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भाग 7: खून की गिनती
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 7 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3313
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दूसरी मौत उसी हफ़्ते के गुरुवार को हुई, और इस बार मरने वाला गाँव का नाई था।
कैलाश नाई। पचास साल का, हँसमुख, जो हर किसी के घर में घुस जाता था और हर बात पहुँचाता था। उसकी लाश उसकी अपनी दुकान की कुर्सी पर मिली, बैठी हुई, आईने के सामने, जैसे वह ख़ुद अपनी डार्ढ़ी बना रहा हो। उसके हाथ में उस्तरा था, और उस्तरे से खून टपक रहा था, पर गला नहीं कटा था। गले पर वही निशान था। पाँच उंगलियाँ। सिंदूर की छाप।
पर इस बार एक बात और थी। कैलाश नाई के मुँह में, उसकी जीभ के नीचे से, चंपा के फूल निकले थे। ताज़े, गीले, जैसे कोई उन्हें उसके गले में उगाकर लाया हो।
विक्रम भीड़ के बाहर खड़ा था, और उसने ग़ौर किया कि इस बार गाँव वालों की नज़रें शव पर नहीं, उस पर थीं। हर आँख में एक ही सवाल था, और एक ही इल्ज़ाम।
"यह तूने करवाया," एक आदमी ने कहा, भीड़ से, बिना सामने आए। "तू आया है, तब से शुरू हुआ है।"
"मैंने कुछ नहीं किया," विक्रम ने कहा, पर उसकी आवाज़ उसी को झूठी लगी। उसने माँगा था। उसने मुराद माँगी थी, और कीमत चुकी थी, और वह जानता था कि कैलाश नाई की मौत में उसका हाथ है, अगर सीधा नहीं तो टेढ़ा, पर है।
"तेरे बाप ने भी यही कहा था," दूसरी आवाज़ बोली। "फिर ग्यारह लोग मरे।"
भीड़ बढ़ने लगी। विक्रम ने देखा कि कुछ हाथों में लाठियाँ आ गई थीं। और तभी, भीड़ के पीछे से, एक आवाज़ आई।
"हट जाओ।"
राम अवतार चाचा आगे आए। उनके हाथ में लाठी नहीं थी, पर उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि भीड़ ने रास्ता दे दिया। "इसे मारने से कुछ नहीं होगा," उन्होंने कहा। "यह नहीं मार रहा। यह सिर्फ़ बंधन है। असली हाथ कहीं और है। और अगर तुम सब को बचना है, तो इस लड़के को जीवित रखना होगा। क्योंकि यह मरा, तो बंधन टूटेगा, और बंधन टूटा, तो वह बेख़ौफ़ हो जाएगी। अभी वह गिनती करके मार रही है। बेख़ौफ़ होकर वह गाँव उड़ा देगी।"
भीड़ धीरे-धीरे घटी। लोग गए, पर उनकी नज़रें विक्रम पर ठहरी रहीं, और विक्रम जानता था कि यह नज़रें अब कभी नहीं हटेंगी।
कैलाश नाई की अर्थी उठते वक़्त एक बूढ़ी औरत, उसकी माँ, विक्रम के पास आई। उसकी आँखें सूखी थीं, रोने से भी आगे की किसी जगह पर पहुँच चुकी थीं। उसने विक्रम का हाथ पकड़ा, और उसकी पकड़ में वह ताक़त थी जो शोक के आगे आती है।
"मेरा बेटा तेरे बाप के साथ खेला था, बचपन में," उसने कहा। "दोनों साथ क़ैद हुए थे, साथ छूटे थे। मैंने दोनों को मरते देखा है, बेटा। तेरे बाप को भी, अपने बेटे को भी। दोनों के गले पर वही था।" उसने अपनी साड़ी का पल्लू ऊपर किया और अपनी गर्दन दिखाई। वहाँ, ढीली त्वचा पर, एक बहुत पुराना, फीका निशान था। पाँच उंगलियों का। "मुझे भी छुआ था उसने, साठ साल पहले। मैं बच गई, क्योंकि उस रात मेरी बेटी रो रही थी और मैं उठी थी। जो सोया, वह गया। जो जागा, वह बचा। यह इस गाँव का नियम है, बेटा, जो किसी बही-खाते में नहीं लिखा।"
