PretikaYakshini Storiesयक्षिणी: कदंब का श्राप

भाग 12: वंशावली

Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
यक्षिणी: कदंब का श्राप
Chapter
12 of 14
Category
Yakshini Stories
Reading time
17 min
Words
3295
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

विक्रम उस रात सोया नहीं। वह आंगन में बैठा रहा, माँ की तस्वीर गोद में, और उसने उस औरत के चेहरे को देखा, उस सफ़ेद साड़ी वाली औरत को, और उसे पहली बार लगा कि वह उसे जानता है। नहीं, यह सही नहीं है। उसे पहली बार लगा कि वह उसे जान सकता है। कि उसके पीछे एक इंसान थी, एक औरत, जो कविताएँ पढ़ती थी, जो बच्चों को पढ़ाती थी, जो आधी रात को अपने बच्चे के लिए पेड़ के नीचे गई और वापस नहीं आई।

सुबह होते ही उसने मीरा और सलीम को बुलाया और सब बताया। हर बात। 1826। मेहफ़िल। मोहरें। पंचायत। आग। गंगा दाई। मुक्ता।

और आखिरी बात। "तू मेरे खून का है।"

तीनों कुछ देर चुप रहे। आंगन में सुबह की धूप आ चुकी थी, पर उस धूप में कोई गर्मी नहीं थी।

"तहख़ाना," सलीम ने सबसे पहले कहा। पुलिस वाला दिमाग़। सबसे पहले सबूत। "उसने कहा, तहख़ाने में पोथी है। इस हवेली में तहख़ाना है?"

"मुझे नहीं पता," विक्रम ने कहा। "मैं इस हवेली में पैदा हुआ हूँ, और मुझे नहीं पता कि इसमें तहख़ाना है।"

"पुरानी हवेलियों में होता है," मीरा ने कहा। वह कुछ सोच रही थी, विक्रम ने देखा। उसका चेहरा कल रात के बाद से अलग था, जैसे वह किसी बात को अंदर-अंदर तौल रही हो। "और अगर तहख़ाना है, तो उसका रास्ता एक ही जगह से होगा। रसोई। पुरानी हवेलियों में तहख़ाना हमेशा रसोई के नीचे होता है, क्योंकि वहीं अनाज रखा जाता था।"

वे रसोई गए। पुरानी रसोई, जिसका चूल्हा अब मिट्टी में धँस चुका था, जहाँ उसकी दादी दाल उबालती थीं। सलीम ने फ़र्श खंगाला। आधे घंटे में उसे मिल गया। चूल्हे के पीछे, फ़र्श के पत्थरों में से एक पत्थर दूसरों से अलग था। उसके किनारों पर मिट्टी नहीं जमी थी। कोई उसे हिलाता रहा था, सालों से, धीरे-धीरे।

पत्थर उठाया। नीचे सीढ़ियाँ थीं। पत्थर की, संकरी, अंधेरे में उतरती हुईं।

"मैं पहले जाऊँगा," सलीम ने कहा। उसने अपनी रिवॉल्वर निकाली, फिर उसे देखा, फिर उसे वापस रख लिया। उसने टॉर्च उठाई। "फ़ज़ूल की चीज़ है," उसने कहा, रिवॉल्वर के बारे में, आधा खुद से। "पर हाथ में होनी चाहिए।"

तीनों उतरे। सीढ़ियाँ गहरी थीं, बीस क़दम, और नीचे एक कमरा था, छोटा, ठंडा, उस तरह की ठंडक जो पत्थर की होती है, मिट्टी की नहीं। टॉर्च की रोशनी में उन्होंने देखा। दीवारों में कोने बने थे, और उन कोनों में चीज़ें रखी थीं। पुरानी तलवारें, जंग लगी। एक पिटारा, टूटा हुआ, जिसमें कपड़े थे, सूखे, मकड़ी के जालों में लिपटे। एक तस्वीर, उलटी टंगी हुई, जिसे किसी ने उलटा करके टाँगा था, जानबूझकर, ताकि उसका चेहरा दीवार की तरफ़ रहे।

