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भाग 9: धुआंधार का महा-पतन, पाताल-कुंड का विस्फोट और तंत्रेश्वर की रक्त-काया का संहार
Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 12 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
- Chapter
- 9 of 15
- Category
- Tantrik & Black Magic
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2346
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
गर्भगृह की टूटी हुई छत से नीचे उतरे उस दस फीट ऊंचे दैत्य के जलते हुए पंजे ने रुद्र की गर्दन को इतनी बर्बरता से जकड़ लिया था कि उसकी ग्रीवा की नसें खिंचकर फटने की कगार पर पहुंच गई थीं।
तंत्रेश्वर के वे छह-छह इंच लंबे, काले और जहरीले नाखून रुद्र के गले की त्वचा को चीरकर भीतर धंस रहे थे। उन नाखूनों से रिसता हुआ पिघला हुआ लावा और गंधक का तेजाब रुद्र के सीने पर बूंद-बूंद टपक रहा था, जिससे मांस के जलने की तीखी, चरचराती गंध हवा में फैल रही थी।
रुद्र जमीन से चार फीट ऊपर हवा में झूल रहा था। उसके पैर छटपटा रहे थे और फेफड़ों के भीतर हवा का एक भी कतरा बाकी नहीं बचा था। उसकी आंखें बाहर उबलने को हो गई थीं और मस्तिष्क के भीतर खून का दबाव इतना बढ़ गया था कि कानों में सायं-सायं की सीटी बजने लगी थी।
फर्श पर उसका 'काल-भैरव खड्ग' छूटकर गिर चुका था।
"हाहाहाहा! कहाँ गया तेरा वह शास्त्रीय ज्ञान, विद्याधर के कीड़े?"
गर्भगृह की छत के ऊपर से तंत्रेश्वर का वह सींगों वाला, भयानक चेहरा नीचे झांक रहा था। उसकी तीन-तीन सुलगती हुई लाल आंखें रुद्र की तड़प को देखकर किसी पिशाच की तरह तृप्त हो रही थीं।
"तेरा रक्त अब सीधे इस गर्भगृह के पाताल-कुंड में गिरेगा... और जैसे ही तेरे शास्त्रीय कुल का यह अंतिम रक्त नर्मदा के इस खौलते जल में मिलेगा, मेरी यह रक्त-अस्थि काया अजर-अमर हो जाएगी!"
रुद्र की चेतना का अंतिम धागा टूटने ही वाला था। अंधकार उसकी आंखों के आगे तैरने लगा था।
लेकिन उस चरम, जानलेवा पल में भी... जब इंसान का भौतिक मस्तिष्क हार मान लेता है, रुद्र के भीतर उसके पूर्वजों की 200 साल पुरानी तांत्रिक साधना और काशी के मणिकर्णिका का वह अघोर संकल्प एक बार फिर जागृत हो उठा।
रुद्र ने अपने नश्वर शरीर के दर्द को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया। उसने अपनी आधी खुली आंखों से नीचे फर्श की ओर देखा।
फर्श पर, भगवान शिव की उस प्राचीन जलहरी के आधार पर गड़ा वह 'श्री-भैरवी महा-चक्र' और उसके केंद्र में धंसा हुआ वह पारद शिवलिंग अब सूर्य के समान प्रचंड, अंधा कर देने वाली श्वेत और स्वर्णिम किरणों से धधक रहा था। और उस दिव्य चक्र से निकली ऊर्जा की लपटें सीधे फर्श पर गिरे उस अष्टधातु के काल-भैरव खड्ग के भीतर समा रही थीं!
खड्ग अब कोई साधारण धातु का हथियार नहीं था; वह साक्षात 'काल-अग्नि' का त्रिशूल बन चुका था।
तभी, गर्भगृह की दहलीज पर एक चमत्कारिक, अलौकिक घटना घटी।
द्वार पर 10वीं शताब्दी से शांत बैठी भगवान शिव के वाहन नंदी की वह विशाल, पाषाण-प्रतिमा के पत्थरों में अचानक एक गहरा, आकाशीय कंपन हुआ!
कड़कड़ाssssहट!
उस प्राचीन काले कसौटी पत्थर के नंदी की पाषाण-आंखों में साक्षात रुद्र-तेज की नीली ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। नंदी की पाषाण-गर्दन में 'कटकट' की आवाज हुई। वह सदियों पुरानी पत्थर की मूर्ति अपने आसन से एक झटके में हिली, और नंदी के दाहिने पाषाण-सींग से शुद्ध स्वर्णिम बिजली का एक ऐसा प्रचंड त्रिशूल-रूपी प्रहार निकला जिसने गर्भगृह की छत से नीचे लटके तंत्रेश्वर के उस विशाल, जलते हुए हाथ की कलाई पर सीधे वार कर दिया!