उसने विक्रम का हाथ छोड़ा। "तू जागे रहना। और तेरी वह लड़की, वह भी जागे रहे। मैंने उसे देखा है। उसकी आँखें वैसी हैं जैसी मेरी थीं, साठ साल पहले। जागती हुई आँखें। ऐसी आँखों वाले या तो गाँव बचाते हैं, या गाँव में सबसे पहले मरते हैं।"
वह चली गई, अपने बेटे की अर्थी के पीछे, और विक्रम वहाँ खड़ा रहा, उसकी बातें अपने सीने में उतारता हुआ।
मीरा उसे घर ले आई। उसने दरवाज़ा बंद किया और उसे पानी पिलाया। विक्रम के हाथ काँप रहे थे।
"दो मौतें," उसने कहा। "रामू, कैलाश। दोनों का मुझसे कोई वास्ता नहीं। तो क्यों?"
"यही तो पता करना है," मीरा ने कहा। "और मुझे लगता है कि जवाब इस गाँव के सबसे पुराने कागज़ में है।"
उस शाम वे शिव मंदिर गए। मंदिर का पुजारी, एक बहुत बूढ़ा, बहुत डरा हुआ आदमी, पहले तो उन्हें अंदर नहीं आने देना चाहता था, पर जब मीरा ने उसे अपनी फ़ाइल दिखाई और कहा कि वह सरकारी रिसर्च कर रही है, तो उसने झुककर मंदिर के गर्भगृह के नीचे की एक पेटी खोली।
"यह मंदिर का बही-खाता है," उसने कहा। "सबसे पुराना। अठारह सौ से भी पहले का। मैंने इसे कभी नहीं खोला। मेरे पिता ने कहा था, इसमें वह नाम लिखे हैं जो लिखने नहीं चाहिए थे।"
बही-खाता मलमल के कपड़े में लिपटा था। विक्रम ने उसे बहुत धीरे से खोला। पन्ने काले पड़ चुके थे, पर स्याही अब भी पढ़ी जा सकती थी। और वहाँ, अठारह सौ छब्बीस के महीने में, उसने वह पन्ना पाया।
उस पर एक तारीख़ थी। और नीचे, एक फ़ेहरिस्त।
"आज, चैत्र की अमावस्या को, ठाकुर रणजीत सिंह के हुक्म से, उस स्त्री को कदंब के नीचे जलाया गया, जिसने ठाकुर की इच्छा का विरोध किया। चिता को आग निम्नलिखित बारह सज्जनों ने दी, हर एक ने एक मशाल:"
और फिर बारह नाम थे। विक्रम ने उन्हें पढ़ा, और उसका ख़ून धीरे-धीरे ठंडा होता गया।
पहला नाम: "रामू साहू (चायवाला) के पिता, शम्भु साहू।"
तीसरा नाम: "कैलाश नाई के दादा, गुलाब नाई।"
विक्रम ने मीरा को देखा। मीरा ने उसे देखा। दोनों ने एक साथ बाकी नाम पढ़े। बारह में से ग्यारह नाम उन घरों के थे जो आज भी शिवगढ़ में थे। हर नाम के सामने, उस घर के मुखिया का नाम, और उनकी बिरादरी।
"रामू और कैलाश," मीरा ने धीरे से कहा। "दोनों इस फ़ेहरिस्त में हैं। यह संयोग नहीं है, विक्रम।"
"यह गिनती है," विक्रम ने कहा। "वह एक-एक करके उन्हीं के घरों को उठा रही है जिन्होंने उसे जलाया था।"
पर फिर उसकी नज़र बारहवें नाम पर पड़ी, और उसका गला सूख गया।
बारहवाँ नाम: "और अंतिम मशाल, चिता के मुख के सामने वाली, स्वयं ठाकुर रणजीत सिंह ने दी।"
रणजीत सिंह। उसका अपना पुरखा। उसका अपना खून।
"अगर यह गिनती है," मीरा ने कहा, उसकी आवाज़ सफ़ेद हो गई थी, "तो इस गिनती का आखिरी नाम..."
