PretikaYakshini Storiesयक्षिणी: कदंब का श्राप

भाग 9: आधी साधना

Piyashi Atma · Yakshini Stories · 18 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
यक्षिणी: कदंब का श्राप
Chapter
9 of 14
Category
Yakshini Stories
Reading time
18 min
Words
3403
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

चौथी रात विक्रम पेड़ के नीचे नहीं गया।

उसने तय किया था, दिन भर सोचने के बाद, कि यह सौदा यहीं रुकेगा। उसने मीरा और सलीम को बुलाया, तीनों ने आंगन में बैठकर बात की, और उसने कहा, "मैं नहीं जाऊँगा। आज रात से यह खत्म। मैंने दो मुरादें माँगीं। दो मौतें हुईं। अब और नहीं।"

सलीम ने उसकी बात सुनी, और फिर उसने अपनी पुलिस वाली आदत से, अपनी उंगलियाँ गिनकर, कहा, "ठीक है। मान लेते हैं कि यह सब सच है। तो तेरे पास दो रास्ते हैं। एक, साधना पूरी कर, इक्कीस रात, और उसे बाँध ले। दो, साधना छोड़ दे, और देख क्या होता है। पर तीसरा रास्ता नहीं है, विक्रम। तू इसे अनसुना नहीं कर सकता।"

"मैं अनसुना करूँगा। मैं नहीं जाऊँगा। क्या कर लेगी वह?"

मीरा ने उसे देखा। उसकी आँखों में वह पुरानी थकान थी जो विक्रम अब पहचानने लगा था। "तू पूछ रहा है कि वह क्या कर लेगी? विक्रम, तूने अपनी डायरी पढ़ी है। नियम एक। साधना छोड़ने पर कीमत दोगुनी हो जाती है, और वह कीमत तू नहीं चुकाता।"

"तो मैं इस हवेली में बन्द होकर रहूँगा। नमक की लकीरें, लोहे की चीज़ें, तेरी राख। मैं देखूँगा कि वह कैसे अंदर आती है।"

"वह अंदर नहीं आएगी," मीरा ने कहा। "उसे अंदर आने की ज़रूरत नहीं है। तू समझ नहीं रहा। तू उसका हिस्सा है, विक्रम। तू उसके बंधन का अगला कड़ा है। तू भागकर कहाँ जाएगा अपने आप से?"

विक्रम ने जवाब नहीं दिया।

उस दिन तीनों ने हवेली को किले में बदल दिया। सलीम ने हर दरवाज़े पर लोहे की चेनें डालीं। मीरा ने हर खिड़की के नीचे राख की लकीरें खींचीं। विक्रम ने पिता की पुरानी तलवार, जो दीवार पर सजावट के लिए लटकी थी, उतारकर अपने कमरे में रख ली।

काम करते-करते सलीम ने कहा, "मैं तुझे बताऊँ कि मैं क्यों आया?"

"क्योंकि मैंने कहा था।"

"नहीं।" सलीम ने चेन कसी। "मैं इसलिए आया क्योंकि जब तूने मुझे मैसेज किया, 'मुझे फ़ोन कर, जल्दी', तो मुझे वह दिन याद आ गया जब हम पंद्रह साल के थे और तूने कुएँ में कूदकर मुझे बचाया था। मुझे तैरना नहीं आता था। तूने पूछा नहीं, सोचा नहीं। बस कूद गया।" उसने विक्रम को देखा। "उस दिन के बाद मैंने तय किया था कि जब भी तू कहेगा, मैं आऊँगा। चाहे कुछ भी हो। यह फ़ाइल, यह केस, यह सब बहाना है, विक्रम। मैं तेरे लिए आया हूँ।"

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपने दोस्त का कंधा दबाया, और दोनों ने काम जारी रखा।

शाम को मीरा ने खाना बनाया। तीनों ने आंगन में बैठकर खाया, और किसी ने बात नहीं की। खाना खाते वक़्त विक्रम ने ग़ौर किया कि मीरा ने अपनी थाली में खाना रखने से पहले, एक छोटा सा हिस्सा अलग निकाला और आंगन के कोने में रख दिया, जैसे किसी को भोग लगाया हो।

