PretikaYakshini Storiesयक्षिणी: कदंब का श्राप

भाग 4: तांत्रिक

Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
यक्षिणी: कदंब का श्राप
Chapter
4 of 14
Category
Yakshini Stories
Reading time
17 min
Words
3259
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सोनार ने मोहर छूने से मना कर दिया।

विक्रम उसे कस्बे के सर्राफ़ा बाज़ार में ले गया था, साइकिल से, पोटली को अपनी शर्ट के अंदर छिपाकर। कस्बा बारह किलोमीटर दूर था, और उसे उम्मीद थी कि वहाँ कोई उसकी गर्दन का निशान नहीं जानता होगा।

पहले सोनार ने मोहर उठाई, तौलने के लिए तराज़ू पर रखी, और फिर उसने मोहर को रोशनी में घुमाया। उसका चेहरा बदल गया। उसने मोहर तराज़ू से उठाई नहीं, बल्कि लकड़ी की चिमटी से उठाकर विक्रम की तरफ़ बढ़ा दी।

"यह वापस ले लो," उसने कहा। "और यहाँ कभी मत लाना।"

"क्यों? सोना खोटा है क्या?"

"सोना खल्ली है। खोटा खानदान है इसका।" सोनार ने अपनी दुकान के पीछे लगे हनुमान जी के चित्र की तरफ़ देखा और मुँह में कुछ बड़बड़ाया। "यह मुहर मैंने बचपन में अपने दादा के पास देखी थी। अर्धचंद्र और यह लिपि। यह शिवगढ़ के ठाकुरों की मोहर है, और इन मोहरों को छूने वाले सोनारों के हाथ सड़ जाते हैं। मेरे दादा के हाथ सड़े थे। मैं बच्चा था, मैंने देखा था।"

"दादा ने किस से ली थीं मोहरें?"

सोनार ने उसे दरवाज़े तक धकेला। "तेरे बाप से किसने ली थीं, यह तू उनसे पूछ। अरे, मर गए वह? तो फिर उनसे पूछ, जिन्होंने तुझे यह दीं। और जा, जल्दी जा। इस बाज़ार में तेरा नाम मत बताना किसी को।"

विक्रम बाज़ार में खड़ा रहा, पोटली शर्ट के अंदर, और उसे लगा कि पूरा कस्बा उसे देख रहा है। किसी ने उसका नाम नहीं लिया था, फिर भी दो दुकानें उसके सामने से गुज़रते ही बंद हो गईं।

उसने वापसी में तय किया कि अब उसे सिर्फ़ एक ही इंसान से बात करनी है। वह इंसान जो इस सब को शुरू से जानता है। वह इंसान जो उसके पिता की फ़ोटो में था, रुद्राक्ष की माला पहने, त्रिशूल-छड़ी लिए।

भैरव नाथ।

मीरा उसी शाम आई, और उसने यह नाम सुनकर अपनी फ़ाइल बंद कर दी।

"तू उस आदमी से मिलने जा रहा है?" उसने पूछा। "विक्रम, मेरी रिसर्च में उसका नाम तीन जगह आया है, और तीनों जगह मौतों के साथ। उन्नीस सौ तिरानबे में एक रिसर्चर ने उसका इंटरव्यू लिया था। रिसर्चर की लाश छह दिन बाद तालाब में मिली। और सुन, सबसे अजीब बात। उस इंटरव्यू की टेप मेरे पास है। मैंने उसे सौ बार सुना है। तांत्रिक की आवाज़ में एक खरोंच है, एक खास किस्म की फुसफुसाहट, जैसे गले में राख भरी हो। विक्रम, उन्नीस सौ तिरानबे की टेप में भी वही आवाज़ है। सत्तर की एक और रिकॉर्डिंग में भी। और एक पुरानी ग्रामोफोन सिलेंडर रिकॉर्डिंग में भी, उन्नीस सौ ग्यारह की।"

"एक ही आवाज़? तीन रिकॉर्डिंग में, अस्सी साल के फ़ासले में?"

