PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 8: चौसठ योगिनियों का चक्रव्यूह-नृत्य, गौरी-शंकर गर्भगृह का रक्षा-कवच और पाताल-कुंड का रहस्य

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
8 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
12 min
Words
2270
Language
Hindi (हिंदी)
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भेड़ाघाट की उस तीन सौ फीट ऊंची, खड़ी पहाड़ी पर स्थित कलचुरी कालीन गोलकी मठ (चौसठ योगिनी मंदिर) का वह खुला, वृत्ताकार प्रांगण अब साक्षात यमलोक की रंगभूमि में तब्दील हो चुका था।
लोहे के विशाल मुख्य कपाट के बंद होते ही बाहर की दुनिया से जीवन का हर संपर्क टूट गया था। ऊपर कोई छत नहीं थी; केवल खुला, स्याह-काला आसमान था, जहाँ बादलों के बीच से झांकता हुआ चौदहवीं का क्षीण, पीला चंद्रमा किसी सड़े हुए नेत्र की तरह घूर रहा था। नीचे नर्मदा की गहरी घाटी से धुआंधार जलप्रपात की गर्जना किसी घायल दैत्य के कराहने जैसी गूंज रही थी—घड़-घड़... गड़गड़ाssssहट!
प्रांगण की बाहरी गोलाकार परिधि में बने उन चौंसठ खुले कक्षों के भीतर से हवा में एक साथ चौंसठ जोड़ी भारी, कांस्य-निर्मित घुंघरुओं की झंकार उठने लगी:
छन... छन... छनक-छन!
वह झंकार किसी शास्त्रीय नृत्य की नहीं थी; वह श्मशान के उस तांत्रिक 'तांडव-चक्र' की ध्वनि थी जिसे सुनते ही साधारण मनुष्य का हृदय फटकर रक्त की उल्टी कर दे।
रुद्र प्रांगण के बिल्कुल केंद्र में अकेला खड़ा था।
उसके चारों ओर, वृत्ताकार बरामदे के कक्षों से वे 10वीं शताब्दी की चौंसठ पाषाण-योगिनियां एक-एक करके अपने-अपने आसनों से बाहर निकल रही थीं। उनके काले और बादामी ग्रेनाइट पत्थरों से तराशे गए शरीरों की नसों में ताजे, गाढ़े खून का संचार हो रहा था। उनकी पथरीली आंखों से रक्त-लाल आग की लपटें निकल रही थीं।
किसी के हाथ में विशाल पाषाण-खड्ग था, किसी के हाथ में नरमुंड-खप्पर, किसी की आठ भुजाओं में चक्र और त्रिशूल थे, तो कोई अपने गले में लिपटे जीवित काले नागों को हवा में लहरा रही थी।
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं... चौसठ योगिन्यै नमः... रक्तं पिब... अस्थि भक्षय!"
उन सभी चौंसठ पाषाण-देवियों के पत्थरों के जबड़े एक साथ भयानक धातुई आवाज के साथ हिल रहे थे। वे एक लयबद्ध, खूनी चक्रव्यूह बनाते हुए रुद्र की ओर अपने कदम बढ़ा रही थीं। उनके हर कदम के साथ मंदिर का प्राचीन पत्थर का फर्श किसी भूकंप की तरह कांप रहा था।
रुद्र ने अपने बाएं कंधे के घाव को भींच लिया। उसकी पसलियों में असहनीय दर्द था, लेकिन उसकी आंखों में केवल एक अदम्य, अघोर संकल्प की ज्वाला धधक रही थी।
उसने अपनी कमर से उस अष्टधातु के 'काल-भैरव खड्ग' को दोनों हाथों से थाम लिया और अपने सीने से उस तपते हुए पारद शिवलिंग को चिपकाए रखा।
सननन! सननन!
अचानक, सबसे पहले तीन योगिनियों ने एक साथ हवा में छलांग लगाई।
एक के हाथ से विशाल पाषाण-गदा रुद्र की खोपड़ी की ओर लपकी, दूसरी की तलवार उसकी गर्दन की ओर आई, और तीसरी के हाथों से काले नागों का एक फंदा उसकी कमर को जकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
रुद्र ने बिजली की फुर्ती से खुद को नीचे झुकाया।
कड़ाssssक!