"मेरा है," विक्रम ने पूरा किया।
मंदिर में सन्नाटा था। दीये की लौ काँपी, और विक्रम ने अपनी परछाई दीवार पर देखी, लंबी, काँपती हुई। उसने अपनी परछाई को देखा और उसे याद आया कि कुछ रातों पहले एक तीसरी परछाई उसके साथ चली थी। उसने जल्दी से पीछे मुड़कर देखा। कुछ नहीं था।
"हमें गाँव के हर उस घर को बताना होगा जो इस फ़ेहरिस्त में है," मीरा ने कहा। "उन्हें चेतावनी देनी होगी।"
"कौन सुनेगा?" विक्रम ने पूछा। "आज सुबह वे लोग मुझे मारने को तैयार थे।"
"तो मैं बताऊँगी।" मीरा ने बही-खाता उठाया। "तू हवेली में रह। और विक्रम, एक बात। इस फ़ेहरिस्त में दस घरों के लोग अभी जीवित हैं। अगर गिनती चलती रही, तो हर रात एक जाएगा। हमारे पास दस दिन हैं।"
"या दस मौतें," विक्रम ने कहा।
उन्होंने उसी दिन दसों घरों का चक्कर लगाया। यह शिवगढ़ का सबसे लंबा दिन था।
पहले घर में, लोहार के घर, दरवाज़ा खोलने वाले आदमी ने उनका चेहरा देखा और दरवाज़ा बंद कर दिया। अंदर से आवाज़ आई, "हमें कुछ नहीं सुनना। जा यहाँ से, ठाकुर की औलाद।"
दूसरे घर में, सुनार के घर, एक बूढ़ी औरत ने उन्हें बैठाया। उसने सुना, फिर अपनी काँपती उंगलियों से अपने गले का ताबीज़ छुआ, और कहा, "मैंने अपनी सास से सुना था। उसने अपनी सास से। कि एक दिन वह हिसाब लेगी। हम सब इस दिन के डर से जीते आए हैं, बेटा। हर सुहागिन औरत इस घर में अपने बच्चे को जन्म देते ही पहली बार यही पूछती है, कि बच्चे के गले पर कुछ तो नहीं है?" उसने अपने पोते को बुलाया, एक सात साल का लड़का, और उसकी गर्दन खोलकर दिखाई। साफ़ थी। बूढ़ी औरत की आँखों में आँसू थे। "हर बच्चे की गर्दन देखते हैं हम। दो सौ साल से।"
"आप भाग क्यों नहीं जातीं?" विक्रम ने पूछा।
बूढ़ी औरत ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने बहुत बचकाना सवाल पूछा हो। "भागने वालों को वह पहले उठाती है, बेटा। यह हमारी सास की सास की सीख है। जो रुका, वह शायद बचा। जो भागा, वह पक्का मरा।"
तीसरे घर में उन्हें पत्थर फेंके गए। चौथे घर में किसी ने गंदा पानी फेंका। पाँचवें घर में एक जवान आदमी, मोटरसाइकिल वाला, बाहर आया और कहा, "तूने ही सब किया है। सब कह रहे हैं। तू गाँव से निकल, नहीं तो हम तुझे निकालेंगे।"
मीरा ने उस आदमी से कहा, "तेरे परदादा ने एक औरत को जलाया था। अब उसका हिसाब आया है। तू चाहे तो बच सकता है। रात को घर में रह, दरवाज़े पर नमक की लकीर खींच, और किसी को अंदर मत लेना, चाहे वह कितना भी रोए, कितना भी पुकारे।"
आदमी ने हँसकर कहा, "और अगर मेरी माँ पुकारे बाहर से?"
