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भाग 8: सलीम की फ़ाइल
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 8 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3236
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सलीम शाम की बस से उतरा तो विक्रम उसे पहचानने में एक पल लगाया।
दस दिन में सलीम बदल चुका था। उसका चेहरा सूख गया था, आँखों के नीचे काले घेरे उतर आए थे, और उसने अपना कॉलर खड़ा किया हुआ था, जून की गर्मी में, जैसे उसे ठंड लग रही हो। उसके एक हाथ में एक पुराना, मोटा ब्रीफ़केस था, जिसे उसने अपनी कलाई से चेन से बाँध रखा था।
"तू चेन क्यों बाँधे है?" विक्रम ने पूछा।
"क्योंकि बस में मेरे बगल में जो बैठा था, उसने पूरे रास्ते मुझसे यही पूछा कि मैं कहाँ जा रहा हूँ।" सलीम ने अपना कॉलर ठीक किया। "और जब मैंने उसका चेहरा देखा, तो... छोड़। पहले घर चल। यहाँ खड़े होकर बात नहीं करनी।"
"क्या देखा तूने?"
सलीम ने अपनी कॉलर ऊपर की, और विक्रम ने देखा कि उसकी गर्दन पर काले धागे में कुछ बँधा था, ताबीज़ जैसा, जो सलीम जैसा आदमी कभी नहीं पहनता था।
"मैंने बस में अपनी सीट पर बैठते ही उसे देखा," सलीम ने कहा। "सामान्य आदमी था शुरू में। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में गुड़ का डिब्बा। मुझसे पूछा, कहाँ जा रहे हो? मैंने कहा, शिवगढ़। उसने गुड़ का डिब्बा खोला और कहा, ले लो। मैंने ले लिया। गुड़ नहीं था, विक्रम। डिब्बे में मिट्टी थी। गीली, काली मिट्टी, और उसमें चंपा के फूल बोए हुए थे।"
"तूने खाया?"
"एक दाना मुँह में रखा था जब मुझे समझ आया। मैंने थूक दिया।" सलीम ने अपनी जीभ दिखाई। उसकी जीभ के किनारे पर एक निशान था, जला हुआ, जैसे किसी ने गरम लोहे से छुआ हो। "जब मैंने थूका, तो वह आदमी मुस्कुराया। और तब मैंने उसका चेहरा देखा। चेहरे की जगह सिर्फ़ चमड़ा था, तना हुआ, बिना आँखों के। और फिर तीसरी बार देखा, तो सब ठीक था। आदमी मुस्कुरा रहा था। उसने मुझसे कहा, 'शिवगढ़ जा रहे हो? मेरी तरफ़ से नमस्ते कह देना उस लड़के को, जो सोने की मोहरें गिनता है।'"
विक्रम का ख़ून ठंडा हुआ। "उसने मोहरों का ज़िक्र किया?"
