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भाग 5: दर्शन
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 5 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3260
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अमावस्या की रात उतरी तो गाँव ने अपने दरवाज़े दोपहर में ही बंद कर लिए।
विक्रम ने देखा कि सूरज ढलते-ढलते शिवगढ़ की गलियाँ खाली हो गईं। खिड़कियों पर काले कपड़े लटक गए। दरवाज़ों की चौखटों पर नमक की लकीरें खिंच गईं। किसी ने अपने बच्चों को ऊपर मंज़िल पर छिपा लिया, किसी ने अपनी गायों को घर के अंदर बाँध लिया। शाम की आरती का समय हुआ, पर मंदिर की घंटी नहीं बजी। पujari ने मंदिर का दरवाज़ा बंद करके ताला लगा दिया, और ताला लगाते वक़्त उसने कदंब के पेड़ की तरफ़ एक बार भी नहीं देखा।
"आज की रात सबसे भारी होती है," राम अवतार चाचा ने विक्रम को बताया, दरवाज़े पर आकर, पर अंदर नहीं आए। "अमावस्या की रात वह सबसे सुंदर दिखती है। और जितनी सुंदर दिखे, समझो उतनी भूखी है। तू घर से बाहर मत निकलना, बेटा। चाहे कुछ भी सुनाई दे।"
"अगर मुझे जाना है तो?" विक्रम ने पूछा।
राम अवतार चाचा ने उसे देखा, उनकी आँखों में वह पुरानी दया थी। "तो यह ले जा।" उन्होंने अपने गमछे से एक छोटा सा लोहे का कुंडा निकाला, पुराना, ज़ंग लगा। "लोहा। वह लोहे को छू नहीं सकती। और यह," उन्होंने एक पोटली दी, "श्मशान की राख। अगर वह तुझे छूने आए, तो यह उसकी तरफ़ फेंक देना। राख से उसे दर्द होता है। दर्द उसे याद दिलाता है कि वह कभी जली थी।"
विक्रम ने दोनों चीज़ें लीं। "चाचा, आपको इतना कैसे पता?"
"क्योंकि तीस साल पहले मैंने भी यही तैयारी की थी," उन्होंने कहा। "और मैं बच गया। मेरे भाई नहीं बचे।" वह चले गए, और उनके जाते ही गली में सन्नाटा उतर आया, वह सन्नाटा जो सिर्फ़ अमावस्या की रातों में होता है, जब चाँद नहीं होता और तारे भी बादलों के पीछे छिप जाते हैं।
दोपहर को विक्रम सरपंच के घर गया। पिता की आखिरी ज़िंदगी के बारे में पूछना था, और गाँव में अगर किसी ने उनसे आखिरी दिनों में बात की थी, तो वह सरपंच था।
सरपंच का घर गाँव का सबसे बड़ा घर था, दो मंज़िला, लोहे के बड़े-बड़े दरवाज़ों वाला। पर आज उस घर की खिड़कियाँ बंद थीं, और दरवाज़े पर एक पुराना त्रिशूल टाँगा था, जिस पर नीबू-मिर्ची की माला सूख चुकी थी।
सरपंच देवी सिंह एक थके हुए आदमी थे, साठ के, सफ़ेद बालों वाले, और उनके घर के अंदर से एक अजीब गंध आ रही थी, दवाओं की, और कुछ और, जैसे कोई बहुत दिनों से बंद कमरे में रह रहा हो।
"तेरे बाप आखिरी बार मुझसे ग्यारह दिन पहले मिले थे," देवी सिंह ने कहा, आंगन में बैठकर, बिना चाय पेश किए। "वे कह रहे थे कि उन्हें कुछ ढूँढना है। कुछ बहुत पुराना। मैंने पूछा क्या, तो उन्होंने कहा, मुक्ति का रास्ता। मैंने कहा, रघुवीर, तू बूढ़ा हो गया है, पूजा-पाठ कर ले। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, देवी, पूजा-पाठ उन लोगों के लिए है जिनके पुरखों ने किसी को जलाया नहीं।"
विक्रम ने सोचा। "और फिर?"
