PretikaYakshini Storiesयक्षिणी: कदंब का श्राप

भाग 14: मीरा का ख़ात

Piyashi Atma · Yakshini Stories · 18 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
यक्षिणी: कदंब का श्राप
Chapter
14 of 14
Category
Yakshini Stories
Reading time
18 min
Words
3539
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात विक्रम ने मीरा से पूछा, "दाई-लिपि तूने कहाँ सीखी थी?"

वे आंगन में बैठे थे। खाना ख़त्म हो चुका था। सलीम अंदर पोथी के पन्नों की तस्वीरें खींच रहा था, अपने फ़ोन से, हर पन्ने की, धीरे-धीरे, जैसे कोई सबूत सँभालता है।

"परदादी से," मीरा ने कहा। "मैंने कहा था ना।"

"तूने कहा था, बही-खाते थे उनके पास।" विक्रम ने कहा। "तूने यह नहीं बताया कि उन बही-खातों में क्या था।"

मीरा ने अपनी थाली उठाई और रसोई की तरफ़ जाने लगी। "मैं थक गई हूँ, विक्रम। कल बात करेंगे।"

"तीसरा झूठ," विक्रम ने कहा।

मीरा रुक गई। उसकी पीठ उसकी तरफ़ थी, और उसकी पीठ पर उसकी साँसें चल रही थीं, धीमी, गिनी हुईं।

"मैं गिन रहा हूँ," विक्रम ने कहा। "पहला, तहख़ाने में, जब तूने कहा कुछ नहीं पहचाना। दूसरा, जब तूने कहा परदादी की कहानियों से। अब तीसरा, कल बात करेंगे। मीरा, इस घर में हर कोई छिपाता है। मैंने कल तक इसे इस घर की बीमारी समझा। अब मुझे लग रहा है कि यह इस कहानी की बीमारी है, और तू इस कहानी में किसी और तरफ़ से आई है।"

मीरा ने थाली रखी। उसने मुड़कर उसे देखा, और उसकी आँखों में वह चीज़ थी जो किसी के पकड़े जाने पर होती है, पर उसके साथ कुछ और भी था। राहत। जैसे उसे पकड़ा जाना ही चाहिए था, बहुत पहले।

"रात में निकलना," उसने कहा। "जब गाँव सो जाए। मैं तुझे कुछ दिखाऊँगी। उसके बाद तू जो पूछेगा, मैं बताऊँगी। हर बात। यह वादा है।"

"कहाँ?"

"पुराने श्मशान में।"

विक्रम ने सलीम को साथ नहीं लिया। उसने उसे बताया भी नहीं। यह उसका दूसरा छिपाव था, और उसे पता था, और उसने फिर भी किया। कुछ बातें दो लोगों की होती हैं, और उनमें तीसरे का आना उन्हें बदल देता है।

पुराना श्मशान गाँव के पश्चिम में था, नदी के सूखे किनारे पर, जहाँ अब कोई नहीं जाता था। नया श्मशान दूसरी तरफ़ बन गया था, सालों पहले। पुराने को छोड़ दिया गया था, जैसे किसी बूढ़े को, जिसकी यादें बोझ हो गई हों।

मीरा वहाँ पहले से थी। उसने एक चीटी के सामने बैठकर एक दीया जलाया था, एक सूखी, पुरानी चीटी, जिस पर नाम नहीं था, और उसके सामने उसने अपनी पोटली रखी थी, खोली हुई।

विक्रम ने दूर से देखा। उसने देखा कि मीरा ने दीये के सामने अपनी थाली से कुछ रखा। चावल के दाने। गुड़ का एक टुकड़ा। और फिर उसने अपने हाथ जोड़े, और उसने कहा, धीमी आवाज़ में, पर श्मशान में आवाज़ें दूर तक जाती हैं:

"दादी माँ। रिपोर्ट देने आई हूँ।"

विक्रम की साँस रुक गई।

"उसने साधना शुरू कर दी है," मीरा ने कहा, उसी ढंग से जैसे कोई किसी जीवित से बात करता है, शांत, साफ़। "सातवीं रात पूरी हुई। उसकी आँखों में धब्बा आ गया है, दादी माँ। तुम्हारी कही बात सच हो रही है। पर एक बात और सच हो रही है, जिसका तुमने हिसाब नहीं किया था। उसकी आँखों के धब्बे के साथ, उसका दिल भी बदल रहा है। वह उससे लड़ नहीं रहा। वह उसे समझने लगा है। और मैं..."

