PretikaParanormalशव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2

भाग 1 — पहली रात की पहली साँस

Piyashi Atma · Paranormal · 9 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
1 of 7
Category
Paranormal
Reading time
9 min
Words
1780
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

डॉ. आर्यन वर्मा ने जब पहली बार शेषनगर के सिविल अस्पताल के पीछे वाले परिसर में कदम रखा, तो उसे सबसे पहले जो महसूस हुआ, वह ठंड थी — वैसी ठंड नहीं जो नवंबर की रातों में होती है, बल्कि वैसी ठंड जो दीवारों के अंदर से निकलती है, जैसे इमारत की ईंटों ने साठ साल में इतनी मौतें सोख ली हों कि अब वे खुद से भय साँसों के साथ बाहर छोड़ती हों। आर्यन अभी-अभी एमबीबीएस पास करके निकला था, चौबीस साल का, शहर के कोतवाली के पास किराए के छोटे से कमरे में रहने वाला, और उसे इस अस्पताल में इंटर्न के तौर पर पहली पोस्टिंग मिली थी। उसकी नियुक्ति-पत्र में साफ लिखा था — "प्राथमिक तैनाती: पैथोलॉजी विभाग एवं मृतक-गृह (शव गृह) — रात्रि पर्यवेक्षण"। दिन के वक्त इस लाइन को पढ़कर उसने बस इतना सोचा था कि रात की ड्यूटी में काम कम होता है, पढ़ने का समय मिलेगा, और पीजी की तैयारी हो जाएगी। उसे नहीं पता था कि इस अस्पताल में शव गृह की रात्रि-ड्यूटी कोई नौकरी नहीं, एक परीक्षा मानी जाती है — और यह परीक्षा पिछले तीस सालों में सिर्फ चार लोग पूरी कर पाए थे।

अस्पताल का मुख्य भवन सामने था — तीन मंज़िला, सफेद रंग उधड़ा हुआ, खिड़कियों में जालीदार लोहे की ग्रिलें — और उससे लगभग सौ कदम पीछे, एक अलग, एकमंज़िला, ग्रे रंग की इमारत खड़ी थी, जिसके चारों ओर पेड़ इतने घने थे कि दिन में भी वहाँ साया-सा बना रहता था। उस इमारत के प्रवेश द्वार पर ऊपर जंग लगे पीतल के बोर्ड पर अक्षर धँस चुके थे, पर पढ़े जा सकते थे — "मृतक-गृह — केवल अधिकृत प्रवेश"। गेट पर एक बूढ़ा आदमी बाँस की कुर्सी पर बैठा बीड़ी पी रहा था। उसकी उम्र कोई सत्तर के आसपास रही होगी, चेहरा झुर्रियों से भरा, पर आँखें ऐसी तीखी कि लगता था वह चेहरे नहीं, चेहरे के पीछे की बात पढ़ता हो। आर्यन ने अपनी नियुक्ति-पत्र दिखाई। बूढ़े ने पत्र को बिना पढ़े, सिर्फ उसके नाम की तरफ देखा, फिर आर्यन के चेहरे को बहुत देर तक देखा — इतनी देर कि आर्यन असहज हो गया।

"गणपत माने," बूढ़े ने आखिरकार अपना नाम बताया, बीड़ी जमीन पर कुचलते हुए। "इस शव गृह का मुंडिया हूँ — तत्तीस साल से। मुंडिया जानते हो? जो मुर्दों को उठाता है, धोता है, स्लैब पर रखता है, और रजिस्टर में उनका नाम लिखता है।" उसने आर्यन को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर एक ऐसी बात कही जो आर्यन को कई रातों तक याद आने वाली थी — "डाक्टर साहब, यहाँ डिग्री काम नहीं आती। यहाँ काम आता है पेट का दम और कानों पर काबू। जो सुनोगे, वह सच नहीं होगा। जो देखोगे, वह पूरा झूठ नहीं होगा। और जो महसूस होगा... उसे कभी किसी से कहना मत, वरना लोग तुम्हें पागल कहेंगे, और यहाँ पागल कहलाना खतरनाक है — क्योंकि यहाँ के मुर्दे पागलों को पहले पुकारते हैं।"

आर्यन ने मजबूत बनने की कोशिश की। "गणपत काका, मैं मेडिकल साइंस का छात्र हूँ। शव मुझे डराते नहीं। कॉलेज में डिसेक्शन हॉल में महीनों काम किया है।"

गणपत ने एक लंबी, सूखी हँसी हँसी, जिसमें मज़ाक से ज्यादा दया थी। "डिसेक्शन हॉल के मुर्दे तेल वाले होते हैं, साहब — फॉर्मेलिन में तैरते हैं, खुले पड़े रहते हैं, बेचारे। यहाँ के मुर्दे अलग हैं। यहाँ के मुर्दे अधूरे होते हैं — किसी का केस अधूरा, किसी का अंतिम संस्कार अधूरा, किसी का इंतज़ार अधूरा। और अधूरा मुर्दा..." उसने आवाज़ धीमी की, "...अधूरा मुर्दा सोता नहीं, साहब। वह जागता रहता है।"

