।"

विक्रम ने वहाँ रुककर अपनी गर्दन छुई। निशान जल रहा था।

"नियम छह: वह झूठ नहीं बोलती। यह उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है और सबसे बड़ी ताक़त भी। उसका सच सुनकर तुम ख़ुद को मिटा दोगे, इसलिए उससे वह सवाल कभी मत पूछना जिसका जवाब तुम सह न सको।"

"नियम सात: उसे कभी अपना खून मत देना। एक बूँद भी नहीं। खून देने वाला उसका हो जाता है, और उसके होने का मतलब है कि तुम्हारी मौत के बाद भी तुम उससे छूट नहीं पाओगे।"

"नियम आठ: अगर वह तुम्हें किसी और नाम से पुकारे, तो सुधारना मत। वह जो नाम लेती है, उस नाम की क़ब्र कहीं होती है।"

"नियम नौ: चंपा का फूल अगर घर के अंदर मिले, तो उसे छुए बिना जला दो। और उस रात, जिस कमरे में फूल मिला था, उस कमरे में मत सोना।"

विक्रम ने रुककर सोचा। रात को, जब वह पेड़ से भागकर वापस आया था, तो उसने अपने कमरे की खिड़की पर एक फूल देखा था। उसने उसे हवा समझकर फेंक दिया था।

चंपा का फूल।

उसने अपने कमरे की तरफ़ देखा, दरवाज़े के पार से, और उसके शरीर में ठंडक दौड़ गई। उसने डायरी पढ़ना जारी रखा, पर अब उसकी आँखें हर दूसरे वाक्य के बाद दरवाज़े की तरफ़ उठ रही थीं।

उसने पन्ने पलटते रहे। डायरी में पिता ने हर रात का हिसाब लिखा था। पहली मुराद, दूसरी मुराद। कीमतें, जो शुरू में छोटी थीं, फिर बड़ी होती गईं। "तेरे लिए एक कुत्ते की जान," एक जगह लिखा था। "तेरे लिए पड़ोसी के बच्चे की बोलने की शक्ति," दूसरी जगह।

विक्रम का पेट मुड़ने लगा। यह उसके पिता की लिखावट थी, पर यह उसके पिता नहीं थे। यह कोई और था, कोई पागल, कोई...

उसने एक पन्ना और पलटा। इस पन्ने पर तारीख़ के नीचे सिर्फ़ तीन पंक्तियाँ थीं, और पंक्तियों के नीचे स्याही का एक बड़ा धब्बा, जैसे कलम रुक गई हो, जैसे लिखने वाले का हाथ काँप गया हो।

"आज उसने मुझसे वह माँगा जो मैं नहीं दे सकता। मैंने कहा, कुछ और ले लो। वह हँसी। उसने कहा, ठाकुर साहब, मैं वही लेती हूँ जो तुम सबसे ज़्यादा चाहते हो। तब तो तुमने मुझसे अपनी बीवी का नाम छुपाया था। अब मुझे पता चल गया है। अब मैं इंतज़ार करूँगी। जब तुम्हारे घर में बच्चा आएगा, तब मैं अपनी कीमत लूँगी।"

विक्रम ने पन्ने को पकड़ा हुआ रखा। उसकी माँ उसे जन्म देकर मरी थीं। यह बात उसे बचपन से पता थी। "तकलीफ़ हुई," पिता कहते थे। "डॉक्टर नहीं पहुँच सका।"

उसने अगले पन्ने की तरफ़ देखा, पर उसे पलटने की हिम्मत नहीं हुई। उसने डायरी बंद की, फिर खोली, फिर उसी पन्ने पर वापस आ गया। "जब तुम्हारे घर में बच्चा आएगा।"

वह कमरे की दीवारों को देखने लगा। नक्शे जो उसने शुरू में धुंधले समझे थे, अब साफ़ दिखे। वे नक्शे नहीं थे। वे हाथ से बनी हुई आकृतियाँ थीं, एक ही आकृति, बार-बार, सैकड़ों बार, पूरी दीवार पर। एक औरत, बैठी हुई, घुटनों पर लंबे हाथ रखे, और उसके चारों ओर पेड़ की जड़ें, जैसे पेड़ उसे अंदर निगल रहा हो।

कुछ आकृतियों में औरत का चेहरा बना था। कुछ में चेहरे की जगह सिर्फ़ दो बिंदु थे, आँखों के लिए, और एक लंबी रेखा, मुस्कान के लिए। दीवार के एक कोने में, पेंसिल से, छोटे अक्षरों में लिखा था: "वह आज मुस्कुराई। मैं तीन दिन से सोया नहीं।"