"किसके लिए?" उसने पूछा।

"उसके लिए," मीरा ने कहा, बिना ऊपर देखे। "जो सुन रही है। मेरी परदादी कहती थीं, जिससे डर लगे, उसे भूखा मत रखो। भूखी चीज़ें कब्ज़ा करती हैं। भरी हुई चीज़ें सो जाती हैं।"

विक्रम ने जवाब नहीं दिया। उसने उस रात अपने कमरे में नमक की तीन लकीरें खींचीं। एक दरवाज़े पर, एक खिड़की पर, एक अपने बिस्तर के चारों ओर। उसने लोहे का कुंडा अपने तकिये के नीचे रखा। उसने मीरा की राख अपने माथे पर लगाई। और उसने अपने कानों में रुई के गोले ठूँस लिए।

सोने से पहले सलीम ने उससे कहा, "अगर रात में कुछ हो, तो चिल्लाना। मैं बगल वाले कमरे में हूँ।" उसने अपनी कुरसी दरवाज़े के पास रखी थी, और उसकी गोद में उसकी पुरानी सर्विस रिवॉल्वर थी, जो उसने कभी दिल्ली में इस्तेमाल नहीं की थी।

"उससे कुछ नहीं होगा," विक्रम ने कहा।

"मुझे पता है," सलीम ने कहा। "पर मेरे हाथ में होगी तो मुझे लगेगा कि मैं कुछ कर रहा हूँ। तू समझता है ना? डर में सबसे बुरा यही है कि हाथ खाली रह जाते हैं।"

विक्रम ने उसका कंधा दबाया। दोस्तों के बीच में कुछ बातें नहीं कही जातीं, और यह उनमें से एक थी।

आधी रात को उसने कुछ नहीं सुना।

कोई आवाज़ नहीं आई। कोई पायल नहीं बजी। कोई नाम नहीं पुकारा गया। विक्रम लेटा रहा, जागता रहा, और एक बजे, दो बजे, तीन बजे, कुछ नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद उसने जीत ली। शायद वह सिर्फ़ एक कहानी थी, जो सुनने से बढ़ती थी, और अनसुना करने से मिट जाती थी।

उसे नींद आ गई, कब, उसे पता नहीं चला।

उसकी आँख खुली तो कमरे में अंधेरा था, पर वह अंधेरा अलग था। पहले के अंधेरे में दीवारें दिखती थीं, खिड़की का आकार दिखता था। अब कुछ नहीं दिख रहा था। वह अंधेरा गाढ़ा था, गीला, जैसे उसकी आँखों पर किसी ने काला कपड़ा बाँध दिया हो।

उसने अपना हाथ उठाया। हाथ दिखा नहीं। उसने अपने हाथ को अपनी आँखों तक लाया। कुछ नहीं।

और तब उसने सुना। बहुत दूर से, बहुत धीमी, वह आवाज़। पायल। टन। टन। टन।

पर अब वह आवाज़ बाहर से नहीं आ रही थी। वह उसके कमरे के अंदर थी।

विक्रम ने अपने कानों से रुई निकाली। आवाज़ तेज़ हुई। टन। टन। टन। और उसके साथ, एक और आवाज़। साँसों की। किसी की साँसें, उसके बिस्तर के ठीक बगल में, ज़मीन पर, जैसे कोई वहाँ बैठा हो।

"तू नहीं आया," आवाज़ ने कहा। अब वह मीठी नहीं थी। अब उसमें कुछ और था, कुछ कड़वा, कुछ जला हुआ। "मैंने इंतज़ार किया, विक्रम। मैंने पूरी रात इंतज़ार किया। और तू नहीं आया।"

विक्रम ने अपने हाथ बढ़ाकर तकिये के नीचे से कुंडा निकाला। उसने उसे अंधेरे में उठाया, उस तरफ़ जहाँ से आवाज़ आ रही थी।

"लोहा," आवाज़ ने कहा, और अब वह हँस रही थी। "तू मुझे लोहे से रोकेगा? विक्रम, मैं तेरे खून में हूँ। तेरे शरीर में लोहा है, तुझे पता है ना? तेरे खून की हर बूँद में। तू मुझे किससे रोकेगा, अपने आप से?"

