Pretika › Paranormal › शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
भाग 3 — बेड नंबर 14
Piyashi Atma · Paranormal · 8 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
- Chapter
- 3 of 7
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1512
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात आर्यन ने फोटो को अपनी किताब के बीच रखा और बहुत देर तक उसे देखता रहा — उस बच्चे की आँखों को, जो कैमरे की तरफ नहीं देख रही थीं। फोटो में कुछ और भी था, जो पहली बार देखने में नहीं चढ़ता था, पर जब आर्यन ने मोबाइल की लाइट में उसे ज़ूम करके देखा, तो उसकी पीठ में सिर्सरी ठंडक दौड़ गई। बच्चे के बेड के सिरहाने की दीवार पर, बिल्कुल धुंधली, एक पुराना बोर्ड टंगा था, जिस पर वार्ड का नाम लिखा था — "बाल रोग विभाग — पूर्वी वार्ड"। और बेड के ऊपर की दीवार पर किसी ने पेंसिल से, बचकानी लिखावट में, दीवार पर ही कुछ लिखा था, जो फोटो में आधा-अधूरा पढ़ा जा सकता था — "...गिनती... मत... करना..."। आर्यन ने वह अधूरा वाक्य कई बार पढ़ा। "गिनती मत करना"? किस चीज़ की गिनती? और किसने लिखा था यह — वह बच्चा? एक नौ साल का, पढ़ा-लिखा भीख माँगने वाला बच्चा? सवालों का ढेर था, और जवाबों का पता सिर्फ एक — पूर्वी वार्ड।
अगली सुबह आर्यन ने अस्पताल के नक्शे की तलाशी ली। शेषनगर सिविल अस्पताल १९५८ में बना था, और उसका पुराना नक्शा मुख्य भवन के प्रवेश द्वार के पास शीशे में कैद लगा हुआ था। उसमें मुख्य भवन के पीछे एक और विस्तार दिखता था — एक लंबी, पतली इमारत, जो आज के अस्पताल परिसर के बिल्कुल पूर्वी छोर पर थी, और जिसके सामने लिखा था "पूर्वी वार्ड — बाल रोग एवं संक्रामक रोग"। आर्यन को हैरानी हुई, क्योंकि उसने दो दिनों में परिसर की कई बार सैर की थी, पर उसे ऐसी कोई इमारत नहीं दिखी थी। उसने नक्शे को ध्यान से देखा — पूर्वी वार्ड उस जगह थी जहाँ अब एक घना, जंगली पुराना पीपल का पेड़ था और उसके चारों ओर नीली पट्टी वाली एक दीवार। यानी इमारत थी, पर उसे किसी ने नक्शे से नहीं, नज़रों से मिटा दिया था — दीवार घेर दी गई थी।
दोपहर को, जब अस्पताल में भीड़ कम होती है, आर्यन पूर्वी छोर पर गया। नीली दीवार के पास पहुँचकर उसे एक पुराना, जंग खाया गेट मिला, जिस पर दो ताले लगे थे — एक नया, एक बहुत पुराना — और गेट पर एक बोर्ड लटका था, जिसका पेंट उखड़ चुका था पर अक्षर बचे थे: "खतरा — संरचना अस्थिर — प्रवेश वर्जित — आदेश: जिला प्रशासन, १९९५"। गेट के पीछे एक लंबी, दो मंज़िला इमारत खड़ी थी, जिसकी खिड़कियाँ टूटी हुई थीं और दीवारों पर बेलें इस तरह चढ़ी थीं मानो प्रकृति उसे वापस अपने अंदर समेट रही हो। आर्यन ने गेट के जाल से अंदर झाँका — एक आंगन था, जिसमें कभी बच्चों के खेलने का एक जंगला जिम रहा होगा, अब जंग खाया और उलटा पड़ा। और उस आंगन के बीच में, जिस चीज़ को देखकर आर्यन के पैर जम गए, वह था एक पुराना, टूटा हुआ सी-सॉ — जो उस पल, बिना हवा के, बहुत धीरे-धीरे, ऊपर-नीचे हो रहा था।