उसकी आवाज़ रुकी। बहुत देर तक रुकी।

"और मैं कर नहीं पाऊँगी, दादी माँ," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वह काँपी जो विक्रम ने उसमें कभी नहीं सुनी थी। "मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हारी सिखाई हुई हूँ, मैं जानती हूँ कि क्या करना है, पर मैं कर नहीं पाऊँगी। क्योंकि वह अलग है। तुम्हें देखना चाहिए था। जिस रात उसने मुझे पेड़ से उठाकर लाया था, उसकी आँखों में डर नहीं था। दया थी। इस खानदान में दया नहीं होती, दादी माँ। तुमने ख़ुद कहा था। पर इसमें है। और मैं उस चीज़ को नहीं मार सकती जिसमें दया है।"

विक्रम ने अपना कदम आगे रखा। सूखी टहनी उसके पैर तले टूटी।

मीरा मुड़ी। उसके चेहरे पर डर नहीं था। बस थकान थी, और वह अजीब राहत, फिर से।

"तू आ गया," उसने कहा। "अच्छा किया। मुझे तुझसे झूठ बोलने की आदत नहीं थी, विक्रम। तीन झूठ, तीन दिन में। मैं ज़्यादा नहीं बोल सकती थी।"

"कौन है यह?" विक्रम ने चीटी की तरफ़ देखा। "किसकी चीटी है?"

"मेरी परदादी की।" मीरा ने कहा। "मैंने उन्हें यहाँ दफ़न होते नहीं देखा। मैं तब शहर में थी। पर मुझे पता है कि वे यहीं हैं। उन्होंने कहा था, मुझे उसी जगह रखना, जहाँ मेरी गंगा दाई है। उनकी परदादी। जिन्होंने उस बच्ची को आग से निकाला था।"

विक्रम ने उसे देखा। "तू जानती थी।"

"मैं जानती थी," मीरा ने कहा। "शुरू से।"

"मेरी बहन के बारे में भी?"

मीरा ने अपनी आँखें झुकाईं। "हाँ।"

"और तूने नहीं बताया।"

"नहीं।"

"क्यों?"

मीरा ने अपनी पोटली उठाई। उसने उसे खोला, और उसमें से चीज़ें निकालीं, एक-एक करके, और उन्हें चीटी के पास रखा, दीये की रोशनी में। लोहे की अंगूठी। राख की शीशी। सूखा कदंब का फूल। और फिर, सबसे नीचे से, एक मुड़ा हुआ कागज़, पुराना, पीला, चारों तरफ़ से सिलवटों वाला, जैसे उसे बार-बार खोला और मोड़ा गया हो।

उसने उसे विक्रम को नहीं दिया। उसने उसे अपने हाथ में रखा, और उसने कहा:

"मेरा परिवार दाई-घर है, विक्रम। गंगा दाई की नस्ल। उन्होंने उस रात सिर्फ़ एक बच्ची को आग से नहीं निकाला था। उन्होंने एक ज़िम्मेदारी भी उठाई थी। उनके बाद उनकी बेटी ने। उसके बाद उसकी बेटी ने। हम सात पीढ़ियों से इस गाँव की रखवाली कर रहे हैं। बाहर से। चुपचाप। हम जानते हैं कि पेड़ में क्या है। हम जानते हैं कि बंधन क्या है। और हम जानते हैं कि बंधन का सबसे खतरनाक वक़्त क्या है।"

"कौन सा?"

"वह वक़्त जब कोई वंशज साधना पूरी करने वाला होता है।" मीरा ने कहा। "क्योंकि पूरी साधना का मतलब है यक्षिणी का पूरी तरह बँधना। और पूरी तरह बँधी यक्षिणी का मतलब है भैरव नाथ का जीतना। दाई-घर की शपथ है, विक्रम। सात पीढ़ियों की शपथ। कि अगर कभी कोई वंशज साधना शुरू करे, तो उसे पूरी होने से पहले रोका जाएगा। किसी भी कीमत पर।"

विक्रम ने उस कागज़ को देखा, उसके हाथ में। "और अगर रोका न जा सके?"