"एक ही आवाज़।" मीरा ने अपनी फ़ाइल खोली और एक पन्ना निकाला। "और यह देख। यह उस गाँव के रजिस्टर की नकल है जहाँ तांत्रिकों के नाम लिखे जाते थे। अठारह सौ छब्बीस में इस गाँव के अखाड़े का महंत था... भैरव नाथ। फिर अठारह सौ छप्पन में... भैरव नाथ। फिर अठारह सौ नब्बे में। फिर उन्नीस सौ बीस में। हर तीस साल में, एक ही नाम। या तो यह ख़ानदानी नाम है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता है..."

"या आदमी एक ही है," विक्रम ने पूरा किया।

दोनों चुप रहे। आंगन में शाम की रोशनी पीली पड़ रही थी, और कहीं दूर एक कौआ बोला, फिर चुप हो गया।

"मीरा," विक्रम ने कहा। "तू मुझे एक बात बता। तू इतना क्यों जानती है? रिसर्चर होती तो तू सवाल पूछती। तू तो जवाब लेकर घूम रही है।"

मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ हिला, फिर वह शांत हो गईं।

"मेरी परदादी इस गाँव की थी," उसने कहा। "बस इतना जान ले अभी। बाकी जब वक़्त आएगा, बता दूँगी।"

"वक़्त कब आएगा, मीरा?"

"जब तू उससे पूछेगा, तब तक मैं शायद बता चुकी हूँ।" उसने अपनी पोटली सीने से सटाई। "अभी इतना जान ले कि मैं तेरे साथ हूँ, और यह भैरव नाथ से मिलना मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ है। पर तू नहीं मानेगा, मैं जानती हूँ। तुम ठाकुरों की नस्ल में ज़िद खून में होती है।"

विक्रम ने उसे देखा। मीरा की आँखें शांत थीं, बहुत शांत, उस आदमी की तरह जो अंदर कुछ छिपाए हो।

"कुछ नहीं," उसने कहा। "चल।"

अखाड़ा गाँव के बाहर था, श्मशान से भी आगे, वहाँ जहाँ सड़क ख़त्म हो जाती थी और कांटेदार झाड़ियाँ शुरू हो जाती थीं। वहाँ एक पुरानी, गिरी हुई छत वाला ढांचा था, जिसे शायद कभी मंदिर कहा जाता था, पर अब उसकी दीवारों पर हड्डियों की मालाएँ लटकी थीं। खोपड़ियाँ, विक्रम ने गिनीं, जानवरों की, और शायद कुछ इंसानों की भी। दरवाज़े पर एक त्रिशूल गड़ा था, और त्रिशूल के तीनों सिरों पर काले कपड़े बँधे थे।

अंदर से धुआँ आ रहा था। लोबान का, और कुछ और, जिसकी गंध विक्रम ने पहले कहीं नहीं सूँघी थी। मीठी और सड़ी, दोनों एक साथ।

दरवाज़े के ऊपर, लकड़ी की पट्टी पर, किसी ने चाकू से कुछ काटा था। विक्रम ने रुककर पढ़ा। अक्षर नहीं थे। निशान थे। सैकड़ों छोटी-छोटी खाँचें, एक के ऊपर एक, जैसे कोई दिन गिन रहा हो। और उन खाँचों के नीचे, एक ही आकृति बार-बार बनी थी। पेड़। और पेड़ के नीचे बैठी औरत।

"गिनती मत कर," मीरा ने धीरे से कहा। "मैंने तिरानबे की टेप में सुना है। रिसर्चर ने गिनी थीं। सात हज़ार, तीन सौ, पैंसठ खाँचें। वह रिसर्चर अगले हफ़्ते मर गया।"

"आओ," अंदर से आवाज़ आई। "दरवाज़ा खुला है, विक्रम सिंह।"

विक्रम का कदम रुका। "उसने मेरा नाम कैसे..."