"तो भी मत खोलना," मीरा ने कहा। "वह तेरी माँ की आवाज़ में बुला सकती है। वह किसी की भी आवाज़ में बुला सकती है।"
आदमी का हँसना बंद हो गया। उसने दरवाज़ा धीरे से बंद किया। शायद उसने सुन लिया।
छठे घर तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। विक्रम के पैर दुख रहे थे, और उसकी गर्दन का निशान हर घर के बाहर जल उठता था, जैसे वह पहचान रहा हो कि यहाँ से, इन्हीं दरवाज़ों से, कभी मशालें निकली थीं।
"यह निशान," मीरा ने कहा, उसकी गर्दन देखते हुए, "हर घर के सामने जलता है?"
"हाँ।"
"तो यह निशान सिर्फ़ निशान नहीं है। यह तौल है। यह बताता है कि किस घर का खून कितना गहरा है।" मीरा ने अपनी डायरी में कुछ लिखा। "विक्रम, अगर यह गिनती बंधन-पत्र में लिखी है, तो इसे रोका नहीं जा सकता। पर अगर यह गिनती किसी और की है..."
"किसी और की?"
मीरा ने उसे देखा। "मैं बस सोच रही हूँ। कुछ बातें इसमें जम नहीं रहीं। यक्षिणी झूठ नहीं बोलती, यह तूने ख़ुद कहा। और उसने तुझसे कहा था, मैंने किसी को नहीं मारा। अगर दोनों सच हैं, तो..."
"तो मार कौन रहा है?" विक्रम ने पूरा किया।
मीरा ने जवाब नहीं दिया। पर उसकी आँखें, विक्रम ने देखा, अखाड़े की तरफ़ उठी थीं, एक पल के लिए, बहुत जल्दी, जैसे उसने कुछ सोचा और तुरंत दबा दिया।
वे आखिरी घर से लौटे ही थे कि उन्होंने देखा। मंदिर के पास, उसी कदंब के पेड़ के नीचे, भैरव नाथ खड़ा था। उसने अपनी जटाएँ खोली हुई थीं, और उसके हाथ में उसकी उंगलियों-हड्डियों की माला थी, और वह उसे घुमा रहा था, धीरे-धीरे, जैसे समय गिन रहा हो।
"बही-खाता मिल गया," उसने कहा। उसकी आँखें बही-खाते पर थीं, और उनमें कुछ चमका, कुछ पुराना, कुछ भूखा। "मैंने सोचा था कि कोई न कोई इसे ढूँढ निकालेगा। पर मैंने यह नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी।"
"तूने यह सब किया," विक्रम ने कहा। "तूने मेरे पिता को मारा।"
भैरव नाथ ने उसे देखा, और उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी इंसान की नहीं होती। "मैंने तेरे पिता को मारा, हाँ। पर मैंने उन्हें मारा क्योंकि वे मेरे काम में रुकावट बन रहे थे। और मेरा काम, विक्रम सिंह, मेरा काम तुझे बचाना है।"
"मुझे बचाना?" विक्रम की आवाज़ में अब हँसी थी, पागलपन की हँसी। "तू मुझे मारना चाहता है।"
"मैं तुझे उससे बचाना चाहता हूँ।" भैरव नाथ ने पेड़ की तरफ़ इशारा किया। "तू सोचता है कि वह तुझसे प्रेम करती है? तू सोचता है कि वह तुझे सच दिखाती है? वह तुझे वही दिखा रही है जो उसे दिखाना है। वह तुझे अपने जाल में ला रही है, और जब तू पूरी तरह उसका हो जाएगा, तब वह तुझे वह करेगी जो उसने मुझसे करवाया था, दो सौ साल पहले।"
"क्या करवाया था?"
