PretikaParanormalशव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2

भाग 5 — गणपत माने का अतीत

Piyashi Atma · Paranormal · 8 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
5 of 7
Category
Paranormal
Reading time
8 min
Words
1535
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

गणपत माने का घर अस्पताल से लगभग दो किलोमीटर दूर, शहर की सबसे पुरानी बस्ती में था — एक छोटा सा मकान, जिसके आंगन में तुलसी का एक पौधा था और दरवाज़े के ऊपर एक तोरण लटका था जो शायद सालों से नहीं बदला गया था। आर्यन शाम को वहाँ पहुँचा, तो गणपत ने उसे अंगन में बिठाया, चूल्हे की चाय दी, और अपनी बीड़ी जलाने से पहले एक बार घर के चारों कोनों में नमक की चुटकियाँ रखीं — एक ऐसी आदत, जिसे देखकर आर्यन समझ गया कि यह आदमी तत्तीस साल से नौकरी नहीं, एक अपव्रत कर रहा है। गणपत ने धुआँ छोड़ा, और फिर उसने वह कहानी शुरू की, जिसे सुनते हुए आर्यन को यह एहसास हुआ कि कुछ कहानियाँ सुनाने वाले को तोड़ देती हैं, और फिर भी उन्हें सुनाना पड़ता है — क्योंकि कहानी का बोझ साझा किए बिना इंसान जी नहीं सकता, बस ढोता है।

"सन् १९९४," गणपत ने शुरू किया, "मैं उस शव गृह में नया-नया आया था। उम्र थी अठ्ठाइस साल। मुझसे पहले वहाँ मुंडिया था — रहमत खाँ। सुन लो इस नाम को ध्यान से, साहब, क्योंकि यह कहानी उसी से शुरू होती है और उसी पर... उसी पर अटकी हुई है। रहमत भाई एक ऐसे इंसान थे जो मुर्दों से इंसानों जैसा व्यवहार करते थे। हर शव को वे खुद धोते थे, अपने हाथों से कफन ओढ़ाते थे, और रजिस्टर में नाम लिखने से पहले हर शव के माथे पर हाथ रखकर फातिहा पढ़ते थे — चाहे शव किसी भी मज़हब का हो। कहते थे — 'मरने के बाद सब एक ही मज़हब के होते हैं, गणपत — इंतज़ार के मज़हब के।' मैंने उनसे यही काम सीखा। और उन्हीं की वजह से मैं आज तक उस इमारत में हूँ — क्योंकि रहमत भाई ने मुझसे एक वादा लिया था, और उस वादे को निभाते-निभाते मेरी पूरी ज़िंदगी निकल गई।"

"नवंबर १९९४ की वह रात मैं कभी नहीं भूल सकता," गणपत की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे वह शब्दों को बहुत सावधानी से तौलकर बोल रहा हो। "रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे, अस्पताल की पीछे वाली सीढ़ियों से कल्लू — वही एम्बुलेंस ड्राइवर — और एक आदमी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था, एक स्ट्रेचर पर छोटा सा शव लेकर आए। नियम के मुताबिक रात को शव गृह में शव नहीं आते — शव सुबह आते हैं, कागज़ों के साथ, पुलिस की रिपोर्ट के साथ। पर उस रात कोई कागज़ नहीं था। कल्लू ने रहमत भाई को एक मोटा लिफाफा दिया — मैंने देखा, उसमें नोटों की गड्डी थी — और कहा, 'सिर्फ एक रात की बात है। सुबह इसे उठा लिया जाएगा। रजिस्टर में नाम लिखने की ज़रूरत नहीं।' रहमत भाई ने लिफाफा लिया... और वापस फेंक दिया। मैंने आज तक किसी को वैसे गुस्से में नहीं देखा। उन्होंने कहा — 'यह मुर्दाघर है, सराय नहीं। बिना कागज़ के यहाँ एक ईंट भी नहीं ठहर सकती।' तब वह दूसरा आदमी आगे आया, और उसने एक नाम लिया — डॉ. देशमुख का। उसने कहा, 'सिविल सर्जन साहब का आदेश है। कल सुबह कागज़ आ जाएँगे।' रहमत भाई झुक गए — नौकरी थी, बीबी-बच्चे थे — पर जाते-जाते उन्होंने एक काम ज़रूर किया, जो मैंने अपनी आँखों से देखा — उन्होंने उस शव का कफन उठाकर चेहरा देखा। और जो उन्होंने देखा, उसे देखकर उनके हाथ से चाबी का गुच्छा गिर पड़ा। शव एक बच्चे का था — नौ-दस साल का — और उसके पेट के बाएँ हिस्से पर, बगल से कमर तक, एक ताज़ी, लंबी सिलाई थी। ताज़ी सिलाई, साहब — ऐसी सिलाई जो मरने के बाद नहीं, मरने से पहले... या मरते-मरते सी जाती है।"