उसने दीवार से नज़र हटाई और डायरी में आगे बढ़ा। एक जगह, ग्यारहवीं रात के नीचे, सिर्फ़ इतना लिखा था: "आज मैंने वह देखा जो इंसान को नहीं देखना चाहिए। आज मैं समझ गया कि मुक्ति का रास्ता मरने में नहीं, बाँधने में है। मुझे माफ़ करना, जो भी यह पढ़े।"

उसने डायरी के बीच के पन्ने पलटे। तारीख़ें बढ़ती गईं। फिर, डायरी के लगभग दो-तिहाई हिस्से के बाद, लिखावट बदल गई। अब यह पिता की लिखावट नहीं थी। यह किसी और की थी, तिरछी, ज़ोरदार, जैसे लिखने वाला जल्दबाज़ी में हो या डर में हो।

"रघुवीर सिंह अब नहीं लिख सकता," नई लिखावट में लिखा था। "वह अंदर चला गया है। मैं लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे लिखना है। मैं वह हूँ जो उसके अंदर रहता है। और मैं बता रहा हूँ कि साधना अधूरी है। इक्कीसवीं रात बाकी है। और इक्कीसवीं रात के लिए जो चाहिए, वह अभी पैदा नहीं हुआ।"

विक्रम ने डायरी को मेज़ पर रखा। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि उसने उन्हें अपनी जाँघों पर रखकर दबाया।

"अभी पैदा नहीं हुआ।"

उसने डायरी की तारीख़ें देखीं। आखिरी तारीख़, जहाँ लिखावट बदली थी, वह उसके जन्म से ठीक तीन महीने पहले की थी।

उसने अंतिम पन्ने की तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर रुक गया। उसे डर लग रहा था। उसे लग रहा था कि अगर उसने वह पन्ना खोला, तो कुछ ऐसा लिखा मिलेगा जिसे वह मिटा नहीं पाएगा।

पर उसने खोला।

आखिरी पन्ने पर कुछ नहीं लिखा था। बस बीच में, बड़े-बड़े अक्षरों में, खून से लिखा हुआ एक शब्द था। खून इतना पुराना था कि वह काला पड़ चुका था, पर अक्षर साफ़ थे, जैसे लिखने वाले ने उन्हें बड़ी सावधानी से, उंगली डुबोकर, एक-एक अक्षर बनाया हो।

विक्रम।

और उसके नीचे, एक तारीख़। आज से ठीक इक्कीस दिन बाद की।

विक्रम ने डायरी गिरा दी। वह पीछे हटा, उसकी पीठ दीवार से टकराई। कमरे में गंध तेज़ हो गई थी, और अब उसे एहसास हुआ कि गंध डायरी से नहीं, उसकी अपनी गर्दन से आ रही थी। सिंदूर की छाप अब गर्म हो रही थी, जैसे कोई उसे धीरे-धीरे गरम कर रहा हो।

उसने कमरे से बाहर निकलकर दरवाज़ा बंद किया। उसका दिमाग़ सुन्न था। उसने आंगन में बैठकर अपना सिर हाथों में ले लिया।

"दादी," उसने पुकारा, आवाज़ काँपते हुए। "दादी माँ!"

कोई जवाब नहीं।

उसने उठकर दादी के कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। कुंडी अंदर से लगी थी। उसने दरवाज़े को ज़ोर से धकेला। लकड़ी पुरानी थी, पर मज़बूत। उसने कंधा लगाया। दरवाज़ा टूटा नहीं, पर कुंडी की खांचा हिली, और उसने एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया।

कमरा खाली था।

खाट पर सफ़ेद चादर बिछी थी, बिल्कुल सीधी। खिड़की बंद थी। अलमारी बंद थी। कमरे में कहीं कोई नहीं था।

विक्रम ने अलमारी खोली। अंदर दादी की साड़ियाँ तह करके रखी थीं, और उनके ऊपर, एक छोटा सा पीतल का डिब्बा। उसने डिब्बा खोला। सिंदूर भरा था। पर सिंदूर के ऊपर की परत पर, किसी ने उंगली से एक निशान बनाया था, पाँच उंगलियों का, फैला हुआ। जैसे किसी ने सिंदूर में हथेली डुबोकर, फिर उसे वापस दबाकर, बंद कर दिया हो।

डिब्बे के नीचे एक पुरानी चिट्ठी मिली, लिफ़ाफ़े में, बिना पते की। विक्रम ने खोला। अंदर एक ही पंक्ति थी, दादी की लिखावट में, जो अब इतनी काँपती हुई थी कि अक्षर टूटे-टूटे थे:

"रघुवीर, मैं बच्चे को लेकर जा रही हूँ। तुमने जो शुरू किया है, उसकी कीमत मैं अपने पोते को नहीं चुकाने दूँगी। अगर मुझे कुछ हो गया, तो समझना वह आ गई। दादी।"

चिट्ठी पर तारीख़ थी। कल की।

विक्रम ने चिट्ठी मुट्ठी में भींच ली। दादी कल तक यहाँ थीं। और आज सुबह से वह उनसे बात कर रहा था, खाना उन्होंने बनाया था, उसकी कलाई उन्होंने पकड़ी थी... या किसी और ने पकड़ी थी?

