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भाग 10: आमना-सामना
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 18 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 10 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3433
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुबह की पहली रोशनी में विक्रम पोटली लेकर बैठा था। उन्नीस मोहरों वाली पोटली, जिसमें से कल रात उसकी दादी की आवाज़ आई थी।
उसने पोटली को अपने कान से लगाया। कुछ नहीं। उसने उसे हिलाया। मोहरें टकराईं, ठंडी, भारी, और उनकी टकराहट में कोई आवाज़ नहीं थी, कोई साँस नहीं, कोई नाम नहीं।
"कुछ सुना?" मीरा ने पूछा। वह दरवाज़े पर खड़ी थी, गले में दुपट्टा लिपटाए, जिसके नीचे वह निशान अब भी था। सुबह की रोशनी में वह निशान फीका पड़ गया था, पर गया नहीं था।
"कुछ नहीं।"
"और मत सुनने की कोशिश करना," मीरा ने कहा। उसने अंदर आकर पोटली उसके हाथ से ली और उसे धीरे से रख दिया, जैसे कोई सोता हुआ बच्चा हो। "मेरी परदादी कहती थीं, क़ैद आत्माएँ बहुत थोड़ा बोलती हैं। हर शब्द उनका एक टुकड़ा घुला देता है। जो आत्मा ज़्यादा बोल दे, वह मिट जाती है। तेरी दादी ने कल जो कहा, वह उन्होंने अपने आप को खर्च करके कहा।"
विक्रम ने पोटली को देखा। उसमें उसकी दादी थीं। उसमें रामू चायवाला था। उसमें कैलाश नाई था। उसमें वे सब थे जो मर चुके थे, उन्नीस आत्माएँ, उन्नीस ज़िंदगियाँ, एक रेशमी कपड़े में बंद।
"मैं इन्हें छुड़ाऊँगा," उसने कहा।
"पहले यह बता कि तू आज रात क्या करेगा।" मीरा ने उसके सामने बैठ गई। "उसने कहा था, आज रात वह तुझे दिखाएगी कि उसने क्या सहा।"
"उससे पहले मैं उससे कुछ पूछूँगा।" विक्रम ने अपने कमरे से वह तस्वीर निकाली, माँ वाली, जिसके शीशे पर भाप से लिखा गया था। उसने शीशा साफ़ कर दिया था, पर उसने तस्वीर को उसके फ्रेम से नहीं निकाला था। कुछ चीज़ें छूने से टूटती हैं, और यह उनमें से एक थी। "मैं उससे अपनी माँ के बारे में पूछूँगा।"
मीरा ने तस्वीर देखी। "तू अपनी माँ के बारे में क्या जानता है?"
विक्रम ने मुँह खोला, और बंद कर लिया। यह सवाल इतना सीधा था कि उसका जवाब उसके पास नहीं था। उसकी माँ उसे जन्म देकर मरी थीं। यह एक बात थी, एक पंक्ति, जो उसने अपने पिता से सुनी थी, बार-बार, हमेशा उन्हीं शब्दों में, जैसे पिता ने उस पंक्ति को रट लिया हो। "तकलीफ़ हुई। डॉक्टर नहीं पहुँच सका।" इससे आगे कुछ नहीं। कोई कहानी नहीं, कोई याद नहीं, कोई तस्वीर नहीं, सिवाय मंदिर वाले कमरे की उस एक तस्वीर के, जिसमें वह सफ़ेद साड़ी में खड़ी थीं और उनकी आँखें कैमरे से हटकर कहीं और देख रही थीं।
"यही जानता हूँ," उसने कहा, धीरे से। "कुछ नहीं जानता। अठाईस साल हो गए, और मैं अपनी माँ के बारे में एक भी बात नहीं जानता जो मुझे मेरे पिता ने न बताई हो।"
"और तेरे पिता ने तुझे कभी झूठ नहीं बोला?"