"और गिनती भी।" सलीम ने ब्रीफ़केस को और कसकर पकड़ा। "उसने कहा, 'उन्नीस बची हैं। बीसवीं मेरे पास है।' विक्रम, मैंने तुझे कभी नहीं बताया कि कितनी मोहरें हैं। और मुझे ख़ुद नहीं पता था कि तेरे पास मोहरें हैं। मैंने तुझे फ़ोन पर सिर्फ़ इतना पूछा था कि तू ठीक है या नहीं। तूने कहा था, ठीक हूँ। और फिर तूने कुछ और कहा, पर लाइन कट गई।"
विक्रम ने अपनी जीभ को अपने तालू से लगाया। "मैं ठीक हूँ" वाला झूठ अब उससे नहीं बोला जाता था। यक्षिणी ने वह झूठ उससे ले लिया था, और अब उसके मन में एक अजीब खालीपन था, जैसे किसी ने उसकी किसी आदत को जड़ से उखाड़ दिया हो।
"मैं ठीक नहीं हूँ, सलीम," उसने कहा, और यह कहते हुए उसे अजीब सी राहत हुई। "मैं बिल्कुल ठीक नहीं हूँ। और अब तू भी यहाँ है, इसलिए शायद तू भी ठीक नहीं रहेगा।"
हवेली पहुँचकर, दरवाज़े बंद करके, तीनों कुंडियाँ लगाकर, सलीम ने ब्रीफ़केस खोला। अंदर से एक फ़ाइल निकली, पुरानी, भूरी, उसके किनारों पर मोम की मुहरें टूटी हुईं, और उसके ऊपर, लाल स्याही से लिखा था: "शिवगढ़ मृत्यु-दौर, 1994। गोपनीय। बंद।"
"यह फ़ाइल मर चुकी थी," सलीम ने कहा। "तीस साल से रिकॉर्ड रूम की सबसे नीचे वाली अलमारी में दबी थी। उसे निकालने के लिए मुझे तीन लोगों के हस्ताक्षर चाहिए थे। तीसरा हस्ताक्षर करने वाले बाबू ने मुझसे कहा, 'यह फ़ाइल क्यों चाहिए? इस फ़ाइल को तो मिट्टी में दबा देना चाहिए था।' मैंने पूछा, ऐसा क्यों कहा आपने? उसने कहा, 'क्योंकि इसमें यही लिखा है। तीन बार।'"
सलीम ने फ़ाइल खोली।
पहला पन्ना एक नक्शा था, शिवगढ़ का, हाथ से बना, और उस पर ग्यारह क्रॉस बने थे। ग्यारह घर। और हर क्रॉस के पास एक तारीख़, ग्यारह लगातार रातों की।
"1994 में ग्यारह मौतें हुईं," सलीम ने कहा। "ग्यारह रातों में। हर रात एक। और हर मौत उसी घर में हुई जिस घर का नाम उस पुराने बही-खाते में है, जो तूने मुझे फ़ोन पर बताया। विक्रम, यह वही फ़ेहरिस्त है। दो सौ साल पुरानी फ़ेहरिस्त, तीस साल पहले दोहराई गई, और अब फिर।"
विक्रम ने नक्शा देखा। ग्यारह क्रॉस। और बारहवें घर की जगह, हवेली की जगह, एक खाली घेरा था, जिसमें कुछ नहीं था।
"हवेली पर क्रॉस क्यों नहीं?" उसने पूछा।
"क्योंकि हवेली में कोई नहीं मरा था 1994 में," सलीम ने कहा। "हवेली से सिर्फ़ एक आदमी जुड़ा था इस केस से। जाँच अधिकारी।"
उसने दूसरा पन्ना पलटा। विक्रम ने पहले से जानता था कि क्या आएगा, पर जब उसने अपने पिता के हस्ताक्षर देखे, उसके नीचे उनका पद, "थानाध्यक्ष रघुवीर सिंह", तो भी उसकी साँस रुक गई।
"पर रुक," सलीम ने कहा। उसने फ़ाइल के पीछे से एक और, और भी पुराना, कागज़ निकाला। "यह फ़ाइल अकेली नहीं थी। उसी अलमारी में एक और फ़ाइल थी, उससे भी पुरानी। 1964। उसमें भी ग्यारह मौतें। वही फ़ेहरिस्त, एक पीढ़ी पहले। और उस फ़ाइल के नक्शे में, विक्रम... उसमें हवेली पर क्रॉस था।"
विक्रम ने 1964 का नक्शा लिया। ग्यारह क्रॉस, वही घर, पर एक क्रॉस ऐसा था जो इस बार के नक्शे में नहीं था। बारहवाँ क्रॉस। हवेली पर।
"1964 में हवेली से कौन मरा था?" विक्रम ने पूछा, हालाँकि उसके पेट में पहले से ही एक ठंडी गाँठ बन चुकी थी।
"तेरे दादा," सलीम ने कहा। "शिवरतन सिंह। मृत्यु का कारण लिखा है, 'हृदयाघात'। पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, जो बची है, उसमें लिखा है कि शव के गले पर निशान था और मुँह में सोने की मोहर। विक्रम, समझ। हर तीस साल में गिनती चलती है। हर बार ग्यारह घर जाते हैं। और हर दूसरी बार, हवेली से भी कोई जाता है। 1964 में तेरे दादा। 1994 में... कोई नहीं, क्योंकि तेरे पिता ने कुछ किया, कुछ सौदा, कुछ समझौता, जिससे हवेली बच गई। और अब..."