विक्रम ने उस तस्वीर को नहीं छुआ। उसे पता था कि कुछ चीज़ें उलटी इसलिए रखी जाती हैं ताकि वे देख न सकें।

पर सलीम ने, अपनी पुलिस वाली आदत से, उसे देखना ज़रूरी समझा। उसने तस्वीर को धीरे से घुमाया, टॉर्च की रोशनी में, और तीनों ने देखा। एक आदमी का चित्र था, अंग्रेज़ी ज़माने की उस सख्त बनावट में जिसमें बैठे आदमी को कैनवस पर कैद कर दिया जाता था। ठाकुरी पोशाक, मूँछें, और आँखें, जिन्हें चित्रकार ने बहुत मेहनत से बनाया था। चित्र के नीचे पीतल की पट्टी पर लिखा था: ठाकुर रणजीत सिंह, शिवगढ़।

विक्रम ने अपने परदादा के परदादा का चेहरा देखा। उसमें अपनी मूँछों की अकड़ देखी। अपनी भौहों की झुकाव। और उसने सोचा कि चंद्रावल्ली ने उसे क्यों रणजीत सिंह कहा था। उसका चेहरा इस आदमी से मिलता था, पर उसकी आँखें इस आदमी की नहीं थीं। उसकी आँखें किसी और की थीं, और अब वह जानता था कि किसकी।

सलीम ने तस्वीर को वापस उलटा कर दिया। किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ चीज़ों को उलटा ही रखना चाहिए।

और कमरे के बीच में, ज़मीन में, एक पत्थर की तख़्ती धँसी थी, चौकोर, हथेली के निशान के साथ, जैसे किसी ने अपनी हथेली गीली मिट्टी में दबाकर उसे पकड़ा हो।

विक्रम ने अपनी हथेली उस निशान पर रखी। उसका हाथ ठीक उतर आया। जैसे यह निशान उसी के लिए बना था।

"मत कर," मीरा ने कहा।

उसने दबाया। तख़्ती के नीचे से कुछ खनका, पत्थर का रगड़, और तख़्ती अपनी जगह से खिसक गई। नीचे एक गड्ढा था, पत्थर का, और उसमें लाल कपड़े में लिपटी एक पोथी रखी थी।

विक्रम ने उसे उठाया। भारी थी। पोथी के पन्ने भोजपत्र के नहीं थे, पत्थर के भी नहीं। पुराने, मोटे कागज़ के थे, हाथ से बने, और उन पर लिखावट थी, घनी, काली, और जगह-जगह पर वह लिखावट भूरी थी, उस तरह की भूरी जो स्याही नहीं होती।

खून। यह वंशावली खून में लिखी गई थी।

"पढ़ सकती है?" विक्रम ने मीरा से पूछा।

मीरा ने पोथी ली। उसने पहला पन्ना खोला, और उसके चेहरे से रंग उड़ गया।

"क्या है?" सलीम ने पूछा।

"यह लिपि..." मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ था जो विक्रम ने उसमें पहले नहीं सुना था। "यह कैठी है, पर यह साधारण कैठी नहीं है। यह... यह दाई-लिपि है। दाई लोग अपने बही-खाते इस लिपि में लिखती थीं। हर बच्चे का जन्म, हर मौत, हर गाँव का। मेरी परदादी के पास ऐसे बही-खाते थे। मैंने बचपन में सीखी थी यह लिपि।"

"तो पढ़," विक्रम ने कहा।

मीरा ने पढ़ा। पोथी के पहले पन्नों में गाँव का नक्शा था, शब्दों में। कौन सा घर कहाँ है, किसका कुआँ, किसका खेत। और फिर नाम शुरू हुए। सबसे पहला नाम:

"रणजीत सिंह, ठाकुर, शिवगढ़। पुत्र: हुकुम सिंह।"

"हुकुम सिंह," मीरा ने पढ़ा, "उन्नीस वर्ष की आयु में मृत। पेड़ से गिरा।"

"पेड़ से?" सलीम ने पूछा। "कौन सा पेड़?"