कड़ाssssक!
नंदी के उस दिव्य पाषाण-प्रहार का प्रभाव ऐसा था मानो किसी ने पर्वत के शिखर पर वज्र मार दिया हो।
तंत्रेश्वर की वह पिघलते लावे और हड्डियों से बनी कलाई एक ही सेकंड में चटककर आधी कट गई। काले धुएं और सड़े हुए खून का एक फव्वारा छूटा। तंत्रेश्वर दर्द से ऐसा दहाड़ उठा कि भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानों से पत्थर टूट-टूटकर नीचे नदी में गिरने लगे।
उस भयानक झटके से तंत्रेश्वर के पंजे की पकड़ रुद्र के गले से एक पल के लिए ढीली पड़ गई।
रुद्र ने उस एक मिलीसेकंड के अवसर को नहीं गंवाया।
उसने अपने दोनों हाथों से तंत्रेश्वर के उस जलते हुए अंगूठे को पूरी ताकत से पीछे की ओर मरोड़ा और खुद को उस खूनी शिकंजे से छुड़ाकर सीधे नीचे फर्श की ओर छलांग लगा दी!
धड़ाम!
रुद्र गर्भगृह के संगमरमरी फर्श पर गिरा। उसने खांसते हुए ताजी हवा को पागलों की तरह अपने फेफड़ों में खींचा। उसके गले से खून बह रहा था, लेकिन उसके हाथ ने एक सेकंड भी गंवाए बिना फर्श पर पड़े उस दहकते हुए काल-भैरव खड्ग को दोनों हाथों से थाम लिया।
जैसे ही रुद्र के खून से सने हाथों का स्पर्श उस खड्ग से हुआ, श्री-भैरवी चक्र की संपूर्ण स्वर्णिम और नीली ऊर्जा कबीर/रुद्र की नसों में उतर गई।
"तंत्रेश्वर!" रुद्र की गर्जना गर्भगृह की दीवारों को फाड़ती हुई बाहर गूंजी। "तूने देवाधिदेव महादेव के मंदिर की पवित्रता को दूषित किया है... आज तेरी इस अधर्म-रूपी काया का विसर्जन स्वयं नर्मदा के इस महा-प्रपात में होगा!"
रुद्र ने गर्भगृह के टूटे हुए खंभों पर अपने बूट जमाए। वह किसी पहाड़ी तेंदुए की अमानवीय फुर्ती के साथ, टूटे हुए पत्थरों की आड़ लेता हुआ सीधे मंदिर की छत पर जा चढ़ा!
छत पर पहुंचते ही रात का भयानक, तूफानी दृश्य सामने आया।
मंदिर की गोलाकार छत के ऊपर खड़े होते ही नीचे का भूगोल रोंगटे खड़े कर देने वाला था।
मंदिर की इस तीन सौ फीट ऊंची खड़ी पहाड़ी के ठीक नीचे नर्मदा की वह संकरी संगमरमरी घाटी थी, जहाँ उबलता हुआ लाल पानी किसी पागल अजगर की तरह फुफकारता हुआ सीधे उस प्रसिद्ध धुआंधार जलप्रपात की ओर बह रहा था। जलप्रपात की गर्जना कान के पर्दे फाड़ रही थी और नीचे 100 फीट गहरे गर्त में गिरता हुआ पानी भाप और धुएं का एक विशाल, डरावना बवंडर बना रहा था।
और उस टूटी हुई छत के ठीक बीचों-बीच... दस फीट ऊंचा वह रक्त-अस्थि दैत्य (तंत्रेश्वर) खड़ा था!
उसकी कलाई नंदी के प्रहार से जख्मी थी, लेकिन नर्मदा के उस पाताल-कुंड से निकलती काली लपटें उस घाव को फिर से भर रही थीं। तंत्रेश्वर के हाथों में वे दोनों विशाल पाषाण-त्रिशूल आग उगल रहे थे।
"तू ऊपर आ गया, कीड़े?" तंत्रेश्वर का वह विकृत, सींगों वाला चेहरा भयानक रूप से हंसा। "अब यहाँ न कोई चौखट है, न कोई नंदी की आड़! इस तीन सौ फीट की ऊंचाई से तेरी हड्डियों का चूरा नीचे उस संगमरमर की चट्टानों पर बिखरेगा!"