वह पाषाण-गदा सीधे फर्श पर टकराई। संगमरमर और ग्रेनाइट का फर्श दो फीट गहरा फट गया और पत्थरों के नुकीले टुकड़े छर्रों की तरह चारों दिशाओं में बिखर गए। एक पत्थर का टुकड़ा रुद्र के गाल को चीरता हुआ निकल गया, जिससे खून की एक पतली धार बह निकली।
रुद्र ने झुकते हुए ही अपने काल-भैरव खड्ग को हवा में घुमा दिया।
छनन्नन!
खड्ग की अष्टधातु से निकली नीली दिव्य अग्नि ने उस दूसरी योगिनी की तलवार को बीच से काट दिया और काले नागों का फंदा जलकर राख हो गया। लेकिन रुद्र अच्छी तरह जानता था कि खुले प्रांगण में एक साथ चौंसठ जाग्रत पाषाण-शक्तियों का सामना करना असंभव था। यह कोई साधारण प्रेत नहीं थे; यह आदिशक्ति की वे 64 मूल महा-शक्तियां थीं जिन्हें कापालिक तंत्रेश्वर ने अपने 186 साल के काले जादू और 79 नरबलियों के रक्त से दूषित करके अपना दास बना लिया था।
तभी, प्रांगण के ठीक बीचों-बीच स्थित उस मुख्य मंदिर के खुले गर्भगृह से एक अत्यंत सूक्ष्म, शीतल और चंदन-जैसी पवित्र सुगंध की एक मंद लहर रुद्र के नथुनों से टकराई।
रुद्र ने नजरें घुमाईं।
प्रांगण के केंद्र में खड़ा था 10वीं शताब्दी का वह मुख्य देवालय—'गौरी-शंकर मंदिर'।
उस मंदिर के गर्भगृह के द्वार पर नंदी की एक प्राचीन, विशाल पाषाण-प्रतिमा बैठी थी, और भीतर अंधकार में भगवान शिव और नंदी पर सवार माता पार्वती की वह अलौकिक, कलचुरी कालीन मूर्ति स्थापित थी।
"गर्भगृह!" रुद्र के मस्तिष्क में कौंध गया।
रुद्र ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया। उसने अपनी बची हुई पूरी ताकत अपने पैरों में समेटी और पाषाण-योगिनियों के उस खूनी घेरे को चीरते हुए सीधे गौरी-शंकर मंदिर की सीढ़ियों की ओर दौड़ लगा दी।
पीछे से दर्जनों त्रिशूल और भाले हवा को चीरते हुए आए और रुद्र की पीठ से कुछ ही इंच दूर मंदिर की सीढ़ियों में धंस गए।
रुद्र ने हवा में छलांग लगाई और सीधे गर्भगृह की चौखट के भीतर जा गिरा!
धड़ाम!
जैसे ही रुद्र के शरीर ने गर्भगृह की उस प्राचीन, नक्काशीदार दहलीज को पार किया, एक ऐसा चमत्कार घटा जिसने काल की गति को रोक दिया।
वे चौंसठ पाषाण-योगिनियां, जो रुद्र के मांस को नोचने के लिए पागलों की तरह पीछे दौड़ रही थीं, गर्भगृह की चौखट से ठीक एक फुट पहले एक झटके में रुक गईं!
कड़ाक... चर्रर्र!
मानो चौखट पर हवा में कांच की कोई अदृश्य, अभेद्य और धधकती हुई दीवार खड़ी हो।
जैसे ही पहली योगिनी का पाषाण-हाथ उस चौखट के पार जाने लगा, उस अदृश्य दीवार से सुनहरी बिजली की सैकड़ों चिंगारियां छूटीं। उस योगिनी की पत्थर की उंगलियां झुलसकर काली पड़ गईं और वह दर्दनाक चीख मारते हुए तीन कदम पीछे जा गिरी।
बाकी तिरसठ योगिनियां चौखट के बाहर खड़ी होकर अपने अस्त्र पटकने लगीं। उनके जबड़े गुस्से से हिल रहे थे, उनकी आंखों से खून के आंसू बह रहे थे, लेकिन वे उस पवित्र गर्भगृह की दहलीज के भीतर एक इंच भी कदम नहीं रख पा रही थीं!
