PretikaHaunted Placesरात 3 बजे की चिता — श्मशान घाट का नया पहरेदार

भाग पहला — नई नौकरी, पुराना घाट

Piyashi Atma · Haunted Places · 4 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रात 3 बजे की चिता — श्मशान घाट का नया पहरेदार
Chapter
1 of 2
Category
Haunted Places
Reading time
4 min
Words
633
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

वाराणसी से सौ किलोमीटर दूर, एक छोटे से कस्बे — रामपुर — के बाहर, गंगा की एक पुरानी बाढ़ की सूखी धारा के किनारे, एक श्मशान घाट है जिसका नाम कस्बे के बूढ़े लोग बिना आवाज़ दबाए नहीं लेते — बस कहते हैं, "घाट पर" — और कहने के बाद अपने बच्चों के सिर पर हाथ फेर लेते हैं। यह घाट पुराना है, बहुत पुराना, और यहाँ का पहरेदार भी हमेशा पुराना ही होता था — जोगा बापू, एक ऐसा आदमी जिसकी उम्र कोई नहीं जानता था, पर जिसे घाट की हर ईंट, हर चिता की राख, और हर उस कहानी का पता था जो इस घाट में कभी जली थी या कभी जलने से रह गई थी।

पर इस कहानी की शुरुआत जोगा बापू से नहीं, बल्कि एक नए लड़के से होती है — ओमकार शिंदे, उम्र चौबीस साल, जिसे शहर में नौकरी न मिलने के बाद कस्बे के नगरपालिका दफ़्तर ने इस घाट का रात का पहरेदार बना दिया था, कहते हुए कि "रात में घाट की देखरेख करनी है — कोई लाश लावारिस आए तो उसका रजिस्टर में नाम लिखना है, और सुबह तक जागना है।" ओमकार को नौकरी चाहिए थी, उसे भूत-प्रेत में विश्वास नहीं था, और उसने सोचा कि रात में अकेले बैठकर सोने से बेहतर है कि वो यह नौकरी कर ले — कम से कम तनख़्वाह तो मिलेगी, और डर? डर तो सिर्फ़ कहानियों में होता है।

पहली रात, जब ओमकार घाट पहुँचा, तो जोगा बापू उसका इंतज़ार कर रहा था — एक पुरानी सी लालटेन जलाए हुए, और उसके चेहरे पर वो भाव थे जो किसी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी को सौंपने वाले के होते हैं। उसने ओमकार को घाट दिखाया — चिताओं की लाइन, राख के ढेर, पुराना कुआँ, और वो दीवार जिस पर काले कोयले से कुछ लिखा था, जो धूल में ढका हुआ था। जोगा बापू ने रजिस्टर सौंपा, चाबियाँ सौंपीं, और फिर उसने ओमकार का कँधा पकड़कर तीनों नियम सुनाए — धीरे-धीरे, हर नियम के साथ एक चेतावनी, और हर चेतावनी के साथ एक ऐसी बात जो ओमकार की हँसी को गले में अटका दे — "बेटा, यहाँ पचास साल से मैं पहरा दे रहा हूँ, और पचास साल में मैंने कभी एक भी नियम नहीं तोड़ा — इसलिए आज मैं जीवित हूँ, और इसलिए आज मैं तुझे यह नौकरी दे रहा हूँ — पर अगर तूने एक भी नियम तोड़ा, तो मैं तुझे बचा नहीं पाऊँगा, क्योंकि यह घाट अपने नियमों से चलता है, और नियम तोड़ने वालों को यह घाट अपने हिसाब में गिन लेता है — और उस हिसाब में गिने हुए लोगों की कोई चिता नहीं जलती, वो बस... यहीं रह जाते हैं।"

ओमकार ने मज़ाक में कहा — "बापू, आप भी, आजकल के ज़माने में भूत-प्रेत? मैं तो साइंस पढ़ा हूँ।" जोगा बापू ने उसकी आँखों में देखा, और बिना कुछ कहे, लालटेन उठाकर चलने लगा — पर जाते-जाते उसने एक बात कही, जो ओमकार के कानों में उस रात बार-बार गूँजी — "साइंस, बेटा, उन चीज़ों का नाम है जिन्हें हम समझ सकते हैं — पर इस घाट में ऐसी चीज़ें भी हैं जिन्हें समझा नहीं जा सकता, बस अनुभव किया जा सकता है — और जो अनुभव करता है, वो या तो साइंस भुला देता है, या ज़िंदगी — आज रात तू जागता रहना, और अगर तीन बजे के बाद कुछ भी सुनाई दे, तो अपनी लालटेन को अपने सीने से लगाकर रखना — क्योंकि लालटेन की रोशनी में वो लोग नहीं आते, जो अँधेरे में आते हैं — और यहाँ अँधेरा, बेटा, बहुत लंबा होता है — तीन बजे से सुबह पाँच बजे तक, दो घंटे, पर वो दो घंटे कभी-कभी पूरी ज़िंदगी से भी लंबे हो जाते हैं।"

सस्पेंस — जोगा बापू ने ऐसी कौन-सी बात छिपाई जो उसने ओमकार को नहीं बताई...? और दीवार पर कोयले से क्या लिखा था, जो धूल में ढका हुआ था...?

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