तंत्रेश्वर ने अपने दोनों पाषाण-त्रिशूलों को हवा में लहराया और पूरी दैहिक ताकत से रुद्र की छाती की ओर एक साथ झोंक दिया!
सननन! हवा चीरती हुई आई!
रुद्र पीछे नहीं हटा। उसने अपनी बाईं हथेली पर पारद शिवलिंग को उठाया और दाहिने हाथ में उस जलते हुए काल-भैरव खड्ग को सीधा तान दिया।
कड़ाssssक! भभक!
खड्ग और पाषाण-त्रिशूलों के बीच ऐसा महा-टकराव हुआ कि पूरी छत पर नीली, लाल और स्वर्णिम चिंगारियों की बारिश हो गई। रुद्र का शरीर उस भीषण धक्के से पीछे फिसला, उसकी एड़ियां छत की मुंडेर से टकराईं, जिसके नीचे सीधे तीन सौ फीट गहरी अंधी खाई थी।
लेकिन रुद्र का संतुलन नहीं बिगड़ा।
तभी, नीचे मंदिर के खुले वृत्ताकार प्रांगण से एक अभूतपूर्व दृश्य उभरा।
वे चौंसठ पाषाण-योगिनियां, जिन्हें रुद्र ने श्री-भैरवी चक्र के माध्यम से शुद्ध किया था, नीचे प्रांगण में एक साथ हाथ जोड़कर खड़ी थीं।
उन चौंसठों पाषाण-देवियों के मस्तक से एक साथ शुद्ध स्वर्णिम प्रकाश की चौंसठ किरणें फूटीं! वे सभी किरणें हवा में एक साथ मिलकर एक विशाल, प्रचंड प्रकाश-पुंज बन गईं और सीधे ऊपर छत पर खड़े रुद्र के काल-भैरव खड्ग के भालों में समा गईं!
चौंसठ योगिनियों ने अपने इस उद्धारक को अपनी संपूर्ण दिव्य शक्ति का आशीर्वाद सौंप दिया था!
खड्ग का तेज अब किसी एक छोटे सूर्य जैसा प्रज्वलित हो उठा। उस प्रकाश के आगे तंत्रेश्वर की लाल, शैतानी आंखें चौंधिया गईं।
"आह! यह प्रकाश... यह मुझे अंधा कर रहा है!" तंत्रेश्वर लड़खड़ाया।
रुद्र ने उस एक क्षण का लाभ उठाया।
उसने हवा में एक अविश्वसनीय छलांग लगाई। उसका शरीर प्रकाश के एक तीर की तरह उड़ा। उसने अपने दोनों हाथों से उस महा-खड्ग को पकड़ा और सीधे तंत्रेश्वर की उस विशाल रक्त-काया के सबसे संवेदनशील केंद्र—उसकी नाभि और रीढ़ के जोड़ पर—पूरी शक्ति से उतार दिया!
यही वह केंद्र था जहाँ से वह नर्मदा के उस पाताल-कुंड से उबलते हुए रक्त-जल को खींच रहा था।
कड़ाssssक! चर्रर्र!
खड्ग तंत्रेश्वर की हड्डियों के पिंजरे और उस खौलते हुए लावे के केंद्र को चीरता हुआ उसकी रीढ़ के आर-पार निकल गया!
"ॐ नमः शिवाय! हे महाकाल... इस पापी का संहार करो!" रुद्र का कंठ दहाड़ उठा।
उस वार का प्रभाव इतना प्रचंड था कि तंत्रेश्वर की दस फीट ऊंची रक्त-अस्थि देह के भीतर बंधा हुआ वह सारा तांत्रिक रसायन और खून एक ही सेकंड में विस्फोटित हो गया।
तंत्रेश्वर के कंठ से निकली वह अंतिम चीख धुआंधार जलप्रपात की गर्जना को भी दबाती हुई कई किलोमीटर दूर तक गूंज उठी:
"आaaaaah! मेरी काया... मेरा चक्र टूट गया!"
उसकी देह के पत्थर, हड्डियां और लावा आपस में टूटने लगे।
रुद्र ने अपने बूट की एक जोरदार ठोकर तंत्रेश्वर की छाती पर मारी।
उस ठोकर से तंत्रेश्वर का वह टूटता हुआ, जलता हुआ दस फीट का राक्षस-शरीर छत की मुंडेर से फिसला...
और हवा में चक्कर काटता हुआ, सीधे उस तीन सौ फीट गहरी खाई में, नीचे नर्मदा के उस खौलते हुए धुआंधार जलप्रपात के मुख्य गर्त में जा गिरा!