रुद्र हांफते हुए गर्भगृह के ठंडे, संगमरमरी फर्श पर बैठ गया।
उसने सिर उठाकर देखा।
गर्भगृह के भीतर का वातावरण बाहर के उस नर्क से पूरी तरह विपरीत था।
यहाँ न तो कोई दुर्गंध थी, न कोई तांत्रिक धुआं। यहाँ केवल सदियों पुरानी धूप, कपूर और बेलपत्रों की वह शांत, पवित्र सुगंध तैर रही थी जो अनादि काल से इस मंदिर में रची-बसी थी।
सामने काले कसौटी पत्थर से बनी भगवान शिव और माता पार्वती की वह अद्वितीय मूर्ति विराजमान थी। भगवान शिव शांत मुद्रा में थे, उनकी जटाओं में चंद्रमा था, और माता पार्वती उनकी गोद में बैठी थीं। दोनों की दृष्टि में एक ऐसा अगाध, ब्रह्मांडीय करुणा का भाव था जिसने रुद्र के घायल शरीर और जलते हुए मन को एक ही पल में परम शांति से भर दिया।
यह 10वीं शताब्दी के कलचुरी राजा युवराजदेव प्रथम का वह अभेद्य 'महा-रुद्र कवच' था जिसे तंत्रेश्वर का काला जादू पिछले 186 वर्षों में भी भेद नहीं पाया था!
लेकिन तभी, गर्भगृह के ठीक मध्य में... फर्श के पत्थरों के बीच से एक भयानक गड़गड़ाहट उठी।
धम... धम... धम... खद-बद!
रुद्र ने नीचे देखा।
गर्भगृह के शिवलिंग के ठीक सामने, फर्श की एक विशाल गोल शिला हटी हुई थी। उस खुली हुई गुहा से गहरे लाल रंग का खौलता हुआ पानी और भाप बाहर निकल रही थी।
वही था—'नर्मदा पाताल-कुंड'!
यह पाताल-कुंड जमीन के भीतर सीधे नर्मदा नदी के उस पाताल-गर्भ से जुड़ा था जहाँ से वह उबलता हुआ लाल पानी आ रहा था।
और उस पाताल-कुंड के मुहाने पर, हवा में तैरता हुआ वह काला, विशालकाय साया गर्भगृह के बाहर खड़े होकर भयानक अट्टहास कर रहा था।
वह था—कापालिक तंत्रेश्वर की वह नई, दैत्याकार रक्त-अस्थि काया (Gore Golem)!
विंध्याचल से आई उसकी प्रेत-आत्मा ने नर्मदा के उस उबलते रक्त-जल, श्मशान की हड्डियों और चौंसठ योगिनियों की नकारात्मक ऊर्जा को खींचकर अब अपनी उस नई देह को लगभग अस्सी प्रतिशत पूर्ण कर लिया था।
उसकी देह अब दस फीट ऊंची, पिघलते हुए लावे और जमे हुए काले मांस की एक भयानक मूर्ति बन चुकी थी। उसकी छाती पर हड्डियों का एक नया पिंजरा बन चुका था और उसके सिर पर भैंसे के जैसे दो विशाल, मुड़े हुए सींग निकल आए थे। उसके दोनों हाथों में काले पत्थरों से बने दो विशाल पाषाण-त्रिशूल धधक रहे थे।
"हाहाहाहा! छिप गया चूहे की तरह?"
तंत्रेश्वर की वह नई, भारी और पाताल जैसी दोहरी आवाज गर्भगृह के बाहर से गूंजी।
"तूने सोचा कि उस गौरी-शंकर की चौखट के पीछे तू सुरक्षित है? मूर्ख! मैं स्वयं उस चौखट के भीतर नहीं आ सकता... लेकिन मैं इस पूरे मंदिर को ही तेरी कब्र बना सकता हूँ!"
तंत्रेश्वर ने अपने दोनों विशाल पाषाण-त्रिशूल हवा में उठाए।
उसने गर्भगृह की बाहरी छत और उन प्राचीन नक्काशीदार खंभों पर पूरी ताकत से प्रहार करना शुरू कर दिया!
कड़ाssssक! धड़ाम!