"फिर वे चले गए। और तीन दिन बाद..." देवी सिंह ने अपने हाथ आपस में रगड़े। "तीन दिन बाद उन्हें पेड़ के नीचे से उठाया गया।"
उसी पल, ऊपर मंज़िल से एक आवाज़ आई। भारी, लहराती हुई आवाज़, जैसे किसी ने मुँह में पानी भरकर कुछ कहा हो। देवी सिंह का चेहरा सख़्त हो गया।
"मेरा बेटा," उन्होंने कहा, बिना पूछे। "बीस साल से ऊपर पड़ा है। कोमा में, डॉक्टर कहते हैं। पर डॉक्टर यह नहीं बताते कि कोमा में पड़ा आदमी रात में कैसे बोलता है। और यह भी नहीं बताते कि वह उन नामों को कैसे जानता है जो उसके जन्म से पहले मर चुके हैं।"
विक्रम ने ऊपर देखा। सीढ़ियों में अंधेरा था, और उस अंधेरे से, धीरे-धीरे, एक ही शब्द आ रहा था, बार-बार, उसी लहराती आवाज़ में।
"चंद्रा... वल्ली... चंद्रा... वल्ली..."
"यह नाम उसने पहली बार उसी रात लिया," देवी सिंह ने कहा, और अब उनकी आवाज़ काँप रही थी, "जिस रात तेरे बाप मरे। बीस साल से वह सिर्फ़ गड़गड़ाता था। उस रात से वह यह नाम ले रहा है। चंद्रावल्ली। मैंने गाँव के सबसे बूढ़े आदमी से पूछा। उसने कहा, यह नाम इस गाँव में दो सौ साल से किसी ने नहीं लिया। यह उसी का नाम है।"
विक्रम ने सीढ़ियों की तरफ़ एक क़दम बढ़ाया। देवी सिंह ने उसकी बाँह पकड़ ली। उनकी पकड़ में दर्द था।
"मत जा ऊपर," उन्होंने कहा। "जो ऊपर है, वह मेरा बेटा नहीं रहा, बेटा। वह कुछ और है, जो मेरे बेटे के शरीर को किराए पर लिए हुए है। और अगर तूने उसे देख लिया, तो वह तुझे भी देख लेगा।"
विक्रम वापस हवेली आया तो शाम हो चली थी। उसके कानों में वह नाम घूम रहा था। चंद्रावल्ली। उसने यह नाम कभी नहीं सुना था, और फिर भी, जब उसने उसे अपने होंठों पर रखकर देखा, तो उसकी गर्दन का निशान जल उठा, जैसे निशान ने उस नाम को पहचान लिया हो।
मीरा आठ बजे आई। उसने अपना बैग आंगन में रखा और उसमें से चीज़ें निकालीं। नमक। लोहे की कुँजियाँ। एक छोटा दीया। और अपनी पोटली, जिसे उसने आज भी नहीं खोला।
"मैं बाहर रहूँगी," उसने कहा। "तू अंदर से बात करेगा, मैं दरवाज़े के पास रहूँगी। अगर तीन बार तेरी आवाज़ न आए, तो मैं अंदर आऊँगी।"
"मीरा, यह मेरी लड़ाई है।"
"यह तेरी लड़ाई है, पर मरने की इजाज़त मैं तुझे नहीं देती।" उसने उसकी आँखों में देखा। "कम से कम आज रात नहीं। मुझे तेरे कुछ जवाब चाहिए, विक्रम सिंह। और मुर्दे जवाब नहीं देते।"
विक्रम ने पहली बार मीरा को ठीक से देखा। दीये की रोशनी में उसका चेहरा तनाव से खिंचा हुआ था, पर उसमें वह चीज़ थी जो उसने किसी और में नहीं देखी थी, शायद अपनी माँ की तस्वीर के सिवाय। एक ऐसा ठहराव जो कहता था कि यह औरत डरने के बावजूद नहीं भागेगी।
"शुक्रिया," उसने कहा, बस इतना।
मीरा ने सिर हिलाया। "जा। और याद रख, झूठ मत बोलना उससे।"
विक्रम ने पिछला दरवाज़ा खोला और अंधेरे में उतरा।
कदंब का पेड़ अमावस्या की रात में और भी काला दिखता था। उसकी सूखी डालियाँ आकाश में फैली हुई थीं, जैसे किसी ने काली मुट्ठी से आसमान पकड़ लिया हो। पेड़ के नीचे, जड़ों की गुफा के पास, दीये जल रहे थे। तीन दीये, किसी ने रखे थे, और उनकी लौ काँप नहीं रही थी, बिल्कुल स्थिर, जैसे हवा ने उन्हें छूना छोड़ दिया हो।
विक्रम ने कुंडा अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ा और आगे बढ़ा।
"तू आया," आवाज़ ने कहा। और इस बार आवाज़ कहीं से नहीं आई। वह हर तरफ़ से आई, और किसी जगह से नहीं। वह पेड़ के अंदर से आई, ज़मीन के नीचे से, और विक्रम के अपने सीने के भीतर से, तीनों एक साथ।
"मैं आ गया," उसने कहा। "अब दिखा।"
हंसी हुई। मीठी, घूमती हुई हँसी, जैसे किसी ने चांदी की कटोरियों को आपस में टकराया हो। "इतनी जल्दी? तेरे पिता ने मुझे देखने में बारह रातें लगाई थीं। तू तो पाँचवीं रात में ही कह रहा है, दिखा। तेरे अंदर वही खून है, विक्रम। वही बेचैनी, वही हवस, वही ज़िद।"
"मैं अपने पिता नहीं हूँ।"
"हम देखेंगे।" आवाज़ आगे बढ़ी, और अब वह पेड़ के तने के पीछे से आ रही थी। "पर पहले मुझे देखने की हिम्मत कर। जो मुझे देखता है, वह या तो मुझसे प्रेम करने लगता है, या मुझसे डरकर भाग जाता है। दोनों ही मेरे हो जाते हैं। तू क्या होगा, विक्रम?"