आर्यन की नसें जड़ हो गईं। उसे रिकॉर्ड रूम की वह एंट्री याद आ गई — "पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिली।" गणपत ने उसकी आँखों पढ़ ली। "हाँ साहब, तुम समझ गए। रहमत भाई भी उसी पल समझ गए थे। उस रात रहमत भाई ने शव को अंदर रखा, पर कुछ और भी किया — उन्होंने शव की तीन-चार फोटो खींचीं, पुराने कैमरे से, जो उनके पास था। और उन्होंने रजिस्टर में वह एंट्री की, जो बाद में किसी ने पेंसिल से मिटा दी — पर रहमत भाई ने उसकी एक नकल अपनी डायरी में भी कर ली थी। उन्होंने मुझसे कहा था — 'गणपत, यह बच्चा मारा गया है। इसके शरीर से कुछ निकाला गया है। और अगर मुझे कुछ हो जाए, तो यह बात किसी से कहना मत — जब तक कि कोई ऐसा न आ जाए, जो सच सुनकर भागे नहीं, लड़े।'"

"उसके तीन दिन बाद की बात है," गणपत की आवाज़ अब लगभग टूटने लगी थी। "रहमत भाई ने वे फोटो और डायरी की नकल उस वक्त के एक ईमानदार पुलिस अफसर तक पहुँचाने की कोशिश की — इंस्पेक्टर शिवाजीराव पाटिल, जो तब शेषनगर सिटी थाने में थे। पाटिल साहब ने रिपोर्ट दर्ज कर ली, जाँच शुरू की... और उसी हफ्ते उनका ट्रांसफर हो गया — पचास किलोमीटर दूर, किसी पहाड़ी थाने में। जाने से पहले उन्होंने रहमत भाई से मिलकर एक बात कही, जो रहमत भाई ने बाद में मुझे बताई — 'रहमत, यह मामला ऊपर तक फैला है। बहुत ऊपर तक। मैं निकम्मा साबित हुआ। तुम अपना ख्याल रखो — और उस बच्चे का भी, जो अब तक तुम्हारे पास ही है।' उस रात... उसी रात, रहमत भाई शव गृह में रात्रि-ड्यूटी पर थे, और सुबह..." गणपत रुका। उसने बीड़ी बुझाई, हाथ काँपते हुए। "सुबह उनकी लाश कमरा नंबर 2 के अंदर मिली। दरवाज़ा अंदर से बंद था। तीनों ताले अंदर से लगे थे — जो नामुमकिन था, क्योंकि ताले बाहर से लगते हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा गया — दिल का दौरा। पर मैंने उनका चेहरा देखा था, साहब। उनका चेहरा डर से ऐसा सिकुड़ा हुआ था जैसे मरने से पहले उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो इंसान के देखने की चीज़ नहीं। और उनके दाहिने हाथ की मुट्ठी में... कुछ कसकर पकड़ा हुआ था। पुलिस ने वह चीज़ निकाली और किसी को नहीं दिखाई। पर मैंने झाँककर देख लिया था — एक छोटा सा, टूटा हुआ, प्लास्टिक का घड़ियाल — हरे रंग का — जैसा बच्चों के खिलौनों में होता है।"