कोई जवाब नहीं देता। पोथी में लिखा था, "कदंब से गिरा। रात के समय। उसकी आँखें खुली मिलीं, और उसकी जीभ में मिट्टी भरी थी।"

रणजीत सिंह की पत्नी ने और संतान नहीं दी। हवेली का वंश रुक गया था। और फिर, सम्वत उन्नीस सौ तेरह, एक प्रविष्टि:

"हुकुम सिंह के पुत्र विजय सिंह का विवाह गंगा-घर की पुत्री से हुआ। दाई-घर की लड़की। नाम: नंदिनी। माता का नाम पोथी में नहीं लिखा जाएगा, क्योंकि माता का नाम पेड़ में लिखा है।"

"नंदिनी," मीरा ने धीरे से कहा। "मुक्ता की बेटी।"

तीनों ने एक-दूसरे को देखा।

"रुको," सलीम ने कहा। "यह कह रही है कि... जिस औरत को रणजीत सिंह ने जलवाया, उसकी पोती रणजीत सिंह के पोते की बीवी बनी?"

"यह कह रही है," मीरा ने कहा, "कि हवेली का खून दो जगह से आया। ठाकुर का नाम, और दाई-घर का खून। और उसके बाद से, हर पीढ़ी में..."

उसने पन्ने पलटे। उसकी उंगलियाँ जल्दी हो गईं। और फिर उसकी उंगलियाँ रुक गईं।

"हर पीढ़ी में," उसने पढ़ा, "एक बच्चा ऐसा जन्म लेता है जिसमें उसकी आँखें होती हैं। एम्बर। चाँदी जैसी। उस बच्चे को पेड़ पहचानता है। उस बच्चे को बंधन खींचता है। बाकी बच्चे मामूली होते हैं। बाकी बच्चे जीते हैं।"

विक्रम ने अपनी आँखों को छुआ। "मेरी आँखें तो काली हैं।"

"तेरे दादा की आँखें," मीरा ने कहा, और पोथी में देखा। "शिवरतन सिंह। उन्नीस सौ चौंसठ में मृत। यहाँ लिखा है, 'इसमें उसकी आँखें थीं।' तेरे दादा की आँखें एम्बर थीं, विक्रम।"

विक्रम को अपने दादा की तस्वीर याद आई, वह बड़ी सी तस्वीर जो हवेली के बैठक में टंगी थी, काली-सफ़ेद, जिसमें एक सख्त चेहरा कैमरे को देखता था। उस तस्वीर में आँखें सिर्फ़ काली थीं, क्योंकि पुरानी तस्वीरों में सब काला होता है। उसने कभी नहीं पूछा था कि उसके दादा की आँखों का रंग क्या था।

"और तेरे पिता," मीरा ने पढ़ा। "रघुवीर सिंह। इसमें लिखा है... 'इसमें उसकी आँखें नहीं थीं। यह मामूली था। इसने साधना की, पर यह कभी पूरा नहीं हो सकता था। पेड़ इसे कभी अपना नहीं मानता था।'"

"पर उसने साधना की," विक्रम ने कहा।

"की। पर अधूरी।" मीरा ने आगे पढ़ा, और फिर उसकी आवाज़ रुक गई। "विक्रम। उन्नीस सौ छियानबे।"

विक्रम ने देखा। पन्ने पर, उसी घनी लिखावट में, उसी खून-भूरी स्याही में:

"रघुवीर सिंह के घर सुधा ने दो बच्चे जन्म दिए। पहला, पुत्र। नाम: विक्रम। दूसरी, पुत्री। नाम—"

नाम काट दिया गया था। खून की स्याही पर किसी ने स्याही से काटा था, तेज़, बार-बार, जैसे काटने वाला गुस्से में हो।