विक्रम ने कुंडा और कसकर पकड़ा। उसकी हथेली में पसीना था, और लोहा गर्म हो रहा था, जैसे उसकी हथेली उसे पिघला रही हो।
"मैं तैयार हूँ," उसने कहा।
पेड़ के तने के पीछे से वह निकली।
पहले विक्रम ने सिर्फ़ उसकी आँखें देखीं। अंबर रंग की, गहरी, और उनमें वह चमक थी जो किसी दीये की नहीं, किसी आग की होती है, जो बहुत दूर से दिखती हो। फिर उसका चेहरा उभरा, और विक्रम की साँस रुक गई।
वह सुंदर थी। इतनी सुंदर कि विक्रम को अपनी साँसें लेनी भूल गईं, इतनी सुंदर कि उसे अपनी गर्दन का निशान, अपना कर्ज़, अपना डर, सब भूल गया। उसका चेहरा उन चेहरों जैसा था जो पुरानी पोथियों में बने होते हैं, गोल, पूर्ण, बिना किसी कमी के। उसके बाल घुटनों तक लंबे थे, काले, और उनमें चंपा के फूल गुँथे हुए थे। उसने लाल साड़ी पहनी थी, गीली, जैसे अभी-अभी किसी तालाब से नहाकर निकली हो, और उसके गीले कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।
पर फिर विक्रम ने उसके हाथ देखे।
उसकी उंगलियाँ लंबी थीं, असामान्य रूप से लंबी, और उनके सिरे पर नाखून नहीं थे। उनकी जगह कुछ काला था, कड़ा, जैसे जली हुई लकड़ी की नोकें। और जब वह चली, तो विक्रम ने देखा कि उसके पैर ज़मीन को छू नहीं रहे थे। वह ज़मीन से एक ऊँगली ऊपर तैर रही थी, और उसके पैरों के नीचे, जहाँ परछाई होनी चाहिए थी, वहाँ कुछ नहीं था।
"तू मुझे देख रहा है," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ साफ़ थी, गहरी, और उसमें वह मीठापन था जो विक्रम ने कभी किसी औरत में नहीं सुना था। "और तू भाग नहीं रहा। यह अच्छी बात है, विक्रम। या बुरी। यह तू ख़ुद तय करेगा।"
वह उसके पास आई। विक्रम ने अपने आपको पीछे नहीं हटने दिया। वह इतनी पास आई कि उसकी साँसों की गंध उसके चेहरे तक आई। चंपा और सिंदूर, और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ और। राख की गंध। जली हुई लकड़ी की।
"तू मुझसे डरता है," उसने कहा। "पर तू मुझे चाहता भी है। यही तो तेरे खून की भीमारी है, विक्रम। तुम ठाकुरों को वही चाहिए जो तुम्हें मारे।"
"तू मुझे नहीं जानती," विक्रम ने कहा।
वह हँसी। "मैं तुझे नहीं जानती?" उसने अपनी एक उंगली उठाई, और विक्रम ने देखा कि उस उंगली की नोक उसके चेहरे से एक ऊँगली दूर रुक गई, जैसे कोई अदृश्य दीवार हो। "तो सुन। जब तू बारह साल का था, तूने अपनी दादी की तिजोरी से पाँच सौ रुपये चुराए थे। तूने वे पैसे किसी खिलौने पर नहीं उड़ाए। तूने उन्हें उस लड़के को दिए थे जिसके पिता की मौत हो गई थी, क्योंकि तू उसकी माँ को रोते नहीं देख सकता था। तूने यह किसी को नहीं बताया। आज तक नहीं बताया। तेरी दादी मरते-मरते तक सोचती रहीं कि पैसे कहाँ गए। तूने सच नहीं बताया क्योंकि तुझे डर था कि तेरी नेकी दिखेगी। तेरा डर यह नहीं कि तू बुरा है, विक्रम। तेरा डर यह है कि तू अच्छा है, और अच्छाई की कीमत इस दुनिया में सबसे ज़्यादा होती है।"
विक्रम का कुंडा उसके हाथ से लगभग छूट गया। उसने उसे दोबारा पकड़ा। "यह... यह तू कैसे..."