आर्यन ने कितनी देर वह सी-सॉ देखा, यह उसे नहीं पता। उसे इतना याद है कि जब उसने हिम्मत करके आँखें मलकर फिर देखा, तो सी-सॉ सन्न था, और आंगन में सिर्फ सूखे पत्ते उड़ रहे थे। वह वापस मुड़ा — और लगभग टकरा गया एक बूढ़ी औरत से, जो उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी, बिना आहट के। औरत की उम्र कोई पचहत्तर के आसपास रही होगी, सफेद साड़ी, कंधे पर झोला, और हाथ में मंदिर का प्रसाद। उसने आर्यन की तरफ ऐसे देखा जैसे वह उसे सालों से जानती हो। "तुम वही हो ना," उसने कहा — सवाल नहीं, पुष्टि की तरह। "वही, जिसे वह बुला रहा है।" आर्यन की जीभ सूख गई। "कौन... कौन बुला रहा है? और आप...?" औरत ने गेट की तरफ, पूर्वी वार्ड की तरफ देखा, और उसकी आँखों में एक पुराना दर्द उतर आया — "मैं जानकी दीदी। तत्तीस साल पहले मैं इसी वार्ड में आयाह थी — बच्चों का ख्याल रखने वाली। मैंने उस बच्चे को अपनी गोद में सुलाया था, उसका माथा सहलाया था, उसे दूध पिलाया था। और उस रात, जब उसे वहाँ से उठाकर ले गए... मैं सो रही थी, या सुलाई गई थी — यह मैं आज तक नहीं जान पाई।" उसने आर्यन का हाथ पकड़ा, और उसकी पकड़ में एक बूढ़ी औरत से कहीं ज्यादा ताकत थी — "बेटा, मैं हर महीने अमावस्या को यहाँ आती हूँ। तीस साल से। पूछोगे क्यों? क्योंकि हर अमावस्या की रात, इस गेट के अंदर से, बच्चों की हँसी की आवाज़ आती है — और उस हँसी में एक आवाज़ रो रही होती है। मैंने उस बच्चे को रोते हुए सुना है, बेटा... तीस साल से। और किसी ने मेरी बात नहीं मानी।"
आर्यन ने उस दिन जानकी दीदी से बैठकर पूरी बात सुनी — पीपल के नीचे, उसी दीवार के पास, जहाँ से पूर्वी वार्ड की खिड़कियाँ दिखती थीं। जो कहानी जानकी दीदी ने सुनाई, वह इस कहानी की रीढ़ थी, और आर्यन ने उसे एक शब्द भी नहीं टोका। "उस बच्चे का नाम किसी को नहीं पता था," जानकी दीदी ने शुरू किया, "पर वार्ड में हम सब उसे 'चिंटू' कहते थे — वह नाम उसने खुद हमें बताया था। बहुत होशियार था, बेटा। नौ साल की उम्र में अपने पैर की गांठ के बारे में वैसे सवाल पूछता था जैसे कोई छोटा डॉक्टर हो। कहता था — 'दीदी, जब मैं ठीक हो जाऊँगा, मैं पढ़ूँगा। मैं डाक्टर बनूँगा।' उसकी आँखों में एक चमक होती थी, जो मैंने किसी और बच्चे में नहीं देखी। फिर एक दिन डॉ. देशमुख खुद वार्ड में आए — वे कभी बाल वार्ड में नहीं आते थे — और उन्होंने चिंटू को देखा, उसका पैर देखा, उसके कागज़ देखे... और उसी शाम चिंटू को सामान्य वार्ड से हटाकर 'स्पेशल ऑब्ज़र्वेशन' में शिफ्ट कर दिया गया — कोठरी नंबर 7 में, जो वार्ड के सबसे आखिर में थी, और जिसका दरवाज़ा अंदर से नहीं, बाहर से खुलता था।" जानकी दीदी की आवाज़ भर्राई — "तीसरी रात, देर रात, मैं दवाईयों का राउंड कर रही थी, तो मैंने देखा — कोठरी