Pretika › Paranormal › शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
भाग 4 — परछाई वाली रात
Piyashi Atma · Paranormal · 6 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
- Chapter
- 4 of 7
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1093
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
आर्यन ने बाद में कई बार सोचा कि उस रात उसने जो किया, वह हिम्मत थी या पागलपन। पर उस वक्त, उस क्षण, उसके मन में डर से बड़ी सिर्फ एक चीज़ थी — एक नौ साल के बच्चे की तीस साल पुरानी तड़प, जो दीवारों के पार से काँपती आवाज़ में सिर्फ इतना कह रही थी कि "मुझे बाहर निकालो"। आर्यन ने मोमबत्ती उठाई, और कुर्सी से उठकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा। परछाई टस से मस नहीं हुई। वह दरवाज़े की दरार से अंदर झाँकती रही — छोटी, दुबली-पतली, एक पैर थोड़ा सा खिसका हुआ, जैसे उस पैर में दर्द हो। आर्यन ने दरवाज़े का कुंडा खोला, और एक लंबी साँस लेकर दरवाज़ा खोल दिया।
गलियारा खाली था।
सिर्फ मोमबत्ती की पीली रोशनी में लंबा, खाली गलियारा, जिसके आखिर में कमरा नंबर 2 के तीन ताले चमक रहे थे। आर्यन ने राहत की साँस ली ही थी कि उसकी नज़र गलियारे के फर्श पर पड़ी — और उसका खून जम गया। फर्श पर, धूल में, छोटे-छोटे पैरों के निशान थे — नंगे पैरों के, एक पैर का निशान हल्का, खिसका हुआ — जो उसके कमरे के दरवाज़े से शुरू होकर गलियारे में आगे जाते थे... और कमरा नंबर 2 के तालों के सामने जाकर रुक जाते थे। मिट्टी के वे निशान ताज़ा थे, गीले थे — जैसे अभी-अभी कोई वहाँ से गुजरा हो। आर्यन ने काँपते हाथ से मोमबत्ती उठाई और उन निशानों के साथ-साथ चलना शुरू किया। हर कदम पर उसका दिल उसकी छाती से बाहर आने को कर रहा था, पर कुछ ऐसा था उन निशानों में — कुछ ऐसी मासूमियत, कुछ ऐसा लंगड़ाता हुआ पैर — कि डर के साथ-साथ एक अजीब सा दर्द भी उसे आगे धकेले जा रहा था। निशान कमरा नंबर 2 के दरवाज़े के सामने रुके — और वहीं, दरवाज़े की सबसे नीचे वाली चौखट पर, किसी ने नाखून से, बहुत पुराने समय में, कुछ खोदा हुआ था, जिसे अब मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ा जा सकता था — "चिंटू यहाँ सोया था। किसी ने नहीं देखा।"
आर्यन वहीं घुटनों के बल बैठ गया। तीस साल पहले, इसी दरवाज़े के सामने, एक नौ साल का बच्चा — मरने के बाद या मरने से पहले, इसे भला कौन जाने — यह लिख गया था। "किसी ने नहीं देखा।" चार शब्द, जिनमें एक पूरी ज़िंदगी का अकेलापन समा गया था। आर्यन की आँखों से आँसू बह निकले, और उसने अंधेरे में, उस दरवाज़े से बोला — "चिंटू... मैं देख रहा हूँ। अब मैं देख रहा हूँ।" और उसी पल, उसकी पीठ के पीछे, गलियारे के दूसरे छोर से, एक आवाज़ आई — धातु का गिरना। आर्यन चौंककर मुड़ा — उसके कमरे का दरवाज़ा, जो उसने खुला छोड़ा था, अब बंद था। और दरवाज़े के सामने की खिड़की के शीशे पर, अंदर की तरफ से, किसी ने धुंधले शीशे पर उँगली से लिखा था, बड़े-बड़े अक्षरों में — "मत आओ अंदर। वह जाग गया है।"
