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भाग 3: पहली मुराद
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 3 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3234
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बब्लू जैट ने तीन दिन में चौबीस बार फ़ोन किया।
पहले दो दिन विक्रम ने कॉल काट दिए। तीसरे दिन, जब वह हवेली की छत पर बैठा पिता की पुरानी फ़ाइलें देख रहा था, फ़ोन फिर बजा, और इस बार उसने उठा लिया। शायद थकान की वजह से। शायद इसलिए कि तीन दिन से उसने किसी इंसान से बात नहीं की थी, और अपनी ही आवाज़ सुनने का तरीका वह भूलता जा रहा था।
"शेरे," बब्लू की आवाज़ आई, मीठी और खतरनाक, जैसे चाकू पर चढ़ा हुआ शहद। "मैंने सुना तू अपने बाप की विरासत गिन रहा है। पुरानी हवेली, कुछ बीघा ज़मीन। अच्छा है। दस-बारह लाख तो निकल ही आएँगे। बाकी के छह लाख के लिए मैं तेरी उंगलियाँ ले लूँगा। हर महीने एक उंगली। जब तक उंगलियाँ ख़त्म न हों, कर्ज़ा चुकता नहीं।"
"मुझे वक़्त चाहिए, बब्लू भाई।"
"वक़्त तो भगवान भी कर्ज़े पर नहीं देता, शेरे।" बब्लू हँसा। "बारह दिन बचे हैं। बारहवें दिन या तो पैसा आएगा, या मैं आऊँगा। और जब मैं आता हूँ ना, तो मैं पैसा नहीं, हिस्सा लेता हूँ। शरीर का।"
कॉल कट गई।
विक्रम ने फ़ोन नीचे रखा। उसके सामने, छत पर, पिता की फ़ाइलें बिखरी थीं। बैंक खाते में चौदह हज़ार रुपये थे। ज़मीन के कागज़ात थे, पर ज़मीन का एक हिस्सा पहले से गिरवी था। हवेली का मालिकाना हक उसके नाम हो सकता था, पर शिवगढ़ में पुरानी हवेलियाँ खरीदने वाला कोई नहीं था। गाँव के लोग तो इस हवेली के सामने से गुज़रने से भी कतराते थे।
तीन दिन से वह हवेली में अकेला था। दादी का कोई पता नहीं था। उसने गाँव के हर घर में पूछा, हर कुएँ के पास देखा, श्मशान तक जाकर देखा। कहीं कुछ नहीं मिला। राम अवतार चाचा ने उसे रोका भी था। "बेटा, जो ग़ायब हो जाते हैं इस गाँव में, उन्हें ढूँढना ठीक नहीं होता। ढूँढने वाले भी ग़ायब हो जाते हैं।"
दूसरे दिन उसने गाँव छोड़ने की कोशिश की।
सुबह उठकर उसने बैग भरा, डायरी और फ़ाइलें उसमें डालीं, और बस अड्डे पर पहुँच गया। दिल्ली की बस दस बजे आती थी। वह साढ़े नौ बजे से खड़ा रहा। बस आई, पर उसके सामने से बिना रुके निकल गई, भले ही उसने दोनों हाथ हिलाए। उसने चिल्लाया। ड्राइवर ने उसकी तरफ़ देखा भी, उसे यक़ीन हुआ, पर बस नहीं रुकी।
उसने एक ट्रैक्टर को रोका। ड्राइवर पड़ोस के गाँव का था, उसे बैठा लिया। आधा घंटा चलने के बाद ट्रैक्टर एक मोड़ पर पहुँचा, और विक्रम ने देखा कि सामने वही सड़क थी, वही बस अड्डा, वही रामू की बंद दुकान। उन्होंने गोल चक्कर लगाया था।
"भाई, यह तो वही जगह है," विक्रम ने कहा।
ड्राइवर ने उसे अजीब तरह से देखा। "कौन सी जगह? मैं तो सीधा ले आया। सुड़ोलिया जाना था ना तुझे?"