"दूसरी, पुत्री," मीरा ने पढ़ा, "को उसी रात दाई-घर को सौंप दिया गया। पिता ने सौंपा। माता ने रोका नहीं, क्योंकि माता उस रात मर रही थी।"

विक्रम ने पोथी को देखा। उसके कानों में एक घंटी बज रही थी, बहुत दूर, बहुत धीमी। उसकी एक बहन थी। उसकी एक जुड़वाँ बहन थी, और उसके पिता ने उसे उसी रात, उसी रात जिस रात उसकी माँ मरी थी, किसी को सौंप दिया। और उसने कभी बताया नहीं। अठाईस साल, उसने कभी बताया नहीं।

"और नीचे," मीरा ने कहा, और अब उसकी आवाज़ काँप रही थी, "नीचे लिखा है: 'दो में से एक में उसकी आँखें हैं।'"

"किसमें?" विक्रम ने पूछा।

"लिखा नहीं है।"

"तो किसमें है, मीरा? मुझमें या उसमें?"

मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने आगे का पन्ना पलटा। पोथी का आखिरी पन्ना।

उस पर एक ही पंक्ति थी। ताज़ी। स्याही अब भी गीली थी, गहरी भूरी, चमकती हुई, जैसे किसी ने अभी-अभी लिखी हो, इसी रात, इसी तहख़ाने में, उनके आने से कुछ पल पहले।

"विक्रम सिंह। इक्कीसवीं रात। अमावस्या।"

और उसके नीचे, एक निशान। एक फूल का निशान, कदंब का, जिसे किसी ने अंगूठे से दबाकर बनाया था, जैसे मुहर लगाई जाती है।

"यह क्या है?" सलीम ने पूछा, हालाँकि वह जानता था।

"मेरी मौत की तारीख़," विक्रम ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ नहीं था। उसे हैरानी नहीं हुई। कुछ बातें इतनी बड़ी होती हैं कि वे हैरानी को खा जाती हैं। "पोथी में पहले से लिखी है। या अभी लिखी गई है। यह बात मायने नहीं रखती। मायने यह रखता है कि जो भी लिख रहा है, वह जानता है कि इक्कीसवीं रात कब है।"

"अमावस्या," मीरा ने धीरे से कहा। "अगली अमावस्या नौ दिन में है।"

नौ दिन। विक्रम ने अपनी गर्दन छुई। निशान जल रहा था, धीमी आँच पर, जैसे वह भी गिनती कर रहा हो।

और तब, उसकी कमर पर बँधी पोटली में, मोहरें हिलीं। उन्नीस मोहरें, एक साथ, टन, और उनमें से एक आवाज़ आई, बहुत दबी हुई, बहुत थकी हुई, उसकी दादी की आवाज़, एक शब्द, बस एक शब्द:

"सावधान।"

और फिर खामोशी। आत्मा ने अपना शब्द खर्च कर दिया।

मीरा ने पोथी बंद की। उसके हाथ काँप रहे थे। विक्रम ने उसे देखा, और उसने पहली बार देखा कि मीरा डर रही थी। नहीं, डर नहीं। वह कुछ और था। वह किसी बात को छिपा रही थी, और उसका छिपाना उसके चेहरे पर लिखा था, साफ़, जैसे पोथी की लिखावट।

"मीरा," विक्रम ने कहा। "तूने कुछ पहचाना है। इस पोथी में कुछ है जो तूने पहचाना है। बता क्या है।"

मीरा ने उसे देखा। उसकी आँखों में बहुत कुछ था, और उस सबके ऊपर, एक तरह का निर्णय, एक तरह का बंद दरवाज़ा।

"नहीं," उसने कहा। "कुछ नहीं। मैं बस थक गई हूँ।"

यह पहली बार था जब मीरा ने उससे झूठ बोला था। विक्रम ने जाना। और उसने कुछ नहीं कहा। कुछ झूठ ऐसे होते हैं जिन्हें तुम उस वक़्त नहीं पकड़ते, क्योंकि तुम्हें पता होता है कि वे झूठ किसी और की रक्षा के लिए बोले जा रहे हैं। शायद तुम्हारी।