भैरव नाथ की आँखें सिकुड़ गईं। उसने अपनी माला घुमानी बंद कर दी। "मैंने उसे बाँधा था, विक्रम। यह सच है। पर मैंने उसे इसलिए बाँधा क्योंकि अगर मैंने न बाँधा होता, तो वह पूरे इलाके को खा जाती। तेरे पुरखा रणजीत सिंह ने उसे जलाया था, यह सच है। पर जलाने से पहले उसने उसे वह किया था जो किसी औरत के साथ नहीं होना चाहिए। और जब वह जली, तो वह मर नहीं सकी। उसकी भूख इतनी बड़ी थी कि मौत भी उसे निगल नहीं सकी। मैंने उसे बाँधा, क्योंकि मैंने उसे बनाया था। मैंने ही उसे वह मंत्र दिया था जिसने उसे जलते हुए भी जीवित रखा।"
विक्रम ने महसूस किया कि उसके पैरों के नीचे की ज़मीन हिल रही है। "तूने... तूने उसे बचाया था? जलते हुए?"
"मैंने उसे अमर किया था," भैरव नाथ ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वह तीनों आवाज़ें थीं, आदमी, औरत, बच्चा। "मैंने उसे अमर किया ताकि मैं उसे अपना बना सकूँ। पर वह मुझसे बड़ी निकली। उसने मुझे धोखा दिया, और मैंने उसे बाँध दिया। दो सौ साल से हम दोनों एक-दूसरे को निगलने की तैयारी में हैं, विक्रम। और तू, तू सिर्फ़ वह बर्तन है जिसमें यह खेल खेला जा रहा है।"
विक्रम ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। "तो मैं क्या करूँ?"
"साधना पूरी कर," भैरव नाथ ने कहा। "इक्कीसवीं रात तू उसे बाँधेगा। और जब तू उसे बाँध लेगा, तो मैं तुझे बताऊँगा कि उसे ख़त्म कैसे करते हैं। यही एकमात्र रास्ता है। तू उसे मुक्त नहीं कर सकता, विक्रम। मुक्त करना माना उसे छोड़ना, और छोड़ने पर वह सबसे पहले तुझे खाएगी।"
"और अगर मैं तुझ पर भरोसा नहीं करता?"
भैरव नाथ मुस्कुराया। उसके दाँत दिखे, काले, पैने। "तो तू उन दस घरों की लाशें गिनता रह। हर रात एक। और जब फ़ेहरिस्त का आखिरी नाम आएगा, तो तू ख़ुद मुझे ढूँढेगा। मैं इंतज़ार करूँगा। मुझे इंतज़ार की आदत है। दो सौ साल की आदत।"
वह मुड़ा और चला गया, उसकी जटाएँ उसके पीछे लहराती हुईं, और विक्रम ने देखा कि जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़े, वहाँ की मिट्टी काली पड़ गई, जैसे उसके कदमों ने उसे जला दिया हो।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा था।
"वह झूठ नहीं बोल रहा था," उसने धीरे से कहा। "कम से कम पूरी तरह नहीं। विक्रम, मैंने ऐसे कई मामले पढ़े हैं। बाँधने वाला और बँधी हुई, दोनों एक-दूसरे को खाना चाहते हैं। और बीच में हमेशा कोई न कोई होता है, कोई बर्तन, कोई नरबलि।"
"मैं नरबलि नहीं बनूँगा," विक्रम ने कहा।
"सब यही कहते हैं," मीरा ने कहा।
उस रात, विक्रम पेड़ के नीचे गया। यह उसकी तीसरी रात थी, और अब उसे यह गिनती अपने आप याद रहने लगी थी, जैसे उसका शरीर किसी घड़ी से बँध गया हो।
यक्षिणी आज ज़मीन पर बैठी थी, अपनी जड़ों के बीच, और उसके हाथ में कुछ था। विक्रम ने देखा। चंपा के फूलों की एक माला थी, जिसे वह धीरे-धीरे गूँथ रही थी।
"रामू और कैलाश," विक्रम ने बिना कुछ कहे सीधे पूछा। "तूने मारा?"
