PretikaVillage Horrorरजिस्टर

रजिस्टर

Pretika · Village Horror · 10 मिनट

Writer
Pretika
Story
रजिस्टर
Chapter
Single story
Category
Village Horror
Reading time
10 min
Words
1985
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

2019 में मेरी नौकरी लगी — सहायक अध्यापिका, मतलब सरकारी प्राइमरी स्कूल की teacher। मैं रांची में पली-बढ़ी हूँ और मैंने ज़िंदगी में कभी गाँव नहीं देखा था।

मेरी posting लातेहार ज़िले के एक टोले में हुई। टोला मतलब बहुत छोटी बस्ती जो किसी बड़े गाँव का हिस्सा होती है। नाम था चिरई टोला। block headquarters से चालीस किलोमीटर, जिसमें आख़िरी बारह किलोमीटर कच्चा रास्ता था जिस पर बरसात में कुछ नहीं चलता था। बिजली दिन में तीन-चार घंटे। network सिर्फ़ एक जगह आता था, स्कूल के पीछे वाले पीपल के पेड़ के नीचे, वो भी एक line.

स्कूल एक कमरे का था। एक कमरा, एक बरामदा, और पीछे एक छोटा कमरा जिसमें मैं रहती थी। कुल सत्ताईस बच्चे, पहली से पाँचवीं तक, सब एक साथ। और teacher सिर्फ़ मैं।

अब मैं आपको वो बताती हूँ जो मुझे पहले महीने में ही अजीब लगा था, लेकिन जिसका मतलब मुझे दो साल बाद समझ आया।

चिरई टोला बहुत ख़ुशहाल जगह थी।

मैं जानती हूँ ये सुनने में डरावना नहीं लगता। लेकिन आप उस इलाक़े को जानते होते तो आपको भी अजीब लगता।

लातेहार में हर साल कोई न कोई बच्चा दस्त से चला जाता है। हर साल कोई न कोई साँप के काटने से जाता है। हर साल कोई फ़सल मार खाती है, कोई कुएँ में गिरता है, कोई बाइक से गिरता है, किसी को TB हो जाती है।

चिरई टोला में नहीं।

मैंने वहाँ दो साल गुज़ारे और उन दो सालों में उस टोले में एक भी बेवक़्त मौत नहीं हुई। बुज़ुर्ग गए — अस्सी साल के, पचासी साल के, अपने बिस्तर पर, अपने बच्चों के बीच। बाक़ी कोई नहीं।

और वहाँ के लोगों को इस पर घमंड था। मुखिया जी — मतलब गाँव के मुखिया — पहली मुलाक़ात में ही मुझसे बोले थे, बिल्कुल सीना तानकर — "मैडम, हमारे यहाँ किसी की बेवक़्त मौत नहीं होती। ऊपर वाले की कृपा है।"

अब दूसरी बात।

टोले के आख़िरी छोर पर, बाक़ी घरों से दो सौ मीटर दूर, एक अकेला मिट्टी का घर था और उसमें एक बूढ़ी औरत रहती थी। नाम — बुधनी देवी। उम्र क़रीब पचपन-साठ।

और पूरा टोला उसे डायन कहता था।

कोई उसके घर के सामने से नहीं गुज़रता था। बच्चों को साफ़ मना था। दुकानदार सामान देते वक़्त पैसे ज़मीन पर रखवाता था, हाथ से नहीं लेता था। शादी-ब्याह में उसे नहीं बुलाया जाता था। और उसका कोई नहीं था — न पति, न बच्चे, न भाई, न कोई रिश्तेदार।

मैं रांची से आई थी, मैं पढ़ी-लिखी थी, और मुझे ये सब बकवास लगा। तो मैंने वो किया जो शायद मुझे नहीं करना चाहिए था।

मैं उसके घर चली गई।

और बुधनी दादी दुनिया की सबसे शांत औरत थीं। उन्होंने मुझे चटाई दी, महुए की चाय पिलाई, और मुझसे कहा — "बिटिया, तुम यहाँ मत आया करो, तुम्हारा भी नाम ख़राब हो जाएगा।"