मीरा ने कागज़ खोला। उसने उसे दीये की रोशनी में फैलाया, और उसने उसे विक्रम की तरफ़ घुमाया।

विक्रम ने पढ़ा। वह पुरानी लिखावट थी, कैठी लिपि में, पर नाम देवनागरी में लिखे थे, साफ़। सबसे ऊपर एक तारीख़ थी। उन्नीस सौ चौरानबे।

और फिर, एक पंक्ति:

"रघुवीर सिंह, शिवगढ़ हवेली, ने साधना शुरू की है। दाई-घर की शपथ के अनुसार, यह चिठ्ठी जारी की जाती है।"

और उसके नीचे, नियम लिखे थे, छोटे, घने, और विक्रम ने उन्हें पढ़ा, और उसका खून ठंडा हो गया:

"यदि साधना इक्कीसवीं रात तक पहुँचे, तो वंशज को मार डाला जाएगा। यह हत्या नहीं है। यह शपथ-पालन है। जो दाई-घर का सदस्य यह करेगा, वह स्वयं अपनी जान देगा, क्योंकि वंशज का खून दाई-घर के हाथ लगेगा, और दाई-घर का हाथ कभी खून से भरा नहीं रहना चाहिए। एक मरेगा, ताकि बंधन अधूरा रहे। दो मरेंगे, ताकि यक्षिणी कभी किसी की दासी न बने।"

पत्र के सबसे नीचे, उन्नीस सौ चौरानबे की तारीख़ के सामने, एक नाम था, जिसे काटकर उसके ऊपर लिखा गया था। पहला नाम: रघुवीर सिंह। काटा हुआ।

और उसके ऊपर, ताज़ी स्याही में, नीली स्याही, किसी पेन की, जो किसी ने हाल ही में लिखी थी:

"विक्रम सिंह।"

"मेरे पिता के लिए भी यही चिठ्ठी थी," विक्रम ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत शांत थी। उसे अपनी आवाज़ पर खुद हैरानी हुई।

"उन्नीस सौ चौरानबे में जारी हुई।" मीरा ने कहा। "मेरी परदादी के नाम। उन्होंने नहीं की। तेरे पिता ने साधना अधूरी छोड़ी, उन्होंने रुकने का फ़ैसला किया, और चिठ्ठी वापस दराज में चली गई। तीस साल तक। और फिर, दो महीने पहले, मेरे पास एक पार्सल आया। मेरी परदादी की मृत्यु के बाद उनकी चीज़ें मुझे मिलीं। इसमें उनका बही-खाता था, और यह चिठ्ठी, और एक पर्ची, जिस पर लिखा था: शिवगढ़ से ख़बर है। रघुवीर सिंह मर गया है। उसका बेटा आ रहा है। तैयार रहना।"

"तो तू मुझे मारने आई थी," विक्रम ने कहा।

"मैं तुझे रोकने आई थी," मीरा ने कहा। "मारने की बात आखिरी है, विक्रम। पहले रोका जाता है। मैंने सोचा, मैं तुझे समझा दूँगी। मैं तुझे कहानी बता दूँगी। तू समझ जाएगा, तू भाग जाएगा, तू कभी नहीं माँगेगा। पर तूने पहली ही रात माँग लिया। पहली ही रात। मैं उस दिन तक पहुँची नहीं थी कि तू पेड़ के नीचे क्या कर चुका था।"

"और अब?"

"और अब सातवीं रात बीत चुकी है।" मीरा ने कहा। "चौदह रातें बची हैं। और चिठ्ठी में लिखा है, इक्कीसवीं रात से पहले।"

विक्रम ने उसे देखा। उसने अपने दोस्त को देखा, उस औरत को जिसने उसे पेड़ से उठवाया था, जिसने उसके लिए खाना बनाया था, जिसने उसके घर में भोग रखा था, और उसने सोचा कि वह इस वक़्त क्या महसूस कर रहा है। डर? नहीं। गुस्सा? नहीं। उसे बस एक सवाल आ रहा था, एक ही, और उसने वही पूछा:

"तूने मुझे अभी तक क्यों नहीं मारा? मीरा, तेरे पास कई मौके थे। तू मेरे खाने में कुछ मिला सकती थी। तू मुझे सोते में मार सकती थी। क्यों नहीं मारा?"

मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में आँसू थे, और उसने कहा, बहुत धीरे से:

"क्योंकि मैंने तुझे पहली बार देखा, उसी दिन, जिस दिन तू गाँव आया था, और तूने अपने पिता की अर्थी के सामने खड़े होकर अपनी आँखें नहीं झुकाई थीं। तू उस गाँव में अकेला आदमी था जो डरा नहीं था। और मैंने सोचा, शायद यह वही है। शायद यह वही है जो इस कहानी को ख़त्म करेगा, मरकर नहीं, जीकर। और मैंने उस दिन अपनी परदादी की शपथ से अपना मुंह मोड़ लिया, विक्रम। मैं सात पीढ़ियों में पहली हूँ जिसने शपथ तोड़ी है।"

"और इसकी कीमत?"

मीरा ने चिठ्ठी के आखिरी पन्ने की तरफ़ देखा। उसने उसे पलटा। पीछे, उसी नीली स्याही में, एक और पंक्ति थी, जो मीरा ने खुद नहीं लिखी थी, जो उसी पुरानी कैठी लिपि में थी, उसी पुराने हाथ में:

"जो शपथ तोड़े, वह वंशज के साथ जाए। दाई-घर अपना हिसाब खुद लेता है।"

"मतलब," विक्रम ने कहा।

"मतलब यह कि अब मेरे पीछे भी कोई आएगा।" मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वह थकान नहीं थी। अब उसमें वह शांति थी जो उन लोगों की होती है जिन्होंने अपनी तारीख़ मान ली हो। "दाई-घर बड़ा है, विक्रम। मैं अकेली नहीं हूँ। मेरे चाचा हैं, मेरे भाई हैं, मेरे रिश्तेदार हैं, जो यही शपथ लिए हुए हैं। मेरी परदादी मर गईं, पर उनकी रिपोर्ट सिर्फ़ मुझ तक नहीं आती थी। वे हर महीने एक खत लिखती थीं, एक पते पर, जिसे मैं नहीं जानती। अब मैंने दो महीने से कोई रिपोर्ट नहीं भेजी। वे समझ गए होंगे।"

"कितना वक़्त है?"

"मुझे नहीं पता।" मीरा ने कहा। "हफ़्ता। दस दिन। शायद कल।"

विक्रम ने उसका हाथ पकड़ा। "तो मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगा।"

"तू मुझे कैसे बचाएगा?" मीरा ने कहा, और उसने हँसने की कोशिश की, पर वह हँसी नहीं थी। "तू ख़ुद नहीं बच पा रहा, विक्रम। तेरे पीछे तांत्रिक है, तेरे अंदर यक्षिणी उतर रही है, तेरे गाँव में मौतें हो रही हैं, और अब मेरे पीछे मेरा अपना घर है। हम दोनों की तारीख़ें लिखी जा चुकी हैं। तेरी पोथी में। मेरी इस चिठ्ठी में।"

"तारीख़ें कागज़ में लिखी जाती हैं," विक्रम ने कहा। "और कागज़ जलता है।"

मीरा ने उसे देखा। और फिर, पहली बार, उस श्मशान में, उस दीये की रोशनी में, उसने सच में हँसा। एक छोटी सी, टूटी हुई, सच्ची हँसी।

"तू बिल्कुल अपनी माँ पर गया है," उसने कहा।

"तू उन्हें जानती थी?"

"मेरी परदादी जानती थीं।" मीरा ने कहा। "सुधा जी उनसे मिली थीं। अपने मरने से पहले। उन्होंने मेरी परदादी को कुछ दिया था, सँभालने के लिए। मुझे नहीं पता क्या। परदादी ने कभी नहीं बताया। उन्होंने बस कहा था, यह उस वक़्त खोलना, जब सुधा का बेटा खुद पूछे।"

विक्रम ने आगे झुककर कहा, "मैं पूछ रहा हूँ।"

"मुझे पता है," मीरा ने कहा। "पर वह चीज़ मेरे पास नहीं है। वह मेरे घर है, शहर में, मेरी परदादी के बही-खाते के साथ। और अब मैं शहर नहीं जा सकती। मेरा घर अब मेरे लिए सबसे खतरनाक जगह है।"