"मैं वह जानती हूँ जो तू किसी को नहीं बताता," उसने कहा। "मैं तेरे खून में हूँ, विक्रम। तेरे पिता ने मुझे बुलाया था, और बुलाते ही मैं उस खून में घुस गई जो उनकी रगों में था। और अब वह खून तेरे अंदर है। तू मुझसे कुछ छिपा नहीं सकता। मैं तेरे सपनों में हूँ, तेरी यादों में हूँ, तेरे उन डरावने कोनों में हूँ जहाँ तू ख़ुद भी नहीं जाता।"
उसने अपना चेहरा और पास लाई। अब विक्रम उसकी आँखों में अपनी परछाई देख सकता था, और उस परछाई के पीछे, उसकी आँखों के अंदर, कुछ और था। एक आग, दूर, जलती हुई, और उस आग में एक आकृति, जलती हुई, चीखती हुई।
"तू मुझसे क्या चाहती है?" विक्रम ने पूछा।
"मैं वही चाहती हूँ जो मुझे दो सौ साल से नहीं मिला," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार वह दरार आई जो विक्रम ने कल रात सुनी थी। दर्द। बहुत पुराना, बहुत गहरा दर्द। "पर यह बात अभी की नहीं है। अभी तो तू मुझे वह दे जो हर रात देना है।"
"क्या?"
"कुछ भी। एक चीज़। जो तेरी हो।" उसने अपना हाथ बढ़ाया, हथेली ऊपर की तरफ़, और विक्रम ने देखा कि उसकी हथेली में एक निशान था, जला हुआ, जैसे किसी ने उस पर गरम लोहा रखा हो। "तेरे पिता मुझे अपनी यादें देते थे। हर रात एक याद। उन्होंने मुझे तेरी माँ की यादें दीं, तेरे बचपन की यादें दीं, अपनी जवानी की यादें दीं। मरते-मरते तक उनके पास सिर्फ़ एक याद बची थी। एक। वह याद जो उन्होंने मुझे नहीं दी।"
"कौन सी?"
यक्षिणी ने मुस्कुराई, और इस बार उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो विक्रम की रीढ़ में ठंडक डाल गया। "वह याद जिसमें उन्होंने तुझे पहली बार गोद में उठाया था। वह याद उन्होंने मुझे नहीं दी। वे मरते हुए भी उसे अपने सीने में दबाए रहे। और इसीलिए, विक्रम, इसीलिए मैंने उन्हें मरने दिया। क्योंकि जो मुझे अपनी आखिरी याद नहीं देता, वह मुझसे अपनी आखिरी साँस भी छुपाता है।"
विक्रम ने कुंडा उठाया। उसका हाथ काँप रहा था। "तू चाहती है मैं तुझे अपनी यादें दूँ?"
"या कुछ और। तेरी पसंद।" उसने अपनी हथेली और पास लाई। "एक बाल। एक बूँद पसीना। एक याद। कुछ भी। पर देना ज़रूरी है, विक्रम। यह सौदा है। सौदे में देना और लेना, दोनों ज़रूरी हैं।"
विक्रम ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उंगलियों को कुछ मिला। एक पुराना सिक्का, एक रुपये का, जो उसने दिल्ली से लाया था, शायद किसी बस के kiraye का बचा हुआ। उसने सिक्का निकाला और यक्षिणी की हथेली में रखा।
यक्षिणी ने सिक्का देखा। फिर उसने विक्रम को देखा। और फिर वह हँसी, ऐसी हँसी जिसमें कोई मीठापन नहीं था, सिर्फ़ पत्थर से पत्थर टकराने की आवाज़ थी।
"तू मुझे सिक्का दे रहा है?" उसने कहा। "मैंने तुझे बीस सोने की मोहरें दीं, और तू मुझे एक रुपये का सिक्का दे रहा है?"
