PretikaParanormalशव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2

भाग 6 — संदूक की चाबी

Piyashi Atma · Paranormal · 6 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
6 of 7
Category
Paranormal
Reading time
6 min
Words
1113
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रहमत खाँ का पुराना घर बस्ती के आखिरी छोर पर था — एक ऐसा मकान जो अब रहने लायक नहीं रहा था, पर गणपत ने उसे बिकने नहीं दिया था। रहमत भाई की बीवी उनकी मौत के दो साल बाद बच्चों को लेकर अपने मायके चली गई थीं, और तब से यह मकान खाली पड़ा था — सिर्फ गणपत महीने में एक बार आकर झाड़ू लगा देता था, जैसे कोई किसी की कब्र साफ करता है। उस शाम दोनों उस मकान में घुसे, तो अंदर की हवा में तीस साल पुरानी खामोशी साँस ले रही थी। गणपत ने दीवार में धँसी एक पुरानी लोहे की संदूक के सामने घुटने टेके, चाबी लगाई — चाबी तीस साल बाद भी घूम गई, जैसे वह भी किसी के आने का इंतज़ार कर रही थी — और संदूक खुली।

अंदर एक रुमाल में लिपटा पैकेट था। गणपत ने उसे दोनों हाथों से उठाया — जैसे कोई नवजात उठाता है — और आर्यन के सामने रखा। रुमाल के अंदर तीन चीज़ें थीं: एक पतली, टूटती जिल्द वाली डायरी; चार काले-सफेद फोटो, जिनके कोने मुड़ चुके थे; और एक छोटी सी बट्टी वाली डायरी — रजिस्टर नकल — जिस पर रहमत खाँ ने अपनी साफ, गोल लिखावट में तारीख डाली थी — "नवंबर १९९४"। आर्यन ने पहले फोटो देखीं। और उसका हाथ काँप उठा। पहली फोटो में स्ट्रेचर पर एक छोटा शव पड़ा था, कफन आधा खुला — और चेहरा... चेहरा वही था जो आर्यन की मेज पर रखे लिफाफे की फोटो में था। वही बच्चा। चिंटू। बस फर्क इतना था कि इस फोटो में उसकी आँखें बंद थीं, और पेट के बाएँ हिस्से पर वह लंबी, ताज़ी सिलाई साफ दिख रही थी — काले धागे की कच्ची सिलाई, जैसी अस्पतालों में नहीं, जैसी किसी जल्दबाज़ी में, किसी छिपे हुए कमरे में सी जाती है। दूसरी फोटो सिलाई का क्लोज-अप थी। तीसरी फोटो में शव की कलाई थी, जिस पर अस्पताल का पट्टा बंधा था, और पट्टे पर धुंधले अक्षरों में पढ़ा जा सकता था — "बेड 14 — बाल रोग"। और चौथी फोटो... चौथी फोटो देखकर आर्यन की साँस अटक गई। उसमें शव नहीं था — उसमें शव गृह का रजिस्टर था, और रहमत खाँ ने उस पन्ने की फोटो खींची थी जिस पर शाम की छह एंट्रियों के नीचे, रात में जोड़ी गई, एक सातवीं एंट्री दिख रही थी — जिसे बाद में रबर से मिटाने की घटिया कोशिश की गई थी — "अज्ञात बालक — समय: रात्रि ११:४० — लाने वाला: कल्लू (एम्बुलेंस) — आदेश: डॉ. के.वी. देशमुख"।