"उसके बाद १९९५ से २००१ तक," गणपत ने कहानी जारी रखी, "शव गृह में जो-जो आया, उसने एक ही बात कही — रात को कोल्ड स्टोरेज के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आती है, धीमी, भारी, जैसे कोई पहरा दे रहा हो — किसी के गिनने की आवाज़ आती है — 'एक... दो... तीन...'। कोई रात नहीं टिक पाता था। आखिर में डॉ. देशमुख ने ही मुझे वहाँ स्थायी कर दिया — शायद इसलिए कि मैं चुप रहता था, कुछ नहीं पूछता था। और मैं रह गया — रहमत भाई के वादे की खातिर। फिर २००१ आया — तीसरे नियम का साल। उस साल यहाँ एक इंटर्न आया — डॉ. सलीम अंसारी — बिल्कुल तुम्हारी उम्र का, बिल्कुल तुम्हारे जैसा — होशियार, बेड़ौल, और अंधविश्वास पर हँसने वाला। उसने एक रात रजिस्टर उठाया और हँसते हुए नाम गिनने लगा — 'देखते हैं आज कितने मेहमान हैं...' मैंने रोका, बहुत रोका। उसने नहीं माना। उसने गिने — 'एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह...' और फिर उसकी आवाज़ अटक गई। रजिस्टर में सातवाँ नाम था — ताज़ी स्याही से, अभी-अभी लिखा हुआ — और वह नाम था... 'डॉ. सलीम अंसारी'। उस रात उसने नौकरी छोड़ दी, शहर छोड़ दिया, सब कुछ छोड़ दिया। तीन महीने बाद खबर आई — सड़क हादसा। एक ट्रक ने उसकी मोटरसाइकिल को उड़ा दिया। रिपोर्ट में लिखा था — मौके पर ही मृत्यु। और साहब..." गणपत ने आर्यन की आँखों में देखा, "जिस ट्रक ने उसे मारा, उसका नंबर था — एमएच १४... शेषनगर RTO की सीरीज़। वह शहर तो छोड़ गया था... पर इस शहर की गिनती उसे वहाँ भी ढूँढ ले आई। तब से तीसरा नियम है — रजिस्टर के नाम कभी गिनना नहीं। क्योंकि जो गिनता है, वह गिनती में शामिल हो जाता है।"

आर्यन बहुत देर तक कुछ नहीं बोल पाया। आंगन में अंधेरा घिर आया था, तुलसी के पौधे के पास गणपत की बूढ़ी माँ दीया जला रही थीं, और कहीं दूर से आजान की आवाज़ आ रही थी। आर्यन ने आखिरकार पूछा — "काका... रहमत खाँ की वह डायरी... वे फोटो... कहाँ हैं?" गणपत ने उसकी तरफ देखा — और पहली बार आर्यन ने उस बूढ़े चेहरे पर मुस्कान के करीब कुछ देखा — "तीस साल से एक ही सवाल पूछने की उम्मीद में जिंदा हूँ, साहब, कि कोई आए और पूछे। डायरी मेरे पास है। फोटो भी। रहमत भाई ने मरने से पहले मुझे एक चाबी दी थी — उनके घर की संदूक की। पर एक बात सुन लो — डायरी उठाने से पहले तुम्हें यह तय करना होगा कि तुम सलीम बनना चाहते हो या पाटिल। सलीम भागा था और मरा। पाटिल लड़ा था और हारा। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि हारने वाला सोया नहीं — उसे नींद नहीं आती, पर मरते वक्त उसकी आँखें खुली नहीं रहतीं।"

⏳ सस्पेंस — रहमत खाँ की डायरी और फोटो, जो तीस साल से किसी संदूक में छिपी हैं... पर गणपत ने एक बात नहीं बताई — कल्लू, वह एम्बुलेंस ड्राइवर, जो उस रात शव लेकर आया था, वह आज कहाँ है...? कहते हैं वह जिंदा है — पागलों की तरह, शहर के पुराने दरगाह के पीछे — और वह हर रात एक ही बात रटता है, जो सुनने वालों के कान भर देती है...?

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