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भाग 6: दूसरी मुराद
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 6 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3225
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस दिन सुबह विक्रम ने आईने में अपने आपको देखा और पहचानने में देर लगी।
कंधे का निशान अब और गहरा हो गया था। होंठों की छाप अब जामुनी रंग की हो चुकी थी, और उसके चारों ओर त्वचा सूज गई थी, जैसे किसी ने गरम सिक्का टिका दिया हो। पर सबसे अजीब बात यह थी कि निशान में दर्द नहीं था। छूने पर वह गर्म था, और गर्मी में एक ऐसा सुकून था जो विक्रम के शरीर को पसंद आया, भले ही उसके दिमाग़ ने उसे नापसंद किया।
मीरा ने नाश्ते में उसे कुछ खाने को दिया, पर उसका पेट बंद था। उसने बस चाय पी, और चाय में भी उसे चंपा की गंध आई।
"यह नशा है," मीरा ने कहा, उसकी थाली देखते हुए। "उसकी छाप एक नशे की तरह काम करती है। मेरी परदादी के ज़माने की एक कहानी है, एक आदमी जिसे यक्षिणी ने निशान किया था। उस आदमी ने छह महीने में अपना सब कुछ उसे दे दिया। घर, ज़मीन, बीवी, बच्चे। अंत में उसने अपनी जीभ काटकर दी, क्योंकि उसके पास देने को कुछ नहीं बचा था। यक्षिणी ने जीभ ले ली। और फिर उसने कहा, अब तुम मुझसे बात कैसे करोगे? और वह आदमी... उसने अपनी आँखें निकालकर दे दीं, ताकि कम से कम उसे देख तो सके।"
विक्रम ने चाय का कप नीचे रखा। "तू मुझे डरा रही है।"
"मैं तुझे तैयार कर रही हूँ।" मीरा ने अपनी चाय ख़त्म की। "आज रात तू दूसरी मुराद माँगेगा। मैं जानती हूँ तू क्या माँगेगा। पर उससे पहले मैं तुझे कुछ दिखाना चाहती हूँ।"
वह उसे गाँव के पुराने रिकॉर्ड रूम ले गई, पंचायत भवन के पीछे वाले उस कमरे में जहाँ मिट्टी और चूहों के अलावा कुछ नहीं रहता था। वहाँ, एक ज़ंग लगी अलमारी में, उसने एक रजिस्टर निकाला, इतना पुराना कि उसके पन्ने उंगलियों में टूट रहे थे।
"मृत्यु-रजिस्टर," मीरा ने कहा। "तीस साल पुराना। देख।"
विक्रम ने देखा। एक ही महीने में, ग्यारह मौतें दर्ज थीं। ग्यारहों में कारण एक ही लिखा था: "दुर्घटना" या "हृदयाघात"। और ग्यारहों के नाम के आगे, एक ही पुलिस अधिकारी के हस्ताक्षर थे।
रघुवीर सिंह।
"तेरे पिता ने हर मौत की जाँच की," मीरा ने कहा। "और हर मौत को दुर्घटना लिख दिया। विक्रम, ग्यारह में से आठ शवों के गले पर वही निशान था। मैंने उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ढूँढीं। सब ग़ायब हैं। किसी ने उन्हें निकाल लिया, और मुझे पता है किसने।"
"मेरे पिता ने क्यों?"
"क्योंकि अगर यह बात बाहर जाती, तो गाँव में दंगे होते। या कुछ और बुरा। तेरे पिता ने सोचा कि वह इसे ख़ुद रोक लेंगे।" मीरा ने रजिस्टर बंद किया। "पर देख, विक्रम। ग्यारह मौतें, और उसके बाद बंद। तीस साल तक कुछ नहीं हुआ। तेरे पिता ने कुछ किया था, कुछ ऐसा जिसने उसे तीस साल के लिए रोका। और अब, तेरे आते ही, वह फिर जाग गई है।"
"मेरे आते ही नहीं," विक्रम ने धीरे से कहा। "मेरे पिता के मरते ही। बंधन खून में जाता है। पिता मरे, बंधन मुझ पर आया। और बंधन आते ही..."
"वह जाग गई," मीरा ने पूरा किया।
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। रिकॉर्ड रूम की खिड़की से धूप आ रही थी, और उस धूप में धूल के कण तैर रहे थे, और विक्रम ने सोचा कि यह दुनिया कितनी सामान्य दिखती है, और कितनी सामान्य बिल्कुल नहीं है।
"आज रात मैं उससे पूछूँगा कि मेरे पिता को किसने मारा," उसने कहा।
"और अगर जवाब तुझे पसंद न आया तो?"
