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भाग दूसरा — पहली रात, पहली चिता
Piyashi Atma · Haunted Places · 3 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रात 3 बजे की चिता — श्मशान घाट का नया पहरेदार
- Chapter
- 2 of 2
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 3 min
- Words
- 600
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
ओमकार की पहली रात शुरू हुई — घाट पर खामोशी थी, ऐसी खामोशी जो सिर्फ़ उन जगहों पर होती है जहाँ इंसान अपनी आखिरी साँसें छोड़ते हैं, और जहाँ हवा भी अपनी आवाज़ कम करके चलती है। ओमकार ने रजिस्टर खोला — आज की एक ही एंट्री थी, एक लावारिस लाश की, जो शाम को पुलिस ने लाई थी, एक बूढ़े आदमी की, जिसकी कोई पहचान नहीं थी, कोई नाम नहीं था, कोई पता नहीं था — बस रजिस्टर में लिखा था — "लावारिस — पुरुष — उम्र लगभग 70 — शाम 6 बजे लाया गया — चिता की प्रतीक्षा में।" ओमकार ने सोचा कि सुबह नगरपालिका वाले आएँगे और विधि पूरी करेंगे — उसने लाश को उसी जगह रखा जहाँ लावारिस लाशें रखी जाती थीं, चिता के पास, चंदन की लकड़ी के ढेर के नीचे, और वो अपनी कुर्सी पर बैठ गया, लालटेन जलाए हुए, और रात का इंतज़ार करने लगा।
रात के बारह बजे तक सब कुछ सामान्य था — ओमकार ने अपने फोन पर गाने सुने, किताब पढ़ी, और एक बार तो उसने सोचा भी कि जोगा बापू ने बस डराया था, कुछ नहीं होता यहाँ। पर रात के ढाई बजे, जब ओमकार की नींद भारी होने लगी, तो उसे जोगा बापू का पहला नियम याद आया — तीन बजे से पहले मत सोना — और उसने अपने आप को जगाए रखने के लिए चाय बनाने की तैयारी की। ठीक उसी वक़्त, उसे एक आवाज़ सुनाई दी — लकड़ी की चरमराहट, ऐसी आवाज़ जो तब होती है जब कोई बहुत भारी चीज़ अपनी जगह से हिलती है — और आवाज़ उसी तरफ़ से आई थी, जहाँ वो लावारिस लाश रखी थी।
ओमकार ने लालटेन उठाई और उस तरफ़ देखा — और उसकी साँस उसी पल अटक गई। लावारिस लाश, जो शाम को लाई गई थी, अब उठकर बैठी हुई थी — बिल्कुल सीधी, जैसे कोई आदमी अपने बिस्तर पर बैठ जाता है — और उसकी आँखें खुली थीं, और उन आँखों में, लालटेन की रोशनी में, एक ऐसी चमक थी जो किसी मरे हुए की आँखों में नहीं होनी चाहिए — और फिर, ओमकार के कानों में, एक आवाज़ उतरी — धीमी, रुकी हुई, पर साफ़ — "ओमकार..." — और ओमकार का हाथ लालटेन पर काँपने लगा, क्योंकि उसे जोगा बापू का तीसरा नियम याद आया — कभी जवाब मत देना — और उसने अपने दाँत भींच लिए, अपनी साँस रोक ली, और बस खड़ा रहा, हिला नहीं, बोला नहीं — और लाश उसे देखती रही, और फिर, बहुत धीरे से, उसने अपना हाथ उठाया, और उसकी उंगली ओमकार की तरफ़ उठी, और उसने कहा — "तू मुझे जलाएगा? मैं पचास साल से इंतज़ार कर रहा हूँ — मुझे जलाने वाला आया नहीं — मैं लावारिस हूँ, और लावारिस लोगों की चिता तब तक नहीं जलती, जब तक कोई उनका नाम नहीं लेता — और मैं अपना नाम भूल गया हूँ, पचास साल में मैंने अपना नाम भुला दिया — बस मुझे इतना याद है कि मेरा एक बेटा था, और उसने मुझे यहाँ छोड़कर कहा था — 'बाबूजी, मैं लकड़ी लेकर आता हूँ' — और वो पचास साल से लकड़ी लेकर नहीं आया — क्या तू मुझे जलाएगा, ओमकार? क्या तू मुझे मेरा नाम देगा? क्योंकि जो मुझे मेरा नाम देगा, मैं उसे अपनी सबसे बड़ी दुआ दूँगा — और जो मुझे यहाँ छोड़कर चला जाएगा, मैं उसे अपनी सबसे बड़ी कहानी सुनाऊँगा — और मेरी कहानी, ओमकार, ऐसी है कि सुनने वाले की नींद हमेशा के लिए चली जाती है।"
सस्पेंस — पचास साल से इंतज़ार कर रही यह लाश कौन है...? और ओमकार उसे उसका नाम कैसे देगा, जब लाश खुद अपना नाम भूल चुकी है...?