विक्रम ने मीरा को देखा। इस सवाल का जवाब वह दे सकता था। उसके पिता ने उससे पूरी ज़िंदगी झूठ बोला था। उसने झूठ बोला था कि माँ बीमारी से मरीं। उसने झूठ बोला था कि हवेली में कोई बंद कमरा नहीं है। उसने झूठ बोला था कि गाँव में कुछ नहीं होता।
"पूरा झूठ बोला," उसने कहा।
उस दोपहर वह राम अवतार के पास गया। बूढ़ा अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठा धुआँ पी रहा था, एक कच्ची सी बीड़ी, जिसमें तंबाकू से ज़्यादा कुछ और सूखा हुआ था। उसने विक्रम को आते देखा और अपनी जगह से उठने की भी कोशिश नहीं की।
"आज क्या पूछने आया है, ठाकुर कुआँर?" उसने कहा। उसकी आवाज़ में ताने से ज़्यादा थकान थी।
"मेरी माँ के बारे में।"
बूढ़े का हाथ रुक गया, बीड़ी होंठों तक पहुँचते-पहुँचते। उसने विक्रम को देखा, फिर बीड़ी को देखा, फिर उसने एक लंबा कश लिया और धुआँ अपने सामने उड़ने दिया।
"तेरी माँ," उसने कहा। "सुधा। नाम जानता है?"
विक्रम के गले में कुछ अटक गया। उसे अपनी माँ का नाम भी नहीं पता था। अठाईस साल। उसके पिता ने कभी उसका नाम नहीं लिया था। "मेरी पत्नी," वह कहते थे। "तेरी माँ।" कभी नाम नहीं।
"सुधा," राम अवतार ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ नरम हो गया। "सुधा सिंह। मैं उस वक़्त सोलह साल का था। वह शहर से आई थी, तेरे पिता की नई बहू। इस गाँव में सब उसे पसंद करते थे। वह हर रविवार मंदिर के पीछे बच्चों को पढ़ाती थी। मुझे भी पढ़ाया उसने। जो कुछ मैं पढ़-लिख सकता हूँ, वह उसी की देन है।" उसने बीड़ी बुझाई। "और तेरा जन्म जिस रात हुआ, उस रात मैं जाग रहा था। मेरे पिता मर रहे थे, कैंसर, और मैं उनके पास बैठा था। इसीलिए मैंने वह देखा जो किसी ने नहीं देखा।"
विक्रम उसके पास बैठ गया, ज़मीन पर, बिना कहें।
"आधी रात का वक़्त था। तू पैदा हो चुका था, शाम को। मुझे ख़बर मिली थी कि हवेली में बेटा हुआ है। और फिर आधी रात को मैंने खिड़की से देखा कि तेरी माँ हवेली से निकली। अकेली। उसी दिन पैदा हुए बच्चे की माँ, विक्रम, जिसे बिस्तर से उठना तक नहीं चाहिए था। वह चल रही थी। धीरे-धीरे, काँपते हुए, पर चल रही थी। और उसके हाथ में कुछ था, कपड़े में लिपटा हुआ।"
"क्या था उसमें?"
"मुझे नहीं पता। मैं उसके पीछे नहीं गया। मैं सोलह साल का था और मुझे डर लगा।" राम अवतार ने अपनी आँखें मींचीं, जैसे वह अब भी उस रात को देख रहा हो। "वह उस तरफ़ गई। पेड़ की तरफ़। और एक घंटे बाद वह लौटी, और उसके हाथ खाली थे, और उसका चेहरा... विक्रम, मैंने मरते लोगों के चेहरे देखे हैं। मेरे पिता उसी रात मरे। तेरी माँ का चेहरा वैसा था। सूखा हुआ, खाली, जैसे किसी ने उसके अंदर की सारी रोशनी बुझा दी हो। चार दिन बाद वह मर गई। गला सूखता गया, डॉक्टर कुछ नहीं समझ पाए। पर मैं जानता हूँ। मैंने देखा था। वह उस रात ही मर गई थी, पेड़ के नीचे। बाकी चार दिन बस शरीर चलता रहा।"
विक्रम कुछ देर चुप बैठा रहा। गाँव की आवाज़ें उसके चारों ओर थीं, किसी के घर में बर्तन, कहीं बकरी, कहीं रेडियो, पर वे सब बहुत दूर की लग रही थीं।
"और मेरे पिता?" उसने पूछा। "उस रात मेरे पिता कहाँ थे?"