"अब फिर हवेली की बारी है," विक्रम ने कहा। "और इस बार हवेली में सिर्फ़ मैं हूँ।"
सलीम ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना ब्रीफ़केस अपनी गोद में खींच लिया, जैसे उसमें से कुछ निकलकर उन्हें सुन रहा हो।
"तेरे पिता ने इस केस की जाँच की," सलीम ने कहा। "और फिर इसे बंद कर दिया। देख, हर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के नीचे उनका हस्ताक्षर है, और हर रिपोर्ट में कारण एक ही लिखा है। प्राकृतिक मृत्यु। विक्रम, मैंने पोस्टमॉर्टम की तस्वीरें देखी हैं। उन शवों में से किसी की भी मौत प्राकृतिक नहीं थी।"
उसने एक लिफ़ाफ़ा निकाला। अंदर तस्वीरें थीं, पुरानी, काली-सफ़ेद, और विक्रम ने उन्हें देखते हुए अपनी नज़रें हटानी चाहीं, पर नहीं हटाईं। हर शव के गले पर वही निशान। पाँच उंगलियाँ। और कुछ शवों के मुँह से कुछ निकला हुआ था, कुछ सफ़ेद, फूल जैसा।
"चंपा," विक्रम ने कहा।
"हाँ। और यह देख।" सलीम ने एक और कागज़ निकाला। "यह गवाह का बयान है। एक चौदह साल के लड़के का, जिसने आखिरी मौत देखी थी। पढ़।"
विक्रम ने पढ़ा। बयान लिखा था सरल भाषा में, एक बच्चे की काँपती हुई बयानी में:
"मैंने देखा कि चाचा घर से बाहर निकले। उनकी आँखें खुली थीं, पर वह सो रहे थे, मैं जानता हूँ, क्योंकि वह सीधे दीवार से टकराए और उन्हें पता नहीं चला। मैं पीछे गया। वे पेड़ तक गए। वहाँ एक परछाई थी। परछाई किसी की नहीं थी, वह अकेली थी। उसके तीन सिर थे। उसने चाचा के गले पर हाथ रखा, और चाचा नीचे बैठ गए, और फिर लेट गए। परछाई ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। जब मैंने खोलीं, परछाई मेरे सामने थी। उसने कहा, 'जा, बता दे सबको। तू गवाह है। हर तीस साल में एक गवाह चाहिए होता है, जो बताए कि हिसाब चुकता हुआ है।' मैं भागा। मैंने सबको बताया। किसी ने नहीं माना।"
बयान के नीचे हस्ताक्षर थे। बच्चे के नाम के सामने लिखा था: राम अवतार।
"राम अवतार चाचा," विक्रम ने कहा। "उन्होंने मुझे बताया था कि उनके भाई मरे थे। उन्होंने यह नहीं बताया कि वह गवाह थे।"
"और उन्होंने यह भी नहीं बताया," सलीम ने कहा, "कि इस बयान के ठीक नीचे तेरे पिता ने लिखा है: 'गवाह की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। बयान रद्द किया जाता है।'" उसने विक्रम को देखा। "तेरे पिता ने एक चौदह साल के बच्चे को पागल ठहरा दिया, ताकि यह केस बंद हो सके।"
विक्रम ने कागज़ नीचे रखा। उसके हाथ ठंडे थे। उसके पिता ने फ़ाइल दबाई थी, मौतों को छिपाया था, एक बच्चे को पागल ठहराया था। और क्यों? क्योंकि वे ख़ुद उस जाल में थे? या क्योंकि वे उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे, अपने तरीके से?