आर्यन का शरीर जड़ हो गया। "वह"? "वह" कौन? उसने तीन कदम अपने कमरे की तरफ बढ़ाए, फिर रुक गया — क्योंकि अब उसे वह आवाज़ सुनाई दी, जिसे सुनकर तीस साल पहले इस इमारत के लोग पागल हुए थे या भागे थे। कमरा नंबर 2 के अंदर से, कोल्ड स्टोरेज की गहराई से, एक आवाज़ आ रही थी — बच्चे की नहीं, किसी वयस्क की — भारी, गूँजती हुई, गले में कंटीलापन लिए, और वह आवाज़ कुछ कह रही थी। आर्यन ने कान लगाए। आवाज़ धीरे-धीरे साफ हुई, और जो शब्द उसने सुने, वे थे — "छह... रखो... छह... सातवाँ... मेरा है... सातवाँ... मेरा... है..." और फिर एक ऐसी आवाज़ आई जैसे किसी ने कोल्ड स्टोरेज के अंदर की किसी धातु की ट्रे को पूरी ताकत से दीवार पर दे मारी हो — इतनी ज़ोर से कि कमरा नंबर 2 के तीनों ताले थरथरा उठे, और पूरी इमारत की नींव काँप उठी।
आर्यन नहीं जानता वह कब भागा, कैसे भागा। उसे इतना याद है कि वह गलियारे से निकला, पीछे के दरवाज़े से बाहर निकला, और पेड़ों के बीच से होता हुआ मुख्य भवन की तरफ दौड़ा — जहाँ रात की रोशनी में नन्हेलाल वॉर्ड बॉय चाय का केतली लेकर चौंककर उसे देखता रह गया। आर्यन ने उसकी कलाई पकड़ ली — "नन्हेलाल... कमरा नंबर 2 में... अंदर... कौन है अंदर?" नन्हेलाल का चेहरा, जो पहले से ही पीला था, अब सफेद हो गया। उसने चारों तरफ देखा और आर्यन को अस्पताल के पुराने साइकिल स्टैंड के पीछे खींच लिया — "साहब, आपने... आपने उसकी आवाज़ सुन ली? वो... वो वाली आवाज़?" आर्यन ने हाँ में सिर हिलाया। नन्हेलाल की आँखों में डर के आँसू आ गए — "साहब, मैं आपको पहले दिन ही बताने वाला था, पर गणपत काका ने मना किया था। कमरा नंबर 2 में... कमरा नंबर 2 में सिर्फ मुर्दे नहीं हैं। वहाँ... वहाँ कोई है, जो मुर्दों का रखवाला बन बैठा है। गणपत काका कहते हैं कि वह १९९४ से वहाँ है — और वह शवों की गिनती रखता है। छह से ज्यादा शव नहीं होने देता... क्योंकि सातवीं जगह... सातवीं जगह उसने किसी के लिए खाली रखी है।" आर्यन की आवाज़ काँपी — "किसके लिए?" नन्हेलाल ने धीरे से, लगभग फुसफुसाकर कहा — "काका कहते हैं... जिसने १९९४ में वो सब किया था, उसके लिए। डॉ. देशमुख के लिए। पर साहब... डॉ. देशमुख तो दस साल पहले मर चुके हैं... और दफ़न भी हो चुके हैं... फिर... फिर वह किसका इंतज़ार कर रहा है?"
उस रात के बाद आर्यन ने शव गृह में वापस जाने से इनकार कर दिया — कम से कम उस रात के लिए। वह सुबह तक अस्पताल की मुख्य इमारत की सीढ़ियों पर बैठा रहा, और सुबह जब गणपत आया, तो आर्यन ने उसे सब कुछ बता दिया — परछाई, पैरों के निशान, चौखट पर खोदा हुआ वाक्य, शीशे पर लिखी चेतावनी, और कोल्ड स्टोरेज की वह भारी आवाज़। गणपत ने सब सुना, बिना चौंके, और फिर उसने एक लंबी साँस लेकर वह बात कही जिसका इंतज़ार आर्यन को पहले दिन से था — "अब समय आ गया है, साहब, कि मैं तुम्हें २००१ की बात बताऊँ — तीसरे नियम की असली वजह। पर यहाँ नहीं। शाम को, जब अस्पताल खाली हो जाए, तुम मेरे घर चले आना। जो मैं बताने वाला हूँ, वह इस इमारत की दीवारों के सामने नहीं कहा जा सकता... क्योंकि इन दीवारों के कान हैं।"
⏳ सस्पेंस — कमरा नंबर 2 में मुर्दों का "रखवाला" कौन है जो १९९४ से वहाँ बैठा शवों की गिनती कर रहा है...? उसने सातवीं जगह किसके लिए खाली रखी है...? और गणपत माने — जो तत्तीस साल से उस इमारत में है — वह असल में कौन है, और २००१ में उसने अपनी आँखों से क्या देखा था...?