"मुझे शिवगढ़ से बाहर जाना है।"
ड्राइवर ने ट्रैक्टर रोका। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। "तू शिवगढ़ का है? तू उस हवेली का है?" उसने विक्रम को नीचे उतरने का इशारा किया। "उतर। मैं तुझे कहीं नहीं ले जाऊँगा। तेरे साथ जो चल रहा है, वह मेरे सिर न चढ़े।"
विक्रम उतर गया। ट्रैक्टर चला गया। वह सड़क पर अकेला खड़ा रहा, और फिर, करने को कुछ न था, वह पैदल ही हवेली लौट आया। रास्ते भर उसे लगता रहा कि कोई उसके पीछे चल रहा है। दो बार उसने पलटकर देखा। दोनों बार सड़क खाली थी, पर दूसरी बार, ज़मीन पर, उसके अपने कदमों के निशान के बगल में, एक और जोड़ी निशान थे। नंगे पैरों के, छोटे, औरत के कदमों के, जो उसके कदमों से सटे-सटे चले आ रहे थे।
उसने दौड़ लगाई। हवेली के दरवाज़े पर पहुँचकर उसने पीछे देखा। गली खाली थी। पर दरवाज़े की चौखट पर, एक चंपा का फूल पड़ा था, ताज़ा, जैसे किसी ने अभी रखा हो।
उसने फूल को लात मारी। फूल उड़कर आंगन में गिरा। उसने दरवाज़ा बंद किया और तीनों कुंडियाँ लगाईं।
और हर रात, ठीक आधी रात को, वह आवाज़ आती थी।
"विक्रम..."
पहली रात उसने कान बंद कर लिए थे। दूसरी रात उसने सर तक चादर ओढ़ ली थी। तीसरी रात आवाज़ ने कुछ नया कहा।
"विक्रम... तेरे कर्ज़ की खबर है मुझे। अठारह लाख। बारह दिन। तेरी उंगलियाँ बहुत सुंदर हैं, विक्रम। उन्हें कटता नहीं देख सकती मैं।"
विक्रम उठकर बैठ गया। उसका शरीर पसीने से भीगा हुआ था।
"तू मुझे सुन रही है?" उसने अंधेरे में पूछा, और तुरंत पछताया। दादी की चेतावनी याद आई। जवाब मत देना।
पर आवाज़ आ गई, और इस बार वह कमरे के अंदर थी, खिड़की के पास, जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा होकर अंदर झाँक रहा हो।
"मैं तुझे हमेशा सुन रही हूँ, विक्रम। तेरे पिता ने मुझे बताया था कि तू आएगा। उन्होंने कहा था, मेरा बेटा तर्क में मानता है, दिल में नहीं। उसे समझाने के लिए उसे दिखाना पड़ेगा। तो देख, विक्रम। खिड़की खोलकर देख।"
विक्रम ने खिड़की की तरफ़ नहीं देखा। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, और वह अंधेरे में बैठा रहा, जब तक कि सुबह की पहली रोशनी कमरे में न आई।
चौथे दिन, दोपहर को, हवेली के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
विक्रम ने दरवाज़ा खोला। बाहर एक लड़की खड़ी थी, उम्र में उसी के बराबर, जींस और कुर्ते में, कंधे पर कैमरा और पीठ पर बैग। उसके चेहरे पर धूप में भी वह सुकून था जो शहर के लोगों में होता है, गाँव के लोगों में नहीं।
"विक्रम सिंह?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"मैं मीरा। दिल्ली यूनिवर्सिटी से। लोककथाओं पर रिसर्च कर रही हूँ।" उसने अपना कार्ड दिखाया। "मुझे पता चला कि इस गाँव में एक बहुत पुरानी यक्षिणी-परंपरा है। क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकती हूँ?"
विक्रम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। तीन दिन से कोई उससे बात नहीं कर रहा था, और अब खड़ी थी एक लड़की, साफ़ हिंदी में, कैमरा लिए, पूछ रही थी यक्षिणी के बारे में। यह सब इतना बेतुका था कि विक्रम को हँसी आ गई। वह हँस पड़ा, ज़ोर से, लगभग पागलों की तरह।
मीरा ने हँसी पर कुछ नहीं कहा। उसने बस इंतज़ार किया, और जब विक्रम की हँसी थमी, तो बोली, "आपकी गर्दन पर निशान है। पाँच उंगलियों का। मैंने अपनी रिसर्च में ऐसे निशान की सत्रह तस्वीरें देखी हैं। सत्रहों लोग मर चुके हैं।"
विक्रम की हँसी सूख गई। उसने अपनी गर्दन ढकी, पर मीरा पहले ही देख चुकी थी।
"मुझे तुमसे बात करनी है," मीरा ने कहा, अब उसकी आवाज़ में वह शहरी सुकून नहीं था। "पर यहाँ नहीं। दरवाज़े पर नहीं। क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?"
