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भाग 7 — कल्लू की जुबानी
Piyashi Atma · Paranormal · 6 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
- Chapter
- 7 of 7
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1186
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दरगाह शहर के सबसे पुराने हिस्से में थी, और उसकी पीछे वाली सीढ़ियाँ ऐसी थीं जहाँ दोपहर का सूरज भी थका-थका पहुँचता है। आर्यन और गणपत जब वहाँ पहुँचे, तो उन्हें कल्लू ढूँढना नहीं पड़ा — वह वहीं था, सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर, एक फटी हुई रजाई ओढ़े, अपने घुटनों को हिलाते हुए, और अपनी ही दुनिया में वही एक पंक्ति रटते हुए — "मैंने सिर्फ गाड़ी चलाई थी... बच्चा गाड़ी में जिंदा था... मैंने सिर्फ गाड़ी चलाई थी..." उसका चेहरा साठ साल से ज्यादा बूढ़ा दिखता था, पर गणपत ने बताया कि वह महज़ उनतालीस का है — "इस शहर ने उसकी उम्र उससे पहले ही निकाल ली, साहब।" आर्यन उसके पास बैठा। पहले तो कल्लू ने उसकी तरफ देखा भी नहीं, पर जब आर्यन ने धीरे से उसके सामने वह हरे प्लास्टिक के घड़ियाल जैसे खिलौने की बात की — जो रहमत खाँ की मुट्ठी में मिला था — तो कल्लू की हिलती हुई टाँगें अचानक रुक गईं। उसने बहुत धीरे से आर्यन की तरफ मुड़कर देखा, और उसकी आँखों में, तीस साल के पागलपन के पीछे से, एक पल के लिए कोई जागा — "घड़ियाल? ...हरा घड़ियाल? तुम्हें... तुम्हें वह मिला? वह उस बच्चे का था। पूरी गाड़ी में वह उसी को अपनी छाती से लगाए रहा... कह रहा था — 'चाचा, यह मेरा दोस्त है। जब मैं ठीक हो जाऊँगा, यह भी डाक्टर बनेगा।'" और फिर कल्लू रो पड़ा — एक ऐसे आदमी की तरह जो तीस साल से रोने के लिए किसी सुनने वाले का इंतज़ार कर रहा था।
उस दोपहर, दरगाह की सीढ़ियों पर, कल्लू ने वह पूरी कहानी कही, जो इस शहर में किसी अखबार ने, किसी अदालत ने, किसी रिपोर्ट में कभी नहीं छपी। आर्यन ने उसे बीच में नहीं टोका — सिर्फ सुना, और अपने फोन में रिकॉर्ड किया, क्योंकि अब उसे पता था कि सच को जिंदा रखने के लिए उसे दर्ज करना होगा। "उस रात मुझे देर रात बुलाया गया था," कल्लू ने शुरू किया, आँखें कहीं दूर, तीस साल पीछे टिकाए। "डॉ. देशमुख के नर्सिंग होम — 'देशमुख मेमोरियल' — की पीछे वाली गली में। वहाँ से मुझे एक बच्चे को उठाना था और सिविल अस्पताल के शव गृह ले जाना था। मुझे बताया गया कि बच्चे की मौत हो चुकी है। पर जब मैंने स्ट्रेचर उठाया... तो बच्चे ने मेरी कलाई पकड़ ली।" कल्लू की आवाज़ टूट गई। "पकड़ ली, साहब। जिंदा था वह। बेहोश था, बहुत कमजोर था, साँसें रुई जैसी हल्की थीं — पर जिंदा था। उसने मेरी कलाई पकड़कर आँखें खोलीं और बस इतना कहा — 'चाचा... दर्द हो रहा है... बगल में... बहुत दर्द है...' मैं पागल हो गया। मैं भागकर अंदर गया, उन लोगों से कहा — बच्चा जिंदा है, अस्पताल ले चलते हैं, ईलाज करते हैं। तब वहाँ खड़े एक आदमी ने — जिसका नाम मैं आज भी डर से नहीं लेता — मेरी बाँह मरोड़कर मुझे दीवार से लगाया और कहा — 'तेरी नौकरी गाड़ी चलाने की है, सोचने की नहीं। बच्चा मर चुका है। कागज़ों में मर चुका है। और जो कागज़ों में मर जाता है, उसे कोई नहीं बचा सकता।'"
