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भाग 13: भैरव का सच
Piyashi Atma · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- यक्षिणी: कदंब का श्राप
- Chapter
- 13 of 14
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3235
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भैरव नाथ हर महीने एक दिन गाँव से ग़ायब होता था।
यह बात मीरा ने पता की। उसने तीन दिन अखाड़े पर नज़र रखी, दूर से, चाय की दुकान की ढलान से, और उसने देखा कि हर अमावस्या के ठीक बाद वाले दिन, भैरव नाथ अपनी झोली लेकर गाँव के पश्चिमी रास्ते से निकलता था, और अगली सुबह लौटता था। कहाँ जाता था, किसी को नहीं पता था। गाँव के लोगों ने कभी पूछा नहीं। तांत्रिकों से नहीं पूछा जाता।
"आज गया है," मीरा ने कहा, सुबह की चाय के साथ। "अगली सुबह तक नहीं आएगा। हमारे पास एक दिन और एक रात है।"
"अखाड़े में घुसेंगे," विक्रम ने कहा। यह सवाल नहीं था।
मीरा ने अपनी डायरी खोली। तीन दिन की नज़र रखने के बाद उसके पन्ने भरे पड़े थे। "उसकी दिनचर्या ठीक-ठाक है। सुबह पाँच बजे धूनी जलाता है। फिर सात बजे से दोपहर तक लोग आते हैं, इलाज के लिए, तावीज़ के लिए। दोपहर में वह अंदर जाता है और दरवाज़ा बंद करता है। और हर महीने, अमावस्या के अगले दिन, वह निकलता है। झोली लेकर। पश्चिमी रास्ते से।"
"पश्चिमी रास्ता कहाँ जाता है?" सलीम ने पूछा।
"कहीं नहीं।" विक्रम ने कहा। "वह रास्ता पुराने श्मशान की तरफ़ जाता है, और आगे कुछ नहीं है। खेत हैं, और फिर जंगल।"
"एक बात और," मीरा ने कहा, और अब उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "कल जब मैं वहाँ बैठी थी, दुकान की ढलान पर, तो उसके अखाड़े के दीये... विक्रम, उसके दीये बिना तेल के जलते हैं, यह हम जानते हैं। पर कल, जब मैं वहाँ बैठी थी, तो सारे दीयों की लौ एक तरफ़ झुक गई। एक साथ। मेरी तरफ़। जैसे सारे दीये मुझे देख रहे हों।"
"उसने तुझे देखा?"
"उसने बाहर नहीं आया। पर उसके दीयों ने देखा।" मीरा ने अपनी डायरी बंद की। "मैं यह इसलिए बता रही हूँ कि हम जो करने जा रहे हैं, वह उसे पता चल जाएगा। शायद पहले से पता है। शायद वह हमें जाने देगा, जानबूझकर, क्योंकि उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम क्या जानते हैं। और मुझे यही सबसे ज़्यादा डरा रहा है। जो आदमी अपने राज़ नहीं छिपाता, उसका मतलब वह यह है कि उसे पता है कि राज़ जानने से हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा।"
"या यह कि वह चाहता है कि हम जानें," विक्रम ने कहा, धीरे से। "कुछ शिकारी अपने जाल को दिखाते हैं। क्योंकि भागता हुआ शिकार ज़्यादा मीठा होता है।"
"तो भी हमें जाना होगा," सलीम ने कहा। "क्योंकि न जानेंगे तो हम कुछ नहीं जानेंगे। और अंधेरे में मरना इससे भी बुरा है।"
सलीम ने अपनी चाय ख़त्म की। "मैं बाहर रहूँगा। कोई आया तो मैं आवाज़ दूँगा।" उसने अपनी रिवॉल्वर देखी, फिर उसे रख लिया। उसने अब उसे निकालना भी छोड़ दिया था। उसने सीख लिया था कि इस गाँव में रिवॉल्वर एक तरह की प्रार्थना है, जिसका कोई जवाब नहीं आता।
अखाड़ा गाँव के बाहर था, पुरानी बावड़ी के पीछे, काँटेदार झाड़ियों के बीच में। विक्रम और मीरा वहाँ दोपहर को पहुँचे, जब गाँव सोता है, जब गर्मी सबको अंदर धकेल देती है। अखाड़े का दरवाज़ा खुला था। उस पर ताला नहीं था। ताले की ज़रूरत उसे नहीं थी।
अंदर वही था जो विक्रम ने पहले देखा था। धूनी, जिसमें राख ठंडी पड़ी थी। दीये, बिना तेल के, जो फिर भी जलते थे। और दीवारें। दीवारों पर वे खांचे, वे निशान, हज़ारों, जिन्हें उसने पहली बार देखा था।
मीरा ने उन्हें देखा। उसने अपनी उंगली उन पर फिराई। "यह गिनती है," उसने कहा। "यह गिनती है, विक्रम।"
"किस चीज़ की?"
मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने खांचों को गिनना शुरू किया। विक्रम ने भी एक दीवार उठाई। दोनों ने गिने, लंबे समय तक, चुपचाप, और फिर दोनों ने अपनी गिनती मिलाई।
"सात हज़ार तीन सौ पैंसठ," मीरा ने कहा। "और देख। खांचे गहरे नहीं हैं सब। कुछ पुराने हैं, मिट चुके हैं। कुछ नए हैं। यह दीवार का निशान नहीं है। यह रजिस्टर है। कोई इसे सालों से भर रहा है।"
"सालों से नहीं," विक्रम ने कहा, धीरे से। "सदियों से।"
उसने अपनी उंगली दीवार के आखिरी छोर पर रखी, जहाँ खांचे ताज़े थे, ताज़े, लकड़ी की सफ़ेदी अब भी दिख रही थी। उसने उन्हें गिना। ग्यारह। ग्यारह ताज़े खांचे।
"ग्यारह," उसने कहा। "तीस साल पहले ग्यारह मौतें हुई थीं।"
मीरा ने उसके हाथ को देखा, फिर दीवार को। "नहीं, विक्रम। गिनती उल्टी कर। ताज़े खांचे वह हैं जो आखिर में हैं। अगर यह रजिस्टर है, तो यह आगे बढ़ रहा है। ग्यारह खांचे वहाँ हैं, जहाँ तीस साल पहले की मौतें थीं। और उनके बाद..."
उसने अपनी उंगली आगे बढ़ाई। ग्यारह खांचों के बाद, दीवार पर एक लंबा खाली हिस्सा था, और फिर, बिल्कुल आखिर में, दीवार के उस कोने में जहाँ रोशनी कम थी, दो और खांचे थे। बिल्कुल ताज़े। लकड़ी का बुरादा उनके नीचे अब भी पड़ा था।
"दो," मीरा ने फुसफुसाई। "रामू। और कैलाश नाई।"
विक्रम ने अपना हाथ खींच लिया। दीवार ठंडी थी, और उस ठंडक में कुछ था जो पत्थर की ठंडक नहीं होती। यह वह ठंडक थी जो किसी चीज़ की होती है जो कभी जीवित थी।
"यह उसकी फ़सल है," विक्रम ने कहा। "यह सब। यह गिनती उसकी फ़सल की है। हर खांचा एक जान। सात हज़ार तीन सौ पैंसठ जानें।"
"दो सौ साल में," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वह पुरानी थकान नहीं थी, अब उसमें एक डॉक्टर जैसी साफ़गोई थी, वह जो लोगों को तब होती है जब वे डर को नापने में बदल देते हैं। "दो सौ साल में सात हज़ार जानें। हर महीने तीन जानें। विक्रम, यह आदमी... यह चीज़... यह सिर्फ़ इस गाँव से नहीं खा रहा। यह पूरे इलाक़े से खा रहा है। यह हर महीने एक दिन गाँव से निकलता है। एक दिन में यह कहीं जाता है, और वहाँ से लेकर आता है।"
"क्या लेकर आता है?"
मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसकी नज़र धूनी के पीछे पड़े एक टीन के ट्रंक पर गई, जंग लगे हुए, जिस पर ताला नहीं था। विक्रम ने उसे खोला।
अंदर तस्वीरें थीं। पुरानी, पीली, कोनों से मुड़ी हुई तस्वीरें, कपड़े में लिपटी हुईं, एक-एक करके, ध्यान से, जैसे कोई अपने परिवार की तस्वीरें सँभालता है।
पहली तस्वीर उन्नीस सौ ग्यारह की थी। उसके पीछे पेंसिल से लिखा था, "हरद्वार, कुंभ"। भीड़ की तस्वीर थी, सैकड़ों लोग, साधु, नंगे बाबा, और भीड़ के किनारे, एक आदमी खड़ा था, जो कैमरे की तरफ़ देख रहा था। उसका चेहरा अलग था। गाल ऊँचे थे, दाढ़ी थी, माथा चौड़ा था। पर आँखें वही थीं। विक्रम ने उन्हें पहचान लिया। वही ठंडी, तौलने वाली आँखें, वही जो अखाड़े में उसे देखती थीं। और उस आदमी के दाहिने हाथ पर, कलाई के ऊपर, एक जला हुआ निशान था, गोल, जैसे किसी ने गरम लोहा दबाया हो।
"देख," विक्रम ने मीरा को दिखाया।
दूसरी तस्वीर उन्नीस सौ चौंतीस की थी। एक मंदिर के सामने, एक तांत्रिक बैठा था, और उसके चारों ओर शिष्य बैठे थे। तांत्रिक का चेहरा फिर अलग था। दाढ़ी गई, गाल धँस गए, नाक बदल गई। पर आँखें वही। हाथ पर वही जला निशान।
तीसरी तस्वीर उन्नीस सौ सत्तर की। चौथी उन्नीस सौ तिरानबे की। हर तस्वीर में वह आदमी था, और हर तस्वीर में उसका चेहरा थोड़ा बदला हुआ था, जैसे कोई मिट्टी का पुतला हो जो हर कुछ साल में अपनी सतह को धीरे-धीरे ढाल लेता हो। चेहरा बदलता था। आँखें नहीं बदलती थीं। निशान नहीं बदलता था।
"वह शरीर नहीं बदलता," मीरा ने धीरे से कहा। "वह शरीर के अंदर बदलता है। उसकी चमड़ी, उसका माँस, धीरे-धीरे, सालों में, खुद को फिर से बुनता है। यह कोई तांत्रिक विद्या है, विक्रम, जो मैंने सिर्फ़ किताबों में पढ़ी है। काया-कल्प। पर काया-कल्प में शरीर नया होता है। इसमें शरीर वही है। बस चेहरा घुलता है और फिर जमता है।"
"तो वह मर ही नहीं सकता?"
