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भाग छठा — अधूरी मुस्कान
Piyashi Atma · Paranormal · 5 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रात 2 बजे का मैसेज — पेंटिंग में क़ैद
- Chapter
- 6 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 5 min
- Words
- 980
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
वसुंधरा बहुत देर तक चुप रही — इतनी देर कि मानवी को लगा कि शायद उसने बहुत बड़ी ग़लती कर दी है, क्योंकि पेंटिंग की दुनिया में जब वक़्त रुकता है, तो वो रुकता हुआ वक़्त साँसों पर चढ़ने लगता है। और फिर वसुंधरा बोली — धीरे से, ऐसे धीरे से जैसे कोई बहुत पुरानी बात को बहुत सावधानी से खोल रहा हो — "साठ साल में, मानवी, मैंने सैकड़ों लोगों से यह सवाल पूछा — और सबने कहा, 'हाँ, आपकी पेंटिंग सुंदर थी, बहुत सुंदर थी' — और मैं जानती थी कि वो झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि वो डर से बोल रहे थे, मुझे खुश करने के लिए बोल रहे थे — और मैं उन्हें यहीं रखती रही, क्योंकि मुझे उनकी झूठी तारीफ़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था — मुझे तो सच चाहिए था, और सच इतना डरावना होता है कि कोई उसे बोलने की हिम्मत नहीं करता — तुम पहली हो, जिसने मुझसे कहा कि मेरी पेंटिंग अधूरी थी — और तुम्हें कैसे पता कि मैंने अपनी मुस्कान नहीं बनाई थी?"
मानवी ने कहा — "मुझे पता है, वसुंधरा जी, क्योंकि मैंने आपकी पेंटिंग को बहुत देर तक देखा है — और मैंने गौर किया कि आपकी पेंटिंग में आपके होंठों की एक तरफ़ की लकीर ऊपर उठी हुई है, पर दूसरी तरफ़ नहीं — जैसे आप मुस्कुराने ही वाली थीं, और किसी ने आपको रोक दिया — और मुझे पता है कि किसने रोका था — आपके गुरु ने, उसी रात, जब उन्होंने आपको बुलाया था — आप उस रात अपनी मुस्कान बनाने ही वाली थीं, और आपकी मुस्कान आपकी पेंटिंग में क़ैद हो गई, अधूरी, हमेशा के लिए — और वसुंधरा जी, अगर आप चाहें, तो मैं आपकी मुस्कान को पूरा कर सकती हूँ — मुझे चित्र बनाना नहीं आता, पर मुझे लोगों को मुस्कुराना सिखाना आता है — मैं एक टीचर हूँ, और मैंने अपने जीवन में बहुत से बच्चों को मुस्कुराना सिखाया है — और मैं आपको भी सिखा सकती हूँ, बस आपको मुझ पर भरोसा करना होगा, और मुझे अपनी इस दुनिया से बाहर निकलकर, आपके लिए एक ऐसी जगह पर ले जाना होगा, जहाँ आपकी मुस्कान पूरी हो सके — क्योंकि पेंटिंग के अंदर मुस्कान पूरी नहीं होती, मुस्कान तो बाहर की हवा में पूरी होती है।"
वसुंधरा ने मानवी की तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में, साठ साल बाद, एक हल्की-सी चमक उतरी — वो चमक जो किसी के भरोसा करने से पहले की होती है — और उसने कहा — "तुम मुझसे क्या चाहती हो, मानवी? सीधा कहो।" मानवी ने कहा — "मुझे मेरा भाई चाहिए, और मुझे मेरा रास्ता चाहिए — और बदले में, मैं आपको आपकी मुस्कान दूँगी — पर इसके लिए आपको हमें बाहर जाने देना होगा, क्योंकि मैं आपकी मुस्कान यहाँ, इस कमरे