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भाग पाँचवाँ — पेंटिंग के अंदर की दुनिया
Piyashi Atma · Paranormal · 4 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रात 2 बजे का मैसेज — पेंटिंग में क़ैद
- Chapter
- 5 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 4 min
- Words
- 684
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
पेंटिंग के अंदर की दुनिया — वो दुनिया जैसी होती है जब कोई आप किसी पुरानी तस्वीर में घुस जाए — सब कुछ वैसा ही था जैसा 1962 की गैलरी में रहा होगा, पर सब कुछ थोड़ा-सा बदला हुआ, जैसे किसी ने वक़्त को रोककर उसे अपनी मर्ज़ी से रंग दिया हो। कमरे की खिड़की से वही नज़ारा दिखता था जो पेंटिंग में बना था, पर जब मानवी ने खिड़की से बाहर झाँका, तो उसने देखा कि बाहर कुछ नहीं है — सिर्फ़ एक सफ़ेद रोशनी है, ऐसी रोशनी जो कैनवास के पिछले हिस्से की होती है, और उसने समझ लिया कि यह दुनिया सिर्फ़ उतनी ही है जितनी पेंटिंग में बनी है — इसके आगे कुछ नहीं, इसके पीछे कुछ नहीं।
रोहन उसी कमरे के कोने में बैठा था — जीवित, सलामत, पर बदला हुआ, क्योंकि उसकी आँखों में अब वो रहस्य थे जो सिर्फ़ उन लोगों की आँखों में आते हैं जिन्होंने किसी ऐसी दुनिया देखी हो जहाँ से वापसी का रास्ता नहीं दिखता। उसने मानवी को देखा और रो पड़ा — "बहन, तू यहाँ क्यों आई? मैंने तुझे इसलिए मैसेज किया था कि तू मुझे ढूँढे, पर मैंने यह नहीं चाहा था कि तू भी यहाँ आ जाए — यहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं है, मैंने तीन दिन तक हर दीवार हिलाई, हर खिड़की खोली — यहाँ तक कि मैंने पेंटिंग के बने हुए दरवाज़े को भी धकेला, पर दरवाज़े के पीछे दीवार है, असली दीवार, क्योंकि वसुंधरा ने इस दुनिया को बनाते वक़्त दरवाज़ा तो बनाया था, पर उसके पीछे का रास्ता बनाना भूल गई थी — और वो कहती है कि रास्ता उसी दिन बनेगा, जिस दिन उसे उसका जवाब मिलेगा।"
और तब वसुंधरा आई — उसी कमरे में, उसी खिड़की के पास, जहाँ वो हमेशा खड़ी रहती थी — और उसका रूप पेंटिंग जैसा ही था, पर उसकी आँखें पेंटिंग से कहीं ज़्यादा गहरी थीं, और उनमें साठ साल का अकेलापन बसा हुआ था। उसने मानवी को देखा और कहा — "तुम्हें मैंने बुलाया नहीं था, मानवी — तुम खुद आई, अपने भाई के लिए — और मैं उन लोगों की इज्ज़त करती हूँ जो किसी के लिए आते हैं, क्योंकि मेरे लिए कोई नहीं आया था — साठ साल में कोई नहीं — न मेरे माता-पिता, जिन्हें बताया गया कि मैं भाग गई हूँ, न मेरे दोस्त, जिन्होंने मुझे भुला दिया, न मेरे गुरु, जिन्होंने मुझे यहाँ रखा — तो अब तुम बताओ, मानवी, तुम्हारे पास मेरा जवाब है? तुमने मेरी पेंटिंग देखी — बताओ, क्या वो सुंदर थी? क्या उसके लिए मेरी जान जाना सही था? और ध्यान से जवाब देना — क्योंकि मैं झूठ पहचानती हूँ, साठ साल से मैंने बहुत से लोगों को झूठ बोलते सुना है, और झूठ बोलने वालों को मैं यहीं रखती हूँ, अपने पास, ताकि वो मुझसे सच सीखें।"
मानवी ने रोहन का हाथ पकड़ा, और उसने वसुंधरा की आँखों में देखा — और उसने वो कहा जो उसके दिल में था, बिना सोचे, बिना डरे — "वसुंधरा जी, आपकी पेंटिंग सुंदर नहीं थी।" कमरे की हवा जम गई — रोहन ने अपनी बहन का हाथ कसकर पकड़ लिया — और वसुंधरा की आँखें सिकुड़ गईं, और उसकी आवाज़ में एक ऐसी ठंडक उतरी जो पेंटिंग के रंगों को भी जमा सकती थी — "क्या कहा तुमने?" मानवी ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखा और कहा — "मैंने कहा, आपकी पेंटिंग सुंदर नहीं थी — क्योंकि आपकी पेंटिंग सुंदर हो ही नहीं सकती थी — आपकी पेंटिंग तो अधूरी थी, वसुंधरा जी — आपने अपना चेहरा बनाया, आपने खिड़की बनाई, आपने कमरा बनाया — पर आपने अपनी पेंटिंग में अपनी मुस्कान नहीं बनाई — आपने अपनी आँखों में वो चमक नहीं बनाई जो आपकी आँखों में उस वक़्त होगी जब आप अपना सबसे अच्छा चित्र बनाएँगी — और वो चित्र अभी बाकी है, वसुंधरा जी — आपकी सबसे सुंदर कृति अभी आपके अंदर है, बिना बने हुए — और जिस कलाकार की सबसे सुंदर कृति अधूरी हो, उसकी पूरी हुई कृति को सुंदर कैसे कहा जा सकता है?"
सस्पेंस — वसुंधरा इस जवाब पर क्या करेगी...? क्या यह जवाब उसे रिहा करेगा, या मानवी की यह बात उसे और क़ैद कर देगी...?