उसने कुंडा फेंक दिया। अंधेरे में कहीं टकराने की आवाज़ हुई।

"मैंने कुछ नहीं किया," विक्रम ने कहा। "मैंने बस नहीं आया। मैंने किसी को नहीं मारा।"

"तूने मुझे बुलाया था," आवाज़ ने कहा। "और फिर तूने मुझे अकेला छोड़ दिया। यह मेरे साथ पहले भी हुआ है, विक्रम। दो सौ साल पहले। मुझे बुलाया गया, फिर मुझे अकेला छोड़ दिया गया, और फिर मुझे जलाया गया। तू जानता है कि अकेली छोड़ी गई औरत क्या करती है?"

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। उसका गला सूख चुका था।

"वह आग लगाती है," आवाज़ ने कहा। "और इस बार, विक्रम, आग मुझे नहीं लगेगी।"

अंधेरा हटा। एक साथ, जैसे किसी ने पर्दा खींचा। कमरा वैसा का वैसा था, दीये की लौ जल रही थी, और विक्रम ने देखा कि वह अकेला था। बिस्तर के बगल में कोई नहीं था। नमक की लकीरें अपनी जगह थीं।

पर नमक की लकीरों के ऊपर से, कुछ गुज़रा था। लकीरें टूटी हुई थीं, तीनों जगह से, और उन पर काली, गीली मिट्टी के निशान थे, पैरों के निशान, छोटे, औरत के, जो दरवाज़े से आकर उसके बिस्तर तक गए थे और फिर वापस चले गए थे।

और उसके तकिये पर, उसके सिर के ठीक बगल में, एक चंपा का फूल रखा था।

पर एक बात और थी, जो उसने बाद में मीरा को बताई। उसके कमरे की दीवार पर, उस दीवार पर जिसमें उसकी बचपन की तस्वीरें टंगी थीं, सारी तस्वीरें उलट गई थीं। हर तस्वीर का शीशा अंदर की तरफ़ था, दीवार की तरफ़, जैसे किसी ने उन्हें एक-एक करके उतारा, उलटा किया, और वापस टाँगा। और सबसे बड़ी तस्वीर, जिसमें वह अपनी माँ के साथ था, नवजात, उसके शीशे पर किसी ने उंगली से लिखा था, भाप से, जैसे कोई ठंडी साँसों से शीशा भरा हो:

"तू मुझे छोड़कर कहाँ जाएगा? मैं तेरे अंदर हूँ।"

उसने तस्वीरें ठीक कीं। पर उसने माँ वाली तस्वीर को छूते वक़्त अपनी उंगलियाँ जलती हुई महसूस कीं, जैसे शीशा अब भी गरम हो।

विक्रम ने फूल को नहीं छुआ। उसने उठकर दरवाज़ा खोला और बाहर निकला। आंगन में सुबह की पहली रोशनी आ रही थी, और उस रोशनी में उसने देखा कि मीरा का कमरा खुला था।

मीरा कमरे में नहीं थी।

उसने पूरी हवेली में देखा। रसोई, आंगन, छत, बंद कमरा भी, जिसका दरवाज़ा अब खुला था, जिसे उसने कल रात बंद किया था। कहीं नहीं।

उसने सलीम को जगाया। दोनों ने गाँव में देखा। कुछ नहीं।

और फिर, सुबह के छह बजे, जब पहली लालिमा आसमान में उतरी, उन्होंने उसे वहाँ पाया।

कदंब के पेड़ के नीचे। उसी जगह जहाँ विक्रम की मुरादें पूरी हुई थीं।

मीरा वहाँ लेटी थी, जड़ों की गुफा के सामने, अपने सफ़ेद कुर्ते में, और उसका चेहरा शांत था, इतना शांत कि विक्रम को लगा कि वह सो रही है। पर उसकी आँखें खुली थीं, और वे आसमान को देख रही थीं, और उनमें कुछ नहीं था। कोई डर नहीं, कोई दर्द नहीं। बस खालीपन।