"हवेली में। तेरे साथ।" राम अवतार ने उसे देखा, और उसकी आँखों में कुछ था जो विक्रम पहचान नहीं पाया। दया होगी, शायद। या बदले की वह ठंडी खुशी जो पुराने घावों में रहती है। "तेरी माँ अकेली गई थी, विक्रम। तेरे पिता ने उसे रोका नहीं। या तो वे सो रहे थे, या वे जानते थे कि वह कहाँ जा रही है। दोनों में से जो भी सच है, वह अच्छा नहीं है।"
विक्रम हवेली लौटा तो शाम ढल रही थी। उसने सीधा स्टोर रूम में जाकर अपनी माँ का बक्सा खोला, वह पुराना स्टील का ट्रंक जिसे उसने बचपन में कभी खुला नहीं देखा था। पिता ने कहा था, "उसकी चीज़ें हैं।" बस। इतना। उसकी चीज़ें।
ट्रंक में साड़ियाँ थीं, सूखी, मोथबॉल की गंध वाली। एक चांदी का हार, वही जो तस्वीर में था। कुछ किताबें, शहर की, कविताओं की। और सबसे नीचे, साड़ियों के नीचे, एक लिफाफा।
लिफाफे पर कुछ नहीं लिखा था। अंदर एक पन्ना था, मोड़ा हुआ, और उस पर एक औरत की लिखावट थी, तेज़, झुकी हुई, जल्दी में लिखी हुई, जैसे लिखने वाली को पता हो कि उसके पास वक़्त नहीं है।
"मेरे बेटे," लिखा था। "तू यह कभी नहीं पढ़ेगा, क्योंकि तेरे पिता तुझे यह कभी नहीं देंगे। पर मैं फिर भी लिख रही हूँ, क्योंकि माँ हूँ, और माँ को लगता है कि उसके शब्द कहीं न कहीं पहुँच जाते हैं। आज रात मैं एक काम करने जा रही हूँ जो मुझे करना है। कोई मुझे नहीं कह रहा। मैं ख़ुद कर रही हूँ। यह याद रखना, अगर तू कभी याद करे: मुझे कोई नहीं मार रहा। मैं ख़ुद जा रही हूँ। और मैं इसलिए जा रही हूँ कि तू रहे।"
पन्ना वहीं फटा हुआ था। बाकी कागज़ नहीं था। शायद कभी था, शायद उसने वहीं लिखना रोक दिया, शायद किसी ने बाकी पन्ना निकाल लिया। विक्रम ने ट्रंक पलट दिया। कुछ नहीं मिला।
उसने वह पन्ना अपनी जेब में रखा, और उसने महसूस किया कि उसके हाथ काँप रहे थे। पर उसकी आँखें सूखी थीं। कुछ दर्द इतने पुराने होते हैं कि वे आँसू नहीं देते। वे बस वज़न देते हैं, एक पत्थर जैसा, जो सीने में बैठ जाता है।
रात को वह पेड़ के नीचे गया। इस बार उसने राख नहीं लगाई थी। इस बार उसके हाथ में बोतल नहीं थी। उसके हाथ में बस वह तस्वीर थी।
यक्षिणी वहाँ थी। वह आज डाली पर नहीं थी। वह ज़मीन पर खड़ी थी, उसी जगह जहाँ विक्रम खड़ा होता था, जैसे वह उसकी जगह ले चुकी हो और अब उसे उसकी जगह ढूँढनी हो। उसकी गीली लाल साड़ी चाँदनी में काली लग रही थी, और उसकी पायल हिल नहीं रही थी।
"तू आया," उसने कहा। "और तूने कुछ लाया है।"
"मेरे सवाल हैं," विक्रम ने कहा। "आज मैं कुछ नहीं माँगूँगा। आज मैं पूछूँगा। और तू जवाब देगी।"
"मैं जवाब दूँगी?"