मैं फिर भी जाती रही। हफ़्ते में एक-दो बार। दो साल तक।

अब असली बात।

दूसरे साल के शुरू में मुझे स्कूल की पुरानी अलमारी साफ़ करनी पड़ी क्योंकि block से inspection आना था।

उस अलमारी में मुझे नौ transfer certificate मिले।

Transfer certificate मतलब वो कागज़ जो तब बनता है जब कोई बच्चा एक स्कूल छोड़कर दूसरे स्कूल जाता है।

नौ। नौ साल में नौ। हर साल ठीक एक।

और मुझे ये इसलिए अजीब लगा क्योंकि चिरई टोला से लोग कहीं जाते ही नहीं थे। न कोई मज़दूरी के लिए बाहर जाता था, न कोई शहर shift करता था, न किसी की शादी बाहर होती थी। पूरे टोले में सत्ताईस बच्चे थे, और उनके माँ-बाप भी वहीं पैदा हुए थे।

तो हर साल एक बच्चा जाता कहाँ था?

मैंने block office में फ़ोन किया। मैंने वो नौ नाम पढ़कर सुनाए। clerk ने आधे घंटे बाद वापस call किया और कहा — "मैडम, इनमें से किसी का भी दाख़िला ज़िले के किसी स्कूल में नहीं हुआ है। ये सारे बच्चे record में कहीं नहीं हैं।"

और उसी अलमारी में, सबसे नीचे वाले खाने में, एक दूसरा रजिस्टर भी था।

कपड़े की जिल्द वाला। बहुत पुराना। इतना पुराना कि उसके किनारे भुरभुरे हो चुके थे।

और उसमें बच्चों के नाम नहीं थे।

उसमें पूरे नाम थे। नाम, पिता का नाम, उम्र। सैकड़ों। और उनमें से बहुत सारों पर काट का निशान लगा हुआ था।

और वो सारी entries एक ही आदमी की लिखावट में नहीं थीं। हर कुछ पन्नों के बाद लिखावट बदल जाती थी। जैसे हर पीढ़ी में कोई नया आदमी उसे लिखने बैठता हो।

सबसे नई entry सबसे नीचे थी, नीली स्याही में, और वो मुश्किल से एक साल पुरानी लगती थी।

मैंने वो रजिस्टर वापस रख दिया और मैंने किसी से कुछ नहीं कहा।

अब मैं सीधे उस रात पर आती हूँ।

नवंबर की एक शाम मुखिया जी स्कूल आए और उन्होंने मुझसे चाबी माँगी। उन्होंने कहा कि रात में एक "पूजा" है और स्कूल के बरामदे में बैठना है।

और उस रात वहाँ झगरू भगत आया।

भगत मतलब वो आदमी जो झाड़-फूँक करता है, जो बताता है कि गाँव पर क्या आया है और क्या करना है। झगरू भगत तीन गाँव छोड़कर रहता था और उसकी बहुत इज़्ज़त थी।

मैं अपने कमरे में थी और मैंने दरवाज़े की दरार से देखा।

कोई नाच नहीं हुआ। कोई ढोल नहीं बजा। कोई चीख़-पुकार नहीं हुई।

झगरू भगत बरामदे में बैठा, उसने एक दीया जलाया, वो लगभग बीस मिनट तक चुपचाप बैठा रहा, और फिर उसने मुखिया जी की तरफ़ देखा और एक नाम बोला।

और मुखिया जी ने वो रजिस्टर खोला और वो नाम लिख दिया।

बस इतना। पूरी "पूजा" यही थी। पंद्रह मिनट में सब ख़त्म। लोग उठे और अपने घर चले गए, जैसे कोई सरकारी मीटिंग ख़त्म हुई हो।

अगली सुबह मैंने वो रजिस्टर खोला।

सबसे नीचे नया नाम लिखा था।

गुड़िया कुमारी। पिता — सुखराम उराँव। उम्र — नौ वर्ष।

गुड़िया मेरी class 4 में थी। वो मेरी सबसे तेज़ बच्ची थी। वो मेरे कमरे में आकर मेरे बाल बनाती थी और मुझसे रांची के बारे में पूछती थी और वो कहती थी कि वो बड़ी होकर teacher बनेगी।