नंबर 7 की तरफ से दो आदमी कुछ उठाकर ले जा रहे थे, पीछे की सीढ़ियों से, जो सीधे... सीधे शव गृह की तरफ जाती थीं। मैंने उनमें से एक को पहचाना था — वह अस्पताल का पुराना एम्बुलेंस ड्राइवर था, कल्लू। मैं कुछ कर नहीं पाई, बेटा। डर लगा। मैं एक सौ बीस रुपये महीने की आयाह थी, और डॉ. देशमुख शहर के मालिक थे। सुबह हमें बताया गया कि चिंटू की मौत हो गई — निमोनिया से। और तीन दिन बाद... मुझे भी ट्रांसफर कर दिया गया, दूसरे जिले में। वहाँ भी मैंने पूछताछ की, तो मेरी नौकरी चली गई। तब समझी — इस शहर में चिंटू के लिए कोई नहीं बोल सकता था। क्योंकि जो बोलते थे... उन्हें चुप करा दिया जाता था।"
आर्यन ने उस रात ड्यूटी पर जाते हुए एक पल के लिए सोचा कि वह सब छोड़कर चला जाए — नौकरी, शहर, यह कहानी। पर फिर उसे फोटो में वह बच्चा याद आया, जो कैमरे से हटकर देख रहा था, और वह अधूरा वाक्य याद आया — "गिनती मत करना"। उसे अपने आप से एक सवाल का जवाब नहीं मिल रहा था — अगर चिंटू की मौत अस्पताल में हुई थी, तो उसका शव शव गृह पहुँचा क्यों? मरीज़ों के शव सीधे परिजनों को दिए जाते हैं; पोस्टमार्टम तभी होता है जब मौत संदिग्ध हो। चिंटू का शव कमरा नंबर 2 में क्यों गया था? और फिर वहाँ से गायब कैसे हुआ? इन सवालों के साथ वह अपने कमरे में बैठा, और रात ठीक दो बजकर सत्रह मिनट पर, बिजली फिर चली गई।
इस बार आर्यन तैयार था। उसने मोमबत्ती जलाई, रजिस्टर खुला रखा, और इंतज़ार किया। खटखट आई — तीन ठोकरें, ठहराव, तीन ठोकरें। पर इस बार आर्यन ने कुछ ऐसा किया जो पिछली रात नहीं किया था — उसने धीरे से, काँपती आवाज़ में, गलियारे की तरफ बोला — "चिंटू? ...अगर तुम सुन रहे हो, तो... तो एक बार खटखट करो।" कुछ सेकंड की वह खामोशी हुई जो मौत से भी गहरी होती है — और फिर, कमरा नंबर 2 के दरवाज़े के पार से, एक ही ठोकर आई। खट। आर्यन का शरीर झुरझुरा उठा, पर उसने खुद को रोके रखा। "चिंटू... मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ। मुझे बताओ — तुम्हें क्या चाहिए? अगर तुम्हें अपना अंतिम संस्कार चाहिए, तो दो बार खटखट करो।" ठहराव। और फिर — खट। खट। दो ठोकरें। आर्यन की आँखों से अनजाने में आँसू निकल आए — डर के या दया के, वह खुद नहीं जानता था। और तभी, उसी पल, मोमबत्ती की लौ एक बार लंबी हुई और टिमटिमा गई — और आर्यन ने महसूस किया कि गलियारे में, उसके कमरे के दरवाज़े के ठीक बाहर, कोई खड़ा है। कोई बहुत छोटा। कोई, जिसकी परछाई मोमबत्ती की रोशनी में दरवाज़े की दरार से अंदर आ रही थी — एक बच्चे की परछाई, जो वहाँ खड़ी, अंदर झाँक रही थी।
⏳ सस्पेंस — दरवाज़े के बाहर खड़ी बच्चे की परछाई... आर्यन ने तीसरे नियम के खिलाफ जाकर रात दो बजे के बाद सवाल तो पूछ लिया... पर अब वह परछाई अंदर आएगी, या आर्यन को बाहर बुलाएगी...? और गणपत ने कहा था — तीसरा नियम २००१ में बना था... उस रात २००१ में आखिर हुआ क्या था...?