धड़ामssss! छपाक!
जैसे ही वह विशाल शव जलप्रपात के भंवर में गिरा, पानी की सतह से सौ फीट ऊंची लाल लपटें और भाप का बवंडर उठा।
लेकिन रुद्र जानता था कि केवल देह का गिरना पर्याप्त नहीं था। जब तक वह पाताल-कुंड शांत नहीं होगा, यह नदी उबलती रहेगी।
रुद्र ने तुरंत छत से नीचे छलांग लगाई और गर्भगृह के भीतर उस खुले हुए नर्मदा पाताल-कुंड के मुहाने पर पहुंचा।
उसने अपने दोनों हाथों में उस पारद शिवलिंग को उठाया।
"हे माते नर्मदे... हे शिव-तनया! अपने इस पावन स्वरूप को पुनः धारण करो!" रुद्र ने पूरी श्रद्धा और अंतरात्मा से प्रार्थना की।
उसने उस पवित्र, तेजस्वी पारद शिवलिंग को सीधे उस खौलते हुए पाताल-कुंड के जलमार्ग के भीतर विसर्जित कर दिया!
छपाक... भभक!
पारद साक्षात भगवान शिव का स्वरूप था। जैसे ही वह दिव्य शिवलिंग उस पाताल-कुंड की गहराइयों में उतरा, एक चमत्कारिक आध्यात्मिक शीतलता उस पूरे भूमिगत जल-तंत्र में बिजली की तरह दौड़ गई।
धुआंधार जलप्रपात और भेड़ाघाट की उस पूरी संगमरमरी घाटी में एक ऐसा शांत, दिव्य कंपन हुआ जिसने प्रकृति के सारे नियमों को शुद्ध कर दिया।
नर्मदा का वह खौलता हुआ, लाल तेजाबी पानी एक ही सेकंड में उबलना बंद हो गया!
उसका गहरा लाल रंग तेजी से बहकर निकल गया और उसकी जगह नर्मदा का वही चिर-परिचित, अमृत-तुल्य, शीतल और दूधिया-सफेद संगमरमरी जल कलकल करता हुआ बहने लगा।
जलप्रपात से उठने वाली वह भाप अब सड़ी हुई चर्बी की नहीं थी; वह ताजे जल की शीतल फुहारों और हवा में घुली कपूर की खुशबू में बदल चुकी थी।
संगमरमर की वे पीली, हड्डियों जैसी दिखने वाली चट्टानें पूर्णिमा के चांद की रोशनी में फिर से चांदी जैसी धवल और पवित्र चमकने लगीं।
नर्मदा का महा-शुद्धिकरण पूर्ण हो चुका था!
लेकिन ठीक उसी समय...
नीचे धुआंधार जलप्रपात के उस शांत होते हुए भंवर के भीतर से, जहाँ तंत्रेश्वर का शरीर गिरा था... काले धुएं की एक अत्यंत घनी, चीखती हुई प्रेत-आत्मा बाहर निकली!
वह तंत्रेश्वर की मूल, अविनाशी काली चेतना (Astral Wraith) थी!
उसका यह दूसरा शरीर भी नष्ट हो चुका था, लेकिन उसकी तांत्रिक आत्मा अभी भी जीवित थी। वह रूह हवा में एक विशाल, काले ड्रैगन जैसी आकृति बनाकर मंदिर की पहाड़ी के ऊपर मंडराने लगी।
उसकी आंखें कबीर/रुद्र की ओर देखकर प्रतिशोध के खूनी अंगारे बरसा रही थीं।
"रुद्र... तूने नर्मदा को बचा लिया... तूने मेरी इस दूसरी काया को भी जला दिया..." उस प्रेत-आत्मा की आवाज बादलों की गड़गड़ाहट की तरह गूंजी।
"लेकिन कल रात... सोमवती अमावस्या की ठीक मध्यरात्रि को मेरा अंतिम और सबसे भयानक तांत्रिक महा-यज्ञ होकर रहेगा! और वह यज्ञ मध्य प्रदेश के चंबल के बीहड़ों में स्थित 'मितावली' के 64 योगिनी मंदिर (एकत्तरसो महादेव मंदिर) में होगा!"