"तो मैं उसे पचा लूँगा।" विक्रम ने रजिस्टर को अलमारी में वापस रखा। "मीरा, मैं पत्रकार हूँ। मेरा काम सच को उठाना है, चाहे वह कितना भी गंदा हो। मैंने सांडों के भ्रष्टाचार से लेकर मंत्रियों के क़त्ल तक की रिपोर्टें लिखी हैं। मैं सच से नहीं डरता।"
मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में वह चीज़ थी जो विक्रम नहीं समझ पाया। "सब कहते हैं कि सच से नहीं डरते, विक्रम। फिर सच सामने आता है, और वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। तू भी करेगा।"
"तू बहुत कुछ जानती है, मीरा।"
"मैं उतना ही जानती हूँ जितना मेरे काम का है," उसने कहा। "और अभी मेरा काम यह है कि तू जीवित रहे।"
दोपहर को विक्रम राम अवतार चाचा के घर गया। बूढ़ा आंगन में बैठा तम्बाकू पीस रहा था, और उसने विक्रम को देखकर काम नहीं छोड़ा।
"तूने उससे मिलने की तैयारी कर ली," उन्होंने कहा, सवाल की जगह दावे की तरह। "तेरे चेहरे पर लिखा है।"
"चाचा, भैरव नाथ कौन है? सच में।"
राम अवतार चाचा का हाथ रुक गया। उन्होंने तम्बाकू की डिबिया बंद की, और कुछ देर तक अपने हाथों को देखते रहे, जैसे उनमें से कोई जवाब निकलने वाला हो।
"मैंने उसे पहली बार उन्नीस सौ पैंसठ में देखा था," उन्होंने कहा। "मैं चौदह साल का था। उस वक़्त वह वैसा ही दिखता था जैसा आज दिखता है। मेरे दादा ने उसे उन्नीस सौ बीस में देखा था। तब भी वैसा ही। और मेरे दादा के दादा ने..." उन्होंने रुककर थूका। "बेटा, इस गाँव में तीन चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। वह पेड़। वह अखाड़ा। और वह आदमी। बाकी सब बदलता है। पीढ़ियाँ, सरकारें, मौसम। वह तीनों नहीं बदलते।"
"तो गाँव क्यों नहीं छोड़ देता? सब मिलकर क्यों नहीं चले जाते?"
राम अवतार चाचा ने पहली बार ऊपर देखा, और उनकी आँखों में विक्रम ने वह देखा जो उसने किसी में नहीं देखा था। बहुत पुरानी, बहुत गहरी थकान। "कई गए, बेटा। मेरे चाचा गए थे, सत्तर में। परिवार समेत। इंदौर बस गए। छह महीने बाद उनकी लाशें लौटीं, तीनों की। गले पर वही निशान। इंदौर में, बेटा। तीन सौ मील दूर।" उन्होंने तम्बाकू फिर से खोली। "यह पेड़ जहाँ है, वहाँ से नहीं भागा जाता। उसकी जड़ें इस गाँव के हर घर तक हैं। तू मिट्टी उठाकर देख, कहीं भी। बारह इंच नीचे जड़ें मिलेंगी। काली, सूखी, मरी हुई। पर ज़िंदा।"
विक्रम हवेली लौटा तो उसके कदम भारी थे। उसने अपने आंगन की मिट्टी देखी। बारिश न हुई महीनों हो गए थे, फिर भी आंगन के एक कोने में, जहाँ पुराना तुलसी का चौरा था, मिट्टी गीली थी। उसने झुककर देखा। गीली मिट्टी में काली, सूखी जड़ों के सिरे दिख रहे थे, जैसे उंगलियाँ, जो ऊपर आकर हवा सूँघ रही हों।
उसने उन्हें मिट्टी से ढक दिया। पर अब उसे पता था कि वे वहाँ हैं। और यह जानना, उसने उस शाम सीखा, किसी चीज़ को देखने से कहीं ज़्यादा डरावना होता है।
उस रात, विक्रम पेड़ के नीचे गया। इस बार मीरा ने रोकने की कोशिश नहीं की। उसने बस नमक की लकीर अपने आसपास खींची और बैठ गई, हवेली के पिछले दरवाज़े के पास, उसकी आँखें अंधेरे में उसकी तरफ़ उठी हुईं।
यक्षिणी पहले से वहाँ थी। वह पेड़ की सबसे मोटी डाली पर बैठी थी, एक टांग लटकाए, और उसकी पायल टन-टन कर रही थी, बिना हिले, बिना किसी वजह के। उसने लाल साड़ी नहीं, आज सफ़ेद साड़ी पहनी थी, और उसके बाल खुले थे, घुटनों तक, और उन बालों में चंपा के फूल इस बार जल रहे थे। सचमुच जल रहे थे, छोटी-छोटी लपटें, पर बाल नहीं जल रहे थे।
"तू आया," उसने कहा, बिना नीचे देखे। "मुझे पता था तू आएगा। तू अपने पिता का बेटा है, आख़िरकार।"
"मुझे मेरे पिता के क़ातिल को दिखा," विक्रम ने कहा। "यह मेरी दूसरी मुराद है।"
यक्षिणी ने नीचे देखा। उसकी आँखें अंधेरे में दो दीये जल रहे थे। "मुराद साफ़ है। कीमत साफ़ कर ले पहले।"
"कीमत क्या है?"