"मैंने गाड़ी चलाई," कल्लू की आवाज़ अब एक लंबी कराह बन गई थी। "मैंने वह गाड़ी चलाई, साहब, जिसमें एक जिंदा बच्चा मरने के लिए लेटा था। पूरे रास्ते वह बच्चा कराहता रहा। पूरे रास्ते मैं सोचता रहा — अगले मोड़ से गाड़ी मोड़ दूँ, किसी और अस्पताल ले जाऊँ, थाने ले जाऊँ, कहीं भी ले जाऊँ। पर मेरे पीछे दूसरी गाड़ी चल रही थी — देशमुख के आदमियों की — और मेरे घर में... मेरे घर में मेरी बीबी और दो बच्चे थे। शेषनगर में उस जमाने में देशमukh की नफरत से बचना मुमकिन नहीं था। मैं गाड़ी शव गृह ले गया। रहमत भाई ने जब बच्चे का चेहरा देखा और वह सिलाई देखी, तो मैंने उनकी आँखों में वही देखा जो मैं खुद महसूस कर रहा था। हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा, और कुछ नहीं कहा। क्या कहते? मैंने उन्हें पैसे दिए — देशमukh की तरफ से — उन्होंने फेंक दिए। और मैं भाग खड़ा हुआ। रात में भागा, अंधेरे में भागा... और कहते हैं उसके तीन दिन बाद रहमत भाई मर गए। उसी कमरे में। जिस कमरे में मैंने उस बच्चे को उतारा था।" कल्लू ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया — "उसके बाद मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। एक रात कुछ आदमियों ने मुझे पकड़कर बहुत मारा — कहा, अगर मूँह खुला तो बच्चों के साथ वही होगा। मैं डर गया, साहब। मैं इतना डरा कि मैं सचमुच पागल हो गया — या शायद मैंने पागल होना ही ठीक समझा, क्योंकि पागलों से कोई सच नहीं पूछता। पागल सड़क पर बैठकर जो चिल्लाता है, वह गवाही नहीं, शोर कहलाता है।"
आर्यन ने उस दिन कल्लू से वह आखिरी सवाल पूछा, जिसका जवाब इस कहानी के बाकी हिस्से की कुंजी था — "कल्लू काका... उस रात बच्चे के शरीर से... क्या निकाला गया था? आपको पता था?" कल्लू ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उसने धीरे से अपनी रजाई के नीचे से एक चीज़ निकाली — एक पुराना, काला पड़ा हुआ कागज़, जो कई बार मुड़ा-तुड़ा हुआ था — और आर्यन की तरफ बढ़ाया। "तीस साल से अपनी छाती से लगाकर रखा है। यह मेरा गुनाह-नामा है। जिस दिन मर जाऊँ, मुझे इसी के साथ दफ़ना देना... शायद ऊपर वाला इसे देखकर मुझसे थोड़ा कम गुस्सा हो।" आर्यन ने कागज़ खोला। वह देशमुख मेमोरियल नर्सिंग होम की एक पुरानी रसीद की कार्बन कॉपी थी — धुंधली, पर पढ़ी जा सकती थी। उसमें लिखा था — "प्राप्ति: ₹४,५०,००० — सेवाएँ: आपातकालीन शल्य-प्रक्रिया एवं अंग-स्थानांतरण समन्वय — रोगी: गोपाल प्रसाद मोहता — संलग्नक: मिलान पुष्टि-पत्र"। तारीख वही थी — नवंबर १९९४ की वही रात। गोपाल प्रसाद मोहता। आर्यन ने यह नाम कहीं सुना था... हाँ — शहर का सबसे बड़ा सर्राफा व्यापारी, जिसकी हवेली शेषनगर के मंदिर के सामने थी, और जिसका एकमात्र बेटा — तेरह-चौदह साल का — उसी दौरान "इलाज के लिए" अचानक बम्बई भेज दिया गया था।
"एक गुर्दा," कल्लू ने फुसफुसाकर कहा, जैसे अब भी कोई सुन लेगा। "एक नौ साल के बच्चे का एक गुर्दा, साहब। साढ़े चार लाख रुपये में — उस जमाने में, जब साढ़े चार लाख में आधा शहर खरीदा जा सकता था। बच्चे को बेहोश किया गया, गुर्दा निकाला गया, और फिर... फिर जब पता चला कि बच्चा सिलाई के बाद भी साँस ले रहा है, तो..." कल्लू की आवाज़ मर गई। "...तो उसे मरने के लिए शव गृह भेज दिया गया। जिंदा। मेरे हाथों। मेरी गाड़ी में। और रहमत भाई ने शायद उस रात समझ लिया था कि बच्चा... कि बच्चा सुबह तक जिंदा रह सकता है। शायद इसीलिए उन्होंने वह सब किया — फोटो, डायरी, पट्टा। शायद वह उसे बचाना चाहते थे। पर अगली सुबह जब गणपत पहुँचा, तो कमरे में सिर्फ रहमत भाई की लाश थी... और बच्चे का शव गायब था।"
⏳ सस्पेंस — चिंटू का शव उस रात कमरा नंबर 2 से गायब हो गया था — या गायब किया गया था? अगर शव कभी मिला ही नहीं, तो तीस साल से कमरा नंबर 2 के अंदर खटखट कौन करता है...? और आज रात, जब आर्यन तीसरी ट्रे खोलेगा — उसे अंदर क्या मिलेगा... पट्टा, या कुछ और...?