"सौदा साफ़ होता है," विक्रम ने कहा, भैरव नाथ की बात दोहराते हुए। "तूने कहा, कुछ भी। तेरी पसंद मेरी नहीं थी। मेरी पसंद यह है।"
यक्षिणी की हँसी रुक गई। उसकी आँखें सिकुड़ गईं, और उसके चेहरे पर पहली बार कोई और भाव आया। गुस्सा नहीं। कुछ और। शायद सम्मान। शायद ख़तरे की पहचान।
"तू अपने पिता से अलग है," उसने कहा, धीरे से। "उन्होंने मुझे पहली रात में ही अपनी माँ की अंगूठी दे दी थी। तू मुझे सिक्का देता है। यह या तो बहुत बेवक़ूफ़ी है, विक्रम, या बहुत समझदारी। मैं देखूँगी कौन सी है।"
उसने सिक्का अपनी हथेली में दबाया। जब उसने हथेली खोली, सिक्का ग़ायब था, और उसकी हथेली में एक नया निशान उभरा था, जले हुए निशान के बगल में, एक छोटा सा गोल निशान।
"अब सुन," उसने कहा। "तेरी अगली मुराद कल रात पूरी होगी। तूने पैसा माँगा था। पर मैं जानती हूँ कि तू असल में क्या माँगना चाहता है।"
"क्या?"
उसने अपना चेहरा उसके चेहरे के इतने पास लाया कि विक्रम उसकी आँखों में अपने आपको दोहरा हुआ देख सकता था, सैकड़ों विक्रम, सैकड़ों आँखों में।
"तू जानना चाहता है कि तेरे पिता को किसने मारा," उसने कहा। "तू जानना चाहता है कि उनके गले पर वह निशान किसने लगाया। तू जानना चाहता है कि तेरी दादी कहाँ है। और तू जानना चाहता है, सबसे ज़्यादा, कि तू कौन है, विक्रम। क्योंकि तुझे अंदर से शक है कि तू वह नहीं है जो तू सोचता है। है ना?"
विक्रम कुछ नहीं बोला। उसका मुँह सूख गया था।
यक्षिणी ने पीछे हटकर उसे देखा। उसकी नज़र उसके चेहरे पर, उसकी गर्दन पर, उसके हाथों पर घूमी, जैसे कोई खरीदार किसी चीज़ को नाप रहा हो।
"तू बिल्कुल वैसा दिखता है," उसने कहा, धीरे से, और अब उसकी आवाज़ में वह मीठापन नहीं था। अब उसमें कुछ और था। पहचान। बहुत पुरानी, बहुत दर्द भरी पहचान। "बिल्कुल वैसा। वही ठुड्डी। वही आँखें। वही हाथ, जिनसे तूने मुझे सिक्का दिया, उन्हीं हाथों से उसने मुझे आग लगाई थी।"
विक्रम का ख़ून जम गया। "किसने?"