तीनों ऊपर आए तो दोपहर ढल चुकी थी। सलीम ने पोथी को मेज़ पर रखा और कहा, "इसे जला देते हैं।"

"नहीं।" मीरा ने पोथी अपनी तरफ़ खींची। "खून की पोथी को नहीं जलाते, सलीम। इसमें नाम लिखे हैं। जो पोथी जलती है, उसके नाम सूख जाते हैं। समझ रहा है? जिन लोगों के नाम इसमें हैं, उनकी यादें, उनकी कहानियाँ, उनका अस्तित्व, सब। यह पोथी सिर्फ़ किताब नहीं है। यह क़ब्रिस्तान है।"

"तो इसमें विक्रम की क़ब्र भी लिखी है," सलीम ने कहा। "अमावस्या वाली। और तू कह रही है, इसे रखें?"

"मैं कह रही हूँ इसे पढ़ें। आखिर तक। हर पन्ना। क्योंकि जो पोथी मौत की तारीख़ लिखती है, वह उससे बचने का रास्ता भी लिखती है। हर बंधन का अपना खुलने का तरीका होता है। यह नियम है। तंत्र का पहला नियम। कोई भी बंधन इतना पूरी तरह बंद नहीं होता कि उसमें एक दरार न हो। बनाने वाला ख़ुद दरार रखता है, क्योंकि बिना दरार के बंधन बनाने वाले को खा जाता है।"

विक्रम ने उसे देखा। "तू यह सब कहाँ से जानती है?"

मीरा ने पोथी को लाल कपड़े में लपेटा। "परदादी की कहानियों से।"

यह दूसरा झूठ था। विक्रम ने यह भी नहीं पकड़ा। पर उसने गिन लिया। दो।

उस रात वह पेड़ के नीचे गया। अकेला। सलीम ने रोकना चाहा, विक्रम ने कहा, "वह मुझे नहीं मारेगी। उसने वचन दिया है। और इस पूरे गाँव में एक ही चीज़ है जो अपना वचन निभाती है, और वह वही है।"

चंद्रावल्ली उसकी प्रतीक्षा में थी। वह आज डाली पर बैठी थी, पुराने ढंग से, और उसकी पायल चाँदनी में चमक रही थी।

"तूने पोथी पढ़ी," उसने कहा। सवाल नहीं था।

"तूने जानबूझकर भेजा।"

"मैंने तुझे सच भेजा।" उसने नीचे देखा। "पोथी मैंने नहीं लिखी, विक्रम। पोथी बंधन लिखता है। बंधन-पत्र की एक प्रति पेड़ की जड़ों में है, और एक प्रति उस पोथी में है। जो कुछ इस खानदान में होता है, वह पोथी में उतर जाता है। जन्म, मौत, हर चीज़। मैं उसे नहीं लिखती। मैं उसमें बस पढ़ी जाती हूँ।"

"और आखिरी पन्ना? मेरी तारीख़?"

चंद्रावल्ली चुप रही। उसकी आँखों की आग धीमी थी आज, जैसे वह भी किसी गिनती में हो।

"इक्कीसवीं रात अमावस्या है," उसने अंत में कहा। "तेरी साधना की इक्कीसवीं रात। उस रात या तो बंधन पूरा होगा, या बंधन टूटेगा। और दोनों हालात में, विक्रम, एक खून गिरेगा। पोथी ने तेरा नाम लिखा है क्योंकि पोथी को पता है कि उस रात तू वहाँ होगा। यह तेरी मौत की तारीख़ नहीं है। यह तेरी नियुक्ति की तारीख़ है। मौत और नियुक्ति में फ़र्क़ होता है।"

"क्या फ़र्क़ है?"

