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भाग 11: चंद्रावल्ली
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 11 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3289
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
विक्रम ने आँखें खोलीं, और साल 1826 था।
पेड़ छोटा था। यही पहली बात थी जो उसने देखी। कदंब का पेड़, जो अब इतना बड़ा था कि उसकी जड़ें पूरे गाँव के नीचे फैली थीं, अब सिर्फ़ एक युवा पेड़ था, एक आदमी के कद से थोड़ा ऊँचा, पतली टहनियों वाला, और उस पर पीले फूल खिले थे, सैकड़ों, और उनकी खुशबू इतनी तेज़ थी कि विक्रम की आँखों में पानी आ गया।
गाँव छोटा था। कच्चे घर, मिट्टी की दीवारें, दो-तीन पक्के मकान, और ऊपर, टीले पर, हवेली। नई हवेली। उसकी दीवारें अब भी चूने से चमक रही थीं, और उसके दरवाज़े पर कलश बँधे थे, जैसे कोई गृह-प्रवेश हुआ हो।
और गाँव के बीच में, मंदिर के सामने की चबूतरे पर, एक औरत नाच रही थी।
विक्रम उसे पहचान गया। उसे पहचानने में उसे एक पल भी नहीं लगा, हालाँकि वह चेहरा अब अलग था। ज़िंदा था। वही आँखें, पर अब उनमें आग नहीं थी, बिजली थी, वह तेज़ चमक जो किसी कलाकार की आँखों में होती है जब वह अपनी कला में डूबा हो। वही होंठ, पर अब वे गा रहे थे, एक पद, ब्रज की किसी बोली में, राधा के विरह का, और उसके पैरों में पायल थी, और वह पायल वह आवाज़ कर रही थी जो विक्रम ने रातों को सुनी थी, टन, टन, टन, पर अब वह आवाज़ डरावनी नहीं थी। अब वह संगीत था।
चंद्रावल्ली। ज़िंदा। औरत। इंसान।
विक्रम उसे देखता रहा। उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ खड़ा है, कैसे खड़ा है। उसके पैर ज़मीन पर थे, पर ज़मीन उसे महसूस नहीं कर रही थी। लोग उसके बीच से गुज़र रहे थे, गाँव के लोग, कच्चे कपड़ों में, और कोई उसे नहीं देख रहा था। कोई उसे छू नहीं रहा था। वह वहाँ था, और नहीं था।
और तब, नाचती हुई, घूमती हुई, चंद्रावल्ली ने एक चक्कर में अपनी आँखें उठाईं, और उसने विक्रम को देखा।
सीधा उसे। उसकी आँखों में।
एक पल। बस एक पल। उसकी आँखें विक्रम पर रुकीं, और उनमें कुछ उठा, हैरानी नहीं, डर नहीं, बल्कि एक तरह की पहचान, जैसे उसे पता हो कि वह कौन है, जैसे वह उसका इंतज़ार कर रही हो। और फिर उसने चक्कर पूरा किया और अपनी आँखें हटा लीं, और विक्रम खड़ा रहा, काँपता हुआ, यह जानते हुए कि जो उसने अभी देखा था, वह इस कहानी का हिस्सा नहीं था। वह उसके लिए था। दो सौ साल पहले, एक औरत ने उसे देखा था।
वह नाच रही थी क्योंकि वह गाँव की देवकन्या थी। मंदिर की नर्तकी। उसे बचपन में मंदिर को दे दिया गया था, जब उसके माता-पिता अकाल में मर गए थे, और मंदिर के पुजारी ने उसे पाला था, और पुजारी की पत्नी ने उसे नाचना सिखाया था, और अब वह शिवगढ़ की शान थी। दूर-दूर के गाँवों से लोग उसे देखने आते थे। उसका नाम उसके गाँव से बड़ा था।
पर गाँव में उसे कोई अपना नहीं मानता था। नर्तकी सबकी होती है, और किसी की नहीं। यह उसे पता था। उसने यह बात अपनी एकमात्र सहेली से कही थी, गंगा दाई से, गाँव की दाई, जो बच्चे निकालती थी और मुर्दे नहलाती थी, और जो इस गाँव में एकमात्र ऐसी औरत थी जो चंद्रावल्ली की आँखों में देखकर बात करती थी।
"तू नाचती बहुत अच्छा है," गंगा दाई ने उससे एक शाम कहा था, मंदिर के पीछे, जहाँ दोनों बैठकर भात खा रही थीं। "पर नाचती बहुत तेज़ भी है। तेरी आँखों में आग है, चंद्रावल्ली। और मर्द आग से डरते हैं। वे आग को या तो बुझाना चाहते हैं, या अपने नाम करना।"
"तो मैं क्या करूँ? धीरे नाचूँ?"