"आज की कीमत तेरी एक याद है," उसने कहा। "कोई भी एक। तेरी पसंद।"
विक्रम ने सोचा। उसने अपनी यादों को छाँटा, जैसे कोई अपने कपड़े छाँटता है कि क्या दान में देना है। उसने एक याद चुनी। दिल्ली का एक दिन, बारिश का, जब वह और उसकी पहली मोहब्बत, सारा, एक छत पर भीगे थे। यह याद अच्छी थी, पर अब उसका कुछ नहीं बिगड़ता था, क्योंकि सारा अब किसी और की थी।
"ले ले," उसने कहा।
यक्षिणी ने अपना हाथ नीचे किया। विक्रम ने महसूस किया कि उसके सिर में कुछ ठंडा घुसा, बर्फ़ की सुई जैसा, और फिर वह याद उठी। उसने महसूस किया कि कुछ निकल रहा है, कुछ गर्म, कुछ गीला, और फिर वह ग़ायब।
उसने सारा को याद करने की कोशिश की। उसे याद था कि कोई सारा थी। पर छत, बारिश, वह सब ग़ायब था। अब उसे सिर्फ़ इतना याद था कि उसने कभी किसी सारा को जाना था, और कुछ नहीं।
यह सबसे डरावनी चीज़ थी जो उसने अब तक महसूस की थी। किसी चीज़ को खोना नहीं, बल्कि यह न जानना कि क्या खोया।
उसने तुरंत अपनी जेब से फ़ोन निकाला और गैलरी खोली। उसे याद था कि उसके पास सारा की तस्वीरें होंगी। थीं भी। एक तस्वीर में एक लड़की छत पर खड़ी मुस्कुरा रही थी, भीगे हुए बाल, हरी कुर्ती। विक्रम ने उसे देखा। उसका चेहरा उसे अनजान लगा। उसे पता था कि यह सारा है, कि उसने कभी इसे चाहा था, पर जिस दिन की यह तस्वीर थी, वह दिन उसके सिर से उठ चुका था। तस्वीर सामने थी, याद नहीं। जैसे किसी और की ज़िंदगी का फ़ोटो एलबम उसकी जेब में आ गया हो।
"अब समझ आया?" यक्षिणी ने पूछा, और उसकी आवाज़ में कोई विजय नहीं थी, बस एक थकान थी। "यही होता है मेरे साथ रहना। मैं लेती हूँ, धीरे-धीरे, और इंसान को पता भी नहीं चलता कि क्या गया। तेरे पिता के पास अंत में सिर्फ़ एक याद बची थी। तेरे पास अभी बहुत हैं। पर वे कम होंगी, विक्रम। हर रात, एक-एक करके। और एक दिन तू भी उसी जगह पहुँचेगा जहाँ तेरे पिता पहुँचे थे। जहाँ इंसान के पास खोने को कुछ नहीं बचता, सिवाय जान के।"
"तू इसलिए मुझे यह बता रही है ताकि मैं डरूँ?"