"मौत में तू मरता है।" उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वह पुरानी कड़वाहट थी। "नियुक्ति में तू बदल जाता है।"

विक्रम ने अपनी आँखों को छुआ। "पोथी में लिखा था। हर पीढ़ी में एक बच्चा, जिसमें तेरी आँखें। मेरे दादा में थीं। मुझमें नहीं हैं। तो मैं वह नहीं हूँ, चंद्रावल्ली। तेरी आँखें मुझमें नहीं हैं।"

चंद्रावल्ली डाली से उतरी। वह उसके पास आई, इतनी पास कि विक्रम उसकी ठंडी साँस महसूस कर सकता था, और उसने अपना चेहरा उसके चेहरे के सामने लाया, और उसने उसकी आँखों में देखा, बहुत देर तक, बहुत गहराई से, जैसे कोई कुएँ में देख रहा हो।

"तू यह कहने आया था?" उसने पूछा, बहुत धीरे से। "कि तू वह नहीं है?"

"मैं सच जानने आया था।"

"तो सच सुन।" उसने अपनी उंगली उठाई और विक्रम की आँख के ठीक सामने रखी, एक ऊँगली की दूरी पर। "तेरी आँखें काली थीं, विक्रम सिंह। जब तू आया था, तब। अब जा, हवेली जा, और आईने में देख। अपनी दाहिनी आँख के भीतरी कोने में देख, पुतली के किनारे। और मुझे बता कि तुझे क्या दिखा।"

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। उसका मुँह सूख गया था।

"बदलाव धीरे होता है," चंद्रावल्ली ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो लगभग दया जैसा था। "पहले एक धब्बा। फिर एक किनारा। फिर पूरी पुतली। मेरे पिता की आँखें भी काली थीं, विक्रम। मेरी माँ की भी। मेरी आँखें एम्बर कब हुईं, यह मुझे नहीं पता। मैंने कभी आईना नहीं देखा उन दिनों। जब मैंने देखा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"

"यह तू कर रही है?"

"यह बंधन कर रहा है। मैं बंधन हूँ, विक्रम। मैं बाँधने वाली नहीं हूँ। मैं क़ैदी हूँ। क़ैदी से पूछ रहा है कि यह ताला तूने लगाया?" उसने अपना हाथ खींच लिया। "जा। आईना देख। और फिर तय कर कि तू किससे लड़ रहा है। मुझसे, या उससे जो तेरे अंदर उग रहा है।"

विक्रम हवेली लौटा। उसने सीधे बाथरूम का आईना देखा, ट्यूबलाइट जलाकर, और उसने अपनी दाहिनी आँख के भीतरी कोने में देखा, पुतली के किनारे।

एक धब्बा था। छोटा, एम्बर रंग का, चाँदी की चमक वाला, जैसे किसी ने उसकी आँख में सोने का एक कण दबा दिया हो।

उसने बहुत देर तक उसे देखा। फिर उसने अपनी आँख बंद की, और उसने अपनी माँ के पत्र की वह पंक्ति सोची, "मैं ख़ुद जा रही हूँ," और उसने अपनी माँ को पहली बार समझा। उसने जानबूझकर मरना चुना था। और विक्रम को, उसकी आँखों में यह धब्बा देखकर, पहली बार यह समझ आया कि मरना चुनना कैसा लगता है। यह डरावना नहीं था। यह शांत था। यही सबसे डरावनी बात थी।

उसने ट्यूबलाइट बंद की। बाहर आंगन में सलीम और मीरा बैठे थे, पोथी को कपड़े में लपेटे हुए, और दोनों ने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या कहा उसने?" सलीम ने पूछा।

"वही जो पोथी में था।" विक्रम ने कहा। "अमावस्या। इक्कीसवीं रात। कुछ होगा उस रात।"

उसने उन्हें धब्बे के बारे में नहीं बताया।

यह पहली बार था जब उसने उन दोनों से कुछ छिपाया। उसे पता नहीं था कि उसने ऐसा क्यों किया। शायद इसलिए कि मीरा ने उससे दो झूठ बोले थे, और उसने उसे नहीं पकड़ा था, और अब उसे लगा कि यही इस घर का नियम है। यहाँ हर कोई कुछ छिपाता है। पिता ने छिपाया। दादी ने छिपाया। मीरा छिपा रही है। और अब वह भी। यह हवेली अपने लोगों को अपना रंग देती है, और उसका रंग छिपाव है।