उस काली रूह ने अपनी भयानक, अमूर्त उंगली उत्तर-पश्चिम की दिशा की ओर उठाई।
"मितावली का वह मंदिर साक्षात काल-चक्र है... वहां 64 कमरों का वह अष्ट-तांत्रिक घेरा सीधे पूरे आर्यावर्त के श्मशानों को बांधता है! कल रात 12:00 बजे तक यदि तू वहां नहीं पहुंचा... तो तेरी कुल-देवी की बलि के साथ उस मंदिर के 64 शिवलिंगों से जो विष निकलेगा, वह इस पूरे देश को एक ही रात में मुर्दाघर बना देगा! आ... अपनी मौत के अंतिम पड़ाव पर आ, रुद्र!"
सननन!
एक भयानक, चीखती हुई आंधी के साथ वह काली प्रेत-आत्मा ग्वालियर और मुरैना के उन बीहड़ जंगलों की ओर, उत्तर-पश्चिम के क्षितिज में विलीन हो गई।
सुबह के करीब चार बज रहे थे।
चौसठ योगिनी मंदिर का वह वृत्ताकार प्रांगण अब पूरी तरह शांत हो चुका था।
वे चौंसठ पाषाण-प्रतिमाएं अपने-अपने कक्षों में अपने मूल, शांत और दिव्य देवी-स्वरूप में लौट चुकी थीं। उनकी आंखों से अब कोई खून नहीं बह रहा था; उनके चेहरों पर 10वीं शताब्दी के कलचुरी शिल्पकारों की वह अमर, पावन शांति विराज रही थी।
रुद्र गर्भगृह से बाहर निकला।
मंदिर की सीढ़ियों पर बूढ़ा नाविक गंगू केवट हाथ जोड़े, आंखों में कृतज्ञता के आंसू लिए खड़ा था।
"बाबू... मैया नर्मदा का पानी फिर से अमृत बन गया! तुमने इस तीर्थ को बचा लिया बाबू... तुमने हमें नया जीवन दिया है!" गंगू रुद्र के पैरों में गिर पड़ा।
रुद्र ने उसे उठाकर गले से लगाया। "काका, यह मां नर्मदा और भगवान गौरी-शंकर की कृपा है। तुम अब निर्भय होकर अपने गांव वालों को वापस बुला सकते हो।"
रुद्र अपनी महिन्द्रा थार जीप के पास पहुंचा।
उसने जीप की बोनट पर अपने परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह प्राचीन चमड़े की डायरी रखी।
डायरी के पन्ने हवा के बिना ही एक बार फिर फड़फड़ाए—सर्र-सर्र-सर्र!
पन्नों का पलटना एक नए, अंतिम पृष्ठ पर जाकर रुक गया।
उस पृष्ठ पर लाल-काली स्याही से एक नया, वृत्ताकार नक्शा खिंच गया, जो हूबहू भारत के संसद भवन जैसी गोलाकार संरचना का था—'मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर (एकत्तरसो महादेव), मुरैना'!
और नीचे विद्याधर शास्त्री की अंतिम, गंभीर चेतावनी लिखी थी:
"मितावली... तंत्र का परम शिखर! 64 कमरों का वह गोलाकार मंदिर साक्षात 'काल-भैरव चक्र' है। तंत्रेश्वर अपनी अंतिम तांत्रिक आहुति वहीं देगा। तुम्हारे पास केवल चौबीस घंटे का समय है... यदि कल रात 12:00 बजे से पहले उस मंदिर के मुख्य केंद्रीय शिवलिंग पर 'महाकाल भस्म-अभिषेक' नहीं हुआ... तो तंत्रेश्वर का वह अमर अवतार सिद्ध हो जाएगा जिसे त्रिलोकी में कोई नहीं मार सकेगा!"
रुद्र ने अपनी कलाई की घड़ी देखी।
समय हो रहा था—सुबह के 04:30 AM।
सोमवती अमावस्या की उस अंतिम, निर्णायक काल-रात्रि में अब केवल साढ़े उन्नीस घंटे बाकी थे।
रुद्र ने जीप का इग्निशन ऑन किया। इंजन की दहाड़ के साथ थार जीप भेड़ाघाट की संगमरमरी वादियों को पीछे छोड़ती हुई सीधे उत्तर की ओर, चंबल के बीहड़ों और मुरैना के उस रहस्यमयी मितावली मंदिर की ओर 120 की रफ्तार से दौड़ पड़ी...
काले जादू, अघोर तंत्र और चौसठ योगिनियों का यह महा-युद्ध अब अपने अंतिम, निर्णायक और सबसे भयानक पड़ाव—'चंबल-मितावली खंड' की ओर बढ़ चुका था!
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 10: चंबल के बीहड़ों का खूनी साया, मितावली का 64 कमरों वाला तांत्रिक चक्रव्यूह और सोमवती अमावस्या का आरंभ।
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप · सभी भाग →