"मैं इसलिए बता रही हूँ ताकि तू जाने कि सौदा क्या है," उसने कहा। "मैं झूठ नहीं बोलती, विक्रम। यह मेरी क़ैद है, पर मेरी ईमानदारी भी। अब देख।"
उसने अपनी दोनों हथेलियाँ ऊपर उठाईं, और पेड़ के नीचे की ज़मीन पर, दीयों की रोशनी में, एक दृश्य उभरा। ज़मीन पर, जैसे कोई पानी का ताल हो, उसमें चित्र बना, और चित्र हिलने लगा।
विक्रम ने देखा। रात थी। यही पेड़, पर अब उसकी डालियों में पत्ते थे, हरे, जैसे कोई और मौसम हो। उसके पिता पेड़ के नीचे खड़े थे, अकेले, और उनके हाथ में एक डायरी थी, वही डायरी।
"मैं नहीं करूँगा," उनके पिता कह रहे थे, आकाश से, पेड़ से, किसी से। "मैं समझ गया हूँ। तू मुझे नहीं, मुझसे मेरे बेटे को चाहती है। मैं नहीं दूँगा उसे।"
फिर एक आवाज़ आई, पेड़ के अंदर से, वही आवाज़, पर अब उसमें कोई मीठापन नहीं था। सिर्फ़ भूख थी। "तू मुझे नहीं देगा, रघुवीर? तूने मुझे सब दिया। अपनी बीवी दी। अपनी यादें दीं। अपनी नींद दी। अब जब मैं आखिरी चीज़ माँग रही हूँ, तू रोक रहा है?"
"मैं उसे बचाऊँगा," पिता ने कहा। "मैं मर जाऊँगा, पर उसे बचाऊँगा।"
"तू मर नहीं सकता, रघुवीर," आवाज़ ने कहा, और अब उसमें हँसी थी। "तू मेरा है। मैं तुझे नहीं मरने दूँगी। मैं तुझे जीवित रखूँगी, और तेरे बेटे को ले लूँगी, और फिर तू देखेगा, जीवित, कैसे मैं उसे वह बनाती हूँ जो तू नहीं बन सका। मेरा।"
विक्रम ने देखा कि उसके पिता ने डायरी ज़मीन पर रखी, और उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छुरी थी। पुरानी, पीतल की, उस पर कुछ लिखा था।
"यह छुरी मुझे उसी ने दी थी," पिता ने कहा, आकाश से। "जिसने तुझे बाँधा था। और उसने मुझे बताया था कि इस छुरी से अगर मैं ख़ुद को मारूँ, तो मैं तेरे बंधन से बाहर हो जाऊँगा। मैं मर जाऊँगा, पर मैं तेरा नहीं रहूँगा। और बंधन मेरे बेटे पर जाएगा, पर वह बंधन अधूरा होगा, क्योंकि मैंने साधना पूरी नहीं की। तुझे उसे फिर से बुलाना पड़ेगा। फिर से शुरू करना पड़ेगा। और तब तक, मैं उसे बचा चुका हूँगा।"
"तू यह नहीं करेगा," आवाज़ ने कहा, और अब उसमें पहली बार कुछ और था। डर। "रघुवीर, सुन। तू मरेगा तो तेरी आत्मा मेरे पास आएगी। मैं तुझे पेड़ में क़ैद कर लूँगी। सौ साल तक तू देखेगा, और कुछ नहीं कर पाएगा।"
"सौ साल देखूँगा," पिता ने कहा, और उन्होंने छुरी उठाई, "पर अपने बेटे को बचता हुआ देखूँगा।"
उन्होंने छुरी अपने गले पर रखी।
विक्रम ने चीखा, "नहीं!"