और उसके गले पर, ठीक बीच में, वही निशान था।

पाँच उंगलियों की हथेली। सिंदूर की छाप। ताज़ा, लाल, चमकता हुआ, जैसे अभी-अभी लगाया गया हो।

विक्रम ने उसे उठाया। उसका शरीर ठंडा था, बरफ़ जैसा ठंडा, पर वह जीवित थी। उसकी साँसें चल रही थीं, धीमी, गहरी, और उसके होंठ कुछ कह रहे थे, बिना आवाज़ के।

विक्रम ने अपना कान उसके होंठों के पास रखा।

"मैंने उसे देखा," मीरा ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी ने उसके गले में राख भर दी हो। "विक्रम... उसने मुझे दिखाया। मुझे मेरी माँ दिखाई। मैंने उसे देखा और मैं चली गई। मैं चली गई, विक्रम। मुझे रोकना चाहिए था ख़ुद को। मुझे पता था कि वह नहीं है। फिर भी मैं चली गई।"

"चुप रह," विक्रम ने कहा। उसने उसे उठाया, अपनी बाँहों में, और उसे हवेली ले आया। मीरा हल्की थी, बहुत हल्की, जैसे उसके अंदर से कुछ निकल गया हो।

हवेली में, खाट पर लिटाकर, मीरा ने फिर आँखें खोलीं। उसने विक्रम को देखा, और उसकी आँखों में अब वह खालीपन नहीं था। अब उनमें डर था, गहरा, काला डर।

"उसने मुझे छोड़ दिया," उसने कहा। "उसने मुझे मारा नहीं। उसने मुझे छोड़ दिया, और उसने कहा... उसने कहा, 'जा, बता दे उसे। अगली बार अगर उसने मुझे अकेला छोड़ा, तो मैं तुझे नहीं छोड़ूँगी। मैं तुझे अपना बना लूँगी, और फिर तू उसे वह करेगी जो मैं कहूँगी।'"

विक्रम ने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा था, और उसकी उंगलियाँ उसकी उंगलियों में दबी हुई थीं, कसकर, जैसे वह डूब रही हो और विक्रम उसकी आखिरी रस्सी हो।

"उसने मुझे दिखाया," मीरा ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में कुछ और था, कुछ टूटा हुआ। "मुझे मेरी माँ दिखाई। मैं पाँच साल की थी जब वह मरीं। मुझे उनका चेहरा भी याद नहीं था, विक्रम। मैंने अपनी परदादी से सुना था कि वह कैसी दिखती थीं। और आज रात, जब मैं सो रही थी, मैंने सुना कि कोई मुझे पुकार रहा है। मेरी माँ की आवाज़ में। और मैं उठी, और मैं चली गई, और मुझे पता था कि यह गलत है, पर मैं रुक नहीं पाई। क्योंकि मैंने उन्हें पहली बार देखा। पाँच साल की उम्र के बाद पहली बार। और उसने मुझसे कहा, 'तू मुझे बचा नहीं पाई थी। अब इसे बचा ले।'"

विक्रम ने सुना, और उसके मन में एक सवाल उठा, जो उसने नहीं पूछा। मीरा की माँ कैसे मरी थीं? और क्यों उन्हें बचाने की बात हो रही थी? पर उसने पूछा नहीं। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका वक़्त होता है, और यह वक़्त उनका नहीं था।

"मैं जाऊँगा," विक्रम ने कहा। "आज रात। और कल रात। और हर रात, इक्कीसवीं रात तक। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ूँगा, मीरा। मैं वादा करता हूँ।"

मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में आँसू आ गए, पहली बार, जब से वह उसे जानता था। "तू समझ नहीं रहा, विक्रम। अब तू जाएगा, तो वह तुझे ले लेगी। तू नहीं जाएगा, तो वह मुझे ले लेगी। यह उसका खेल है। इसमें जीतने का रास्ता नहीं है। इसमें सिर्फ़ हारने के दो तरीके हैं।"

"तो मैं तीसरा तरीका ढूँढूँगा," विक्रम ने कहा।

"तीसरा तरीका दो सौ साल से कोई नहीं ढूँढ पाया।"

"तो मैं चौथा ढूँढूँगा। पाँचवाँ। जो भी हो।" विक्रम ने उसका हाथ छोड़ा और खड़ा हुआ। उसकी आँखें जल रही थीं, और उसके सीने में कुछ था जो डर से ज़्यादा था। क्रोध। शुद्ध, गहरा, काला क्रोध। "मीरा, मैं आज रात उससे मिलूँगा। और मैं उससे अपनी तीसरी मुराद नहीं माँगूँगा। मैं उससे उसका सौदा माँगूँगा।"

"क्या मतलब?"

"मतलब यह कि अब मैं नियम नहीं मानूँगा। अब मैं नियम बनाऊँगा।" विक्रम ने अपनी पोटली उठाई, उन्नीस मोहरों वाली, और उसे अपने कमर से बाँधा। "उसने कहा था, सौदा साफ़ होता है। तो अब सौदा मेरे ढंग से होगा।"

मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में, आँसुओं के बीच, कुछ और चमका। शायद आशा। शायद और भी ज़्यादा डर।

"तू अपने पिता की तरह बोल रहा है," उसने कहा।

"मैं अपने पिता से अलग हूँ," विक्रम ने कहा। "उन्होंने सौदा किया था अपनी जान बचाने के लिए। मैं सौदा करूँगा उसे मारने के लिए।"

और उसने अपनी डायरी खोली, उसी डायरी को जिसमें उसने अपनी उंगली के खून से लिखा था, और उसने एक और पंक्ति जोड़ी:

"तीसरी रात से मैं अपने नियम से खेलूँगा। नियम एक: मैं झूठ नहीं बोलूँगा। नियम दो: मैं डरूँगा नहीं। नियम तीन: मैं उसे वह दूँगा जो वह चाहती है, पर मेरी कीमत पर। और नियम चार: मैं उसे मारूँगा, चाहे उसके लिए मुझे ख़ुद को मारना पड़े।"

उसने डायरी बंद की। बाहर, कहीं दूर, कदंब की डालियाँ हिलीं, बिना हवा के, और विक्रम ने अपनी गर्दन छुई। निशान अब भी जल रहा था, पर अब उस जलन में कुछ और था। एक तरह की पहचान, जैसे निशान जानता हो कि अब खेल बदल चुका है।

दोपहर को सलीम ने उससे बात करने की कोशिश की। दोनों हवेली की पिछली सीढ़ियों पर बैठे थे, जहाँ से पूरा गाँव दिखता था, और कदंब का पेड़ सबसे ऊँचा, सबसे हरा, सबसे ज़िंदा। गाँव में कोई भी पेड़ उतना हरा नहीं था।

"तू पागल हो गया है," सलीम ने कहा। उसने अपनी रिवॉल्वर निकाली, घुमाई, फिर रख ली, जैसे वह इसे संभालकर नहीं रख सकता। "विक्रम, तू उससे शर्त करने जा रहा है। वह चीज़, जो दो सौ साल से ज़िंदा है, जो मिट्टी से गुज़रती है, जो नमक की लकीरों को रोंदकर आती है। तू उससे सौदा करेगा?"