विक्रम ने उसे अंदर आने दिया। वह जानता था कि यह बेवक़ूफ़ी हो सकती है। पर तीन दिन की अकेलापन ने उसके अंदर कुछ तोड़ दिया था, और उसे अब इस बात की परवाह नहीं थी कि सामने वाला इंसान है या कुछ और। बस वह सुनना चाहता था कि कोई और भी वह देख रहा है जो वह देख रहा है।
मीरा ने आंगन में बैठकर अपना बैग खोला और एक फ़ाइल निकाली। फ़ाइल में फोटोकॉपियाँ थीं, पुराने अख़बारों की, और कुछ हाथ से बने नक्शे।
"शिवगढ़ में हर तीस साल में एक दौर आता है," उसने कहा। "मौतों का दौर। पिछला दौर तीस साल पहले था। उससे पहले साठ साल पहले। उससे पहले नब्बे। और उससे पहले... लगभग दो सौ साल पहले, जब इस गाँव में एक औरत को ज़िंदा जलाया गया था।"
"किसने जलाया था?" विक्रम ने पूछा, हालाँकि उसे अंदाज़ा हो चला था कि जवाब उसके अपने घर से जुड़ा है।
"उस वक़्त के ठाकुर ने। रणजीत सिंह ने।" मीरा ने उसकी आँखों में देखा। "तुम्हारे पुरखों ने, विक्रम।"
विक्रम कुछ नहीं बोला। उसने मीरा की फ़ाइल उठाई और नक्शे देखे। एक ही नक्शा, बार-बार। पेड़। जड़ें। और जड़ों के नीचे, एक आकृति।
फ़ाइल के आखिर में एक फोटोकॉपी थी, इतनी पुरानी कि अक्षर धुंधले हो चुके थे। किसी अंग्रेज़ी गज़ेटियर का पन्ना था, साल 1832 का। मीरा ने उसे पढ़कर सुनाया।
"1826 में इस गाँव के ठाकुर, रणजीत सिंह, ने एक नृत्यांगना को ज़िंदा जलाने का हुक्म दिया। औरत का नाम रिकॉर्ड में नहीं है, सिर्फ़ इतना लिखा है कि वह 'ठाकुर की इच्छा के विरुद्ध गई'। जलाने की रस्म गाँव के कदंब के पेड़ के नीचे हुई। उसी रात ठाकुर का घर जल उठा। ठाकुर बच गया, पर पागल हो गया। उसने मरने से पहले अपनी दीवारों पर एक ही बात लिखी, सैकड़ों बार: 'वह अब भी नाच रही है।'"
मीरा ने पन्ना बंद किया। "अंग्रेज़ी रिकॉर्ड में आगे लिखा है कि उसके बाद हर तीस साल में इस गाँव में 'बेकाबू मृत्यु-दौर' आया। अंग्रेज़ों ने इसे मलेरिया लिखा, कभी प्लेग। पर मौतों की तस्वीरें..." उसने एक और फोटोकॉपी निकाली। "गले पर एक ही निशान। हर बार।"
विक्रम ने तस्वीर देखी। धुंधली थी, पर निशान साफ़ था। पाँच उंगलियाँ। बीच में गोल छाप।
"यह परंपरा सिर्फ़ कहानी नहीं है," मीरा ने कहा। "मैं पाँच गाँवों में जा चुकी हूँ जहाँ ऐसी कहानियाँ हैं। हर गाँव में एक पेड़ है, एक बँधी हुई आत्मा है, और एक खानदान है जिसने उसे बाँधा है। पर शिवगढ़ की कहानी सबसे खतरनाक है, क्योंकि यहाँ की यक्षिणी अब भी जागी हुई है। और यहाँ का खानदान..."
"खत्म हो रहा है," विक्रम ने पूरा किया। "मैं आखिरी हूँ।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना बैग बंद किया और खड़ी हुई।
"मैं कल फिर आऊँगी," उसने कहा। "और विक्रम, एक बात सुन लो। मेरी रिसर्च में एक बात हर जगह एक जैसी मिली है। यक्षिणी से कभी कुछ मत माँगना। चाहे कितना भी बुरा वक़्त हो, चाहे कितनी भी ज़रूरत हो। क्योंकि वह देती ज़रूर है, पर जो देती है, उसका ब्याज उसकी कीमत से ज़्यादा होता है।"
वह चली गई। विक्रम दरवाज़े पर खड़ा रहा, उसे जाते देखता रहा, और उसके दिमाग़ में एक ही खयाल घूम रहा था।
बारह दिन। अठारह लाख। उंगलियाँ, एक-एक करके।
शाम को बब्लू जैट का एक और मैसेज आया। इस बार कोई धमकी नहीं थी। एक तस्वीर थी। विक्रम के दिल्ली वाले कमरे की तस्वीर, बाहर से ली गई, और तस्वीर में दरवाज़े के सामने दो आदमी खड़े थे। नीचे लिखा था: "तेरा कमरा तो खाली है, शेरे। तू कहाँ है? बता दे, नहीं तो तेरे दोस्तों से पूछूँगा। सलीम नाम है ना एक का?"