"तू झूठ नहीं बोल सकती। यह मुझे पता है।" विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया। वह उससे सिर्फ़ दस कदम दूर था, और उसकी साँसों में लकड़ी जलने की गंध आ रही थी। "झूठ नहीं बोल सकती, यह तेरा बंधन है। तो आज तू मेरे बंधन में है, चंद्रावल्ली। आज तू जवाब देगी।"
पहली बार, उसके नाम के साथ। चंद्रावल्ली।
पेड़ की डालियाँ ऊपर खिंचीं, एक साथ, जैसे किसी ने उन्हें झटके से खींचा हो। यक्षिणी की आँखों में वह आग तेज़ हुई, और एक पल के लिए विक्रम ने उसमें वह देखा जो उसने देखा था, वह जलती हुई औरत, वह दो सौ साल पुरानी चीख।
"मेरा नाम," उसने कहा, धीरे से, और उसकी आवाज़ में अब वह मीठापन नहीं था, अब वह आवाज़ किसी और की थी, किसी बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई औरत की। "दो सौ साल में किसी ने मुझे मेरे नाम से नहीं पुकारा। वे कहते हैं, यक्षिणी। वे कहते हैं, वह। वे कहते हैं, देवी माँ, जब वे डरते हैं, और कुछ नहीं कहते, जब वे मुझे जलाते हैं। तूने मुझे मेरा नाम दिया, विक्रम सिंह। यह दूसरी बात है जो तूने मुझे दी है।"
"पहली क्या थी?"
"सिक्का।" उसने अपनी हथेली खोली। उसमें वही एक रुपये का सिक्का था। "सिक्का तूने हँसते हुए दिया था। नाम तूने डरते हुए दिया है। दोनों की कीमत बराबर है।"
विक्रम ने गहरी साँस ली। "पहला सवाल। रामू को किसने मारा?"
"मैंने नहीं।"
"कैलाश नाई को?"
"मैंने नहीं।"
"मीरा के गले पर निशान किसका है?"
यक्षिणी ने अपनी आँखें झुकाईं। "वह निशान मेरा नहीं है। मैंने तुझे पहले भी कहा था। मेरा निशान कदंब का फूल होता है। जो मरा है, वह मुझसे नहीं मरा। जो मुझसे मरेगा, उसके सीने पर फूल खिलेगा।"
"तो कौन मार रहा है?"
"यह तू जानता है," उसने कहा। "तूने देखा है। उसकी परछाई में तीन सिर हैं।"
विक्रम ने उसे देखा। "तू उसका नाम क्यों नहीं लेती?"
"क्योंकि मैं बँधी हूँ," यक्षिणी ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो विक्रम ने उम्मीद नहीं की थी। गुस्सा नहीं। बोखलाहट। "बंधन-पत्र में लिखा है, मैं अपने बाँधने वाले का नाम नहीं ले सकती, उसका काम नहीं बता सकती, उसके खिलाफ़ एक शब्द नहीं कह सकती। मैं झूठ नहीं बोल सकती, विक्रम। पर बंधन मुझसे सच भी नहीं बुलवाता। मैं बस इतना कह सकती हूँ जो मुझे कहने दिया गया है। सोच। तू समझदार है। सोच, कि कौन है जो चाहता है कि तू साधना पूरी करे।"
विक्रम चुप रहा। उसके कानों में भैरव नाथ की आवाज़ गूँज रही थी, अखाड़े वाली, "तू इक्कीस रात पूरी करेगा... तू उसे बाँध लेगा... मालिक।"
"दूसरा सवाल," विक्रम ने कहा। उसने तस्वीर उठाई, और उसे अपने सामने पकड़ा, शीशा बाहर की तरफ़। "इसे जानती है?"