उसने अपनी कलाई देखी। निशान अब भी था।

पर ज़मीन पर, खाट के नीचे से, कुछ टपक रहा था।

विक्रम ने झुककर देखा। पानी नहीं था। गाढ़ा, काला, और उसमें चंपा के फूल तैर रहे थे।

उसने खाट उठाई। नीचे, ज़मीन पर, एक बड़ा सा निशान था, जैसे किसी ने गीले कपड़े से पोंछा हो, और उस निशान के बीच में, कुछ लिखा था। उसी तिरछी लिखावट में जो डायरी के बीच में थी।

"वह आ गई है। अब कोई नहीं बचेगा।"

विक्रम ने खाट नीचे रखी। उसका सिर घूम रहा था। उसने सोचा, दादी कहाँ गईं? उसने सोचा, यह सब क्या है? उसने सोचा, क्या वह सच में पागल हो रहा है?

उसने हवेली से बाहर निकलकर दो-तीन घरों में दादी के बारे में पूछा। पहले घर में बुआ जी ने दरवाज़ा आधा खोला और कहा, "तेरी दादी? वह तो शुक्रवार से दिखी नहीं।" दूसरे घर में दुल्हन ने बिना दरवाज़ा खोले अंदर से कहा, "यहाँ मत आओ। हमारे घर में बच्चा है।" तीसरे घर में एक बूढ़े ने बाहर आकर कहा, "बेटा, तू जा यहाँ से। तेरे खून में जो है, वह हमें नहीं चाहिए।"

"मेरे खून में क्या है?" विक्रम ने पूछा।

बूढ़े ने दरवाज़ा बंद कर लिया। बंद करने से पहले उसने इतना कहा, "जा कर अपनी हवेली की बावड़ी में देख। वहाँ तेरा जवाब है।"

विक्रम बावड़ी तक गया। बावड़ी सूखी पड़ी थी, सीढ़ियाँ टूटी हुईं, और उसके किनारे पर, पुरानी पट्टियों के नीचे, किसी ने हाल ही में कुछ खोदा था। मिट्टी ताज़ी थी। विक्रम ने घुटनों पर बैठकर मिट्टी हटाई। नीचे से एक पुरानी, ज़ंग लगी टीन की डिबिया निकली। डिबिया में एक पुराना अख़बार था, तीस साल पुराना, और उसके नीचे एक फ़ोटो।

फ़ोटो में उसके पिता थे, जवान, पुलिस की वर्दी में। और उनके बगल में एक और आदमी, लंबा, साफ़ शेव किया हुआ, सिर पर रुद्राक्ष की माला, हाथ में त्रिशूल जैसी छोटी छड़ी। दोनों किसी अखाड़े के सामने खड़े थे। फ़ोटो के पीछे कुछ लिखा था, पिता की लिखावट में:

"भैरव नाथ के साथ। उन्होंने कहा, मैं जो ढूँढ रहा हूँ, वह मुझे पेड़ के नीचे मिलेगा। भगवान मुझे माफ़ करे, मैं जा रहा हूँ।"

विक्रम ने फ़ोटो पलटी। भैरव नाथ का चेहरा उसे कहीं से जाना-पहचाना लगा। फिर उसे याद आया। कल रात, पेड़ के नीचे, उस आकृति के पास, अंधेरे में, एक और परछाई खड़ी थी। उसने उसे नहीं देखा था, पर महसूस किया था। एक आदमी, खड़ा, देखता हुआ।

उसने अख़बार खोला। पहले पन्ने पर एक खबर थी, तीस साल पुरानी: "शिवगढ़ में तीन और मौतें: पुलिस ने कहा, जाँच जारी।" खबर में लिखा था कि तीनों शवों के गले पर एक जैसा निशान मिला था। पाँच उंगलियों का। निशान की तस्वीर छपी थी।

विक्रम ने अपनी गर्दन छुई।

वही निशान।

उसने फ़ोन निकाला और सलीम को कॉल किया।

फ़ोन बजता रहा। कोई जवाब नहीं आया। विक्रम ने मैसेज किया, "मुझे फ़ोन कर। जल्दी।"

फिर, बावड़ी की टूटी सीढ़ी पर बैठे-बैठे, उसने वह किया जो वह हमेशा करता था। उसने गूगल खोला। "यक्षिणी साधना" टाइप किया।