विक्रम का हाथ काँप गया। उसने सलीम को कॉल किया। फ़ोन बजता रहा, कोई जवाब नहीं। उसने मैसेज किया: "सलीम, कुछ दिन कहीं और रह। किसी को अपना पता मत बता। मुझे कॉल कर जैसे ही मिले।"
उसने फ़ोन मेज़ पर रखा और दीवार को घूरता रहा। अब खेल सिर्फ़ उसका नहीं रहा। अब उसके दोस्त भी उसके साथ तराज़ू में रखे जा चुके थे।
उस रात, जब आवाज़ आई, विक्रम ने चादर नहीं ओढ़ी। उसने आँखें बंद नहीं कीं। वह उठा, खिड़की की तरफ़ गया, और उसने खिड़की खोली।
बाहर आंगन था, और आंगन के पार, दीवार के ऊपर से, कदंब की सूखी डालियाँ दिख रही थीं। चाँदनी में वे डालियाँ हड्डियों जैसी सफ़ेद लग रही थीं।
"मैं यहाँ हूँ," आवाज़ ने कहा, और अब वह आवाज़ उसके कमरे में नहीं, उसके कानों के बिल्कुल पास थी, जैसे कोई उसके कंधे के पीछे खड़ा हो। "मुझे देखने आएगा?"
विक्रम ने पीछे मुड़कर देखा। कमरा खाली था। पर बिस्तर पर, उस जगह जहाँ वह लेटा था, चादर में एक आकृति दबी हुई थी, जैसे कोई अभी-अभी वहाँ बैठा था। और हवा में गंध थी। चंपा की, और उसके नीचे, कुछ और। गीली मिट्टी की गंध, जैसी बारिश की पहली बूँदों के बाद आती है, बस इसमें फ़र्क़ इतना था कि बाहर बारिश नहीं हुई थी। महीनों से नहीं हुई थी।
"तू मुझसे डरता है," आवाज़ ने कहा। अब वह खिड़की के दूसरी तरफ़ थी, फिर कमरे के कोने में। वह हर जगह थी, और कहीं नहीं थी। "अच्छी बात है। जो डरता है, वह जीवित रहता है। तेरे पिता डरते नहीं थे। तेरे पिता मुझसे प्रेम करने लगे थे, अंत में। यही उनकी गलती थी। मुझसे प्रेम करने वाले सबसे पहले मरते हैं, विक्रम। क्योंकि मैं जिससे प्रेम करती हूँ, उसे अपने पास रख लेती हूँ।"
"तूने मेरे पिता को मारा?" विक्रम ने पूछा।
लंबी खामोशी। फिर आवाज़, और अब उसमें पहली बार कोई ऊतर था, कोई गड्ढा, कोई ऐसी जगह जहाँ से मीठापन उतरकर कुछ और निकलता था। बहुत पुराना दर्द, या बहुत पुराना क्रोध। विक्रम फ़र्क़ नहीं कर पाया।
"मैंने किसी को नहीं मारा, विक्रम। मैं सिर्फ़ लेती हूँ जो मेरा है। तेरे पिता को उन्होंने ख़ुद मारा। और तुझे... तुझे भी तू ख़ुद मारेगा, अगर तूने वही किया जो वे करते रहे। मुझसे प्रेम मत करना, विक्रम। मुझसे सौदा करना। सौदा साफ़ होता है। प्रेम में मैं अधूरी रह जाती हूँ, और जो अधूरा रह जाता है, वह मैं पूरा करके ही छोड़ती हूँ।"
विक्रम ने अपने दोनों हाथ खिड़की की चौखट पर रखे। उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे अपनी धड़कन गले में महसूस हो रही थी।
"अगर मैं कुछ माँगूँ," उसने धीरे से कहा, "तो क्या होगा?"
"जो माँगेगा, वह मिलेगा।"
"और कीमत?"