में, नहीं बना सकती — आपकी मुस्कान तो उस दुनिया में बनेगी, जहाँ आपकी पेंटिंग लगी है, जहाँ लोग आपको देखते हैं, और जहाँ कोई आपसे कहेगा — सच में, दिल से — कि वसुंधरा, आपकी मुस्कान दुनिया की सबसे सुंदर कृति है, क्योंकि यह मुस्कान साठ साल के इंतज़ार के बाद भी नहीं मिटी — और अगर आपको यह बात कोई पेंटिंग के बाहर खड़ा होकर कहे, तो आप जान जाएँगी कि आपकी कला मर नहीं सकती, क्योंकि आपकी कला में आपकी मुस्कान है, और मुस्कान कभी नहीं मरती, बस कभी-कभी उसे ढूँढने में साठ साल लग जाते हैं।"
वसुंधरा ने अपनी आँखें बंद कीं — और जब उसने उन्हें खोला, तो उसकी आँखों में पानी था, वो पानी जो पेंटिंग के रंगों में घुलकर उन्हें और गहरा बना देता है — और उसने अपना हाथ उठाया, और कमरे की उस दीवार की तरफ़ इशारा किया, जो पेंटिंग की सतह थी — और दीवार पर, धीरे-धीरे, एक दरवाज़ा उभर आया — ऐसा दरवाज़ा जो पहले कभी नहीं था, क्योंकि वसुंधरा ने उसे कभी बनाया ही नहीं था — और उसने कहा — "यह दरवाज़ा मैंने अभी बनाया है, तुम्हारे लिए — पर इस दरवाज़े की एक शर्त है — इस दरवाज़े से सिर्फ़ एक बार निकला जा सकता है, और जो निकलेगा, उसे मुझसे वादा करना होगा कि वो मुझे मेरी मुस्कान दिलाएगा — और अगर तुमने वादा तोड़ा, मानवी, तो मैं तुम्हें ढूँढ लूँगी, चाहे तुम दुनिया के किसी भी कोने में हो — क्योंकि अब मैं जानती हूँ कि बाहर की दुनिया में मुझे ढूँढने वाले भी होते हैं, और मुझे मुस्कुराने वाले भी।" मानवी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा — "वादा है, वसुंधरा जी — मैं आपकी मुस्कान पूरी करूँगी, और मैं आपको आपकी कला लौटाऊँगी — बस आप मुझे और मेरे भाई को जाने दीजिए।" और वसुंधरा ने दरवाज़ा खोला — और दरवाज़े के पीछे, गैलरी की असली दुनिया थी — पर जैसे ही मानवी और रोहन ने कदम बढ़ाया, वसुंधरा ने आखिरी बात कही, जिसने मानवी के कदम रोक दिए — "और हाँ, मानवी — जब तुम बाहर निकलो, तो गैलरी के उस कोने में मत देखना, जहाँ मेरी हड्डियाँ दबी हैं — क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम मुझे उस हालत में देखो — मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे मेरी मुस्कान के साथ याद रखो — और एक बात और — मेरे गुरु अब भी जीवित हैं, उम्र पचासी साल, और वो आज भी इसी शहर में रहते हैं — और मुझे पता है कि वो हर साल, मेरी बरसी पर, इस गैलरी के सामने से गुज़रते हैं, बिना अंदर आए, बिना रुके — तो जब तुम बाहर निकलो, तो उनसे मेरी एक बात कहना — कि वसुंधरा ने उन्हें माफ़ कर दिया, क्योंकि उसने सीख लिया है कि क़ैद करने वाला कभी आज़ाद नहीं होता, और क़ैद होने वाला कभी हारता नहीं — बस वक़्त का फ़र्क़ होता है, और वक़्त हमेशा क़ैद होने वालों का साथ देता है, क्योंकि वक़्त खुद क़ैदी होता है, अपने ही चक्कर का।"
सस्पेंस — वसुंधरा के गुरु जीवित हैं...! क्या मानवी उनसे मिलेगी...? और क्या पचासी साल के बूढ़े देशपांडे को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी...?