"एक चीज़ और है," सलीम ने कहा। उसने फ़ाइल की सबसे नीचे से एक छोटा सा लिफ़ाफ़ा निकाला, मोम से सील, जिस पर लिखा था: "सामग्री: मय्यत के मुँह से बरामद।"
उसने मोम तोड़ी। अंदर से एक चीज़ गिरी, मेज़ पर, और टकराई। सोने की मोहर। अर्धचंद्र वाली। वही मोहर।
"हर शव के मुँह से यही मिला था," सलीम ने कहा। "ग्यारह शव, ग्यारह मोहरें। दस रिकॉर्ड में हैं, ग़ायब हो गईं, पिछले तीस सालों में। यह ग्यारहवीं है, जो किसी तरह रह गई। विक्रम, तेरे पास जो मोहरें हैं..."
"उन्नीस," विक्रम ने कहा।
"वे इन्हीं मोहरों जैसी हैं?"
विक्रम ने पोटली निकाली, जो अब वह अपने साथ ही रखता था, कमर से बँधी हुई। उसने एक मोहर निकाली और मेज़ पर रखी, सलीम वाली मोहर के बगल में।
दोनों एक जैसी थीं। एक ही अर्धचंद्र। एक ही लिपि। पर एक फ़र्क़ था। सलीम वाली मोहर ठंडी थी, मरी हुई, तीस साल पुरानी लिफ़ाफ़े में दबी हुई। विक्रम वाली मोहर गर्म थी। उसे छूकर विक्रम ने हमेशा एक धड़कन जैसी महसूस की थी, हल्की, जैसे मोहर जीवित हो।
सलीम ने अपनी मोहर उठाई, उसे रोशनी में घुमाया, और फिर, विक्रम के रोकने से पहले, उसने उसे अपनी हथेली में रख लिया।
"सलीम, मत—"
पर सलीम ठिठक गया। उसकी आँखें खुली रहीं, पर उनमें कुछ बदल गया। उसका चेहरा ढीला पड़ गया, और उसके होंठों पर एक मुस्कान आई, वह मुस्कान जो विक्रम ने पहले कभी सलीम के चेहरे पर नहीं देखी थी। चौड़ी, बहुत चौड़ी, कानों तक।
"उन्नीस," सलीम ने कहा, पर आवाज़ उसकी नहीं थी। आवाज़ किसी औरत की थी, मीठी, घूमती हुई। "और एक यह। बीस हो गईं। अब हिसाब पूरा हुआ।"
विक्रम ने सलीम की हथेली से मोहर झटके से निकाली और उसे कमरे के उस कोने में फेंक दिया जहाँ दीये की राख जमा थी। मोहर राख में गिरी, और वहाँ से एक आवाज़ आई, जैसे किसी ने साँस खींची हो, लंबी, गहरी, नाखुशी भरी।
सलीम ढह गया। कुर्सी पर, फिर ज़मीन पर। विक्रम ने उसे उठाया, उसके गाल पर थपेड़े दिए। सलीम ने आँखें खोलीं, अपनी आँखें, अपने डर के साथ।
मीरा तब तक अपनी पोटली लेकर आ चुकी थी। उसने पहली बार उसे विक्रम के सामने खोला। अंदर से उसने निकाला: एक छोटा सा लोहे का छल्ला, श्मशान की राख भरी एक नली, और एक सूखा हुआ, काला पड़ा फूल, जिसे देखकर विक्रम ने पहचान लिया कि वह कदंब का फूल था।
उसने राख को सलीम के माथे पर लगाया, तीन उंगलियों से, तीन बार। सलीम का शरीर अकड़ा, फिर ढीला हुआ, और उसके मुँह से एक साँस निकली, लंबी, काली, जैसे उसके अंदर से कुछ निकल गया हो।
"यह क्या था?" विक्रम ने पूछा।
"बंधन-मुद्रा," मीरा ने कहा। उसने मोहर को, जो राख में पड़ी थी, लोहे के छल्ले से उठाई, बिना छुए, और उसे अपनी पोटली के एक अलग खाने में डाल दिया। "मेरी परदादी इन्हें इसी नाम से जानती थीं। यक्षिणी जब किसी को मारती है, तो वह उसकी आत्मा को मोहर में बदल देती है। मोहर इसलिए नहीं दी जाती कि तुम अमीर हो जाओ। मोहर इसलिए दी जाती है ताकि तुम उसे सँभालो। हर मोहर एक आत्मा है, और जो इन्हें सँभालता है, वह उन आत्माओं का रखवाला बन जाता है।"
"तो मैं... मैं उन्नीस मुर्दों का रखवाला हूँ?"
