PretikaParanormalशव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2

भाग 2 — जो रजिस्टर में नहीं था

Piyashi Atma · Paranormal · 7 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
2 of 7
Category
Paranormal
Reading time
7 min
Words
1382
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आर्यन नहीं जानता कि वह उस रात अपने कमरे की कुर्सी पर कितनी देर बेजान-सा बैठा रहा। उसे बस इतना याद है कि जब सुबह साढ़े पाँच बजे गणपत की साइकिल की घंटी गेट पर बजी, तो मोमबत्ती पूरी पिघलकर मेज पर जम चुकी थी, रजिस्टर उसकी गोद में खुला था, और गलियारे के आखिर में खड़ा कमरा नंबर 2 खामोश था — वैसी खामोशी जो रात भर चिल्लाने के बाद किसी के गले में बैठ जाती है। गणपत अंदर आया, और उसने आर्यन का चेहरा देखा, फिर रजिस्टर देखा, फिर कमरा नंबर 2 की तरफ देखा — और उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं आई। यही सबसे डरावनी बात थी। जो आदमी तत्तीस साल से यहाँ काम कर रहा हो, उसके चेहरे पर हैरानी का न होना इस बात का सबूत था कि जो कुछ रात को हुआ, वह नया नहीं था — वह बस दोहरा रहा था।

"सातवाँ नाम देख लिया तुमने," गणपत ने कहा। यह सवाल नहीं था, पुष्टि थी। उसने रजिस्टर उठाया, उस पन्ने को देखा जहाँ पेंसिल से "अज्ञात बालक" लिखा था, और फिर उसने एक ऐसा काम किया जो आर्यन की समझ से बाहर था — उसने उस पन्ने को बिना मिटाए, बिना फाड़े, बस धीरे से मोड़ दिया, जैसे कोई चुने हुए इंसान को अलविदा कहता हो। "कल सुबह यह लिखावट गायब हो जाएगी," उसने कहा। "हमेशा हो जाती है। पर रात को यह फिर आ जाएगी — जब तक तुम यहाँ हो, हर रात आएगी। क्योंकि अब उसे पता चल गया है कि यहाँ कोई नया आया है... कोई, जो सुन सकता है।"

आर्यन ने खुद को संभाला। उसने वो पूरा तर्क दिया जो एक पढ़ा-लिखा, विज्ञान में विश्वास रखने वाला इंसान देता है — नींद की कमी, पहली रात का मानसिक दबाव, सजेस्टेबिलिटी, पुरानी इमारतों की आवाज़ें, गणपत और नन्हेलाल की कहानियों का प्राइमिंग इफेक्ट। गणपत ने उसकी बात चुपचाप सुनी, बिना काटे, और जब आर्यन खत्म हुआ, तो उसने बस एक सवाल पूछा — "ठीक है साहब, मान लिया सब दिमाग का खेल था। तो यह बताओ — रात को जब तुमने रजिस्टर में वह सातवाँ नाम देखा, तो तुमने लिखावट गौर से देखी थी? पेंसिल की लिखावट? बच्चे जैसी, तिरछी?" आर्यन ने सिर हिलाया। "तो अब यह देखो।" गणपत ने रजिस्टर उलटा, पीछे के पन्नों को पलटा, और एक पुराना पन्ना खोला — तारीख लिखी थी "१९९४"। उस पन्ने पर, उसी पेंसिल की, उसी तिरछी, बच्चे जैसी लिखावट में, तीस साल पहले किसी ने लिखा था — "अज्ञात बालक, उम्र लगभग ९, पहचान बाकी"। और उस नाम के सामने, मुक्ति के कॉलम में, तारीख की जगह खाली था — तीस साल से खाली।

"१९९४," गणपत ने धीमे से कहा, मोमबत्ती के धुएँ में अपना चेहरा छिपाते हुए। "उस साल मैं यहाँ नया-नया आया था। उस साल इस अस्पताल में एक बच्चा मरा था — नाम किसी को नहीं पता, या शायद पता था पर किसी ने लिखा नहीं। कहा जाता है कि वह रेलवे स्टेशन के पास भीख माँगता था, पैर में गांठ थी, इलाज के लिए यहाँ आया। तीन दिन बाद उसकी मौत हो गई — कागज़ों में लिखा 'फेफड़ों का संक्रमण'। शव यहीं आया, कमरा नंबर 2 में। लावारिस था, तो नियम था कि बहत्तर घंटे बाद नगरपालिका अंतिम संस्कार करेगी। पर उस रात... उस रात यहाँ सातवाँ शव रखा गया, और पहला नियम टूट गया।" गणपत की आवाज़ में अब वह भार आ गया था जो बहुत पुरानी, बहुत बार सुनाई गई बातों में आता है। "उस रात के बाद से इस इमारत में कुछ ऐसा बस गया, जो जाता नहीं। मैंने अपनी आँखों से नहीं देखा, साहब, पर मैंने उन लोगों को देखा जिन्होंने देखा — और जो देखते हैं, वे या तो यहाँ से भागते हैं, या यहीं रह जाते हैं... हमेशा के लिए।"

आर्यन ने उस दिन सुबह एक फैसला किया, जो उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल देने वाला था। उसने नौकरी छोड़ने की बजाय यह तय किया कि वह इस पूरे मामले की जड़ तक जाएगा — एक डॉक्टर की तरह, एक जाँच की तरह। अगर कोई बच्चा १९९४ में इस अस्पताल में मरा था, तो उसकी कोई न कोई एंट्री तो होगी — मरीज़ों के रजिस्टर में, मौत के प्रमाण-पत्र में, पुलिस के रिकॉर्ड में। और अगर वह लावारिस था, तो उसका शव कहाँ गया — यह तो नगरपालिका के रिकॉर्ड में होगा ही। आर्यन को इस उम्मीद से काम शुरू करना था कि सब कुछ का एक तार्किक जवाब निकलेगा, और वह यह साबित कर देगा कि डर सिर्फ अज्ञानता का दूसरा नाम है। उसे नहीं पता था कि कुछ दरवाज़े खोलने के लिए नहीं बने होते — और कमरा नंबर 2 का दरवाज़ा सिर्फ लोहे का नहीं, तीस साल के खामोशी के पत्थर का भी था।