एक-एक प्रहार से गर्भगृह के 10वीं शताब्दी के भारी पत्थर हिलने लगे। छत से चूना, धूल और भारी शिलाखंड टूट-टूटकर नीचे गिरने लगे। खंभों में गहरी दरारें पड़ने लगीं। तंत्रेश्वर मंदिर की छत को ही तोड़कर रुद्र को उसी मलबे के नीचे जिंदा दफन करने पर आमादा था।
रुद्र जानता था कि उसके पास केवल कुछ ही मिनट बचे थे। अगर छत गिरी, तो गौरी-शंकर का यह कवच भी मलबे में दब जाएगा।
रुद्र ने अपने कंधे के झोले से परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह चमड़े की प्राचीन डायरी निकाली।
उसने कांपते, खून से सने हाथों से डायरी का अगला पन्ना खोला।
उस पन्ने पर विद्याधर शास्त्री की पुरानी, घसीटदार लिखावट में भेड़ाघाट के इस मंदिर का सबसे गुप्त और परम सत्य लिखा था:
"भेड़ाघाट का यह गोलकी मठ केवल एक मंदिर नहीं है... यह संपूर्ण भू-मंडल का 'हृदय-चक्र' है। कलचुरी राजाओं ने जब 64 योगिनियों की स्थापना की थी, तो उन्होंने मुख्य शिवलिंग की पीठिका (आधार) के ठीक नीचे सोने का एक गुप्त 'श्री-भैरवी महा-चक्र' स्थापित किया था। यह चक्र 64 योगिनियों की मूल जीवन-डोर है। यदि कोई शुद्ध साधक अपने कुल का पवित्र रक्त उस चक्र पर अर्पित करके उस पर पारद शिवलिंग स्थापित कर दे... तो 64 योगिनियों का समस्त आसुरी सम्मोहन एक ही सेकंड में टूट जाएगा और वे अपने मूल देवी-रूप में लौट आएंगी... परंतु सावधान! ऐसा करते ही पाताल-कुंड का सारा लावा बाहर निकल आएगा... साधक को अपने प्राणों की बाजी लगानी होगी!"
"श्री-भैरवी महा-चक्र!" रुद्र की आंखें चमक उठीं।
उसने तुरंत मुख्य शिवलिंग की उस प्राचीन काले ग्रेनाइट की पीठिका (जलहरी) को देखा।
पीठिका के आधार पर, जहाँ गंगाजल और दूध बहने की नाली बनी थी, काई और पुराने सिंदूर की मोटी परत के नीचे धातु की एक चमकती हुई पीली लकीर दिखाई दे रही थी।
रुद्र अपने घुटनों के बल गिरा। उसने अपने काल-भैरव खड्ग की नोक से उस काई और सिंदूर को तेजी से खुरचना शुरू किया।
चर्र-चर्र... खट!
सिंदूर हटते ही नीचे से शुद्ध अष्टधातु और सोने की बनी एक विशाल, चौकोर तांत्रिक प्लेट बाहर निकल आई। उस प्लेट पर चौंसठ कोणों वाला एक अत्यंत जटिल और दिव्य 'श्री-भैरवी महा-चक्र' खुदा हुआ था!
बाहर से तंत्रेश्वर का त्रिशूल लगातार मंदिर के खंभों पर बरस रहा था।
कड़ाssssक!
गर्भगृह की छत का एक पांच सौ किलो का विशाल पत्थर ठीक रुद्र के बगल में आ गिरा। पत्थर के टुकड़े रुद्र की पीठ पर लगे, लेकिन उसने अपनी नजरें उस चक्र से नहीं हटाईं।
समय अब सेकंडों में समाप्त हो रहा था।
रुद्र ने अपने काल-भैरव खड्ग की धार को अपनी दाहिनी हथेली पर पूरी ताकत से खींच दिया।
छपाक!
पवित्र, शास्त्रीय कुल का ताजा लाल रक्त उसकी हथेली से धार बनकर सीधे उस सोने के 'श्री-भैरवी महा-चक्र' के केंद्र पर गिर पड़ा।
साथ ही, रुद्र ने अपने बाएं हाथ में चमकते हुए उस पारद शिवलिंग को उठाया और अपने पूरे शरीर का वजन डालते हुए सीधे उस चक्र के ठीक मध्य में, जहाँ मुख्य त्रिकोण बना था, पूरी ताकत से गाड़ दिया!
छनन्नन... भभकssss!