"नहीं।" गंगा दाई ने उसका हाथ पकड़ा। "तू तेज़ नाच। पर एक कान खुला रख। आग वालों के लिए गाँव धीरे-धीरे चलता है, पर जल्दी जलता है।"
चंद्रावल्ली ने तब इस बात को नहीं समझा था। उसे क्या पता था कि गंगा दाई ने अपनी ज़िंदगी में कितनी आग देखी थीं।
और चंद्रावल्ली के पेट में, उस शाम, दो महीने की जान थी।
उसका पति मधो, बरगद के पेड़ वाली गली का कुम्हार, तीन महीने पहले मर गया था। बुख़ार। तीन दिन का बुख़ार, और फिर खाली खाट। चंद्रावल्ली ने विधवा का सफ़ेद नहीं पहना था, क्योंकि मंदिर की नर्तकी विधवा नहीं होती, वह देवी की होती है, और देवी के लिए कोई विधवा नहीं होता। यह गाँव की दया थी, या गाँव की सज़ा, यह वह कभी तय नहीं कर पाई।
उसने अपने पेट की बात किसी को नहीं बताई थी। सिवाय गंगा दाई के। गंगा दाई ने उसका हाथ पकड़कर नाड़ी देखी थी, और उसकी आँखों में आँसू आ गए थे, और उसने कहा था, "मधो की निशानी है। रखेगी?"
"रखूँगी," चंद्रावल्ली ने कहा था। "गाँव क्या कहेगा, यह मैं देख लूँगी। यह मधो का बच्चा है। यह मेरा बच्चा है।"
"तो एक बात सुन," गंगा दाई ने कहा था। "जब तक पेट न दिखे, तू मंदिर से हवेली की तरफ़ नज़र उठाकर भी मत देखना। ऊपर वाले को पता चल गया कि तेरे पेट में जान है, तो वह तुझे मंदिर से निकाल देगा। और मंदिर से निकली नर्तकी के लिए गाँव में एक ही रास्ता है, और वह रास्ता अच्छा नहीं है।"
पर ऊपर वाले को पता लग चुका था। चंद्रावल्ली को यह नहीं पता था। पर ऊपर वाले को, ठाकुर रणजीत सिंह को, हर बात का पता था। यही उसकी ताकत थी, और यही उसकी बीमारी।
रणजीत सिंह ने चंद्रावल्ली को पहली बार शिवरात्रि पर देखा था। उसके बाद उसने उसे हर त्योहार पर बुलवाया। उसके बाद उसने हर बार उसके लिए उपहार भेजे। चाँदी की पायल। बनारसी साड़ी। चंद्रावल्ली ने हर चीज़ मंदिर में चढ़ा दी। उसने एक भी चीज़ अपने पास नहीं रखी।
यह उसकी पहली ग़लती थी। इनकार भी एक तरह का जवाब होता है, और रणजीत सिंह जैसे आदमी के लिए जवाब का मतलब होता है कि बातचीत चल रही है।
फिर आया वह दिन। हवेली की छत का गृह-प्रवेश। तीन दिन का जश्न, तीन गाँवों के मेहमान, और आखिरी रात, मेहफ़िल। चंद्रावल्ली को बुलाया गया। उसने मना करना चाहा। पुजारी ने कहा, "ठाकुर की मेहमान-नवाज़ी है। मना करना मंदिर की बेइज़्ज़ती होगी।"