फिर आर्यन ने डायरी खोली। रहमत खाँ की डायरी कोई साहित्यिक दस्तावेज नहीं थी — वह एक साधारण आदमी की सीधी-सादी, डर और गुस्से से भरी रोज़ाना लेखनी थी। आर्यन ने उसमें से कुछ पन्ने उसी रात पढ़े, और जैसे-जैसे पढ़ता गया, तीस साल पुराना अंधेरा उसके सामने खुलता गया। "१४ नवंबर," एक जगह लिखा था, "आज कल्लू फिर आया। इस बार शव नहीं — कुछ और लेकर आया। एक छोटा थर्मोकोल का बक्सा, जिस पर बर्फ की मोहर लगी थी। उसे कोल्ड स्टोरेज में रखवाया, दो घंटे के लिए। मैंने पूछा क्या है, तो मुझे धमकी दी — 'रहमत, ज्यादा कान मत लगा। यहाँ आवाज़ें दीवारों में उतर जाती हैं।' फिर बक्सा एक प्राइवेट गाड़ी में गया — नंबर मैंने लिख लिया है।" और कुछ पन्ने आगे — "२० नवंबर। आज पता चला कि बक्सों में क्या जाता है। मुझे नहीं पता था कि इंसान इंसान का इतना बड़ा शिकारी हो सकता है। मुझे माफ करना, खुदा — मैं उस बच्चे की आँखें नहीं भुला पा रहा। मैं कल पाटिल साहब से मिलूँगा। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो यह डायरी गणपत के पास है। गणपत — अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो एक बात याद रखना — सबूत मिटा दिए जा सकते हैं, पर सच नहीं। सच कहीं न कहीं रुका रहता है — किसी कमरे में, किसी रजिस्टर में... किसी के इंतज़ार में।" डायरी का आखिरी पन्ना सिर्फ एक पंक्ति का था, और उसे पढ़कर आर्यन के रोंगटे खड़े हो गए — "२३ नवंबर, रात। शव गृह में लिख रहा हूँ। आज बाहर से आवाज़ें आ रही हैं। लगता है आज रात कोई आएगा। मैंने ताले अंदर से लगा लिए हैं। गणपत को सुबह सब सौंप दूँगा। अगर मैं न रहूँ, तो उस बच्चे का अंतिम संस्कार ज़रूर कराना — उसकी कलाई का पट्टा मैंने संभालकर रखा है, कोल्ड स्टोरेज की तीसरी ट्रे के नीचे। वह पट्टा ही उसकी पहचान है। उसे जलाने से पहले उसका नाम तो पता चलने दो। बेचारा बहुत दिनों से... गिनती में अटका है।"

आर्यन ने डायरी बंद की और गणपत की तरफ देखा। "काका... तीसरी ट्रे के नीचे... आपने कभी देखा?" गणपत ने धीरे से सिर हिलाया — ना में। "तीस साल में मैंने कमरा नंबर 2 के अंदर सफाई के अलावा कुछ नहीं छुआ, साहब। तीसरी ट्रे... तीसरी ट्रे उस कोल्ड स्टोरेज की वह ट्रे है जिसे मैंने खोलते हुए कभी नहीं देखा। कहूँ तुम्हें सच? मैंने कभी खोलने की हिम्मत ही नहीं की। क्योंकि जिस रात रहमत भाई मरे, उस रात के बाद से तीसरी ट्रे का दरवाज़ा... ठंडक की जगह से गर्मी छोड़ता है। मैंने महसूस किया है, साहब। कोल्ड स्टोरेज की ट्रे, जो गर्म हो।"

दोनों उस शाम वहाँ से लौटे, तो रास्ते में आर्यन ने वह सवाल पूछा जो पिछले दो दिनों से उसके सीने में दबा था — "काका, कल्लू कहाँ है? वह एम्बुलेंस ड्राइवर। अगर किसी ने वह रात देखी है, तो वह है।" गणपत का कदम एक पल के लिए रुका। "कल्लू जिंदा है," उसने धीरे से कहा। "शहर के पुराने दरगाह के पीछे, सूफी चील्ला के पास, एक झुग्गी में रहता है। पागल हो गया है — कहते हैं १९९५ में ही हो गया था, जिस साल देशमुख ने उसे नौकरी से निकाल दिया था। दिन भर वह दरगाह की सीढ़ियों पर बैठा रहता है, और रात भर... रात भर वह एक ही बात दोहराता है, साहब। लोग उसके पास से कान दबाकर गुजरते हैं।" आर्यन ने पूछा — "क्या दोहराता है?" गणपत ने कुछ देर चुप रहकर कहा — "वह कहता है — 'मैंने सिर्फ गाड़ी चलाई थी... मैंने सिर्फ गाड़ी चलाई थी... बच्चा गाड़ी में जिंदा था... बच्चा गाड़ी में जिंदा था...'"

⏳ सस्पेंस — "बच्चा गाड़ी में जिंदा था"... अगर चिंटू उस रात एम्बुलेंस में जिंदा था, तो क्या वह अस्पताल में नहीं, कहीं और मारा गया...? और कोल्ड स्टोरेज की तीसरी ट्रे — जो तीस साल से गर्मी छोड़ रही है — उसके नीचे रहमत खाँ ने जो "पट्टा" छिपाया था, क्या वह आज भी वहीं है...? कल रात, आर्यन को कमरा नंबर 2 के अंदर जाना होगा...

(भाग 7 में: कल्लू की झुग्गी की रात — एक पागल आदमी की जुबान से तीस साल पुरानी उस रात की पूरी कहानी, और वह नाम जो अब तक किसी ने नहीं लिया...)

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