जैसे ही पारद, रक्त और उस 10वीं शताब्दी के दिव्य चक्र का मिलन हुआ, एक ऐसा अलौकिक, आध्यात्मिक महा-विस्फोट हुआ जिसने पूरे भेड़ाघाट के आकाश को दिन के उजाले से भी सौ गुना अधिक चमका दिया।
गौरी-शंकर की उस पाषाण-प्रतिमा के त्रिनेत्र से शुद्ध स्वर्णिम प्रकाश की एक ऐसी प्रचंड किरण फूटी जो गर्भगृह के द्वार को चीरती हुई सीधे बाहर उस वृत्ताकार प्रांगण में फैल गई।
उस दिव्य प्रकाश के स्पर्श होते ही बाहर प्रांगण में खड़ी उन चौंसठ पाषाण-योगिनियों के शरीरों में एक भयानक आध्यात्मिक कंपन हुआ।
चर्रर्र... कटकट!
उनकी पाषाण-आंखों से बहता वह काला-लाल खून एक ही सेकंड में सूखकर राख हो गया। उनकी आंखों की वह शैतानी लाल आग बुझ गई और उसकी जगह साक्षात आदिशक्ति की असीम, शांत और ममतामयी दूधिया-सफेद ज्योति जल उठी।
चौंसठों योगिनियों के पत्थर के हाथ, जो अस्त्र ताने खड़े थे, एक झटके में नीचे झुक गए और वे सभी पाषाण-देवियां हाथ जोड़कर भगवान शिव और माता पार्वती के उस गर्भगृह के सामने नतमस्तक हो गईं!
कापालिक तंत्रेश्वर का 186 साल पुराना वह काला सम्मोहन तिनके की तरह बिखर चुका था!
"न... नहीं! मेरी योगिनियां! मेरा साम्राज्य!"
गर्भगृह के बाहर खड़ा तंत्रेश्वर का वह दस फीट ऊंचा रक्त-अस्थि दैत्य पागलों की तरह चीख उठा। उसकी शक्ति का मुख्य आधार छिन चुका था।
लेकिन तंत्रेश्वर ने अपनी पराजय स्वीकार नहीं की।
उसकी उस नई, अधूरी देह के भीतर बैठी वह अमर प्रेत-आत्मा असीम क्रोध से पागल हो उठी।
"यदि योगिनियां मेरी नहीं रहीं... तो तू भी जीवित नहीं रहेगा रुद्र!"
तंत्रेश्वर ने अपनी उस दस फीट ऊंची दैत्याकार काया के दोनों विशाल हाथों को गर्भगृह की टूटी हुई छत के भीतर घुसा दिया।
उसने एक ही झटके में छत के मुख्य पत्थर को उखाड़कर फेंक दिया।
और उसका वह विशाल, पिघलते हुए लावे और हड्डियों से बना भयानक पंजा सीधे नीचे गर्भगृह में उतरा...
और उसने रुद्र की गर्दन को अपनी दहकती हुई, लोहे जैसी उंगलियों से पूरी ताकत से जकड़ लिया!
घोंssssट!
रुद्र का शरीर जमीन से चार फीट ऊपर हवा में उठ गया। उसकी सांसें एक ही झटके में रुक गईं। तंत्रेश्वर के जलते हुए नाखूनों ने रुद्र के गले की चमड़ी को जलाना शुरू कर दिया।
रुद्र की आंखें बाहर आने को हो गईं। उसके हाथ से काल-भैरव खड्ग छूटकर नीचे फर्श पर गिर पड़ा।
तंत्रेश्वर का वह भयानक, सींगों वाला चेहरा गर्भगृह की टूटी हुई छत से नीचे झांक रहा था। उसकी लाल, सुलगती हुई आंखें रुद्र के तड़पते हुए चेहरे पर टिकी थीं:
"अब कौन बचाएगा तुझे, विद्याधर के कीड़े? तेरा रक्त इस पाताल-कुंड में गिरेगा... और मेरी यह काया अमर होगी!"
रुद्र हवा में तड़प रहा था... उसकी चेतना का अंतिम धागा टूटने की कगार पर था...
लेकिन नीचे फर्श पर गड़ा वह पारद शिवलिंग और श्री-भैरवी चक्र अब सूर्य की तरह धधक रहे थे...
क्या रुद्र इस साक्षात यम-फांस से बच पाएगा?
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 9: धुआंधार जलप्रपात का महा-पतन, पाताल-कुंड का विस्फोट और तंत्रेश्वर की रक्त-काया का संहार।
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