और तब, श्मशान के अंधेरे में, कहीं से, एक ताली बजी। एक। फिर दूसरी। फिर तीसरी। धीमी, तौलती हुई, किसी की तालियाँ, जो किसी अच्छे नाच पर बजाई जाती हैं।

तीनों ओर अंधेरा था। दीये की लौ सीधी जल रही थी, बिना हवा के। और अंधेरे में से, भैरव नाथ की आवाज़ आई, शांत, संतुष्ट, जैसे कोई दर्शक अपनी सीट से बोल रहा हो:

"बहुत सुंदर। सच्चाई की मेहफ़िल। मुझे अच्छा लगा।"

विक्रम और मीरा खड़े हो गए। अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था, पर आवाज़ आ रही थी, हर तरफ़ से, या शायद किसी एक तरफ़ से, जिसे पहचानना मुश्किल था।

"बच्ची," भैरव नाथ की आवाज़ ने कहा, और अब उसमें वह मीठापन था जो सबसे खतरनाक था। "तूने ठीक किया। उसे अपने पास रख। उसे अपने दिल में रख। प्यार में रखे हुए आदमी का खून सबसे ज़्यादा स्वेच्छा से बहता है। मुझे ऐसे ही चाहिए। स्वेच्छा से।"

और फिर खामोशी। और दीये की लौ काँपी, और तब उन्हें एहसास हुआ कि हवा चल रही थी, शायद पहले से ही, और शायद वह आवाज़ हवा में ही थी, या शायद कहीं और, किसी और कान में, बहुत दूर।

मीरा ने दीये को देखा। उसकी लौ अब सीधी नहीं थी। वह पश्चिम की तरफ़ झुकी हुई थी, जमी हुई, जैसे कोई उसे अभी भी देख रहा हो।

"वह सुन रहा था," विक्रम ने कहा। "सब कुछ।"

"नहीं," मीरा ने धीरे से कहा। "वह सुन नहीं रहा था। वह हमें बता रहा था कि वह सुन सकता है। फ़र्क़ समझ। वह हमें अपनी ताक़त दिखा रहा है। वह कह रहा है कि तुम्हारी कोई बात उससे छिपी नहीं है। कि तुम्हारा प्यार, तुम्हारी शपथें, तुम्हारे राज़, सब उसके खेल के पत्ते हैं।"

विक्रम ने अपनी आँखों को छुआ। धब्बा अब उसे दिखता था, बिना आईने के, अपनी नज़र के कोने में, एक सुनहरी परत, जैसे दुनिया के किनारों पर अब सोने का पानी लगा हो।

"तो अब हम उसके खेल में नहीं खेलेंगे," उसने कहा। "हम अपना खेल बनाएँगे। और उस खेल का पहला नियम मैं बनाता हूँ। अब से, हम दोनों के बीच कोई झूठ नहीं। कोई छिपाव नहीं। मैं अपनी आँख का धब्बा बताऊँगा। तू अपनी परदादी की हर चीज़ बताएगी। साफ़।"

मीरा ने उसका हाथ पकड़ा। "साफ़," उसने कहा।

हवेली लौटते हुए, रास्ते में, उसने आखिरी बात कही, धीरे से, जैसे किसी घाव को खोलते हुए:

"विक्रम। उस चिठ्ठी में एक बात और लिखी है। आखिरी पंक्ति में। मैंने तुझे वह नहीं दिखाई थी।"

"क्या?"

"लिखा है, वंशज एक नहीं है। दो हैं। दोनों को रोको। और अगर दोनों कभी एक साथ मिल जाएँ, तो किसी एक को तुरंत मारो, क्योंकि दो खून एक साथ मिलकर वह कर सकते हैं जो एक कभी नहीं कर सकता।"

"वह क्या?"