"उसे सब पता है," मीरा ने धीरे से कहा। "यही तो ख़तरा है।"

वे अंदर गए। अखाड़े के बीच में धूनी जल रही थी, और धूनी के पार, एक आदमी बैठा था। लंबा शरीर, सूखा, पर ताक़तवर, जैसे पुरानी लकड़ी। नंगा धड़, जटाएँ कंधों पर बिखरी हुईं, और गले में रुद्राक्ष की नहीं, कुछ और की माला थी। विक्रम ने ग़ौर से देखा। छोटी-छोटी हड्डियों की माला थी, उंगलियों की हड्डियों की।

और उस आदमी के चारों ओर, ज़मीन पर, सात दीये जल रहे थे। बिना तेल के। विक्रम ने देखा, साफ़ देखा, कि दीयों में बाती सूखी थी, तेल एक बूँद नहीं था, और फिर भी लौ जल रही थी, स्थिर, बिना काँपे।

"बैठो," भैरव नाथ ने कहा। उसने अपनी आँखें नहीं खोलीं। "और वह लड़की भी बैठो। दाई की नस्ल, तेरा यहाँ स्वागत है। तेरे परिवार ने मेरी बहुत सेवा की है, बीते दो सौ सालों में।"

मीरा का चेहरा सख़्त हो गया। वह नहीं बैठी। विक्रम बैठ गया, धूनी के पार, और उसने पहली बार भैरव नाथ के चेहरे को ठीक से देखा।

वह चेहरा किसी उम्र का नहीं था। झुर्रियाँ थीं, पर त्वचा तनी हुई थी। दाढ़ी सफ़ेद थी, पर दाँत काले और पैने थे, किसी जानवर के जैसे। और जब भैरव नाथ ने आँखें खोलीं, तो विक्रम ने देखा कि उसकी पुतलियों में कुछ जल रहा था, बहुत दूर, बहुत छोटा, जैसे आँखों के अंदर कोई और धूनी जल रही हो।

"तुम मुझे जानते हो?" विक्रम ने पूछा।

"तुम्हारे पैदा होने से पहले से," भैरव नाथ ने कहा। "तुम्हारे पिता मेरे पास आए थे, तीस साल पहले। बहुत डरे हुए थे। उन्होंने कुछ शुरू किया था, और उन्हें ख़त्म करना नहीं आता था। मैंने उन्हें बताया। पर उन्होंने आधा किया, आधा छोड़ा। आधे काम की कीमत हमेशा पूरी होती है, विक्रम सिंह। यह पहली सीख है।"

"मेरी माँ," विक्रम ने कहा, और उसकी आवाज़ में दरार थी। "मेरी माँ की मौत..."

"कीमत थी," भैरव नाथ ने कहा, बिना किसी भाव के, जैसे मौसम बता रहा हो। "तेरे पिता ने उसे दी। मुराद के बदले। उन्होंने तुझे बचाने के लिए तेरी माँ को दे दिया। क्योंकि बंधन-पत्र में लिखा था, पहली कीमत वह होगी जिसे तू सबसे ज़्यादा चाहता है, और तेरे पिता तेरी माँ से ज़्यादा तुझे चाहते थे। यह उनकी कमज़ोरी थी। यह उनकी हार थी।"

विक्रम का क़ब्ज़ा बाहर की ओर खिंचा, जैसे उसकी छाती में कुछ फटा हो। उसने अपने हाथ अपनी जाँघों पर रखे और उन्हें दबाया, ताकि वे काँपते न दिखें।

"बंधन-पत्र क्या है?" उसने पूछा।

भैरव नाथ ने धूनी में लकड़ी डाली। लपट उठी, और एक पल के लिए उसका चेहरा उस लपट में दिखा, लाल और खोखला, जैसे चेहरे के पीछे कुछ न हो।

"जब तेरे पुरखों ने उसे बाँधा था, तो एक पत्र बना था," उसने कहा। "भोजपत्र पर, खून से लिखा हुआ। उसमें लिखा था कि यक्षिणी क्या देगी, और क्या लेगी। दो सौ साल से वह उसी पत्र से बँधी है। वह पत्र से एक बूँद ज़्यादा नहीं ले सकती, और एक बूँद कम भी नहीं। पत्र ही उसकी क़ैद है, और पत्र ही उसकी ताक़त।"

"पत्र कहाँ है?"