फिर उसने अंदर चलने का इशारा किया, और रास्ते में उसने आर्यन को वे तीन नियम बताए जो इस कहानी की शुरुआत में लिखे गए हैं — छह से ज्यादा शव नहीं; रात दो से तीन के बीच की खटखट पर दरवाज़ा नहीं खोलना; और रजिस्टर के नाम कभी गिनने नहीं। आर्यन ने तीनों नियम सुने, मुस्कुराया, और मन ही मन सोचा — गाँव-देहात की पुरानी अंधविश्वासी बातें, जो हर पुरानी सरकारी इमारत के साथ मुफ्त में मिलती हैं। उसने पूछा भी — "ये नियम किसने बनाए?" और गणपत ने जो जवाब दिया, वह पहली बार आर्यन के भरोसे में दरार डाल गया — "इन नियमों को किसी ने नहीं बनाया, साहब। ये नियम खुद बनते हैं। हर नियम के पीछे एक मौत होती है। पहला नियम १९९४ में बना, जब यहाँ सातवाँ शव रखा गया था। दूसरा नियम १९९७ में बना, जब रात के ढाई बजे एक चौकीदार ने दरवाज़ा खोल दिया था — सुबह उसकी लाश कोल्ड स्टोरेज के अंदर मिली, और रहस्य यह कि दरवाज़ा अंदर से बंद था। और तीसरा नियम..." गणपत कुछ पल रुका, "तीसरा नियम २००१ में बना। उसके बारे में रात को नहीं बताता।"

शव गृह के अंदर का नज़ारा आर्यन की उम्मीद से ज्यादा साफ था, पर उससे कहीं ज्यादा सूना। एक लंबा गलियारा, जिसकी दीवारें आधी ऊँचाई तक हरे रंग की पेंट से रंगी थीं — पुराने सरकारी अस्पतालों की वही थकी हुई हरियाली। गलियारे के दाएँ एक छोटा कमरा था, जिसमें एक मेज, एक कुर्सी, एक पंखा, और दीवार पर लगी एक पुरानी दीवार घड़ी थी — यह था रात्रि-पर्यवेक्षक का कमरा, यानी आर्यन का कमरा। गलियारे के बाएँ एक बड़ा दरवाज़ा था, सफेद, जिस पर लिखा था "कमरा नंबर 1 — पोस्टमार्टम कक्ष", और गलियारे के बिल्कुल आखिर में एक और दरवाज़ा था — लोहे का, मोटा, जिस पर तीन अलग-अलग ताले लगे थे, और जिसके ऊपर लाल पेंट से लिखा था "कमरा नंबर 2 — कोल्ड स्टोरेज"। आर्यन ने तीन ताले देखे और हँसने से रोक नहीं पाया — "काका, यहाँ मुर्दे रखे हैं या सोना?" गणपत ने तालों की तरफ देखे बिना जवाब दिया, जैसे उनकी तरफ देखना भी उसे पसंद न हो — "साहब, ताले अंदर वालों के लिए नहीं हैं। ताले बाहर वालों के लिए हैं — ताकि कोई बाहर वाला, भूल से भी, अंदर न घुस जाए। अंदर वालों को तो..." उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया, और आर्यन ने पहली बार महसूस किया कि इस आदमी की हर अधूरी बात, पूरी बात से ज्यादा डरावनी है।

उस पहली रात का समय, आर्यन को आज भी याद है, मिनट-दर-मिनट। साढ़े दस बजे गणपत ने उसे रजिस्टर दिखाया — एक मोटा, काले जिल्द वाला रजिस्टर, जिसकी जिल्द पर किसी ने सफेद स्याही से लिखा था "मृतक-गृह प्रवेश पंजीका — १९८९ से वर्तमान"। उसमें उस रात की तारीख के सामने छह नाम लिखे थे — छह शव, जो अभी कमरा नंबर 2 की कोल्ड स्टोरेज में रखे थे। गणपत ने बताया — "तीन सड़क हादसे के हैं, दो अज्ञात हैं — रेलवे लाइन से मिले, पहचान नहीं हुई — और एक बूढ़ी अम्मा हैं, मंदिर के सीढ़ियों से गिरीं, उनका बेटा कल सुबह आएगा।" आर्यन ने नाम पढ़े, और पढ़ते हुए उसकी नज़र रजिस्टर के पन्नों की मोटाई पर गई — उसने शरारत में पूछा, "काका, इसमें अब तक कुल कितने नाम होंगे?" गणपत का चेहरा एक पल के लिए कठोर हो गया — "तीसरा नियम याद है ना, साहब? गिनने नहीं। कभी नहीं।"