यक्षिणी ने तस्वीर को देखा।
और कुछ बदल गया। विक्रम ने उसे दो बार देखा था पहले, और दोनों बार उसके चेहरे पर वही चीज़ थी, वह भूखी खुशी, वह खेलने वाली मुस्कान। अब वह मुस्कान नहीं थी। उसकी आँखों की आग धीमी पड़ गई, और उसका चेहरा, वह सुंदर, सफ़ेद, चाँद जैसा चेहरा, एक पल के लिए किसी और का हो गया। किसी ऐसे का जो किसी को याद कर रहा हो।
"सुधा," यक्षिणी ने कहा।
विक्रम की पकड़ ढीली पड़ गई। उसने तस्वीर को संभाला। "तू उसे जानती है।"
"मैंने उससे बात की थी।" यक्षिणी ने अपनी उंगली उठाई, उस जली लकड़ी जैसी उंगली, और तस्वीर के शीशे को छुआ। शीशे पर, जहाँ उसकी उंगली लगी, वहाँ भाप उठी, ठंडी भाप, और शीशा धुंधला हो गया। "अठाईस साल पहले। यहीं, इसी जगह। वह यहाँ आई थी, आधी रात को, अकेली, और उसके हाथ में कुछ था।"
"क्या था उसके हाथ में?"
यक्षिणी ने उसे देखा। "तेरे पिता की डायरी। और बंधन-पत्र की नक़ल। उसने दोनों पढ़े थे। उसे सब पता था, विक्रम। उसे पता था कि उसके घर में क्या हो रहा है, उसके पति क्या कर रहे हैं, और किसकी कीमत चुकाई जा रही है।"
"किसकी कीमत?"
"तेरी।"
विक्रम को लगा कि ज़मीन उसके पैरों के नीचे से हिल गई। "मेरी?"
"बंधन-पत्र में लिखा था," यक्षिणी ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वह पुरानी थकान थी, वह दो सौ साल की थकान। "पहली कीमत वह होगी जिसे तू सबसे ज़्यादा चाहता है। तेरे पिता ने दो मुरादें माँगी थीं। तीसरी माँगने वाले थे, और तीसरी मुराद की कीमत... वह लिखी जा चुकी थी, विक्रम। जन्म से पहले ही। तीसरी मुराद की कीमत थी, उसका पहला बच्चा। तू।"
विक्रम ने अपनी साँस रोकी हुई पाई।
"तेरे पिता ने सोचा कि वह चालाकी कर लेंगे," यक्षिणी ने कहा। "उन्होंने सोचा कि वह तीसरी मुराद कभी नहीं माँगेंगे, और कीमत कभी नहीं आएगी। पर बंधन-पत्र ऐसे नहीं चलता। जो लिखा है, वह होता है। तू पैदा हुआ, और उसी रात पत्र ने अपनी कीमत माँगी। तेरा गला सूखने लगा, विक्रम। नवजात के गले में कुछ नहीं मिलता, डॉक्टर कुछ नहीं समझते। तू मर रहा था। तीन दिन में तू मर जाता।"
"और माँ ने..."