यक्षिणी ने अपना काम नहीं छोड़ा। "मैंने पहले भी कहा था। मैंने किसी को नहीं मारा।"
"उनके गले पर तेरा निशान था।"
"मेरा निशान नहीं था।" उसने माला में एक फूल और पिरोया। "मेरा निशान कदंब का फूल होता है, विक्रम। पाँच पंखुड़ियों वाला, जो अंदर से गूँथा हुआ होता है। जो निशान तूने देखा, वह हथेली का था। हथेली इंसानों की होती है। मैं अब इंसान नहीं हूँ, और मेरी हथेलियाँ अब वह नहीं छोड़तीं जो छापें छोड़ती हैं।"
"तो कौन मार रहा है?"
"तू जानता है," उसने कहा, और उसने पहली बार ऊपर देखा। उसकी आँखों में अंधेरा था, गहरा, और उसमें कुछ जल रहा था, बहुत दूर। "तूने देखा है उसे। तूने उसकी परछाई देखी है। तूने उसके तीन सिर देखे हैं। तुझे पता है कि कौन मार रहा है, विक्रम। तू बस मानना नहीं चाहता, क्योंकि मान लेने के बाद तुझे यह भी मानना पड़ेगा कि तूने उसकी बात सुनकर मुझसे मुराद माँगी, और उसकी बात सुनकर साधना जारी रखी, और उसकी बात सुनकर अपनी माँ की कीमत को न्याय मान लिया।"
विक्रम ने एक क़दम आगे बढ़ाया। "तू कह रही है कि भैरव नाथ मार रहा है। क्यों? उसे क्या मिलेगा?"
"डर," यक्षिणी ने कहा। "उसे डर चाहिए। डर एक ऐसी आहुति है जो बिना जलाए भी जलती है। हर मौत से यह गाँव डरता है, और हर डर से भैरव नाथ और मज़बूत होता है। और जब डर अपने चरम पर पहुँचेगा, जब दसों घर काँपेंगे, तब वह अपना असली काम करेगा।"
"क्या काम?"
यक्षिणी ने माला पूरी की और उसे अपने गले में डाल लिया। "यह तुझे मैं नहीं बताऊँगी। यह तुझे वह पत्र बताएगा, जो मेरी जड़ों में दबा है। तूने आज मुझसे दो सवाल पूछे, और मैंने दोनों के जवाब दिए। अब कीमत दे।"
"क्या?"