"हर चीज़ मरती है," मीरा ने कहा। "जो चीज़ नहीं मरती, उसमें कोई ऐसी कीमत होती है जो वह चुका रहा होता है। सवाल यह है कि वह कीमत क्या है।"
ट्रंक के सबसे नीचे, सबसे पुरानी चीज़, कोई तस्वीर नहीं थी। एक लकड़ी की तख़्ती थी, छोटी, जिस पर रंगों से एक चित्र बना था, कंपनी ज़माने की मिनिएचर पेंटिंग, ठीक उस तरह की जो अंग्रेज़ अफ़सर अपने साथ ले जाते थे। चित्र में एक दरबार था, ठाकुर का, और ठाकुर के पास, उसके कंधे के पीछे, एक आदमी खड़ा था, काले वस्त्रों में, जिसका हाथ ठाकुर के सिंहासन पर रखा था, जैसे सिंहासन उसका हो और ठाकुर उसका किरायेदार।
चित्रकार ने उसकी आँखें बहुत ध्यान से बनाई थीं। वही आँखें। और उसके दाहिने हाथ पर, कलाई के ऊपर, चित्रकार ने एक छोटा सा गोल निशान भी बनाया था।
"यह अठारह सौ छब्बीस का है," मीरा ने कहा। "रणजीत सिंह का दरबार। और उसमें यह खड़ा है। विक्रम, यह आदमी उस रात वहाँ था जब चंद्रावल्ली जली। यह सब उसी की योजना थी। शुरू से। रणजीत सिंह की हवस को इसने हवा दी। चोरी का झूठा इल्ज़ाम इसने रचा। पंचायत को इसने समझाया। क्योंकि यक्षिणी बनाने के लिए एक ऐसी आत्मा चाहिए जो अन्याय से मरे, आग में मरे, और मरते वक़्त इतनी ताक़त रखती हो कि बँध सके। इसने उसे चुना। इसने उसे पकड़वाया। इसने उसे जलवाया। और इसने उसे बाँधा।"
"रणजीत सिंह तो बस चारा था," विक्रम ने कहा।
"रणजीत सिंह बिल्ली थी। शिकारी यह था।"
मीरा ने तख़्ती वापस ट्रंक में रखी, और तब उसकी नज़र अखाड़े के पिछले हिस्से पर पड़ी। वहाँ एक पर्दा था, काले कपड़े का, जिसके पीछे अंधेरा था।
"शायद बाकी जवाब वहाँ हैं," उसने कहा।
विक्रम ने पर्दा हटाया।
पर्दे के पीछे एक कोठरी थी, छोटी, बिना खिड़की की, और उसमें, ज़मीन पर, बारह मटके रखे थे। मिट्टी के मटके, मुँह बंद, लाल कपड़े से बँधे हुए, और हर मटके पर, काली स्याही से, एक नाम लिखा था। विक्रम ने पहला नाम पढ़ा। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
उसने अपनी जेब से वह कागज़ निकाला जिसमें उसने मंदिर के बही-खाते से वे बारह नाम उतारे थे। 1826 के बारह मशालची।
बारह नाम। बारह मटके।
"यह क्या है?" सलीम की आवाज़ पीछे से आई। वह दरवाज़े पर खड़ा था, उसने अपनी पहरेदारी छोड़ दी थी, और उसका चेहरा टॉर्च की उलटी रोशनी में कुछ और ही लग रहा था। "विक्रम, यह क्या है?"
"यह उन लोगों की क़बरें हैं," मीरा ने कहा। "जो मर चुके हैं।"
मीरा ने एक मटके का कपड़ा खोला। अंदर राख थी। ठंडी, पुरानी राख। और राख के ऊपर, एक सोने की मोहर रखी थी। सम्वत अठारह सौ चौरासी। ठाकुर रणजीत सिंह, शिवगढ़ी।
"बंधन-मुद्रा," मीरा ने कहा। "यहाँ भी। विक्रम, तेरे पास जो उन्नीस मोहरें हैं, वे इसी ख़ज़ाने की हैं। उस ख़ज़ाने की जो चंद्रावल्ली ने चुराया था, या जो उसके नाम पर रखा गया। और हर मोहर में एक आत्मा क़ैद है।"
"तो इन बारह मटकों में..." विक्रम ने कहा।
"बारह घरों की आत्माएँ।" मीरा ने मटके का कपड़ा वापस बाँधा, धीरे से, इज्ज़त से, जैसे कोई किसी की क़ब्र ढक रहा हो। "जिन्होंने उसे जलाया, उन्हें भी उसने नहीं छोड़ा। भैरव नाथ ने उन्हें भी बाँध लिया। मरने के बाद भी वे उसके हैं।"
और तब, कोठरी के अंधेरे कोने में, कुछ हिला।
विक्रम ने टॉर्च उठाई। रोशनी उस कोने पर पड़ी, और तीनों ने देखा।
एक आदमी खड़ा था।
वह वहाँ पहले से था। उन्होंने उसे आते नहीं देखा, नहीं सुना। वह बस वहाँ था, कोने में, दीवार से सटा हुआ, खड़ा, और उसका चेहरा...
