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भाग तीसरा — कस्तूरी आर्ट गैलरी
Piyashi Atma · Paranormal · 3 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रात 2 बजे का मैसेज — पेंटिंग में क़ैद
- Chapter
- 3 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 3 min
- Words
- 596
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मानवी उसी शाम पुणे के पुराने शहर पहुँची — कस्तूरी आर्ट गैलरी, एक दो मंज़िला पुरानी इमारत, जिसके बाहर का बोर्ड धूल से ढका था, पर जिसके दरवाज़े पर एक नया-सा, चमकता हुआ ताला लगा था — ऐसा ताला जो किसी बंद इमारत पर नहीं लगता, बल्कि किसी ऐसी इमारत पर लगता है जहाँ कोई नहीं चाहता कि अंदर वाला बाहर आए। मानवी ने ताले को हाथ लगाया — और ताला उसके हाथ में ही खुल गया, बिना चाबी के, जैसे ताला इंतज़ार कर रहा था कि कोई उसे छुए। अंदर की हवा में इत्र और तारपीन की मिली-जुली गंध थी, और गैलरी के अंदर, दीवारों पर, पेंटिंगें लगी थीं — दर्जनों पेंटिंगें, सब एक ही लड़की की बनाई हुई, और सबमें वही खिड़की, वही पोशाक, वही चेहरा — पर हर पेंटिंग में लड़की के साथ कोई न कोई और भी था — किसी में एक बूढ़ा आदमी, किसी में एक युवती, किसी में एक बच्चा — और हर पेंटिंग के नीचे एक तारीख़ लिखी थी, 1962 से शुरू होकर, और आखिरी पेंटिंग पर तारीख़ थी — कल की।
आखिरी पेंटिंग में रोहन था — खिड़की के पास खड़ा, उसी कमरे में जो तस्वीर में दिखा था, और उसके चेहरे पर अब चिल्लाने वाली हालत नहीं थी — अब उसके चेहरे पर वो शांति थी जो किसी के हार मान लेने पर आती है, और उसकी आँखों में वो गुज़ारिश थी जो सिर्फ़ पढ़ी जा सकती है, सुनी नहीं जा सकती। मानवी ने पेंटिंग को छुआ — और उसी पल, गैलरी में हलचल हुई — सभी पेंटिंगों में, एक साथ, सभी चेहरे मानवी की तरफ़ घूम गए — और उसने अपने कानों से सुना, बहुत साफ़, बहुत करीब से, एक लड़की की आवाज़ — "मानवी, तुम आ गईं — मुझे पता था तुम आओगी, क्योंकि मैंने तुम्हारे भाई को इसलिए चुना था कि उसकी बहन उसे ढूँढने ज़रूर आएगी — और मुझे एक ऐसी इंसान चाहिए थी जो किसी को खोने का दर्द जानती हो — क्योंकि मेरी कहानी सुनने के बाद, तुम ही तय करोगी कि रोहन को यहाँ से निकालने की क़ीमत क्या है, और वह क़ीमत कौन चुकाएगा — तुम, या मैं, या वो, जिसने मुझे साठ साल पहले इसी गैलरी में, इसी तरह, अपनी पेंटिंग में क़ैद करके छोड़ दिया था।"
मानवी की आँखें उस पेंटिंग पर टिकीं जो सबसे पुरानी थी — 1962 वाली — जिसमें लड़की अकेली थी, और जिसके नीचे प्लेट लगी थी, जिस पर लिखा था — "वसुंधरा — आत्म-चित्र — अधूरा" — और मानवी ने पेंटिंग के पीछे देखा, तो उसके पीछे, एक पुरानी चिट्ठी टँगी थी, जिसकी स्याही फीकी पड़ चुकी थी, पर जिसकी पहली पंक्ति आज भी साफ़ पढ़ी जा सकती थी — "जिसने भी इस चिट्ठी को पढ़ा, वह मेरी कहानी सुनने के लिए बाध्य है — मैं वसुंधरा हूँ, और मुझे इस पेंटिंग में मेरे अपने गुरु ने क़ैद किया था — और मैं आज भी उसी गुरु को ढूँढ रही हूँ, ताकि मैं उससे पूछ सकूँ कि उसने मुझे क़ैद करके क्या पाया — और जब तक मुझे मेरा जवाब नहीं मिलेगा, मैं हर उस इंसान को यहाँ रखूँगी जो मेरी पेंटिंग को देखेगा — क्योंकि शायद किसी की आँखों में मुझे मेरा गुरु दिख जाए, या शायद कोई मुझे वो बता सके जो मैं साठ साल से पूछ रही हूँ — कि जिस पेंटिंग को बनाने में मेरी जान गई, उस पेंटिंग को देखकर किसी ने भी एक बार कहा कि यह सुंदर है?"
सस्पेंस — वसुंधरा के गुरु ने उसे पेंटिंग में क्यों क़ैद किया था...? और क्या मानवी के पास उस सवाल का जवाब है जो साठ साल से अनुत्तरित है...?