मीरा ने उसे देखा, और उसकी आँखों में अब वह सब कुछ था, डर, थकान, और वह पुरानी ज़िम्मेदारी।

"लिखा नहीं है," उसने कहा। "मेरी परदादी ने वह पंक्ति ऐसे छोड़ी है जैसे वे खुद नहीं जानती थीं। या जैसे वे जानती थीं, और लिखने से डरती थीं।"

और उस रात, पहली बार, दोनों ने एक-दूसरे को सब कुछ बताया।

सुबह, जब सलीम जागा, तो दोनों आंगन में बैठे उसका इंतज़ार कर रहे थे। विक्रम ने उसे सब बताया। चिठ्ठी। दाई-घर। शपथ। बहन। सब कुछ, क्योंकि अब छिपाने का कोई मतलब नहीं था, और विक्रम ने अपना नियम बना लिया था। साफ़। हर बात।

सलीम ने सुना। उसने बीच में कुछ नहीं पूछा। जब विक्रम ने ख़त्म किया, तो उसने बहुत देर तक अपने हाथों को देखा, और फिर उसने कहा:

"तो इस कहानी में तीन तरफ़ से मौत आ रही है। तांत्रिक, जो तुझे इक्कीसवीं रात तक ज़िंदा चाहता है, पर उसके बाद नहीं। दाई-घर, जो तुझे इक्कीसवीं रात से पहले मरता चाहता है। और पोथी, जिसमें तेरी तारीख़ पहले से लिखी है।" उसने अपनी उंगलियाँ गिनीं। "और हम तीन हैं। एक बदलता हुआ, एक शपथ-तोड़, एक पुलिसवाला जो अब तक एक भी गोली नहीं चला सका।"

"तू चला जा सकता है," विक्रम ने कहा।

"मैं यह बात तीसरी बार सुन रहा हूँ," सलीम ने कहा। "और मैं तीसरी बार वही जवाब दे रहा हूँ। नहीं। अब यह बात बंद कर।" उसने अपना फ़ोन उठाया। "मैं एक काम कर सकता हूँ। मैं दिल्ली में अपने एक साथी से बात करूँगा, जो मानविकी विभाग के रिकॉर्ड देखता है। तेरी बहन के बारे में। अनाथालय के रिकॉर्ड। उन्नीस सौ छियानबे के आसपास जो लड़कियाँ अनाथालयों में छोड़ी गईं, उनकी सूची निकलवा सकता हूँ। धीमा काम है, पर असली काम है।"

"कर," विक्रम ने कहा।

"और मैं अपना बही-खाता लाऊँगी," मीरा ने कहा। "परदादी वाला। वह शहर में है, मेरे कमरे में, बिस्तर के नीचे के ट्रंक में। मैं खुद नहीं जा सकती। पर किसी को भेज सकती हूँ।"

"किसे?" सलीम ने पूछा। "जिस पर भरोसा हो?"

मीरा ने सोचा। "मेरी चाची हैं। वे इस शपथ में नहीं हैं। वे बस जानती हैं कि मैं अजीब काम करती हूँ। मैं उन्हें कहूँगी कि मेरा ट्रंक कुरियर कर दें।"

"पता तो शिवगढ़ का होगा," विक्रम ने कहा। "जो पता देगी, उस पर नज़र होगी।"

"नहीं। मैं उन्हें दूसरा पता दूँगी। आसपास के कस्बे का। और वहाँ से खुद लाऊँगी।"

यह तय हुआ। सलीम ने अपने साथी को फ़ोन किया। मीरा ने अपनी चाची को संदेश लिखा। और विक्रम ने उस दिन पहली बार महसूस किया कि वह अकेला नहीं लड़ रहा। यह एक छोटी सी, कमज़ोर, टूटी-फूटी सेना थी, पर सेना थी।

दोपहर को, जब सलीम सो गया, मीरा ने विक्रम को अपनी परदादी के बारे में बताया। वे हवेली की छत पर बैठे थे, और नीचे गाँव अपनी दोपहर की नींद में था।

"उन्होंने मुझे सात साल की उम्र से सिखाना शुरू किया," मीरा ने कहा। "दाई-लिपि। राख बनाना। नाड़ी देखना। मुझे लगता था यह सब दादी-नानी की पुरानी बातें हैं। मैं इतिहास पढ़ने गई, विक्रम। मैंने सोचा, मैं इन कहानियों को किताबों में ढूँढूँगी, पढ़ूँगी, लिखूँगी, और उन्हें किताबों में ही रहने दूँगी। मुझे लगता था कि कहानियों को पढ़ने से वे तुम्हें नहीं पकड़तीं।"

"पर पकड़ लेती हैं।"