"तेरी माँ ने डायरी पढ़ी।" यक्षिणी ने कहा। "उसने पत्र पढ़ा। उसने समझा कि क्या हो रहा है। और उसने अपने पति से पूछा, कि वह साधना छोड़ दें, कि वह पत्र जला दें। तेरे पिता ने मना कर दिया। क्योंकि साधना छोड़ने की कीमत भी थी, और उस कीमत में उनकी अपनी जान थी। तेरे पिता ने अपनी जान बचाई, विक्रम। यह उनकी कमज़ोरी थी। यह उनकी हार थी।"
"और माँ यहाँ आई।"
"तेरी माँ यहाँ आई।" यक्षिणी की आवाज़ धीमी हो गई, और उसकी आँखें अब विक्रम को नहीं देख रही थीं। वे कहीं और देख रही थीं, अठाईस साल पीछे। "आधी रात को। मैं उसे आता देख रही थी, दूर से। एक औरत, जो चार दिन पहले माँ बनी थी, जिसे चलना भी नहीं चाहिए था, और वह चली आ रही थी, एक कदम, फिर एक कदम, और हर कदम पर वह रुकती, और हिलती, और फिर चलती। मैंने बहुत लोगों को यहाँ आते देखा है, विक्रम। वे दौड़कर आते हैं, लालच में। वे रोते हुए आते हैं, डर में। तेरी माँ चलकर आई। यह फ़र्क़ है।"
विक्रम कुछ नहीं कह सका।
"उसने मुझसे कहा," यक्षिणी ने कहा, "कि मैं उसे ले लूँ। उसने कहा, पत्र में लिखा है, जो सबसे ज़्यादा चाहा जाता है। मेरे पति अपने बेटे से ज़्यादा किसी को नहीं चाहते, यह सच है। पर एक और चीज़ भी सच है, कि मैं अपने बेटे से ज़्यादा किसी को नहीं चाहती। और पत्र में यह नहीं लिखा कि कीमत पति की नज़र से तय होगी। कीमत कीमत है। मेरे पास भी वही है जो उसके पास है। उससे ज़्यादा है। क्योंकि वह अपने बेटे को प्यार करते हैं, पर मैं अपने बेटे को अपनी जान से ज़्यादा प्यार करती हूँ। मैं अपनी जान देती हूँ। ले लो। और मेरे बेटे को जीने दो।"
पेड़ की डालियाँ हिलीं। बिना हवा के, धीरे से, जैसे पेड़ भी सुन रहा हो, जैसे उसे भी वह रात याद हो।
"मैंने उससे पूछा," यक्षिणी ने कहा, "कि तुझे पता है कि तू क्या माँग रही है? उसने कहा, हाँ। मैंने कहा, तुझे डर नहीं लगता? उसने कहा, लगता है। पर मैं माँ हूँ। माँ का डर अलग होता है। माँ का डर कहता है, भागो। माँ का प्यार कहता है, खड़े रहो। और माँ का प्यार, माँ के डर से हमेशा बड़ा होता है।"
विक्रम की आँखों में अब आँसू थे। उसने उन्हें नहीं पोंछा।
"मैंने उसकी बात मान ली," यक्षिणी ने कहा। "मैंने उसे लिया। चार दिन में उसका गला सूखा, उसकी साँसें रुकीं, और वह मर गई। और तू जी गया, विक्रम। तू इसलिए ज़िंदा है कि तेरी माँ ने अपनी जान दी। तेरे पिता ने उसे नहीं दिया। यह भैरव नाथ का झूठ है, जो उसने तुझे बताया, ताकि तू अपने पिता से नफ़रत करे और उसी की तरह बने। तेरे पिता ने बस यह किया कि उन्होंने उसे रोका नहीं। वे खड़े रहे, और उन्होंने देखा, और उन्होंने रोका नहीं। यह उनका गुनाह है। मारना नहीं। रोकना नहीं। यही उनका गुनाह है, और वे इसी गुनाह में मरे।"
"और माँ ने... माँ ने बदले में कुछ माँगा?" विक्रम ने पूछा। उसकी आवाज़ रूँधी हुई थी। "कुछ भी माँगा, अपने लिए?"
यक्षिणी ने उसे देखा। उसकी आँखों में अब वह आग बहुत धीमी थी, लगभग बुझी हुई, और उसकी जगह कुछ और था, कुछ जो विक्रम ने कभी किसी में नहीं देखा था।
"उसने दो वचन लिए," उसने कहा। "पहला, कि उसके बेटे को मैं कभी अपने हाथ से न मारूँ। मैंने दिया। इसीलिए तू आज ज़िंदा है, विक्रम। तूने मुझे बुलाया, तूने मुझे छोड़ा, तूने मुझे गाली दी, तूने मुझसे लोहा उठाया, और मैंने तुझे कुछ नहीं किया। क्योंकि मैंने तेरी माँ को वचन दिया था, और मैं अपना वचन नहीं तोड़ती। मैं झूठ नहीं बोलती।"
"और दूसरा वचन?"
यक्षिणी चुप रही। बहुत देर तक चुप रही। और फिर उसने कहा, बहुत धीरे से:
"दूसरा वचन तेरे लिए नहीं था।"
"किसके लिए था?"