"तू उन्नीस आत्माओं का क़ैदखाना है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी, क्योंकि नरमी अब झूठ होती। "और वे आत्माएँ तुझसे बात करेंगी, विक्रम। जल्दी। जब वे समझ जाएँगी कि तू सुन सकता है।"
विक्रम ने अपनी पोटली देखी। उन्नीस मोहरें। अब वह जानता था कि वे क्या थीं। उन्नीस चेहरे, उन्नीस मौतें, उन्नीस क़ैदी, जो उसके सीने से लिपटे सोते थे।
"मैं इन्हें फेंक दूँगा," उसने कहा। "कुएँ में। तालाब में। कहीं भी।"
"फेंकने से वे वापस आएँगी," मीरा ने कहा। "दी हुई चीज़ फेंकने से बंधन टूटता नहीं, गहरा होता है। इन्हें मुक्त करना होगा, और मुक्ति का रास्ता..."
"क्या है?"
मीरा ने अपनी पोटली बंद की। "मुझे नहीं पता। अभी नहीं। पर मैं पता लगाऊँगी।"
सलीम ने अपनी हथेली देखी, जहाँ मोहर का जला निशान था, और उसने पूछा, बहुत धीरे से, "विक्रम, जब मैं... जब मैं अंदर था, तो मैंने कुछ कहा था?"
"तूने कहा, बीस हो गईं। अब हिसाब पूरा हुआ।"
सलीम ने अपनी आँखें बंद कीं। "मैंने वहाँ कुछ और भी देखा, विक्रम। उस अंधेरे में, उन बैठे लोगों के पीछे, एक तेरहवाँ स्थान था। खाली। और उस खाली स्थान के ऊपर, किसी ने एक नाम लिखा था।"
"किसका नाम?"
सलीम ने उसे देखा, और उसकी आँखों में वह था जो किसी दोस्त की आँखों में कभी नहीं होना चाहिए। "तेरा।"
कमरे में कोई कुछ नहीं बोला। बाहर, कहीं, पायल बजी, एक बार, फिर चुप।
"मैं... मैं कहाँ था?" उसने पूछा।
"यहीं था।"
"नहीं।" सलीम ने अपनी हथेली देखी। उस पर, मोहर के आकार का, एक जला हुआ निशान उभर रहा था। "मैं कहीं और था। किसी अंधेरे में। और वहाँ... वहाँ बहुत सारे लोग थे, विक्रम। सब बैठे हुए थे, पंक्ति में, जैसे किसी मंदिर में प्रसाद का इंतज़ार कर रहे हों। और सबके मुँह में... सबके मुँह में यही मोहरें थीं।" उसने विक्रम का हाथ पकड़ा। "वह मोहरें पैसा नहीं हैं, विक्रम। वह मोहरें क़ैद हैं। जो मरता है, उसके मुँह में एक मोहर जाती है, और उसकी आत्मा उस मोहर में क़ैद हो जाती है। वह पैसा नहीं दे रही। वह क़ैदी बना रही है।"
विक्रम ने अपनी पोटली देखी। उन्नीस मोहरें। उन्नीस क़ैदियों की चाबियाँ, जो उसने अपने कमर से बाँध रखी थीं, अपने सीने से लगाकर सोया था।