मैं उसी दिन बुधनी दादी के पास गई।

और मैंने सोचा था वो डरेंगी, या चौंकेंगी, या कहेंगी कि ये सब झूठ है।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस चूल्हे पर चाय चढ़ा दी और मेरे बैठने का इंतज़ार किया।

और फिर उन्होंने मुझे वो बताया जो मैं आपको बता रही हूँ।

बहुत साल पहले — कितने साल, ये किसी को नहीं पता, और बुधनी दादी को भी नहीं पता था — इस टोले ने एक इंतज़ाम कर लिया था।

किससे, ये भी किसी को नहीं पता। किसने किया, ये भी नहीं। बुधनी दादी ने कहा कि उनकी दादी को भी नहीं पता था।

बस इंतज़ाम ये था — हर साल एक नाम उस रजिस्टर में लिखा जाएगा।

और जिसका नाम लिखा जाता है, वो एक रात उठकर टाँड़ की तरफ़ चला जाता है — टाँड़ मतलब वो खुला पथरीला मैदान जो स्कूल के पीछे है — और वापस नहीं आता।

बदले में, उस टोले में कोई और नहीं मरता। कोई बुख़ार से नहीं, कोई साँप से नहीं, कोई कुएँ में गिरकर नहीं, कोई भूख से नहीं।

और फिर उन्होंने वो बात बताई जो इस पूरी कहानी की जड़ है।

उन्होंने कहा — "बिटिया, वो रजिस्टर ऊपर से नीचे नहीं चलता। वो नीचे से ऊपर चलता है। जो नाम सबसे बाद में लिखा जाता है, वो सबसे पहले जाता है।"

मैंने पूछा — "और जो पहले लिखे गए वो?"

उन्होंने कहा — "वो इंतज़ार करते हैं।"

मैंने पूछा — "कब तक?"

और उन्होंने चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा — "जब तक उनके नीचे नाम लिखे जाते रहें।"

मुझे उस पल तक समझ नहीं आया था कि वो क्या कह रही हैं।

मैंने पूछा — "दादी, आपको ये सब इतनी अच्छी तरह कैसे पता है?"

और बुधनी दादी ने बहुत आराम से कहा — "क्योंकि मेरा नाम उस रजिस्टर में बयालीस साल से है।"

मैं वहीं जम गई।

उन्होंने कहा — "मैं सत्रह की थी। उस साल मेरा नाम लिखा गया था। और मैं उस रात चली भी गई थी, टाँड़ की तरफ़। और मैं आधे रास्ते में थी जब पीछे से किसी ने एक और नाम लिख दिया।"

मैंने पूछा — "किसने?"

उन्होंने कहा — "एक औरत ने। जो मुझसे बहुत प्यार करती थी। जिसने मुझे ये सब बता दिया था।"

"और वो औरत?"

"वो चली गई थी, बिटिया। उसी रात। मेरी जगह।"

मैं वहाँ बैठी रही और मुझे लगा कि मेरे कान में कुछ बज रहा है।

क्योंकि अब मुझे सब समझ आ गया था।

पूरा टोला बुधनी दादी को डायन कहता है, उनसे दूर रहता है, उन्हें अछूत मानता है — और वजह ये नहीं है कि वो कुछ करती हैं। वजह ये है कि वो बयालीस साल से उस रजिस्टर में हैं और अभी तक ज़िंदा हैं। और गाँव के लोग जानते हैं कि हर साल जो नाम नीचे लिखा जाता है, वो असल में उनके ऊपर का ढक्कन है।

हर साल एक बच्चा जाता है — और बुधनी दादी की बारी टल जाती है।

पूरा टोला उनसे नफ़रत नहीं करता। पूरा टोला उनसे डरता नहीं है।

पूरा टोला उन्हें दोषी मानता है।

और अब सबसे ज़रूरी बात।

बुधनी दादी ने ये सब मुझे मुफ़्त में नहीं बताया था।

क्योंकि गुड़िया का नाम रजिस्टर में सबसे नीचे था — मतलब सबसे पहले उसकी बारी थी — और उसे बचाने का सिर्फ़ एक तरीक़ा था।

