Pretika › Paranormal › रात 2 बजे का मैसेज — पेंटिंग में क़ैद
भाग चौथा — वसुंधरा की कहानी
Piyashi Atma · Paranormal · 5 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रात 2 बजे का मैसेज — पेंटिंग में क़ैद
- Chapter
- 4 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 5 min
- Words
- 807
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मानवी ने चिट्ठी खोली — और गैलरी की उस धुंधली रोशनी में, उसने वो कहानी पढ़ी जो किसी किताब में कभी नहीं छपी थी, क्योंकि यह कहानी सिर्फ़ एक चिट्ठी में बंद थी, और चिट्ठी उसी के हाथ लगती थी जिसे गैलरी बुलाती थी। चिट्ठी में लिखा था — "मैं वसुंधरा कानूनगो, साल 1962 में पुणे की सबसे होनहार चित्रकार मानी जाती थी, और मेरे गुरु थे श्रीनिवास देशपांडे — वो आदमी जिसने मुझे ब्रश पकड़ना सिखाया था, और जिसने एक दिन मुझसे कहा था — 'बेटी, तुम्हारे अंदर वो चिंगारी है जो मुझमें कभी नहीं थी — एक दिन तुम मुझसे आगे निकल जाओगी।' मैंने उस दिन उनकी बात को आशीर्वाद समझा था — पर वो आशीर्वाद नहीं, ईर्ष्या थी, और ईर्ष्या उस दिन फूटी जब मैंने अपना आत्म-चित्र बनाना शुरू किया — एक ऐसा चित्र जिसे देखकर पूरी गैलरी का शहर बोल उठा था — 'यह तो जीवित है, यह तो बोलती हुई लगती है।'"
"मेरे गुरु ने उस चित्र को देखा — और उन्होंने उस रात मुझे गैलरी में बुलाया, कहा कि वो मेरी तस्वीर को अंतिम रूप देंगे। मैं गई — और वहाँ उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें एक ऐसा विद्या आती है, एक ऐसी पुरानी विद्या जिसमें चित्रकार अपने चित्र को हमेशा के लिए जीवित रख सकता है — बस उसके लिए चाहिए कि चित्र बनते ही उसका बनाने वाला उसमें अपनी साँस दे दे। मैंने मज़ाक समझकर हँस दिया — और उन्होंने मेरे हँसते हुए चेहरे को देखकर कहा — 'तो फिर दे दो अपनी साँस, वसुंधरा — इस चित्र में, अभी, इसी वक़्त — क्योंकि यह चित्र तुम्हारा नहीं, यह चित्र मेरा है — मैंने तुम्हें बनाया है, और अब मैं तुम्हें अपने चित्र में रखूँगा, ताकि दुनिया कहे कि श्रीनिवास देशपांडे ने एक ऐसा चित्र बनाया जो हमेशा जीवित रहेगा — और तुम? तुम बस उस चित्र के अंदर रहोगी, मेरी सबसे बड़ी कृति बनकर।' और उन्होंने वो किया जो उन्होंने कहा था — मैं नहीं जानती कैसे, मैं नहीं जानती किस विद्या से, पर उस रात मैं अपने ही चित्र में उतर गई, और मेरा शरीर गैलरी के उसी कोने में गिरा, जहाँ आज भी मिट्टी के नीचे मेरी हड्डियाँ दबी हुई हैं — और मेरे गुरु ने दुनिया को कहा कि मैं शहर छोड़कर चली गई हूँ, कहीं, बिना बताए।"
मानवी ने चिट्ठी का आखिरी हिस्सा पढ़ा, जिसमें लिखा था — "और उस दिन से मैं इस पेंटिंग में हूँ — साठ साल से — और साठ साल में मैंने बहुत कुछ सीखा — मैंने सीखा कि मैं उन लोगों को अपने पास बुला सकती हूँ जो मुझे देखते हैं, मैंने सीखा कि मैं उन्हें अपनी दुनिया में उतार सकती हूँ, और मैंने यह भी सीखा कि मैं उन्हें वापस छोड़ सकती हूँ — पर मैं किसी को वापस नहीं छोड़ती, क्योंकि मुझे एक चीज़ चाहिए, जो मुझे आज तक नहीं मिली — मुझे मेरा जवाब चाहिए — कि जिस चित्र के लिए मेरी जान गई, क्या वो चित्र सच में सुंदर था? क्या किसी ने उसे देखकर कभी यह कहा कि वसुंधरा की यह कृति उसकी जान से बड़ी थी? और जब तक मुझे यह जवाब नहीं मिलेगा — सच्चा जवाब, किसी ऐसे इंसान से जो कला को समझता हो और झूठ को नहीं — मैं इस गैलरी को अपने मेहमानों से भरती रहूँगी, क्योंकि मैं अकेली नहीं रह सकती — साठ साल बहुत होते हैं, और अकेलापन पेंटिंगों को भी पागल कर देता है।"
मानवी ने चिट्ठी नीचे रखी — और उसकी आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि उसे रोहन की याद आई, जो अब उसी पेंटिंग में था, और उसे वसुंधरा की भी याद आई, जो साठ साल से एक जवाब के लिए तड़प रही थी। उसने हिम्मत करके गैलरी के बीच में खड़े होकर कहा — "वसुंधरा जी, मैं आपकी कहानी सुन चुकी हूँ — और मैं आपको आपका जवाब दूँगी, पर मेरी एक शर्त है — पहले मुझे मेरे भाई से मिलने दीजिए, उस पेंटिंग के अंदर, ताकि मैं उसे बता सकूँ कि मैं उसे लेने आई हूँ, और उसके बाद मैं आपके सवाल का जवाब दूँगी — एक ऐसा जवाब जो आपने साठ साल में कभी नहीं सुना होगा।" गैलरी में खामोशी छा गई — और फिर, धीरे-धीरे, 1962 वाली पेंटिंग की सतह पर, एक हलचल उतरी, और पेंटिंग में खड़ी वसुंधरा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया — मानवी की तरफ़ — और मानवी ने अपना हाथ बढ़ाया, और उसका हाथ पेंटिंग की सतह से होकर अंदर उतर गया — ठंडा, गीला, कैनवास जैसा — और अगले ही पल, मानवी भी पेंटिंग के अंदर थी, उसी कमरे में, जहाँ उसका भाई उसका इंतज़ार कर रहा था — और उसके पीछे, पेंटिंग की सतह, दीवार जैसी हो गई, और उस पर लिखा उतरा — "अब तुम दोनों मेरी मेहमान हो — और मेहमान अपनी मेज़बान की कहानी सुने बिना नहीं जाते।"
सस्पेंस — मानवी भी पेंटिंग में क़ैद...! अब कौन इन दोनों को बाहर निकालेगा...?