उसने नाचा। विक्रम ने देखा। वह मेहफ़िल में खड़ा था, दीवार के पास, कोना में, और किसी ने उसे नहीं देखा, और उसने वह सब देखा जो हुआ। उसने देखा कि चंद्रावल्ली ने नाचा, और उसका नाच इतना खूबसूरत था कि मेहफ़िल में बैठे मर्द रुक गए, कुछ अपने पैग के साथ, कुछ अपनी बातों के बीच में। उसने देखा कि रणजीत सिंह ने उसे देखा, पूरे नाच, बिना पलक झपकाए, वही नज़र जो विक्रम ने अपने पिता की आँखों में देखी थी जब वे अपनी शराब की बोतल को देखते थे। भूख। साफ़, सीधी, बेशर्म भूख।
और उसने देखा कि कोने में, दीयों की रोशनी से दूर, एक और आदमी बैठा था। तांत्रिक। काले वस्त्र, माथे पर टीका, और उसकी आँखें चंद्रावल्ली पर नहीं थीं। उसकी आँखें उसके ऊपर थीं, उसके चारों ओर, जैसे वह उसे नहीं, उसकी आत्मा को देख रहा हो, तौल रहा हो, नाप रहा हो, जैसे कोई ज्वेलर किसी हीरे को तौलता है।
भैरव नाथ। वही चेहरा। वही आँखें। दो सौ साल, और एक भी झुर्री नहीं।
नाच ख़त्म हुआ। तालियाँ बजीं। रणजीत सिंह खड़ा हुआ, और उसने अपने हाथ से एक थाली उठाई, जिसमें सोने की मोहरें थीं, चमकती हुई, नई, उसी साल की ढली हुईं, और उसने कहा, "चंद्रावल्ली। आज तूने नाचा, और मेरा घर धन्य हो गया। यह थाली तेरी है। और इसके साथ, एक प्रस्ताव। आज रात तू यहीं रुकेगी।"
मेहफ़िल में सन्नाटा हो गया। कुछ मर्दों ने एक-दूसरे को देखा। कुछ ने अपनी थालियों में देखा। कोई कुछ नहीं बोला।
चंद्रावल्ली ने अपनी पायल की आवाज़ को शांत होने दिया। फिर उसने कहा, साफ़ आवाज़ में, इतनी साफ़ कि हर कान तक पहुँची:
"ठाकुर साहब। मैं मंदिर की दासी हूँ। मैं नाचती हूँ, क्योंकि नाच मेरी पूजा है। आपने मुझे नाचने के लिए बुलाया, मैं आई। आपने इनाम दिया, मैंने मंदिर में चढ़ा दिया। पर जो आप माँग रहे हैं, वह मेरे पास नहीं है। वह कभी किसी के पास नहीं था जिसे आप दे सकें या ले सकें। मैं अपनी मर्ज़ी से जीती हूँ, ठाकुर साहब। और मैं अपनी मर्ज़ी से नहीं रुकूँगी।"
रणजीत सिंह का चेहरा पड़ गया। विक्रम ने देखा। उसने अपने पुरखे का चेहरा देखा, और उसमें वह देखा जो उसने उम्मीद की थी, और फिर भी उसे देखकर उसका पेट मुड़ गया। क्रोध नहीं। शर्म। एक आदमी की वह शर्म जो तब होती है जब उसे उसके सामने, सबके सामने, दिखा दिया जाए कि वह छोटा है।
रणजीत सिंह ने मुस्कुराया। "बहुत बोलती है तू," उसने कहा। "जा। जा अभी। और कल सुबह तक अपनी यह बोलती हुई ज़बान संभालकर रख।"
चंद्रावल्ली चली गई। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। विक्रम ने देखा कि रणजीत सिंह ने भैरव नाथ की तरफ़ देखा, और भैरव नाथ ने अपना सिर हिलाया, बहुत धीरे, एक बार, जैसे कोई डॉक्टर किसी मरीज़ का नाम बताने से पहले सिर हिलाता है।