"कीमत बाद में सोचना। पहले माँग तो।"
विक्रम ने आँखें बंद कीं। उसके सामने बब्लू जैट का चेहरा तैरा। उसकी उंगलियाँ, कटती हुईं। अठारह लाख। बारह दिन। और फिर उसके सामने पिता का चेहरा आया, गले पर वही निशान, और दादी की चिट्ठी, "वह आ गई," और मीरा की चेतावनी, "कभी कुछ मत माँगना।"
पर उसने मुँह खोला, और उससे निकला:
"मुझे पैसा चाहिए। अठारह लाख रुपये। बारह दिन के अंदर।"
एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ। फिर हवा चली। कदंब की सूखी डालियाँ हिलीं, और उनमें से एक आवाज़ आई, जैसे बहुत दूर से कोई हँस रहा हो, या रो रहा हो।
"तैयार रहना," आवाज़ ने कहा। "कल सुबह तक तेरे दरवाज़े पर तेरी मुराद होगी। और सुन, विक्रम..."
"क्या?"
"अब तू मेरा हो गया। अब हर रात तू मुझसे मिलेगा। इक्कीस रात। यह तेरी साधना है, चाहे तू जाने या न जाने।"
विक्रम ने खिड़की बंद कर ली। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसने खुद से कहा कि यह सब सपना है, कि कल सुबह कुछ नहीं होगा, कि वह पागल हो रहा है।
वह सोया नहीं। वह रात भर बैठा रहा, दीवार से लगकर, और सुबह का इंतज़ार करता रहा।
सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे, जब पहली रोशनी निकली, दरवाज़े पर दस्तक हुई।
तीन दस्तकें। धीमी, भारी।
विक्रम ने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। पर ज़मीन पर, दरवाज़े के ठीक सामने, एक पोटली रखी थी। लाल कपड़े की, मुँह बँधा हुआ, और उस पर सिंदूर का निशान लगा था।
उसने पोटली उठाई। भारी थी। उसने मुँह खोला।
अंदर सोने की मोहरें थीं। पुरानी, अजीब आकार की, किसी पुराने ज़माने की मोहरें, जिन पर एक तरफ़ अर्धचंद्र बना था और दूसरी तरफ़ कोई अक्षर, जिसे वह नहीं पढ़ सका। मोहरें ठंडी थीं, बरफ़ जैसी ठंडी, और उनमें से कुछ पर मिट्टी लगी थी, गीली, ताज़ी, जैसे अभी-अभी ज़मीन से निकाली गई हों।
विक्रम ने मोहरें गिनीं। बीस मोहरें। उसे सोने के भाव का अंदाज़ा था। हर मोहर कम से कम एक लाख की होगी। हो सकता है उससे ज़्यादा, अगर इन्हें कोई अंटीक समझे।
उसने एक मोहर बाथरूम में ले जाकर धोई। मिट्टी नहीं उतरी। उसने साबुन लगाया, ब्रश से रगड़ा। मिट्टी मोहर में घुसी हुई थी, जैसे मिट्टी और सोना एक ही चीज़ से बने हों। और जब उसने मोहर को रोशनी में घुमाया, उसने वह अक्षर पढ़ा जो उसे पहले समझ नहीं आया था। अक्षर देवनागरी नहीं था, पर किसी पुरानी लिपि का था, और उसके नीचे, बहुत छोटे में, उत्कीर्ण था:
"रणजीत सिंह शिवगढ़ी, संवत अठारह सौ चौरासी।"
रणजीत सिंह। उसी नाम के सिक्के। जिस ठाकुर ने उस औरत को जलवाया था, उसी के ख़ज़ाने की मोहरें, अब उसकी मुट्ठी में थीं, और उनमें लगी मिट्टी उसी पेड़ की थी जहाँ वह औरत जली थी।
विक्रम ने मोहर वापस पोटली में डाली। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसने खुद को रोका। पैसा पैसा होता है। मुर्दों के पैसे से भी कर्ज़ उतरता है। और उसके अंदर, किसी कोने में, एक आवाज़ बार-बार गिन रही थी: अठारह लाख, बारह दिन, उंगलियाँ सलामत। वह जानता था कि यह आवाज़ उसकी अपनी नहीं है। यह वही लालच है जिसने उसके पुरखों को ठाकुर बनाया था। पर जानना और रोकना, दो अलग चीज़ें होती हैं।
उसने पोटली अंदर रखी और दरवाज़ा बंद किया। उसने फ़ोन उठाया, बब्लू को मैसेज करने के लिए, कि पैसा मिल जाएगा, कि उसे छूए भी न।