"उसी के पास। जहाँ उसे बाँधा गया था।" भैरव नाथ ने मुस्कुराई। "पेड़ के नीचे, उसकी जड़ों में, उसके साथ दबा हुआ। तू अगर उस पत्र को पा ले, तो तू उसके हर नियम को पढ़ सकता है। हर कीमत जान सकता है। और शायद, कोई ऐसा पन्ना भी मिले जो उसे छुड़ा सके। पर पत्र तक पहुँचने के लिए तुझे पेड़ के नीचे उस गुफा में उतरना पड़ेगा, और उस गुफा में जो उतरा, वह कभी लौटा नहीं। तेरे पिता भी उतरे थे। तीन घंटे के लिए। जब लौटे, तो उनके बाल सफ़ेद हो चुके थे, और वे कभी किसी को नहीं बताए कि नीचे क्या था।"

"तुम्हें सब पता है," विक्रम ने धीरे से कहा। "तुम वहाँ थे, दो सौ साल पहले भी। मीरा की रिसर्च में तुम्हारा नाम अठारह सौ छब्बीस से है।"

भैरव नाथ ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी माला की हड्डियाँ छुईं, एक-एक करके, जैसे गिन रहा हो।

"मैं बूढ़ा हूँ," उसने अंत में कहा। "इतना बूढ़ा कि अब मुझे अपनी उम्र याद नहीं। और इतना बूढ़ा कि अब मुझे मरने की तरकीबें याद हैं, पर मरना नहीं आता। यह भी एक क़ैद है, विक्रम सिंह। बूढ़ों की क़ैद उनके शरीर होते हैं। तू समझेगा, कुछ रातों बाद, जब तू अपने आपको आईने में देखेगा और पहचानेगा नहीं।"

"मुझे इससे बाहर कैसे निकलना है?" उसने पूछा।

"बाहर?" भैरव नाथ ने पहली बार मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में दाँत दिखे, काले, पैने। "बाहर निकलने का रास्ता नहीं है, विक्रम सिंह। बाहर निकलने का रास्ता अंदर से होकर जाता है। तू इक्कीस रात पूरी करेगा। हर रात उससे मिलेगा। हर मुराद साफ़ माँगेगा। और इक्कीसवीं रात, जब साधना पूरी होगी, तो तू उसे बाँध लेगा।"

"बाँध लूँगा?"

"यही तेरे पुरखों ने किया था। यही तेरे पिता करना चाहते थे। यक्षिणी को बाँधने वाला उसका मालिक बन जाता है, विक्रम। मालिक। उसकी शक्ति, उसका ख़ज़ाना, उसकी अमरता, सब उसका। तू जो चाहे, वह कर सकेगा। तेरा कर्ज़, तेरे दुश्मन, तेरा दिल्ली का वह कमरा, सब मिट जाएगा।"

विक्रम ने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा खड़ी थी, उसका चेहरा सख़्त, और उसकी आँखें विक्रम पर ठहरी हुई थीं, और उन आँखों में विक्रम ने कुछ पढ़ा, कुछ जो चेतावनी से आगे था।

"और अगर मैं नहीं चाहता मालिक बनना?" विक्रम ने पूछा।

"तो तू मरेगा," भैरव नाथ ने कहा, सरलता से। "और मरने के बाद भी उसका होगा। बंधन खून में जाता है, विक्रम। तेरे पिता ने तुझे बचाने की बहुत कोशिश की। पर तू आ गया। तू आ ही गया। अब तेरे पास दो ही रास्ते हैं। मालिक बनो, या मल बनो। यक्षिणी के पास तीसरा रास्ता नहीं होता।"