उसका चेहरा नहीं था। उसके चेहरे पर मिट्टी थी, चिकनी, गोल, बिना आँखों के, बिना नाक के, बिना मुँह के, जैसे किसी ने एक आदमी को मिट्टी से ढाला हो और चेहरा बनाना भूल गया हो।
सलीम ने अपनी रिवॉल्वर निकाली। इस बार उसने निकाली।
"यही था," उसने कहा, उसकी आवाज़ शांत थी, बहुत शांत, उस तरह की शांति जो डर के ठीक ऊपर की परत होती है। "बस में। मेरे साथ बस में यही बैठा था।"
मिट्टी के आदमी ने अपना सिर झुकाया, एक तरफ़, उसी तरह जैसे कुत्ता सुनता है। और फिर, बिना मुँह के, उसने कहा, और उसकी आवाज़ भैरव नाथ की थी:
"मेहमानों के लिए पानी नहीं है मेरे पास। माफ़ करना।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया। उसके पैर से मिट्टी के कण गिरे, और वे कण ज़मीन पर गिरकर सूखे कीटों की तरह रेंगने लगे, हर कण अपने-अपने रास्ते पर, हर कण अपने ढेर की तरफ़ लौटता हुआ। विक्रम ने देखा कि उसके शरीर पर, उसकी चिकनी मिट्टी की छाती पर, कुछ उभरा था। एक निशान। पाँच उंगलियों की हथेली, सिंदूर की, जो अंदर से धँसी हुई थी, जैसे किसी ने उसे बनाते वक़्त ही दबा दिया हो।
उसी तरह की हथेली जो मरे हुओं के गलों पर मिलती थी।
"वही मारता है," विक्रम ने फुसफुसाया। "वही हथेली है।"
मिट्टी के आदमी ने अपना हाथ उठाया, धीरे से, और उसकी उंगलियाँ मीरा की तरफ़ बढ़ीं, और मीरा ने अपनी पोटली से राख की चुटकी निकाली और उसकी तरफ़ फेंकी। राख उसके चेहरे पर पड़ी, और जहाँ राख लगी, वहाँ मिट्टी सिकुड़ गई, जैसे गरम लोहे पर पानी पड़ता है, और उसके चेहरे पर, उस चिकनी मिट्टी में, एक दरार फूटी, और उस दरार में से काला धुआँ निकला, और एक आवाज़ आई, बहुत दबी हुई, बहुत दूर की, किसी आदमी की चीख, जो बहुत पहले मर चुका था और अब भी मर रहा था।
तीनों भागे। विक्रम ने बाद में यह स्वीकार किया, बिना शर्म के। वे भागे, पर्दे के पार, अखाड़े से बाहर, धूप में, और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक वे झाड़ियों के पार नहीं पहुँचे।
साँसें रोककर, विक्रम ने मीरा को देखा। मीरा ने उसे देखा। सलीम ने अपनी रिवॉल्वर को देखा, और फिर उसने उसे अपनी जेब में डाल लिया, और उसने कहा, "अब मैं मानता हूँ। अब मैं पूरी तरह मानता हूँ।"
"वह उसका नौकर था," मीरा ने कहा। "मिट्टी का आदमी। भूत-सेवक। मरा हुआ आदमी, जिसे मिट्टी में ढालकर फिर से चलाया गया। भैरव नाथ के मटके सिर्फ़ क़बरें नहीं हैं, विक्रम। वे कैंटीन हैं। वे दुकानें हैं। वह उन आत्माओं को चलाता है। जब उसे किसी को मारना होता है, वह ख़ुद नहीं जाता। वह अपने सेवकों को भेजता है।"
"रामू," विक्रम ने कहा। "कैलाश नाई। मेरे पिता।"
"तेरे पिता को उसने ख़ुद मारा," मीरा ने कहा। "तूने दृश्य में देखा था। पर बाकी सब... वे सेवक कर सकते हैं। और सेवक मारते हैं तो उनकी मार का निशान वही होता है जो उनके मालिक चाहते हैं। सिंदूर की हथेली। यक्षिणी का नकली निशान। ताकि सब उसे दोष दें।"
विक्रम ने अपनी गर्दन का निशान छुआ। "पर उसने कहा था, मेरा निशान कदंब का फूल होता है।"
"और उसने झूठ नहीं बोला था।" मीरा ने कहा। "उसने कभी झूठ नहीं बोला। उसने कभी किसी को नहीं मारा, विक्रम। दो सौ साल में उसने कभी किसी को नहीं मारा। सारी मौतें इसने कीं। इस तांत्रिक ने। और दोष उस पर डाला, जो बँधी हुई है, जो अपना बचाव नहीं कर सकती।"
"पर क्यों?" सलीम ने पूछा। "उसे क्या मिलता है?"
मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक तांबे की नली, छोटी, मुँह मोम से बंद। "यह मैंने कोठरी से उठाई थी, भागते वक़्त। मुझे पता है चोरी है। पर मुझे लगा कि यह ज़रूरी है।"
उसने मोम तोड़ा। अंदर से एक भोजपत्र निकला, पुराना, सूखा, सुडोल लिपि में लिखा हुआ। उसने उसे खोला, धीरे से, और उसने पढ़ा। उसका चेहरा पढ़ते-पढ़ते बदल गया।
"यह बंधन-पत्र है," उसने कहा। "असली वाला। सम्वत अठारह सौ तिरासी का। जिस दिन चंद्रावल्ली जलाई गई थी, उससे एक रात पहले का। इसमें लिखा है कि कैसे एक आत्मा को यक्षिणी बनाया जाता है, कैसे उसे पेड़ में बाँधा जाता है, कैसे उसकी शक्ति को मोहरों में भरा जाता है। और सबसे नीचे, बनाने वाले का नाम।"
उसने विक्रम को देखा।
"नाम रणजीत सिंह का नहीं है, विक्रम। रणजीत सिंह तो बस ग्राहक था। उसने पैसे दिए। उसने आग दिलवाई। पर बंधन-पत्र उसने नहीं बनाया। बनाने वाला कोई और है।"
"कौन?"
मीरा ने भोजपत्र को उसकी तरफ़ घुमाया। सबसे नीचे, उसी घनी, काली लिखावट में, एक नाम लिखा था, और उसके साथ एक मुहर, तीन सिर वाली छाया की मुहर:
"बंधन-कर्ता: भैरव नाथ, अघोरी, अमरता-साधक।"
"उसने उसे बाँधा था," विक्रम ने कहा। "दो सौ साल पहले। उसी ने।"
"और वह आज भी यहीं है," मीरा ने कहा। "वही आदमी। नहीं बूढ़ा हुआ, नहीं मरा। विक्रम, इस पत्र में एक बात और है। अंतिम पंक्ति। सुन।"
उसने पढ़ा:
"'जिस दिन कोई वंशज इक्कीस रात की साधना पूरी करेगा, उस दिन यक्षिणी उसकी दासी होगी, पूरी तरह, आत्मा से शरीर तक। और जिस दिन यक्षिणी किसी की दासी होगी, उस दिन बंधन-कर्ता अपना हक़ लेगा, क्योंकि बंधन-कर्ता का हक़ बाँधने वाले से पहले का है।'"
"मतलब?" सलीम ने पूछा।
"मतलब यह कि वह इंतज़ार कर रहा है," मीरा ने कहा। "वह दो सौ साल से इंतज़ार कर रहा है कि कोई इस हवेली से, कोई वंशज, साधना पूरी करे। क्योंकि जिस दिन साधना पूरी होगी, चंद्रावल्ली पूरी तरह बँध जाएगी, और उस दिन भैरव नाथ उसे अपने कब्ज़े में ले लेगा। उसकी सारी शक्ति। उसकी अमरता। उसके ख़ज़ाने की सारी मोहरें, उनमें क़ैद सारी आत्माओं समेत।"
"इसीलिए उसने मेरे पिता को धकेल दिया," विक्रम ने धीरे से कहा। "तीस साल पहले। और जब वे अधूरे रहे, उसने उन्हें मरवा दिया, और मुझे बुला लिया। मैं उसका दूसरा दाँव हूँ।"