पर दृश्य में पिता ने छुरी नहीं चलाई। उन्होंने रुककर, बहुत धीरे से, छुरी नीचे कर ली। उनका चेहरा बदल गया। उनकी आँखें बड़ी हो गईं, और उन्होंने कहा, बहुत धीरे से, "तूने मुझे रोका। तू मेरे अंदर घुसकर मुझे रोक रही है।"
"मैं तुझे नहीं मरने दूँगी," आवाज़ ने कहा। "पर मैं तुझे यह भी नहीं करने दूँगी कि तू मुझे छोड़कर जाए। तू मेरा है, रघुवीर। और तेरे बेटे को मैं ख़ुद लेने आऊँगी।"
फिर दृश्य में, पेड़ के पीछे से, एक परछाई निकली। लंबी, सूखी, जटाओं वाली। भैरव नाथ। उसने पिता के कंधे पर हाथ रखा, और पिता का शरीर झुक गया, जैसे उनकी हड्डियाँ टूट गई हों।
"तूने बहुत कुछ जान लिया, रघुवीर सिंह," भैरव नाथ ने कहा, उसकी आवाज़ में तीन आवाज़ें मिली हुई थीं। "अब तू बाकी लोगों को बता देगा। मैं यह नहीं होने दे सकता।"
पिता ने छुरी उठाई, पर भैरव नाथ ने उनकी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ में पिता की कलाई टूटी, विक्रम ने सुना, हड्डी टूटने की आवाज़, साफ़, और पिता ने छुरी गिरा दी।
"तू... तू कौन है?" पिता ने पूछा। "तू वह नहीं है जो मुझे दिखता था।"
"मैं वह हूँ जो तुम्हें दो सौ साल से चलाता आया है," भैरव नाथ ने कहा। "मैं वह हूँ जिसने तेरे पुरखों को यक्षिणी दी थी। और अब, जब तू मेरे काम में रुकावट बन रहा है, तो मैं तुझे हटाऊँगा।"
उसने अपना हाथ उठाया। उसके हाथ में कुछ था, एक छोटी सी चीज़, चमकती हुई, जैसे सोने की मोहर। उसने उसे पिता के गले पर रखा, और विक्रम ने देखा कि पिता के गले पर वही निशान उभरा, पाँच उंगलियों का, सिंदूर का।
पिता गिरे। उन्होंने आखिरी बार ऊपर देखा, पेड़ की तरफ़, और उन्होंने कहा, बहुत धीरे से, "विक्रम को बचाना।"
और फिर दृश्य बुझ गया।
विक्रम ज़मीन पर गिरा। उसके घुटने मिट्टी में धँसे। उसने देखा, साफ़ देखा, कि उसके पिता ने ख़ुद को नहीं मारा था। उन्हें मारा गया था। और मारने वाला भैरव नाथ था।
पर फिर उसने कुछ और देखा। दृश्य बुझने से पहले, आखिरी पल में, उसने भैरव नाथ की आँखें देखीं। और उन आँखों में, उसने कुछ पहचाना। वही आँखें, वही भांति की लंबी, ऊपर उठी हुई आँखें, जो उसने कहीं और देखी थीं।
सरपंच के बेटे की। उस कोमा में पड़े लड़के की, जो बीस साल से बोल नहीं पा रहा था, पर जिसकी आँखें उसने कल ऊपर जाते वक़्त, एक पल के लिए, सीढ़ियों के अंधेरे में देखी थीं, जब देवी सिंह ने उसे रोका था।
भैरव नाथ ने सरपंच के बेटे के शरीर से यह काम किया था। या शायद, सरपंच के बेटे ने किया था, और भैरव नाथ उसमें था।
विक्रम ने सिर उठाया। यक्षिणी अब भी डाली पर बैठी थी, उसकी आँखें उस पर ठहरी हुई थीं।
"तूने यह मुझे क्यों दिखाया?" उसने पूछा।
"क्योंकि तूने माँगा," उसने कहा। "मैं देती हूँ जो माँगा जाता है, विक्रम। मैं नहीं बताती कि क्या ठीक है और क्या गलत। मैं सिर्फ़ देती हूँ। और अब, जब तूने देख लिया है, तो तू क्या करेगा?"
विक्रम उठा। उसके पैर काँप रहे थे, पर उसने खुद को सँभाला। उसने यक्षिणी को देखा, और पहली बार उसे उसमें कुछ और दिखा। भूख नहीं। दर्द नहीं। कुछ और। एक तरह का इंतज़ार, जैसे वह भी देखना चाहती है कि विक्रम क्या करेगा।
"मैं उस आदमी को ढूँढूँगा," उसने कहा। "जिसके शरीर से यह काम हुआ।"
"और फिर?"