पहला नतीजा एक धार्मिक वेबसाइट थी, जिसमें लिखा था कि यक्षिणी साधना से धन मिलता है, वशीकरण होता है, और यह साधना "अत्यंत गोपनीय" होनी चाहिए। विक्रम ने मज़ाक में सोचा कि अठारह लाख का कर्ज़ उतर जाए, तो गोपनीयता ही सही।

दूसरा नतीजा एक मंच था, एक पुराना फ़ोरम, जहाँ लोग अपने अनुभव लिखते थे। उसने एक पोस्ट खोली, दो हज़ार नौ में लिखी गई:

"मैंने यक्षिणी साधना की। पहली मुराद पूरी हुई। दूसरी भी। तीसरी मुराद माँगने से पहले मेरी पत्नी का गला सूखने लगा। डॉक्टरों को कुछ नहीं मिला। चौथे दिन वह मर गई। उसके गले पर लाल हथेली का निशान था। मैंने साधना बीच में छोड़ दी थी। गलती मेरी थी। साधना छोड़ने पर कीमत प्रियजन चुकाते हैं, यह मुझे कोई बता नहीं पाया था। अब मैं हर रात उसे अपनी खिड़की के बाहर खड़ा देखता हूँ। मेरी पत्नी को। वह मुस्कुराती है। मैं यह पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ कि अगर कोई यह साधना करने की सोच रहा है, तो वह रुक जाए। और अगर कर चुका है, तो इक्कीस रात पूरी करे, चाहे कुछ भी हो जाए। बीच में मत छोड़ना। बीच में छोड़ने वालों को वह कभी नहीं छोड़ती।"

पोस्ट के नीचे एक ही कमेंट था, दो हज़ार ग्यारह में लिखा गया, उसी आदमी की प्रोफ़ाइल से, पर अलग वर्तनी में:

"अब वह मेरे साथ है। अब हम दोनों खुश हैं। तुम भी आ जाओ। पेड़ के नीचे आ जाओ।"

प्रोफ़ाइल की तस्वीर में एक आदमी था, धुंधला, किसी पेड़ के सामने खड़ा। विक्रम ने तस्वीर को ज़ूम किया। पेड़ की डालियाँ सूखी थीं। कदंब का पेड़ था।

उसने फ़ोन बंद कर दिया। उसके हाथ में पसीना था। उसने खुद को समझाया कि इंटरनेट पर ऐसी हज़ारों कहानियाँ हैं, सब झूठी, सब डरावनी कहानियाँ लिखने वालों की। पर उसके गले का निशान जल रहा था, और उसकी गली के सामने चंपा के फूलों की लाइन अब भी थी, और उसकी दादी ग़ायब थीं।

उसने फ़ोन जेब में डाला और हवेली लौट आया। उसे दीवारों के अंदर होने की ज़रूरत थी, बंद दरवाज़ों की, किसी भी चीज़ की जो उसे उस पेड़ से अलग करे।

वह आंगन पार करके सामने के दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि उसने सुना। दूर से, शायद गाँव की तरफ़ से, शायद पेड़ की तरफ़ से, एक आवाज़।

टन। टन। टन।

पायल की आवाज़। या चांदी की किसी चीज़ की। धीमी, लयबद्ध, जैसे कोई चल रहा हो।

विक्रम ने दरवाज़ा खोला। गली खाली थी। दोपहर का सूरज चमक रहा था, और गर्मी में हवा काँप रही थी। कहीं कोई नहीं था।

पर ज़मीन पर, हवेली के दरवाज़े के ठीक बाहर, चंपा के फूलों की एक लाइन बनी थी। फूल ताज़े थे, और वे एक दिशा में जाते थे, गाँव की तरफ़, जैसे किसी ने चलते-चलते बिखेरे हों।

और उस लाइन के ठीक बीच में, ज़मीन पर, किसी ने लिखा था, उंगली से, मिट्टी में:

"इक्कीस रात बची हैं।"

विक्रम ने अपनी गर्दन छुई। निशान अब दर्द कर रहा था। उसने ऊपर देखा। आसमान में, बिना किसी बादल के, कहीं दूर एक गिद्ध मंडरा रहा था, गोल-गोल, ठीक उस पेड़ के ऊपर।

कदंब के पेड़ के ऊपर। जहाँ उसकी मौत ने उसका इंतज़ार किया था, और जहाँ अब, उसकी मौत का इंतज़ार किया जा रहा था।

विक्रम ने दरवाज़ा बंद किया। उसने कुंडी लगाई। उसने अपनी पीठ दरवाज़े से सटाई और धीरे-धीरे नीचे बैठ गया।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे लड़ रहा है। पर उसे एक बात समझ आ गई थी।

यह लड़ाई उसके पिता ने शुरू की थी। और अब, चाहे वह चाहे या न चाहे, उसे उसे ख़त्म करना होगा।

या ख़त्म हो जाना होगा।

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