उसने धूनी में कुछ डाला। धुआँ उठा, हरा-सा, और उस धुएँ में विक्रम ने एक आकृति देखी, बहुत जल्दी, बहुत धुंधली। एक औरत, जो नाच रही थी, घूमती हुई, और उसकी पायल की आवाज़ उसके कानों में आई, टन, टन, टन।

और फिर आकृति रुकी। धुएँ के बीच में वह औरत सीधी खड़ी हो गई, और उसने अपना चेहरा धुएँ से बाहर निकाला, विक्रम की तरफ़, और विक्रम ने उसका चेहरा देखा।

वह चेहरा उसकी माँ की तस्वीर से मिलता-जुलता था। वही आँखें, वही होंठों का ढेर। पर मुस्कान अलग थी। इस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो किसी जीवित चेहरे पर नहीं होता, एक ऐसी खुशी जो भूख से बनी हो।

"यही भूल होती है सबसे," भैरव नाथ ने कहीं से कहा, उसकी आवाज़ दूर से आती हुई लगी, जैसे वह धुएँ के उस पार चला गया हो। "वह तुम्हें वह दिखाती है जिसे तुम खो चुके हो। देखो मत, विक्रम। देखो मत।"

विक्रम ने आँखें नहीं हटाईं। धुएँ में वह चेहरा अब उसकी माँ का था, पूरी तरह, और उसने अपने होंठ हिलाए, और विक्रम ने पढ़ा, बिना आवाज़ के: "मेरा बेटा।"

धुआँ बिखर गया। दीयों की लौ काँपी। विक्रम को अपने गाल पर कुछ गीला महसूस हुआ, और उसने उसे पोंछा, बिना पहचाने कि वह क्या था।

"कल रात उससे मिल," भैरव नाथ ने कहा। "उसने तुझे बुलाया है। और सुन, एक बात बता देता हूँ, मुफ़्त में। तेरे पिता ने जो सबसे बड़ी गलती की, वह यह थी कि उन्होंने उससे झूठ बोला। उससे झूठ मत बोलना, विक्रम। उसकी नज़र में झूठ की गंध होती है।"

विक्रम उठा। उसका सिर भारी था, और उसकी गर्दन का निशान जल रहा था। उसने मीरा का हाथ पकड़ा और बाहर निकलने लगा।

"और एक बात," भैरव नाथ ने पीछे से कहा। "तेरी वह पोटली, सोने की मोहरों वाली। उसमें से एक मोहर कम पड़ रही है। गिन लेना। वह अपनी चीज़ें वापस लेना शुरू कर चुकी है।"

विक्रम ठिठक गया। उसने पोटली किसी को नहीं दिखाई थी। मीरा को भी नहीं। उसने बिना पलटे पूछा, "तुम्हें कैसे पता?"

"मुझे सब पता है," भैरव नाथ ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वह मुस्कान थी जो चेहरे से ज़्यादा आवाज़ में डरावनी लगती है। "मैं यहाँ दो सौ साल से हूँ, विक्रम सिंह। इस गाँव में मैं वह हूँ जो रहता है। बाकी सब आते हैं, जाते हैं, जलते हैं, मिट्टी होते हैं। मैं रहता हूँ।"

विक्रम और मीरा बाहर निकले। शाम ढल चुकी थी, और कांटेदार झाड़ियों में अंधेरा पहले से घर कर रहा था। दोनों कुछ दूर चुपचाप चलते रहे।

"तूने उसकी बात सुनी," विक्रम ने कहा। "मालिक बनो या मल बनो।"

"और तूने मेरी बात सुनी थी," मीरा ने कहा। "कभी कुछ मत माँगना। तूने माँगा, और रामू मर गया। अब यह आदमी कह रहा है कि माँगता रह। विक्रम, तू सोच। जिसने पहली बार इसे बाँधा था, वह कौन था? यही तांत्रिक। और अब यही कह रहा है कि तू इसे बाँध ले। इसका मतलब..."