"और फिर मैं उसे रोकूँगा।"
यक्षिणी मुस्कुराई, और उसकी मुस्कान में इस बार कुछ ऐसा था जो विक्रम को डरा गया। दया। "तू अपने पिता जैसा है," उसने कहा। "उन्होंने भी यही कहा था। और मैंने उन्हें रोका नहीं था। मैंने सोचा, शायद वे सच में रोक लें।" उसने अपनी डाली से कूदकर ज़मीन पर उतरा, बिना आवाज़ के, बिना धूल उड़ाए। "पर वे नहीं रोक सके, विक्रम। क्योंकि भैरव नाथ को रोकने का एक ही तरीका है, और वह तरीका मैं तुझे नहीं बता सकती।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैंने बताया, तो तू उसे रोक लेगा, और मैं फिर क़ैद रह जाऊँगी।" उसने अपनी अंबर आँखों से उसे देखा। "मैं अपनी क़ैद से प्यार नहीं करती, विक्रम। पर मैं अपनी आज़ादी से ज़्यादा किसी और चीज़ से प्यार करती हूँ। और वह चीज़ है मेरा बदला।"
विक्रम ने उसे देखा, और उसने समझने की कोशिश की कि यह औरत-नहीं-औरत क्या चाहती है। बदला, या मुक्ति, या कुछ और, जो उसकी समझ से बाहर था।
"मैं कल फिर आऊँगा," उसने कहा।
"मैं जानती हूँ," यक्षिणी ने कहा। "और सुन, विक्रम। कल जब तू सरपंच के घर जाएगा, तो ऊपर मत जाना। जो ऊपर है, वह अब सरपंच का बेटा नहीं है। वह कुछ और है, और वह तुझे देख चुका है।"
विक्रम का ख़ून जम गया। "तुझे कैसे पता कि मैं वहाँ जाऊँगा?"
यक्षिणी मुस्कुराई, और इस बार उसकी मुस्कान में कुछ बच्चे जैसा था, कुछ निर्दोष, कुछ बहुत डरावना। "मैं तेरे खून में हूँ, विक्रम। तू जो सोचता है, वह मैं पहले से जानती हूँ।"
विक्रम हवेली लौटा तो मीरा दरवाज़े पर उसका इंतज़ार कर रही थी। उसने उसका चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। उसने बस उसका हाथ पकड़ा और अंदर ले आई।
रसोई में बैठकर विक्रम ने उसे सब बताया। दृश्य, भैरव नाथ, पिता की आखिरी बात। मीरा ने सब सुना, बिना टोके, पर विक्रम ने ग़ौर किया कि जब उसने भैरव नाथ का नाम लिया, तो मीरा के हाथ अपनी पोटली पर चले गए, और उसकी उंगलियाँ पोटली की गाँठ से खेलने लगीं।
"तू कहती है कि तू मुझे बचाने आई है," विक्रम ने कहा। "पर कभी-कभी मुझे लगता है कि तू मुझे नहीं, किसी और चीज़ को बचाने आई है।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में दीये की रोशनी काँप रही थी। "हो सकता है दोनों एक ही चीज़ हों, विक्रम।"
"और अगर न हों?"
मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने उठकर दीये को बुझाया, और अंधेरे में उसकी आवाज़ आई, धीमी, थकी हुई। "सो जा। कल का दिन लंबा है। और विक्रम, अगर रात में मैं सोते में कुछ कहूँ, कोई नाम लूँ, तो मुझे मत जगाना। और ख़ुद भी मत सुनना। कुछ चीज़ें सुन लेने से इंसान बदल जाता है।"
विक्रम ने उसे अपने कमरे में सुलाया और ख़ुद आंगन में खाट पर लेट गया। उसे नींद नहीं आई। रात भर उसने सुना। कभी पेड़ की तरफ़ से पायल, कभी कुएँ की तरफ़ से टन-टन, और एक बार, ठीक सुबह से पहले, मीरा के कमरे से एक धीमी सी आवाज़, जैसे कोई सपने में बड़बड़ा रहा हो।
उसने नहीं सुना। उसने अपने कान दबा लिए। पर एक शब्द, बस एक शब्द, दीवारों से घुसकर उसके कान में आ ही गया।
"माफ़ करना, दादी।"
किस दादी? विक्रम ने सोचा। उसकी, या मीरा की? और माफ़ी किस बात की?
"कल सुबह मैं सरपंच के घर जाऊँगा," विक्रम ने अंधेरे में खुद से कहा।
और उस रात, जब विक्रम ने आखिरी बार अपनी खिड़की से बाहर देखा, तो उसने देखा कि गाँव के दूसरी तरफ़, सरपंच के घर की ऊपरी मंज़िल की खिड़की में, एक दीया जल रहा था। बीस साल से बंद उस कमरे में, जहाँ कोई सोया नहीं करता था, एक दीया जल रहा था।
और उस दीये की रोशनी में, एक आकृति खिड़की पर खड़ी थी, सीधी, स्थिर, और उसकी आँखें, विक्रम जानता था, हवेली की तरफ़ देख रही थीं।
उसकी तरफ़।