उसके नीचे एक और नाम लिखना।

उस रात मैंने स्कूल की अलमारी खोली, वो कपड़े की जिल्द वाला रजिस्टर निकाला, और गुड़िया कुमारी के नाम के ठीक नीचे मैंने लिखा —

शिवानी कुमारी। पिता — रामनरेश सिंह। उम्र — चौबीस वर्ष।

और फिर मैं अपने कमरे में जाकर बैठ गई और मैंने सुबह होने का इंतज़ार किया।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि उस रात क्या हुआ।

कुछ नहीं हुआ।

बिल्कुल कुछ नहीं। कोई आवाज़ नहीं, कोई साया नहीं, कोई ठंडी हवा नहीं। मैं सुबह छह बजे तक जागती रही और फिर मुझे नींद आ गई और आठ बजे बच्चों की आवाज़ से मेरी आँख खुली।

गुड़िया स्कूल आई। हँसती हुई। ज़िंदा।

और उस साल किसी बच्चे का transfer certificate नहीं बना।

दो महीने बाद मेरा transfer हो गया — असली वाला, सरकारी, block के आदेश से। मैं वापस रांची आ गई।

और अगले पाँच साल में मैंने ख़ुद को ये समझा लिया कि वो सब मेरे दिमाग़ का बोझ था। नई नौकरी, अकेलापन, अजीब जगह, और एक बूढ़ी औरत की कहानियाँ।

फिर अक्टूबर 2021 में मेरे रांची वाले पते पर एक लिफ़ाफ़ा आया।

उसमें एक photograph थी।

उस रजिस्टर के एक पन्ने की photo. साफ़, दिन की रोशनी में खींची हुई।

उसमें मेरा नाम था, और मेरे नाम के नीचे दो और नाम लिखे हुए थे।

और लिफ़ाफ़े पर भेजने वाले का कोई पता नहीं था। बस डाकघर की मुहर थी — लातेहार।

अगले साल फिर आया। उसी महीने। इस बार मेरे नीचे भी दो नाम थे, लेकिन उनमें से एक पर काट का निशान लगा हुआ था।

फिर अगले साल। फिर अगले साल।

हर साल वो photo आती है, और हर साल मैं वही करती हूँ — मैं उसे खोलती हूँ, और मैं गिनती हूँ कि मेरे नाम के नीचे कितने नाम बचे हैं।

2023 में मैं एक बार वापस गई थी। मैंने block में कोई काम निकाला और मैं चिरई टोला चली गई।

बुधनी दादी ज़िंदा थीं।

वो अब बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं और उन्हें दिखना कम हो गया था, लेकिन उन्होंने मेरी आवाज़ पहचान ली।

और मैंने उनसे सिर्फ़ एक सवाल पूछा।

मैंने पूछा — "दादी, आपने मुझे ये सब बताया क्यों था?"

और उन्होंने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और कहा —

"क्योंकि किसी को लिखना था, बिटिया।"

"मुझे भी किसी ने यही बताया था। बयालीस साल पहले। और उसने भी मुझसे प्यार किया था, और उसने भी मुझे बचाया था। और तब मुझे भी यही लगा था कि वो मेरे साथ भलाई कर रही है।"

मैंने पूछा — "और अगर मैं किसी को न बताऊँ?"

और बुधनी दादी ने कहा — "तो तुम्हारी बारी आ जाएगी। और उसके बाद जो आएगी, उसे कोई और बता देगा।"

अब आख़िरी बात। और ये मैंने आज तक किसी से नहीं कही, अपने पति से भी नहीं।

इस साल की photo पिछले महीने आई है।

मेरे नाम के नीचे अब सिर्फ़ एक नाम बचा है।

और पिछले महीने ही हमारे स्कूल में एक नई teacher आई है। बाईस साल की। धनबाद से। रांची में अकेली रहती है, hostel में। बहुत बातूनी है, और वो मुझसे बहुत घुलमिल गई है, और वो मेरे साथ lunch करती है और मुझे अपनी माँ की बातें बताती है।

कल उसने मुझसे पूछा कि मैं इतनी चुप क्यों रहती हूँ।

मैंने उसे कुछ नहीं बताया है।

अभी तक नहीं बताया है।

रजिस्टर · सभी भाग →