"और मुझे एक बात और बता," सलीम ने कहा, उसकी आवाज़ अब बिल्कुल धीमी थी, जैसे वह कहना नहीं चाहता था पर कह रहा था। "मैंने जन्म-मृत्यु रजिस्टर भी देखा, रिकॉर्ड रूम में। तेरे जन्म का दर्जा देखा। 1996। माँ का नाम, पिता का नाम, सब ठीक। पर उसी पन्ने पर, उसी तारीख़ में, एक और प्रविष्टि थी, जिसे बाद में काली स्याही से काटा गया था। मैंने उसे रोशनी के सामने रखकर पढ़ा, विक्रम। मैंने पढ़ लिया।"
विक्रम ने अपने दोस्त के चेहरे को देखा। सलीम की आँखों में आँसू थे, और सलीम वह आदमी नहीं था जो रोता हो।
उसी पल, हवेली के बाहर, गली में, एक दरवाज़ा खुला। फिर दूसरा। फिर तीसरा। विक्रम ने खिड़की से देखा। रात के इस पहर में, गली में लोग निकल रहे थे, और सब एक ही तरफ़ देख रहे थे। गाँव के तीसरे घर की तरफ़। लोहार के घर की तरफ़।
"तीसरा," मीरा ने कहा। वह कब दरवाज़े पर आकर खड़ी हुई, विक्रम ने नहीं देखा। "तीसरी रात, तीसरी मौत। लोहार का घर।"
तीनों भागे। लोहार के घर की गली में भीड़ जमा थी, पर इस बार कोई चीख नहीं रहा था, कोई रो नहीं रहा था। सब खामोश थे, और यह खामोशी उन सबसे ज़्यादा डरावनी थी। लोहार का बेटा, वही मोटरसाइकिल वाला जवान आदमी जिसने विक्रम को धमकाया था, अपने दरवाज़े पर बैठा था, अपने पिता का सिर अपनी गोद में लिए, और वह कुछ नहीं कर रहा था। बस बैठा था, झुका हुआ, और उसकी आँखें खुली थीं, सूखी, खाली।
"उसने दरवाज़ा खोला था," कोई कह रहा था, भीड़ में, बहुत धीरे से। "रात में उसकी माँ ने पुकारा, बाहर से। उसकी माँ तो पाँच साल पहले मर गई थी। फिर भी उसने दरवाज़ा खोला।"
विक्रम ने लोहार के शव को देखा। गले पर वही निशान। मुँह से चंपा का फूल निकला हुआ। और शव के हाथ में, उसकी सिकुड़ी हुई मुट्ठी में, कुछ था, कुछ चमकता हुआ।
विक्रम ने झुककर देखा। सोने की मोहर। उसने उसे छूने से पहले ही पहचान लिया। अर्धचंद्र। वही लिपि।
"उसे छूना मत," मीरा ने उसकी कलाई पकड़ी। "विक्रम, मत छू।"
पर विक्रम ने देखा कि भीड़ में से एक बच्चा, लोहार का छोटा बेटा शायद, आगे आया और उसने अपने पिता की मुट्ठी से मोहर निकाल ली। कोई रोक नहीं पाया। बच्चे ने मोहर उठाई, उसे देखा, और फिर, सबके देखते-देखते, उसने उसे अपनी जेब में डाल लिया, और उसका चेहरा... उसका चेहरा बदल गया। बच्चे की आँखों में, एक पल के लिए, अंबर रंग चमका।
"मुझे मेरी चीज़ मिल गई," बच्चे ने कहा, और आवाज़ बच्चे की नहीं थी। फिर बच्चा पलटा, और सामान्य हो गया, और उसने अपनी माँ से पूछा, "माँ, पापा को क्या हुआ?"