"पकड़ लेती हैं।" मीरा ने अपनी उंगलियों को देखा। "परदादी ने मुझे एक बार कहा था, जब मैं सोलह साल की थी और मैंने उनसे कहा था कि मुझे यह सब नहीं करना। उन्होंने कहा था, बेटा, शपथ वह चीज़ है जो तुझे नहीं चुनती। तू उसे चुनती है। पर जब तू उसे चुन लेती है, तो वह तुझे कभी नहीं छोड़ती। मैंने उस दिन चुना था। मैंने उन्हें कहा था, ठीक है, मैं करूँगी। क्योंकि मुझे उनसे प्यार था। और अब मैं उसी शपथ को तोड़ रही हूँ, और मुझे लगता है कि मैं सही कर रही हूँ, और यह दोनों बातें एक साथ सच हैं, और इससे मेरा सीना फटता है।"

विक्रम ने उसका हाथ पकड़ा। "मेरी माँ ने भी चुना था," उसने कहा। "और उसने भी अपनी शपथ... अपने घर की रीतियों को तोड़ा था। शायद हम दोनों ऐसे लोगों की नस्ल हैं जो तोड़ते हैं।"

"शायद," मीरा ने कहा। "या शायद हम वे हैं जो जोड़ते हैं।"

उस शाम, पेड़ के नीचे जाने से पहले, विक्रम ने मीरा से एक आखिरी सवाल पूछा। "परदादी ने कहा था, सुधा जी ने उन्हें कुछ दिया था। कब दिया था?"

"उन्नीस सौ छियानबे में। तेरे जन्म से कुछ दिन पहले।"

"तो माँ को पता था," विक्रम ने धीरे से कहा। "माँ को पता था कि वह मरने वाली है। उसने पहले से तैयारी की थी। उसने पत्र लिखा। उसने तुम्हारे घर को कुछ सौंपा। उसने अपनी बेटी को दाई-घर को दिया। विक्रम ने सोचा, और उसकी साँसें गहरी हो गईं। माँ ने मरने से पहले अपनी सारी चीज़ें बाँट दी थीं। जैसे कोई अपना घर सजाता है, जाने से पहले।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। कुछ बातें इतनी भारी होती हैं कि उन पर कुछ कहना उन्हें हल्का कर देता है।

पर अगली सुबह, एक चीज़ हुई जिसने सब बदल दिया।

मीरा की चाची का फ़ोन आया। मीरा ने उठाया, और विक्रम ने देखा कि उसका चेहरा, धीरे-धीरे, सफ़ेद पड़ गया। उसने फ़ोन रखा, और उसने कहा:

"ट्रंक नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"मेरी चाची कह रही हैं कि ट्रंक कमरे में नहीं है। तीन दिन पहले कोई आया था। एक औरत। मेरे नाम से। उसने कहा कि मीरा ने भेजा है, और उसके पास मेरी चाबी थी, और मेरा कॉलेज का कार्ड था, और उसने ट्रंक ले गई।" मीरा की आवाज़ काँप रही थी। "विक्रम, मैंने किसी को नहीं भेजा। मैंने तीन दिन पहले किसी को नहीं भेजा।"

तीन दिन पहले। उसी दिन, जिस दिन उन्होंने अखाड़े में घुसकर ट्रंक खोला था। उसी दिन, जिस दिन भैरव नाथ गाँव से बाहर गया था। पश्चिमी रास्ते से।

"उसने हमें अखाड़े में जाने दिया," विक्रम ने धीरे से कहा। "उसे पता था कि हम वहाँ जाएँगे। और जब हम उसका अखाड़ा खंगाल रहे थे, वह तेरा कमरा खंगाल रहा था।"

"बही-खाता उसके पास है," मीरा ने कहा। "परदादी का बही-खाता। जिसमें सब है। दाई-घर की सात पीढ़ियों की सारी जानकारी। सुधा जी की दी हुई चीज़। और..." उसने अपनी साँस रोकी। "और तेरी बहन का पता, विक्रम। बही-खाते में सबसे आखिरी पन्ने पर मेरी परदादी ने लिखा था कि उसे कहाँ रखा गया था।"

और अब, पहली बार, घड़ी दोनों तरफ़ चल रही थी। विक्रम अपनी बहन को ढूँढ रहा था। पर भैरव नाथ उसे पहले से ढूँढ रहा था। और उसके पास वह किताब थी जिसमें उसका पता लिखा था।

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