और तभी, दूर से, गाँव की तरफ़ से, एक चीख आई।
उसके बाद एक और। फिर कई। औरतों की चीखें, आदमियों की आवाज़ें, दरवाज़े खुलने और बंद होने की आवाज़ें, और फिर किसी का रोना, ऐसा रोना जो सिर्फ़ तब निकलता है जब किसी का अपना चला जाता है।
विक्रम ने दरवाज़ा खोला और बाहर भागा। गली में लोग दौड़ रहे थे, सब एक ही तरफ़, गाँव के पहले घर की तरफ़, रामू चायवाले के घर की तरफ़।
विक्रम भी दौड़ा। उसने भीड़ को धकेला और अंदर झाँका।
रामू चायवाला अपने आंगन में लेटा था। उसकी आँखें खुली थीं, आसमान की तरफ़, और उसका मुँह भी खुला था, जैसे वह चीखते-चीखते चुप हो गया हो। उसकी पत्नी उसके ऊपर झुकी रो रही थी, और दो आदमी उसे खींचने की कोशिश कर रहे थे।
और रामू के गले पर, ठीक वही निशान था।
पाँच उंगलियों की हथेली। बीच में सिंदूर का गोल निशान।
पर इस बार निशान धुंधला नहीं था। इस बार वह ताज़ा था, लाल, चमकता हुआ, जैसे अभी-अभी लगाया गया हो।
विक्रम ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी मुट्ठी में सोने की मोहरें थीं, ठंडी, मिट्टी लगी हुई।
रामू चायवाला, जिसकी दुकान चार दिन बाद खुलने वाली थी, आज चौथा दिन था।
भीड़ में से राम अवतार चाचा निकले और विक्रम के सामने आकर खड़े हो गए। उनका चेहरा पत्थर का था।
"तूने माँगा, ना?" उन्होंने पूछा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, इसलिए ज़्यादा डरावनी थी। "मैंने तुझे कहा था। पेड़ की तरफ़ मत जाना, कुछ मत माँगना। तूने माँगा, ना?"
विक्रम ने जवाब नहीं दिया। उसका खामोश रहना ही जवाब था।
राम अवतार चाचा ने अपना गमछा मुँह पर रखा, जैसे बदबू रोक रहे हों। "रामू को पता था। इसीलिए उसने अपनी दुकान बंद की थी। चार दिन। उसे पता था कि चौथे दिन वह..." उनकी आवाज़ टूट गई। "हर बार यही होता है, बेटा। हर बार। जब खानदान का कोई माँगता है, तो गाँव का कोई चुकाता है। तीस साल पहले तेरे बाप ने माँगा था। तब ग्यारह लोग मरे थे। ग्यारह।"
"ग्यारह?" विक्रम की आवाज़ बैठ गई।
"और तेरे बाप ने उन ग्यारह की फ़ाइलें ग़ायब करा दीं। वह पुलिस में था, उसे पता था कैसे करना है।" राम अवतार चाचा ने थूका, एक तरफ़, और फिर कहा, "अब सुन। तूने एक माँगा है। अब या तो तू इक्कीस रात पूरी करेगा, या यह गाँव खाली हो जाएगा। और मैं तुझे एक बात और बता दूँ, बेटा। मुक्ति इसमें नहीं है कि तू भागे। मुक्ति इसमें है कि तू वह करे जो तेरे बाप न कर सके।"
"क्या?"
राम अवतार चाचा ने उसकी आँखों में देखा, और पहली बार विक्रम ने उनकी आँखों में डर के अलावा कुछ और देखा। दया। बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई दया।
"इसे पूछ कि वह क्या चाहती है," उन्होंने कहा। "मुराद क्या है, यह तो सब पूछते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि उसे क्या चाहिए। शायद इसीलिए वह आज तक बँधी है।"
वह चले गए। विक्रम वहीं खड़ा रहा, भीड़ उसके इर्द-गिर्द बहती रही, और उसके कानों में मीरा की आवाज़ गूँज रही थी। "जो देती है, उसका ब्याज उसकी कीमत से ज़्यादा होता है।"
और उसके कानों में, उससे भी गहराई से, एक और आवाज़ गूँज रही थी, मीठी, संतुष्ट, जैसे किसी ने पेट भरकर भोजन किया हो।
"पहली कीमत चुक गई, विक्रम। अब दूसरी मुराद सोच ले। तेरे पास इक्कीस रातें हैं। बीस बची हैं।"