उसने अपने कमरे में जाकर पोटली खोली। उन्नीस मोहरें। उसने उन्हें अपनी हथेली में रखा, एक-एक करके, और उनमें से एक को उसने अपने कान से लगाया।

"दादी," उसने फुसफुसाया। "मुझे पता है तू सुन रही है। मुझे बहुत कुछ पूछना है। पर मैं तुझसे एक ही बात पूछूँगा। मुझे बता... उसने, मेरे पिता ने, मुझे कभी प्यार किया? या मैं हमेशा से बस एक हिसाब था?"

मोहर कुछ देर ठंडी रही। फिर उसमें से आवाज़ आई, बहुत दूर से, बहुत धुंधली, जैसे किसी ने पानी के बहुत नीचे से कहा हो:

"प्यार... किया। पर... प्यार से ज़्यादा... डरा... हुआ था।"

"किससे डरा हुआ था?"

मोहर में कुछ देर कुछ नहीं रहा। फिर आवाज़ आई, और इस बार उसमें उसकी दादी की वह पुरानी सख्ती थी, वह जो उसने बचपन में सुनी थी:

"तुझसे।"

मोहर ठंडी पड़ गई। दादी ने अपने शब्द खर्च कर दिए। विक्रम ने उसे पोटली में वापस रखा, और उसने लंबी देर तक अंधेरे में बैठकर सोचा कि एक बाप अपने बेटे से कैसे डरता है। और फिर उसे समझ आया। उसके पिता ने उसकी आँखों में देखा होगा। हर रोज़। और उन्हें डर लगा होगा कि एक दिन वे आँखें बदल जाएँगी।

उनका डर सही था। बस उनकी ज़िंदगी कम पड़ गई।

आधी रात को विक्रम आंगन में अकेला बैठा था, और उसने अपनी जेब से अपनी माँ का वह फटा पन्ना निकाला, और उसने उसे फिर से पढ़ा, चाँदनी में। "मैं ख़ुद जा रही हूँ। और मैं इसलिए जा रही हूँ कि तू रहे।"

और अब उसे समझ आया कि वह पन्ना क्यों फटा था। क्योंकि उसके बाद की पंक्ति किसी ने नहीं चाही थी कि वह पढ़े।

"और एक बात, मेरे बेटे," उसने फुसफुसाकर कहा, उस फटे पन्ने को पकड़े हुए, जैसे वह पंक्ति कहीं लिखी हो, किसी ऐसी जगह जहाँ से वह उसे सुन सके। "तेरी एक बहन है।"

उसने उस पन्ने को अपने सीने से लगाया। अठाईस साल उसने सोचा कि वह अकेला है। अकेला बच्चा, अकेला वारिस, अकेला बंधन का कड़ा। और अब उसे पता चला कि कहीं, किसी शहर में, किसी घर में या किसी अनाथालय में, एक लड़की है जो उसकी उम्र की है, जिसकी आँखें शायद उसकी माँ जैसी हैं, और जिसे यह भी नहीं पता कि उसका एक भाई है। और उसमें से एक में उसकी आँखें हैं। एम्बर। चाँदी जैसी। पोथी ने नाम काट दिया था, पर काटे हुए नाम मिटते नहीं, विक्रम। वे बस अंधेरे में चले जाते हैं।

पेड़ की डालियाँ हिलीं। बिना हवा के। और इस बार, विक्रम को लगा कि वे हिल नहीं रहीं। वे इशारा कर रही थीं। पश्चिम की तरफ़। उस तरफ़, जहाँ गाँव की सड़क ख़त्म होती थी, और शहर की तरफ़ जाती थी।

जैसे पेड़ उसे बता रहा हो कि वह कहाँ है।

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