"और वह तुझे खुद नहीं मार सकता," मीरा ने कहा। "क्योंकि उसे वंशज का खून चाहिए, स्वेच्छा से दिया हुआ। साधना स्वेच्छा से होती है। इसीलिए वह तुझे मार नहीं रहा, विक्रम। इसीलिए वह तुझे डरा रहा है, तेरे आस-पास के लोगों को मार रहा है, ताकि तू साधना पूरी करने पर मजबूर हो जाए। तू उसका शिकार नहीं है। तू उसका औज़ार है।"
तीनों कुछ देर चुप रहे। झाड़ियों के पीछे से अखाड़ा दिखता था, शांत, खाली, गर्मी में सोया हुआ।
"हमें यह सब यक्षिणी को बताना होगा," विक्रम ने कहा।
"उसे पता है," मीरा ने कहा। "उसे दो सौ साल से पता है। वह बता नहीं सकती। बंधन में लिखा है, वह अपने बाँधने वाले का नाम नहीं ले सकती। उसने तुझे इशारों में बताया, विक्रम। उसने कहा, जो चाहता है कि तू साधना पूरी करे। उसने सब बता दिया था। बस नाम नहीं लिया था।"
वे हवेली लौटे। रास्ते भर कोई नहीं बोला। सूरज ढल रहा था, और उसकी लालिमा में कदंब का पेड़ काला खड़ा था, और विक्रम ने पहली बार उस पेड़ को वैसे देखा जैसे वह था। एक क़ैदख़ाना। एक औरत की क़ैदख़ाना, जिसे दो सौ साल पहले जलाया गया था, और जिसे अब एक आदमी बेचने वाला था।
हवेली के दरवाज़े पर उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। पर अंदर, आंगन में, एक चीज़ उनका इंतज़ार कर रही थी।
धूनी की राख। एक छोटा सा ढेर, आंगन के बीच में, जो वहाँ सुबह नहीं था। और राख में, किसी ने उंगली से लिखा था, ताज़ी राख में, ताज़े अक्षरों में:
"अगली बार मेरी चीज़ें छूने से पहले इजाज़त लेना, विक्रम सिंह।"
और उसके नीचे, एक और पंक्ति, और विक्रम ने उसे पढ़ते ही अपनी साँस रोक ली:
"तेरी आँखें बदलने लगी हैं। मैं देख रहा हूँ। इक्कीसवीं रात को इंतज़ार करूँगा।"
सलीम ने अपनी रिवॉल्वर निकाली। मीरा ने पोटली को सीने से लगाया। और विक्रम ने, बिना कुछ कहे, अपनी दाहिनी आँख के कोने को छुआ, जहाँ वह एम्बर धब्बा था, और उसने महसूस किया कि वह धब्बा कल से बड़ा हो गया था।
उस रात, पहली बार, विक्रम ने सोचा कि शायद यह लड़ाई उस और भैरव नाथ के बीच नहीं थी। शायद यह लड़ाई उसके अंदर चल रही थी, और भैरव नाथ बस बाहर खड़ा इंतज़ार कर रहा था, उस दिन का, जब विक्रम अंदर से बदल जाएगा।
और उसे यह बात किसी तरह सबसे ज़्यादा डरावनी लगी।