तीन दिन बाद, हवेली के ख़ज़ाने से सोने की मोहरें ग़ायब हो गईं। वही मोहरें, नई ढली हुईं, सम्वत अठारह सौ चौरासी वालीं। चार सौ मोहरें। और चौथे दिन, किसी ने कहा, किसी ने सुना, किसी ने देखा था कि मंदिर की नर्तकी ठीक उस रात हवेली की पिछली दीवार के पास देखी गई थी।
उसकी झोंपड़ी की तलाशी ली गई। उसकी खाट के नीचे से, मिट्टी में दबी हुई, एक पोटली मिली। उसमें पचास मोहरें थीं।
उस शाम गंगा दाई उसके पास आई। चंद्रावल्ली झोंपड़ी के बाहर बैठी थी, और गाँव के लोग दूर से उसे देख रहे थे, वैसे जैसे कोई किसी मरे हुए को देखता है जो अभी चल रहा हो। गंगा दाई ने उसका हाथ पकड़ा और उसे अंदर खींचा।
"सुन मेरी बात," उसने कहा, फुसफुसाकर, उसकी आँखें दरवाज़े पर थीं। "आज रात तू भाग जा। मेरे पास कुछ रुपये हैं, थोड़े से, पर काफ़ी हैं कासी के रास्ते के लिए। मेरा भतीजा गाड़वान चलाता है, वह तुझे आधी रात को पश्चिमी नदी तक छोड़ आएगा। वहाँ से नाव। तू कासी चली जा। वहाँ मंदिरों में नर्तकियों को जगह मिलती है। तू जी लेगी।"
"मैं भागूँगी नहीं, गंगा।"
"तेरे पेट में जान है!" गंगा दाई ने उसका हाथ झटक दिया। "तू अकेली नहीं है अब! तू मधो के बच्चे के लिए भाग!"
"और कल को मेरा बच्चा मुझसे पूछेगा कि उसकी माँ कौन थी, तो मैं क्या कहूँगी? कि उसकी माँ एक चोर थी जो रात को भाग गई?" चंद्रावल्ली ने अपना हाथ छुड़ाया, पर उसकी आवाज़ कठोर नहीं थी। उसने गंगा दाई के हाथ को अपने दोनों हाथों में लिया। "गंगा। मैंने कुछ नहीं किया। यह पंचायत जानती है कि मैंने कुछ नहीं किया। यह गाँव जानता है। झूठ के सामने भागना झूठ को जिताना है। मैं कल पंचायत के सामने खड़ी होंगी, और मैं सच कहूँगी, और सच सुनाई देगा। सुनाई देता है, गंगा। सच की आवाज़ अलग होती है।"
गंगा दाई ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर उसने कहा, बहुत धीरे, बहुत बूढ़ी आवाज़ में:
"सच की आवाज़ अलग होती है, चंद्रावल्ली। पर पंचायत कानों से नहीं, डर से सुनती है। और इस गाँव का डर अब तेरा नाम नहीं है। इस गाँव का डर ठाकुर का नाम है।" उसने उसका गाल छुआ, उसी तरह जैसे कोई माँ अपनी बच्ची का गाल छूती है, आखिरी बार। "ठीक है। मत भाग। पर अगर कल कुछ गलत हुआ, तो तू अपने पेट का ख़याल रखना। और अगर तू न रही, तो मैं रखूँगी। यह मेरा वचन है, देवकन्या। मैं रखूँगी।"
चंद्रावल्ली ने उसे गोद में ले लिया। विक्रम ने देखा कि उस बूढ़ी औरत की आँखों में आँसू थे, पर वह रोई नहीं। दाई लोग नहीं रोते। उन्होंने इतनी मौतें देखी होती हैं कि उनका रोना अंदर ही अंदर सूख जाता है, और उसकी जगह कुछ और आ जाता है, कुछ पत्थर जैसा।