यक्षिणी ने जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ उठाया, और उसकी उंगली उसके चेहरे को छूने आई। विक्रम ने कुंडा उठाया, पर यक्षिणी ने उसकी कलाई को हवा में ही रोक दिया, बिना छुए, बस एक नज़र से।
"झूठ नहीं बोलूँगी," उसने कहा। "पर पूरा सच भी आज नहीं बताऊँगी। पूरा सच उसी को मिलता है जो पूरा देता है। तूने आज मुझे सिक्का दिया है, विक्रम। सिक्के की कीमत सिक्के से चुकती है।"
उसने अपनी उंगली उसकी ठुड्डी पर रखी, और उसके छूते ही विक्रम ने कुछ देखा। अपनी आँखों के सामने नहीं, अपनी आँखों के पीछे। एक दृश्य, धुंधला, जलता हुआ।
एक हवेली। यही हवेली, पर नई, चमकती हुई, उसके दरवाज़ों पर आम के पत्तों की तोरणें बँधी थीं। आंगन में एक आदमी खड़ा था, लंबा, चौड़ी छाती वाला, सिर पर सफ़ेद पगड़ी, और उसके हाथ में एक मशाल थी। उसके चारों ओर आदमी खड़े थे, मुँह ढके हुए, और उनके बीच में, ज़मीन पर घुटनों टेके, एक औरत थी।
विक्रम ने उस औरत का चेहरा देखा। वही चेहरा। वही अंबर आँखें, पर अब उनमें डर था, इंसानी डर, जीवित डर।
"तुम मुझे नहीं जानते," औरत कह रही थी, उसकी आवाज़ काँपती हुई, पर साफ़। "तुमने मुझे देखा है, माँगा है, पर जाना नहीं। जो तुम मुझसे चाहते हो, वह मेरा नहीं है। वह उसका है जिसने मुझे बचाया था। मैं किसी की नहीं हूँ, ठाकुर। मैं अपनी हूँ।"
मशाल उठी। दृश्य में आग फैली, और विक्रम ने अपनी आँखें बंद कर लीं, पर दृश्य आँखों के अंदर था, बंद आँखों से नहीं बुझता था। उसने औरत की चीख सुनी, और उस चीख के बीच में, उसने एक और आवाज़ सुनी। एक तांत्रिक की, मंत्र पढ़ते हुए, और वह आवाज़ उसे जानी-पहचानी लगी।
भैरव नाथ की आवाज़। दो सौ साल पुरानी, और बिल्कुल वैसी ही, जैसी अभी अखाड़े में थी।
दृश्य टूटा। विक्रम ने आँखें खोलीं। यक्षिणी उसके सामने खड़ी थी, और उसके चेहरे पर अब वह मीठी मुस्कान नहीं थी। अब वहाँ सिर्फ़ दो सौ साल पुराना अंधेरा था।
और फिर उसने अपनी ठंडी, कड़क उंगली उसकी ठुड्डी पर रखी, और धीरे से कहा, उसी आवाज़ में जो अब बिल्कुल बदल चुकी थी, उसी आवाज़ में जिसमें दो सौ साल का दर्द और दो सौ साल की भूख मिली हुई थी:
"तुमने फिर बुलाया मुझे, रणजीत सिंह। तुमने फिर बुलाया, ठाकुर साहब। और इस बार, मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगी। चाहे तुम्हारा चेहरा बदल गया हो, चाहे तुम्हारा नाम बदल गया हो। तुम्हारा खून वही है। और खून मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता।"
विक्रम ने देखा कि उसकी आँखों में, उस अंबर गहराई में, आग बढ़ रही थी। और उस आग में, उसने अपना चेहरा देखा, जलता हुआ, चीखता हुआ, और उस चेहरे के नीचे, किसी और का चेहरा था, किसी और के कपड़े, किसी और के हाथ, जो उसी आग को हवा दे रहे थे।
रणजीत सिंह के हाथ।
उसके अपने हाथ।
विक्रम को याद नहीं कि वह वहाँ से कैसे लौटा। उसे बस इतना याद है कि जब उसने आँख खोली, तो वह आंगन में बैठा था, मीरा उसके सामने घुटनों पर थी, और पूर्वी आसमान में सुबह की पहली लकीर उभर रही थी।
"तीन बार पुकारा तुझे," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार डर था। "तीन बार से ज़्यादा। तू अंदर आता ही नहीं था। मैं दरवाज़े तक गई, पर आगे नहीं। विक्रम, तेरे कंधे पर..."
"क्या?"
उसने अपनी शर्ट उतारी। बाएँ कंधे पर, ठीक उस जगह जहाँ उसकी ठुड्डी से सटा हुआ था, एक निशान उभरा था। उंगली का निशान नहीं। चूमे का निशान। होंठों का, गहरे लाल रंग का, जैसे किसी ने सिंदूर में होंठ डुबोकर उसकी त्वचा पर छाप लगाई हो।
"उसने तुझे निशान किया है," मीरा ने धीरे से कहा। "अब तू उसका हुआ, विक्रम। अब तू उससे छिप नहीं सकता।"
विक्रम ने अपने हाथ उठाकर देखे। वही हाथ। सामान्य, इंसानी, थके हुए हाथ। पर उसे अब भी वह दृश्य दिख रहा था, वह मशाल, वह आग, और वे हाथ जो आग को हवा दे रहे थे।
उसने अपने हाथों को मुट्ठी में बंद किया और उन्हें अपने सीने से लगा लिया, जैसे किसी और के हाथों को अपने से दूर रखने की कोशिश कर रहा हो।
पर हाथ उसके अपने थे। और यही सबसे डरावनी बात थी।