उस दिन दोपहर को आर्यन अस्पताल के रिकॉर्ड रूम गया। रिकॉर्ड रूम मुख्य भवन की तहखाने में था — एक ऐसी जगह जहाँ कागज़ साँस लेते हैं और समय फंगस की तरह जमता है। रिकॉर्ड कीपर एक बूढ़ी अधेड़ औरत थी, नाम — श्रीमती दुर्गा भट्टनागर, जिसने अस्पताल में अपनी पूरी नौकरी बिताई थी और अब रिटायरमेंट से पहले के आखिरी साल गिन रही थी। आर्यन ने उससे १९९४ के मरीज़ रजिस्टर माँगे। दुर्गा जी ने पहले तो उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे किसी ने किसी पुराने घाव पर उँगली रख दी हो, और फिर धीरे से पूछा — "तुम वही नए इंटर्न हो ना... शव गृह वाले?" आर्यन ने हाँ कही। दुर्गा जी ने लंबी साँस ली, अपनी कुर्सी से उठीं, और एक ऊँची अलमारी के सबसे नीचे वाले रैक से एक धूल में लिपटा रजिस्टर निकाला — पर निकालते वक्त उसने एक शर्त रखी: "इसे यहीं पढ़ोगे। इसे कॉपी नहीं करोगे। और जो पढ़ोगे, उसे यहीं भूल जाओगे — क्योंकि १९९४ की कुछ फाइलें ऐसी हैं, बेटा, जिन्हें खोलने वालों की नौकरियाँ भी गई हैं और ज़िंदगियाँ भी।"

रजिस्टर में आर्यन ने वह एंट्री ढूँढी — और मिली भी। "नवंबर १९९४ — अज्ञात बालक, उम्र लगभग ९ वर्ष, लिंग: पुरुष — प्रवेश: रेलवे स्टेशन से, संदर्भ: थाना शेषनगर सिटी — लक्षण: दाहिने पैर में गांठ, कुपोषण — वार्ड: बाल रोग, बेड 14 — दायकिल: डॉ. पी. रामचंद्रन, जूनियर रेजिडेंट"। आर्यन की नज़र नीचे चली — "स्थिति: तीन दिन बाद मृत्यु — कारण: फुफ्फुसीय संक्रमण (निमोनिया) — शव: मृतक-गृह में स्थानांतरित"। और फिर, उसी एंट्री के मार्जिन में, किसी ने नीली स्याही से, बहुत छोटे अक्षरों में, एक पंक्ति लिखी थी, जो शायद मिटाने के लिए लिखी गई थी पर मिटाई नहीं गई — "पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिली। शव बहत्तर घंटे से पहले गायब। फाइल बंद — आदेश: सिविल सर्जन कार्यालय।"

आर्यन का दिल धक् से रह गया। शव गायब? बहत्तर घंटे से पहले? और फाइल बंद करने का आदेश सिविल सर्जन के कार्यालय से? यह साधारण लापरवाही नहीं थी — यह कवर-अप थी। उसने दुर्गा जी से पूछा — "१९९४ में यहाँ के सिविल सर्जन कौन थे?" दुर्गा जी का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने चारों तरफ देखा, आवाज़ फुसफुसाई — "डॉ. के.वी. देशमुख। बहुत बड़े आदमी थे — शहर के सबसे बड़े नर्सिंग होम के मालिक भी, मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन भी। मर चुके हैं, दस साल पहले। पर बेटा..." उसने आर्यन का हाथ पकड़ा, और उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं, "...मरे हुए आदमियों के बनाए हुए जाल जिंदा रहते हैं। उस फाइल को मत खोलो। जो मर गया, उसे मरने दो।"

पर आर्यन अब रुकने वालों में से नहीं था। उस शाम, जब वह अपनी ड्यूटी पर लौटा, तो उसके कमरे की मेज पर किसी ने एक चीज़ रखी थी — एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा, बिना नाम के। अंदर एक ही चीज़ थी — एक फोटो। १९९० के दशक की फोटो, धुंधली, पुराने कैमरे की। उसमें एक अस्पताल का वार्ड था, और एक बेड पर एक दुबला-पतला बच्चा बैठा था, जिसके पैर पर पट्टी बंधी थी, और जो कैमरे की तरफ नहीं, कैमरे से थोड़ा हटकर किसी की तरफ देख रहा था — जैसे फोटो खींचने वाले से ज्यादा, फोटो देखने वाले को पहचानने की कोशिश कर रहा हो। और फोटो के पीछे, उसी बच्चे जैसी तिरछी पेंसिल-लिखावट में, सिर्फ तीन शब्द लिखे थे — "बेड नंबर 14"।

⏳ सस्पेंस — १९९४ में गायब हुआ शव, बंद की गई फाइल, और अब आर्यन की मेज पर अपने आप पहुँची बच्चे की फोटो... यह फोटो अस्पताल के किस गर्त में तीस साल से दफ़न थी, और इसे आर्यन तक पहुँचाने वाला कौन है — कोई जिंदा, या...? और बेड नंबर 14 आज अस्पताल के किस हाल में है...?

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