"तूने कल ही कहा था कि तीसरा रास्ता नहीं है। मैं तीसरा रास्ता बना रहा हूँ।"

"मैंने यह नहीं कहा था।" सलीम ने उसकी तरफ़ देखा। "मैंने कहा था, पूरी कर या छोड़ दे। मैंने यह नहीं कहा था कि तू उससे दोस्ती कर ले। विक्रम, सुन। कल रात जो मेरे साथ हुआ, वह मैंने तुझे नहीं बताया।"

विक्रम ने उसे देखा।

"मैं तेरे कमरे के बाहर कुरसी पर बैठा था। तीन बजे के आसपास मुझे झपकी आ गई। मुझे लगा एक मिनट के लिए। पर जब मैं जागा, तो मेरी रिवॉल्वर मेरे हाथ में नहीं थी। वह कमरे के बीच में रखी थी, ज़मीन पर, और उसके चारों ओर... किसी ने चावल के दाने रखे थे, गोल घेरे में, और हर दाने पर एक बूँद सिंदूर थी।" सलीम ने अपने हाथ देखे। "विक्रम, मैं पुलिस में रहा हूँ। मैंने लाशें देखी हैं, मैंने क़त्ल देखे हैं। पर मैंने कभी किसी को मेरे सोते हुए, मेरे हाथ से चीज़ छीनते नहीं देखा। उसने मुझे मारा नहीं। उसने मुझे बताया। कि वह चाहे तो कर सकती है।"

दोनों कुछ देर चुप रहे। नीचे गाँव में कहीं एक औरत कपड़े धो रही थी, कहीं एक बच्चा रो रहा था। सामान्य आवाज़ें, एक सामान्य गाँव की, और विक्रम को लगा कि यह सामान्यता ही सबसे बड़ा झूठ था।

"तू चला जा, सलीम," विक्रम ने कहा। "मैं तुझे रोकूँगा नहीं। तेरे पास दिल्ली है, तेरा केस है, तेरी ज़िंदगी है। यह मेरा गाँव है, मेरा कचरा है।"

"तेरा कचरा नहीं है।" सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ सख्त था। "तेरा कचरा होता तो मैं चला जाता। यह तेरा क़ब्रिस्तान है, विक्रम। और मैं अपने दोस्त को उसके क़ब्रिस्तान में अकेला नहीं छोड़ता। मैं रहूँगा। पर एक बात याद रख। जिस दिन मुझे लगा कि तू वह नहीं रहा, जिस दिन मुझे लगा कि तेरे अंदर कुछ और बोल रहा है, उस दिन मैं तुझे गोली मार दूँगा। यह मेरा वादा है।"

विक्रम ने उसे देखा, और फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया, और दोनों ने हाथ मिलाया, एक बार, कसकर।

"मैं भी यही चाहता हूँ," विक्रम ने कहा।

शाम को, सूरज ढलते हुए, मीरा थोड़ी बेहतर दिखी। उसने अपने गले के निशान को दुपट्टे से ढक लिया था, और उसने विक्रम को जाने से पहले एक चीज़ दी। अपनी पोटली की वह शीशी, जिसमें श्मशान की राख थी।

"यह अपने शरीर पर लगा लेना," उसने कहा। "जाने से पहले, माथे पर, गले पर, हाथों पर। यह उसे रोकेगी नहीं। पर यह उसे बताएगी कि तू आया है, बिना डरे। श्मशान की राख उसकी दुनिया की चीज़ है, विक्रम। उसे पहनकर जाने वाला उससे नहीं भाग रहा। उसे पहनकर जाने वाला उसकी दुनिया में घुस रहा है।"

"और अगर मैं वापस न आऊँ?"

मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो विक्रम पहचान नहीं पाया। "तो मैं तुझे ढूँढने आऊँगी," उसने कहा। "चाहे तू किसी भी दुनिया में हो।"

उस रात, जब वह पेड़ के नीचे गया, तो उसके हाथ में कुंडा नहीं था। उसके हाथ में कुछ और था। एक माचिस की तीली, और एक छोटी सी बोतल, जिसमें मीरा की पोटली से निकली श्मशान की राख और सरसों का तेल मिला था।

"तू आया," यक्षिणी ने कहा, डाली से, उसकी आवाज़ में वह मीठापन वापस था, पर अब उसमें एक खरोंच थी। "मैं जानती थी तू आएगा।"

"मैं आया हूँ," विक्रम ने कहा। "और आज से मैं हर रात आऊँगा। पर मेरी शर्त है।"

यक्षिणी ने नीचे देखा। उसकी आँखें अंधेरे में जल रही थीं। "शर्त? तू मुझसे शर्त करेगा?"