"आज की कीमत तेरा खून नहीं है," उसने कहा, और विक्रम ने राहत की साँस ली। "आज की कीमत तेरी एक झूठी बात है। वह झूठ जो तूने आज तक सबसे ज़्यादा बोला है।"
विक्रम ने सोचा। उसके जीवन में झूठ बहुत थे, पर एक झूठ था जो उसने सबसे ज़्यादा दोहराया था। "मैं ठीक हूँ।"
"यह," यक्षिणी ने कहा, और उसकी आँखें चमकीं। "यह झूठ तूने अपनी दादी से बोला था, हर बार, जब वह दिल्ली फ़ोन करती थीं। तू कभी ठीक नहीं था, विक्रम। तू कर्ज़ में था, अकेला था, टूटा हुआ था। पर तूने उन्हें कभी नहीं बताया। और अब तू कभी नहीं बता पाएगा।"
विक्रम ने महसूस किया कि उसके सीने में कुछ ठंडा हुआ, जैसे उस झूठ का वज़न उससे उठा लिया गया हो। वह अब "मैं ठीक हूँ" नहीं कह सकता था, भले ही चाहे। उसने कोशिश की, अपने होंठों को हिलाया, पर शब्द नहीं निकले। वह झूठ अब उसका नहीं था।
"यह बहुत छोटी कीमत थी," यक्षिणी ने कहा। "पर तू देखेगा, विक्रम। छोटी कीमतें सबसे ज़्यादा दुखती हैं, क्योंकि वे वे चीज़ें होती हैं जिनसे हम अपने आप को बाँधे रखते हैं।"
विक्रम हवेली लौटा तो उसकी थकान उसके हड्डियों में उतर चुकी थी। उसने बही-खाते की नकल बनाई, हर नाम को अपनी डायरी में लिखा, और हर नाम के सामने उस घर का पता। दस घर। दस मौतें। और फिर, ग्यारहवाँ, आखिरी, उसका अपना।
उसने अपनी गर्दन छुई। निशान अब स्थिर था, जलता नहीं था, बस रहा था, जैसे उसकी त्वचा का हिस्सा बन गया हो। और उसने अपने कंधे की छाप को भी छुआ, वह होंठों का निशान, और उसे याद आया कि यक्षिणी ने कहा था, "तू अपने पिता से अलग है।"
पर क्या वह अलग था? उसके पिता ने ग्यारह मौतों को छिपाया था। उसने अब तक दो को देखा था, और कुछ नहीं किया था। क्या यही उसका खून था? क्या यही उसकी विरासत थी, कि वह देखता रहे और कुछ न करे?
उसने अपनी डायरी में एक पन्ना खोला और लिखा, अपनी लिखावट में, अपने खून की स्याही से, क्योंकि पेन सूख गया था और उसने अपनी उंगली काट ली थी:
"मैं विक्रम सिंह। मैं शिवगढ़ का आखिरी ठाकुर हूँ। और मैं यह लिख रहा हूँ कि मैं इसे ख़त्म करूँगा। चाहे मुझे मरना पड़े।"
उसने लिखना बंद किया। उसने अपनी उंगली देखी, जहाँ से खून टपक रहा था, और उसने सोचा कि खून से लिखना कितना आसान है। बस एक कट लगता है, और फिर खून ख़ुद लिखता रहता है।
बाहर, कहीं दूर, एक कुत्ता भौंका। फिर चुप हो गया। फिर, पूरी रात, कोई कुत्ता नहीं भौंका।
सुबह होते ही उसका फ़ोन बजा। कई दिनों बाद स्क्रीन पर वह नाम था जिसका वह इंतज़ार कर रहा था।
सलीम।
"विक्रम," सलीम की आवाज़ थी, पर उसमें कुछ था जो विक्रम ने पहले कभी नहीं सुना था। काँपती हुई, दबी हुई आवाज़, जैसे कोई छिपकर बात कर रहा हो। "तेरा मैसेज मिला। मैंने वह ढूँढ लिया जो तूने कहा था। शिवगढ़, तीस साल पुरानी फ़ाइल। विक्रम, यह फ़ाइल... यह फ़ाइल में जो लिखा है, वह मैं फ़ोन पर नहीं बता सकता। मैं आ रहा हूँ। कल शाम तक पहुँच जाऊँगा।"
"सलीम, तू ठीक—"
"और विक्रम," सलीम ने उसे काटते हुए कहा, "यह फ़ाइल तेरे पिता के नाम पर बंद हुई थी। और उसे बंद करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर के नीचे, किसी ने लाल पेंसिल से एक ही बात लिखी है, तीन बार।"
"क्या?"
सलीम ने एक लंबी साँस ली। "यह मामला मिट्टी में दबाओ। यह मामला मिट्टी में दबाओ। यह मामला मिट्टी में दबाओ।"
कॉल कट गई। विक्रम फ़ोन को घूरता रहा, और उसके सीने में, कहीं गहराई में, उसकी गर्दन का निशान फिर से जलने लगा।