कोई कुछ नहीं बोला। भीड़ ने उस बच्चे से दूरी बना ली, और विक्रम ने देखा कि माँ ने अपने बेटे को गोद में नहीं उठाया। उसने उसे दूर से देखा, और उसकी आँखों में डर था, अपने ही बेटे के लिए।
"अब यह पैसा फैलेगा," मीरा ने धीरे से कहा। "हर मौत के साथ एक मोहर छूटेगी, और हर मोहर कोई न कोई उठाएगा। यह गाँव अब ख़ुद अपने हाथों से अपनी क़ैद गिनेगा।"
विक्रम ने सलीम को देखा। सलीम ने उसे देखा। दोनों ने कुछ नहीं कहा। दोनों जानते थे कि अब बात सिर्फ़ इक्कीस रातों की नहीं रही। अब बात उस गाँव की थी जो धीरे-धीरे अपने आप को खा रहा था।
"क्या लिखा था, सलीम?" विक्रम ने पूछा, जब वे हवेली लौटे और दरवाज़े बंद हो गए। "रजिस्टर में। जो तूने पढ़ा।"
सलीम ने अपना ब्रीफ़केस बंद किया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। "उसमें लिखा था कि उस रात हवेली में दो बच्चे पैदा हुए थे, विक्रम। एक लड़का। और एक लड़की। और लड़की की प्रविष्टि के सामने, किसी ने लिखा था: 'मृता'। पर उसके नीचे, किसी और की लिखावट में, बहुत पुरानी लिखावट में, एक शब्द जोड़ा गया था।"
"कौन सा?"
"'स्थानांतरित।'"
विक्रम ने अपने पिता के हस्ताक्षर वाले पन्ने को देखा, फिर अपने हाथों को, फिर उस कोने में पड़ी मोहर को, जो राख में दबी अब भी गर्म थी, उसे पता था, बिना छुए भी पता था।
उसकी एक बहन थी। कभी थी। या अब भी है।
और किसी ने, किसी वजह से, उसे इस दुनिया के रजिस्टर से काटकर कहीं और भेज दिया था।
उस रात विक्रम अपने कमरे में लेटा रहा, पोटली उसके सिरहाने रखी थी, क्योंकि अब वह उसे अपने से दूर नहीं कर सकता था और अपने पास भी नहीं रख सकता था। आधी रात को, जब गाँव की आखिरी लौ बुझ चुकी थी, उसने एक आवाज़ सुनी। बहुत धीमी, बहुत दूर, जैसे किसी ने कपड़े के नीचे से पुकारा हो।
उसने पोटली उठाई और उसे अपने कान से लगाया।
अंदर से आवाज़ें आ रही थीं। बहुत सारी, एक साथ, फुसफुसाती हुईं, जैसे बहुत से लोग एक साथ अपनी-अपनी कहानियाँ कह रहे हों। और उन आवाज़ों के बीच में, एक आवाज़ उसने पहचानी। बूढ़ी, थकी हुई, पहचानी हुई आवाज़, जो कह रही थी:
"विक्रम... बेटा... तूने मेरी चिट्ठी पढ़ी थी ना...?"
दादी माँ की आवाज़।
विक्रम ने पोटली नीचे रख दी। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि पोटली लगभग गिर गई। दादी माँ की आवाज़ मोहरों में से आ रही थी। इसका मतलब सिर्फ़ एक ही हो सकता था।
दादी माँ जीवित नहीं थीं। और उनकी आत्मा, किसी तरह, इन्हीं मोहरों में क़ैद थी।
और कल रात, जब वह पेड़ के नीचे जाएगा, तो उसे पूछना होगा कि उसकी दादी की आत्मा इस क़ैद में कैसे पहुँची। और उसे डर था, बहुत डर था, कि जवाब वह होगा जो वह सुनना नहीं चाहता था।