"हाँ।" विक्रम ने बोतल उठाई। "मेरी शर्त यह है कि तू मुझे, और मुझसे जुड़े हर इंसान को, छुएगी नहीं। तू मुझे मारेगी, तो मैं मर जाऊँगा, और बंधन मेरे खून से आगे जाएगा। पर तू मुझे छुएगी नहीं, मीरा को छुएगी नहीं, सलीम को छुएगी नहीं, इस गाँव के किसी को छुएगी नहीं। और बदले में, मैं तुझे वह दूँगा जो तू चाहती है।"

"मैं क्या चाहती हूँ, यह तू जानता है?"

"मुक्ति," विक्रम ने कहा। "तू मुक्ति चाहती है। दो सौ साल से बँधी है। तू मुझसे यह चाहती है कि मैं तुझे बाँधूँ, ताकि भैरव नाथ तुझे ले सके। या मैं तुझे मुक्त करूँ, ताकि तू अपना बदला ले सके। दोनों में से एक। पर मैं तीसरा रास्ता दूँगा।"

यक्षिणी डाली से उतरी। वह ज़मीन पर आई, बिना आवाज़ के, और विक्रम के सामने खड़ी हुई। इस बार वह इतनी पास थी कि विक्रम उसकी आँखों में अपनी परछाई देख सकता था, और उस परछाई के पीछे, उसकी आँखों के अंदर, वह आग, वह जलती हुई औरत, वह दो सौ साल पुरानी चीख।

"तीसरा रास्ता क्या है?" उसने पूछा, और अब उसकी आवाज़ में कुछ और था। सावधानी। और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ और। उम्मीद।

"तीसरा रास्ता यह है कि मैं तुझे तेरा बदला दिलाऊँगा," विक्रम ने कहा। "पर मेरे ढंग से। तूने जो सहा, वह मैं देखूँगा। तूने जो खोया, वह मैं जानूँगा। और फिर, जब मैं जान जाऊँगा कि तू क्या है, तब मैं तय करूँगा कि तुझे क्या मिलेगा। मुक्ति, या मोक्ष।"

यक्षिणी ने उसे देखा, बहुत देर तक, और उसकी आँखों में वह आग धीमी पड़ गई, और उसकी जगह कुछ और आया, कुछ जो विक्रम ने उसमें पहले कभी नहीं देखा था।

भरोसा नहीं। कभी नहीं। पर शायद, एक तरह का इंतज़ार, एक तरह का दाँव, जैसे वह सोच रही हो कि शायद, बस शायद, यह आदमी अलग है।

"तू अपने पुरखों से अलग है," उसने अंत में कहा, धीरे से, लगभग खुद से। "शायद इसीलिए तुझे चुना गया। शायद इसीलिए तू आखिरी है।"

और फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया, और विक्रम की गर्दन के निशान को छुआ, और विक्रम ने महसूस किया कि निशान की जलन बदल गई। अब वह दर्द नहीं था। अब वह एक तरह का बंधन था, एक तरह का वादा।

"कल रात," यक्षिणी ने कहा, "मैं तुझे वह दिखाऊँगी जो मैंने सहा। और फिर तू तय करेगा, विक्रम सिंह, कि तू मुझसे प्रेम करेगा या मुझसे युद्ध।"

और वह ग़ायब हो गई, और उसके ग़ायब होते ही, विक्रम ने महसूस किया कि उसकी गर्दन का निशान अब उसकी त्वचा में उतर गया है, गहराई में, जैसे वह अब उसका हिस्सा है, जैसे अब वह और विक्रम एक ही चीज़ के दो टुकड़े हैं।

और उसे यह बात डरावनी नहीं लगी। यही सबसे डरावनी बात थी।

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