चंद्रावल्ली ने कहा कि उसने नहीं देखीं। उसने कहा कि उसने कभी उस दीवार की तरफ़ नहीं देखा। उसने कहा कि यह साज़िश है। किसी ने नहीं सुना। जिन्होंने सुना, उन्होंने अपनी आँखें झुका लीं। गाँव के बारह आदमी, बारह घरों के मुखिया, पंचायत में बैठे। विक्रम ने उन बारह को देखा। उसने उनके चेहरे देखे। उनमें से कुछ के चेहरे उसे जाने-पहचाने लगे। उनमें से एक राम अवतार के दादा जैसा दिखता था। एक कैलाश नाई के बाप जैसा। वही बारह घर। वही फ़ेहरिस्त।
पंचायत ने फ़ैसला सुनाया। चोरी। मंदिर की दासी होकर चोरी। देवता की निंदा। और सज़ा, पंचायत के मुखिया ने कहा, सज़ा यह है कि इसे गाँव से निकाल दिया जाए।
तब भैरव नाथ खड़ा हुआ।
"निकालना काफ़ी नहीं है," उसने कहा, शांत आवाज़ में, वही शांत आवाज़ जो विक्रम ने अखाड़े में सुनी थी। "यह औरत चोर नहीं है। यह दया की बात मत समझना, पंचों। मैंने इसकी जन्म-पत्री देखी है। इसके अंदर कु-शक्ति है। यह जिस घर में जाती है, उस घर को खा जाती है। इसके पति को इसने खाया। अब यह ख़ज़ाने को खा रही है। अगर इसे निकाला, तो यह दूसरे गाँव में जाकर यही करेगी, और उस गाँव का श्राप हमारे सिर आएगा।"
"तो क्या करें?" किसी ने पूछा।
"इसे जलाना होगा," भैरव नाथ ने कहा। "आग ही कु-शक्ति को शुद्ध करती है। और मैं यहाँ हूँ। मैं वह मंत्र पढ़ूँगा जो इसकी आत्मा को गाँव से बाँध देगा, ताकि यह मरकर भी किसी को न खाए। यह मेरा काम है। यह मेरा धर्म है।"
विक्रम ने चिल्लाने की कोशिश की। उसने चिल्लाया। उसने उन बारह आदमियों को चिल्लाकर कहा कि यह झूठ है, कि यह साज़िश है, कि यह तांत्रिक उन्हें इस्तेमाल कर रहा है। किसी ने उसे नहीं सुना। वह वहाँ था, और नहीं था। उसकी आवाज़ हवा से भी हल्की थी।
उस रात, उन्होंने चंद्रावल्ली को उठाया। मंदिर से। सोते हुए। गंगा दाई ने रोकने की कोशिश की, उन्होंने उसे धक्का दिया, वह गिरी, और उसका सिर मंदिर की सीढ़ी से लगा, और वह बेहोश हो गई। यह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गिलान था, कि वह उस रात बेहोश थी। बाद में वह कहती, अगर मैं जागी होती, तो मैं जल जाती उसके साथ।
उन्होंने चंद्रावल्ली को उसी कदंब के पेड़ के नीचे लाए। उस पेड़ के नीचे, जो अब युवा था, जिस पर पीले फूल खिले थे। उन्होंने उसे पेड़ से बाँधा। उन्होंने उसके चारों ओर लकड़ी रखी। सूखी लकड़ी, सरसों के तेल में भिगोई हुई, ताकि आग तेज़ हो।
चंद्रावल्ली ने चीखीं नहीं लगाईं। विक्रम ने देखा। उसने उसे देखा, बँधी हुई, और उसकी आँखें सूखी थीं, और उसकी आवाज़ साफ़ थी, और उसने उन बारह आदमियों से कहा, एक-एक करके, उनके नाम लेकर, क्योंकि वह उन सबको जानती थी, उसने उनके बच्चों को नाचना सिखाया था:
"तुम मुझे जला रहे हो। मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हें पता है मैंने कुछ नहीं किया। और फिर भी तुम जला रहे हो। तो सुनो। मैं मर रही हूँ, पर मैं मिट नहीं रही। मैं तुम्हारे घरों में घुसूँगी। मैं तुम्हारे बच्चों को देखूँगी। और तुम्हारे बच्चों के बच्चों को। और जब तक तुम्हारा खून इस मिट्टी में है, मैं तुम्हें जानूँगी। मैं तुम्हें पहचानूँगी। और एक दिन, एक दिन मैं अपना हिसाब लूँगी।"
आग लगी। बारह मशालें। बारह हाथ।
और जब आग उठी, तब भैरव नाथ आगे आया। उसने अपना मंत्र शुरू किया, धीमी आवाज़ में, गहरी, और विक्रम ने सुना, और उसे समझ नहीं आया, क्योंकि वह भाषा संस्कृत नहीं थी, कोई भाषा नहीं थी, कोई ऐसी आवाज़ थी जो शब्दों से पहले की थी। और विक्रम ने देखा कि आग में, जलती हुई चंद्रावल्ली के ऊपर, कुछ उठा, कुछ धुंधला, कुछ जो उसकी आत्मा थी, और वह ऊपर जा रहा था, आकाश की तरफ़, और भैरव नाथ के मंत्र ने उसे पकड़ा, और खींचा, और नीचे लाया, और पेड़ में ठोक दिया, जैसे कोई किसी चीज़ को दीवार में कील से ठोकता है।
चंद्रावल्ली की चीख उस वक़्त आई, जब उसका शरीर जल चुका था। उसकी आत्मा चीखी, जब उसे पता चला कि उसे जाने नहीं दिया जाएगा। कि उसे यहीं रहना है। कि उसकी मौत भी उसकी नहीं है।
और तब, आग के बीच में, उसके जलते शरीर में, उसके पेट में, कुछ हिला।
गंगा दाई ने देखा। वह होश में आ चुकी थी, और वह भीड़ के पीछे खड़ी थी, और उसने देखा। उसके पेट में, आग में, एक छोटी सी हरकत। एक ठोकर। मधो की आखिरी निशानी, जो अब भी ज़िंदा थी, आग के बीच में, ज़िंदा।
उस रात, जब गाँव सो गया, जब आग बुझ गई, जब बारह आदमी अपने घरों में अपनी बीवियों के पास लेट गए और अपनी आँखें बंद करके सोने का नाटक किया, तब गंगा दाई वापस आई।
अकेली। अंधेरे में। अपने कपड़े में लिपटी हुई, अपने हाथ में दाई वाला चाकू लिए, उसी चाकू से जिससे वह नाल काटती थी।
विक्रम ने देखा। उसने देखा कि वह बूढ़ी औरत, उसकी काँपती हुई उंगलियों ने, उस जले हुए, चमकते हुए, अंगारों जैसे ढेर में हाथ डाला। उसने अपने हाथ जलाए। उसने नहीं रोके। उसने उस शरीर को खोला, धीरे से, जैसे वह हज़ार बार कर चुकी थी, पर इस बार उलट, इस बार किसी को बाहर निकालने के लिए, किसी को अंदर रखने के लिए नहीं।
और उसने एक बच्ची को बाहर निकाला।
छोटी। जली हुई नहीं, क्योंकि माँ के पेट ने उसे बचा लिया था, माँ का शरीर उसकी ढाल बन गया था। साँस ले रही थी। धीमी, कमज़ोर, पर साँस ले रही थी।