ग्यारह बजे गणपत चला गया — वह रात में नहीं रुकता था, यह उसकी नौकरी की एकमात्र शर्त थी, जो उसने तत्तीस साल पहले रखी थी और आज तक किसी ने टाली नहीं। जाते-जाते उसने आर्यन को एक चीज़ दी — एक पुरानी, मटमैली मोमबत्ती और माचिस की एक डिब्बी। "यहाँ बिजली जाती है, साहब। और जब बिजली जाती है, तो मोबाइल की टॉर्च मत जलाना। सिर्फ मोमबत्ती।" आर्यन ने पूछा क्यों, तो गणपत ने बिना मुड़े कहा — "क्योंकि टॉर्च की रोशनी में वे तुम्हें देख लेते हैं। मोमबत्ती की रोशनी पीली होती है, धुंधली होती है — और पीली रोशनी में मुर्दे इंसान और साये में फर्क नहीं कर पाते।" यह कहकर वह रात में घुल गया, और आर्यन पहली बार उस इमारत में अकेला रह गया — सौ कदम दूर अस्पताल की रोशनी, बीच में घने पेड़, और चारों ओर नवंबर की वह ठंड, जो अब उसे दीवारों से नहीं, उसके अपने शरीर के अंदर से आती हुई लग रही थी।

पहले दो घंटे बिल्कुल सामान्य बीते। आर्यन ने अपनी पीजी की किताब खोली, साढ़े ग्यारह बजे अस्पताल की कैंटीन से एक वॉर्ड बॉय चाय लेकर आया — नन्हेलाल नाम का एक दुबला-पतला लड़का, जो चाय देकर चुपचाप खड़ा रहा, और जाने से पहले बोला — "साहब, एक बात कहूँ? आप नई नौकरी हो, इसलिए कह रहा हूँ — रात को अगर कमरा नंबर 2 से किसी बच्चे की रोने की आवाज़ आए, तो प्लीज दरवाज़ा मत खोलना। पिछले इंटर्न ने खोला था... वह तीन दिन में नौकरी छोड़ गया, और सुना है अब तक रात को लाइट जलाकर सोता है।" आर्यन ने हँसकर उसे विदा किया, पर मन में एक कोने में बैठ गया सवाल — इस इमारत में बच्चा? इस इमारत में तो बच्चों के शव भी कम ही आते होंगे...

ठीक रात दो बजकर सत्रह मिनट पर, बिजली चली गई।

आर्यन ने मोमबत्ती जलाई, और उसी पल उसने वह आवाज़ सुनी — बहुत दूर से, बहुत धीमी, पर बिल्कुल साफ। खट... खट... खट... तीन ठोकरें, फिर ठहराव, फिर तीन ठोकरें। आवाज़ गलियारे के आखिरी दरवाज़े की तरफ से आ रही थी — कमरा नंबर 2 से। आर्यन का हाथ किताब पर जमा रहा। उसने खुद को याद दिलाया — मैं डॉक्टर हूँ, यह मशीनरी की आवाज़ है, कंप्रेसर है, पाइप हैं, कुछ भी हो सकता है। पर फिर उसे गणपत की बात याद आई — बिजली गई है, तो कंप्रेसर कैसे चलेगा? और आवाज़... आवाज़ में एक पैटर्न था, एक जानबूझकर बनाया गया पैटर्न — तीन ठोकरें, ठहराव, तीन ठोकरें — जैसे कोई सिग्नल दे रहा हो। जैसे कोई पुकार रहा हो।

आर्यन ने दूसरा नियम याद किया — दरवाज़ा मत खोलो, रजिस्टर पलटो, आज की तारीख के सामने का नाम तीन बार पढ़ो। उसने काँपते हाथ से रजिस्टर खोला, मोमबत्ती पास लाई, और आज की तारीख के सामने लिखे छह नामों में से पहला नाम पढ़ा — "रामकुमार सोनी, उम्र ५४, सड़क दुर्घटना" — उसने तीन बार पढ़ा। खटखट नहीं रुकी। उसने दूसरा नाम पढ़ा, तीसरा, चौथा... खटखट नहीं रुकी। और तभी उसकी नज़र रजिस्टर के उस हिस्से पर पड़ी जहाँ उसका खून जम गया — आज की तारीख के सामने, छह नामों के नीचे, हाल्की पेंसिल से, बच्चे जैसी तिरछी लिखावट में एक सातवाँ नाम लिखा था, जो शाम तक वहाँ नहीं था — "अज्ञात बालक, उम्र लगभग ९, पहचान बाकी"।

और कमरा नंबर 2 में, उसी पल, खटखट रुक गई — और एक बच्चे की आवाज़ में, बहुत धीमे, बहुत साफ, दीवारों के पार से एक बात आई, जो आर्यन ने सुनी और भुला कभी नहीं पाया — "डाक्टर साहब... मुझे बाहर निकालो... मेरा अंतिम संस्कार तो करा दो... मैं तीस साल से जमा हूँ..."

⏳ सस्पेंस — शाम तक कमरा नंबर 2 में छह शव थे, तो रात को सातवाँ शव अंदर कैसे पहुँचा...? और अगर वह बच्चा तीस साल से वहाँ जमा है, तो तीस साल पहले इस अस्पताल में आखिर हुआ क्या था...?

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