"इसका मतलब वह चाहता है कि साधना पूरी हो," विक्रम ने धीरे से कहा। "पर क्यों? उसे क्या मिलेगा?"

मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी पोटली को सीने से सटाया।

हवेली पहुँचकर विक्रम ने पहला काम यही किया कि उसने पोटली निकाली और मोहरें गिनीं। मीरा ने पहली बार वह पोटली देखी, और उसकी आँखें बड़ी हो गईं, पर उसने कुछ नहीं पूछा।

विक्रम ने दो बार गिनीं। फिर तीसरी बार।

उन्नीस।

"बीस थीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी। "मैंने गिनी थीं। बीस।"

"कहीं गिर तो नहीं गई?"

"पोटली बँधी थी। मैंने कसकर बाँधी थी।" विक्रम ने पोटली पलटी। उसके नीचे, कपड़े पर, मिट्टी का एक छोटा ढेर था, गीली मिट्टी, जैसे कोई मोहर धीरे-धीरे मिट्टी में बदल गई हो। उसने मिट्टी छुई। ठंडी थी। और उसमें से गंध आई, वही, चंपा और सिंदूर की, जो रात में उसके कमरे में आती थी।

"वह अपनी चीज़ें वापस ले रही है," मीरा ने धीरे से कहा। "विक्रम, यह अच्छा नहीं है। जो चीज़ वह देती है, वह उसका बंधन है। तूने बीस मोहरें लीं। अब उन्नीस तेरी हैं, एक उसके पास वापस गई। इसका मतलब है कि अब तू उससे एक मोहर का कर्ज़दार है। यह हिसाब सोने का नहीं है। यह हिसाब बंधन का है।"

"तो मैं यह पोटली लौटा दूँ? फेंक दूँ?"

"दी हुई चीज़ लौटाने से कर्ज़ नहीं उतरता," मीरा ने कहा। "कर्ज़ तब उतरता है जब कीमत चुकती है। और कीमत..." उसने रामू के घर की तरफ़ देखा, जहाँ से अब भी रोने की आवाज़ें आ रही थीं। "कीमत चुक चुकी है।"

विक्रम ने पोटली को दीवार के कोने में रखा और उस पर एक पत्थर रख दिया, जैसे पत्थर उसे रोक पाएगा। उसे खुद अपने इस काम पर हँसी आई, पर हँसी गले में ही मर गई।

रात को दोनों ने खाना साथ खाया। मीरा ने रसोई संभाली, और विक्रम ने पहली बार ग़ौर किया कि वह हवेली में घुसते ही उसे हर चीज़ की जगह मालूम थी। आटा कहाँ है, चूल्हा कैसे जलता है, पानी की मटकी किस कोने में है। उसने पूछा नहीं। पूछता, तो शायद मीरा कुछ बोलती नहीं, पर विक्रम ने उस पल पूछने से बचना ही ठीक समझा। कुछ जवाब ऐसे होते हैं जो सुनने के बाद रिश्ते बदल देते हैं, और अभी उसे मीरा चाहिए थी, जैसी भी थी।

खाना खाते वक़्त मीरा ने कहा, "कल रात तू उससे मिलेगा।"

"हाँ।"

"तो मेरी एक बात याद रखना। जो वह दिखाएगी, वह सच होगा, पर पूरा सच नहीं होगा। वह तुझे वह दिखाएगी जो तुझे तोड़े। अगर वह तुझे तेरी माँ दिखाए, या तेरे पिता, या मुझे... तो तू याद रखना कि वह चीज़ें दिखाती है, इंसान नहीं।"