"उसके लिए," यक्षिणी ने कहा, "जिसे तू जानता भी नहीं।"
विक्रम ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर उसका हाथ उसके शरीर से होकर गुज़र गया, ठंडी धुंध में, और उसने अपना हाथ खींच लिया, काँपता हुआ।
"कौन?" उसने पूछा। "किसे मैं नहीं जानता?"
"अब नहीं," यक्षिणी ने कहा। "यह सच अभी का नहीं है। तू जो पूछ रहा है, विक्रम सिंह, उसका जवाब उस दिन मिलेगा जिस दिन तू तैयार होगा। और जिस दिन तू तैयार होगा, उस दिन तू कामेंगा कि तू तैयार न हुआ होता।"
उसने अपनी उंगली तस्वीर के शीशे से हटाई। शीशा अब भी धुंधला था, और उस धुंध में, उसकी उंगली के निशान के नीचे, कुछ लिखा था। विक्रम ने तस्वीर को घुमाया, चाँदनी में।
दो शब्द। सूखे, ठंडे शीशे पर, भाप से लिखे हुए, एक औरत की लिखावट में, तेज़, झुकी हुई, जल्दी में लिखी हुई:
"बेटा, माफ़ करना।"
विक्रम ने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया। उसने अपनी आँखें बंद कीं। और पहली बार, उस पेड़ के नीचे, उस डरावनी चीज़ के सामने, वह रोया। शोर नहीं किया। बस रोया, जैसे बच्चा रोता है, जैसे अनाथ रोता है।
यक्षिणी ने उसे रोते देखा। उसने कुछ नहीं कहा। बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
और फिर, जब विक्रम ने आँखें खोलीं, तो उसने कहा, धीरे से:
"अब तू तैयार है।"
"किसके लिए?"
"जो तू माँग रहा था। मैंने कहा था, मैं तुझे वह दिखाऊँगी जो मैंने सहा।" यक्षिणी ने अपना हाथ उठाया, और उसकी जली उंगलियाँ विक्रम के माथे के सामने आकर रुक गईं, एक ऊँगली की दूरी पर। "मैं तुझे अपनी कहानी दिखाऊँगी, विक्रम सिंह। शुरू से। जब मैं इंसान थी। जब मेरा नाम चंद्रावल्ली था, और मैं नाचती थी, और मुझे नहीं पता था कि इस गाँव के आदमी क्या हैं।"
"मैं देखूँगा," विक्रम ने कहा।
"पर एक बात याद रख," यक्षिणी ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कुछ ऐसा था जो विक्रम ने पहले कभी नहीं सुना था। डर। उसके अंदर, उस दो सौ साल पुरानी आग के नीचे, एक पुराना, कभी न बुझने वाला डर। "जो तू देखेगा, उसके बाद तू मुझसे नफ़रत नहीं कर पाएगा। और यह बुरा है। क्योंकि जो मुझसे नफ़रत नहीं करता, वह मुझसे बच नहीं पाता।"
"मुझे बचना नहीं है," विक्रम ने कहा। "मुझे समझना है।"
"समझना बचने से ज़्यादा खतरनाक है," यक्षिणी ने कहा। "समझने वाला अंदर आ जाता है। और अंदर आने वाला बाहर नहीं निकलता।"
और उसने अपनी उंगली विक्रम के माथे पर रख दी।
विक्रम ने महसूस किया कि ज़मीन उसके पैरों तले गायब हो गई। ठंडी धुंध उसके अंदर भर गई, उसकी आँखों में, उसके कानों में, और उसके कानों में एक आवाज़ आई, बहुत पुरानी, बहुत दूर की, घंटियों की, पायल की, और तालियों की, और एक औरत के गाने की, ऐसा गाना जो उसने कभी नहीं सुना था, किसी ऐसी भाषा में जो उसे समझ नहीं आती थी, पर जो उसे अपनी गर्दन के निशान तक महसूस होती थी।
और जब उसने आँखें खोलीं, तो साल 1826 था।