गंगा दाई ने उसे अपनी ओढ़नी में लपेटा। उसने उसे अपने सीने से लगाया, और उसने उस जले हुए पेड़ की तरफ़ देखा, जिसमें अब एक आत्मा क़ैद थी, चीखती हुई, और उसने फुसफुसाकर कहा, ताकि सिर्फ़ वह आत्मा सुने:
"तेरी बच्ची ज़िंदा है, चंद्रावल्ली। मैंने उसे निकाल लिया। मैं उसे पालूँगी। मैं उसे गाँव से दूर ले जाऊँगी, और उसे पालूँगी, और उसे कभी नहीं बताऊँगी कि उसकी माँ कौन थी। पर मैं उसे एक नाम दूँगी। मैं उसे मुक्ता कहूँगी। क्योंकि वह एकमात्र है जो इस आग से आज़ाद निकली है।"
और पेड़ की जली हुई टहनियाँ हिलीं, बिना हवा के, और उस रात, गाँव के हर घर में, हर सोते हुए आदमी ने सुना, अपने सपने में, एक औरत को रोते हुए। रोने की नहीं। किसी को खोने की नहीं। किसी को पाने की।
विक्रम ने आँखें खोलीं। वह पेड़ के नीचे खड़ा था। अब। 2024 में। उसका चेहरा गीला था, और उसकी साँसें तेज़ थीं, और उसके सामने चंद्रावल्ली खड़ी थी, यक्षिणी, और उसकी आँखों में वह आग अब बुझी हुई थी।
"मुक्ता," विक्रम ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "बच्ची का नाम मुक्ता रखा गया।"
"मुक्ता," चंद्रावल्ली ने कहा। "मेरी बेटी। मैंने उसे कभी नहीं देखा। मैंने उसे कभी छुआ नहीं। मैं बस उसे महसूस करती थी, पेड़ के अंदर से, जब गंगा दाई उसे लेकर यहाँ से गुज़रती। मैंने उसे बड़ा होते देखा, दूर से। मैंने उसकी शादी देखी। मैंने उसके बच्चे देखे।"
"और उसके बच्चों के बच्चे," विक्रम ने धीरे से कहा। उसके पेट में कुछ ठंडा उतर रहा था, कुछ जो उसे पहले से पता था, पर जिसे वह नहीं जानना चाहता था। "उसकी नस्ल... कहाँ गई, चंद्रावल्ली?"
यक्षिणी ने उसे देखा। उसकी आँखों में अब कुछ ऐसा था जो विक्रम ने उसमें पहले कभी नहीं देखा था। दया। गहरी, काली, दो सौ साल पुरानी दया।
"तू जानता है," उसने कहा। "तू हमेशा से जानता था। बस तूने कभी सोचा नहीं। क्यों तू? क्यों तेरे पिता? क्यों इस हवेली का हर वंशज? क्यों वह मुझे रणजीत सिंह कहकर पुकारती है, और क्यों मैं तुझे देखती हूँ और मुझे लगता है कि मैं आईने में देख रही हूँ?"
विक्रम ने अपने हाथ देखे। अपनी उंगलियाँ। अपनी त्वचा।
"कल रात," चंद्रावल्ली ने कहा, "तेरी हवेली के तहख़ाने में जा। वहाँ एक पोथी है, पत्थर की तख़्ती के नीचे दबी हुई। उसमें इस गाँव की असली वंशावली है। वह वंशावली जो कागज़ों में नहीं, खून में लिखी गई है। उसे पढ़। और फिर तू जानेगा, विक्रम सिंह, कि तू कौन है।"
"मैं कौन हूँ?" उसने पूछा।
"तू मेरा है," चंद्रावल्ली ने कहा। "तू मेरे खून का है।"