"और अगर वह तुझे दिखाए?" विक्रम ने पूछा, आधे मज़ाक में।

मीरा ने अपनी थाली में देखा। "तो सबसे ज़्यादा बचकर रहना।"

रात ढल चुकी थी जब मीरा ने जाने के लिए अपना बैग उठाया। विक्रम उसे गली तक छोड़ने निकला। गली में अंधेरा था, पर ठीक सामने वाले घर के आँगन में एक पुराना दीपक जल रहा था, और उसकी रोशनी गली की दीवार तक आ रही थी।

दोनों चलने लगे ही थे कि विक्रम ने कुछ देखा और उसका कदम रुक गया।

उस दीपक की रोशनी में, गली की दीवार पर, दो परछाइयाँ पड़ रही थीं। विक्रम की और मीरा की।

और एक तीसरी।

तीसरी परछाई उन दोनों के बीच में थी, लंबी, सूखी, जटाओं वाली, और वह परछाई उनके साथ चल रही थी। विक्रम ने अपने बगल में देखा। कोई नहीं था। उसने दीवार पर देखा। परछाई वहीं थी, उनके साथ क़दम से क़दम मिलाती हुई।

"मीरा," उसने धीरे से कहा। "दीवार देख।"

मीरा ने देखा। उसकी साँस रुकी।

परछाई अब रुक गई थी। उन दोनों के आगे खड़ी थी, उनका रास्ता रोके हुए, और फिर, विक्रम ने देखा, परछाई ने अपना सिर घुमाया। पर सिर एक नहीं था। दीवार पर, उस एक परछाई के कंधों के ऊपर, तीन सिर उभरे हुए थे, तीनों अलग-अलग दिशाओं में देख रहे थे, और तीनों सिरों ने, एक साथ, मुस्कुराया।

परछाई का मुँह खुला, और विक्रम ने देखा कि उसमें दाँत हैं। परछाई में दाँत नहीं होते। परछाई में कुछ नहीं होता, सिर्फ़ अंधेरा होता है।

"मुझे माफ़ करना," परछाई ने कहा, और आवाज़ भैरव नाथ की थी, पर उसमें तीन आवाज़ें मिली हुई थीं, एक आदमी की, एक औरत की, और एक किसी बच्चे की। "मैं तुम्हें छोड़कर नहीं आया था। मैं तुम्हारे साथ ही आया था। मैं तुम्हारी परछाई में हूँ, विक्रम सिंह। जब से तू अखाड़े से निकला है, मैं तेरे साथ हूँ।"

दीपक बुझ गया। परछाई ग़ायब हो गई। गली में पूरा अंधेरा था, और उस अंधेरे में, विक्रम ने अपने दाहिने कान के बिल्कुल पास, एक साँस महसूस की। गर्म, सड़ी हुई साँस।

और एक फुसफुसाहट: "इक्कीसवीं रात तक, तू मुझसे कहीं नहीं जा पाएगा।"

विक्रम ने मीरा का हाथ पकड़ा और दोनों हवेली की ओर भागे। दरवाज़ा बंद करते वक़्त उसने गली में देखा। अंधेरा शांत था, खाली, पर दीवार पर, जहाँ अभी दीपक की रोशनी थी, वहाँ अब अंधेरे में भी एक आकृति ठहरी हुई थी, जैसे परछाई को रोशनी की ज़रूरत न रही हो।

उसने तीनों कुंडियाँ लगाईं। मीरा उस रात हवेली में ही रुकी, मेहमानों वाले कमरे में। दोनों ने सोने की कोशिश नहीं की। दोनों ने बस दरवाज़ों के बंद होने की आवाज़ें गिनीं, और आधी रात को, जब पेड़ की तरफ़ से पायल बजी, दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया, अंधेरे में, बिना कुछ कहे।

बाहर, कदंब की सूखी डालियों के नीचे, कोई नाच रहा था। धीरे-धीरे, बिना थके, जैसे उसे दो सौ साल का अभ्यास हो।

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