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भाग 7: नर्मदा का संगमरमरी श्मशान, भेड़ाघाट का 64 योगिनी मंदिर और उबलते पानी का रहस्य
Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
- Chapter
- 7 of 15
- Category
- Tantrik & Black Magic
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2653
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
विंध्याचल के बीहड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब महिन्द्रा थार जीप मध्य प्रदेश की सीमा में प्रविष्ट हुई, तो प्रकृति का भूगोल पूरी तरह बदल चुका था। रीवा, सतना और कटनी के घने जंगलों को पार करते हुए सड़क अब महाकौशल के प्राचीन भू-भाग की ओर बढ़ रही थी।
रुद्र के बाएं कंधे पर बंधी पट्टी से रिसता खून अब सूखकर कत्थई हो चुका था। बाबा बालकनाथ की उस सिद्ध भस्म ने घाव के विष को तो सोख लिया था, लेकिन पसलियों में हर हिचकोले के साथ ऐसी चुभन होती थी मानो कोई लोहे की सुई फेफड़ों के पास घुमा रहा हो।
परंतु उस दैहिक पीड़ा से कहीं अधिक भयानक था वह मानसिक तनाव जो रुद्र के मस्तिष्क को खाए जा रहा था।
गाड़ी के डैशबोर्ड पर रखी उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह 200 साल पुरानी डायरी लगातार हल्की-हल्की कंपकपी कर रही थी। डायरी के चमड़े की जिल्द से एक ऐसी अस्वाभाविक, ठंडी महक उठ रही थी जो केवल सदियों पुरानी कब्रों या पानी में डूबे सड़े हुए शवों से ही आ सकती थी।
शाम के करीब साढ़े सात बज रहे थे जब जीप जबलपुर शहर की सीमा को पार करके भेड़ाघाट की ओर जाने वाले संकरे, घुमावदार पहाड़ी मार्ग पर मुड़ी।
भेड़ाघाट... प्रकृति का वह अद्भुत और रहस्यमयी आश्चर्य, जहाँ पवित्र नर्मदा नदी संगमरमर की सैकड़ों फीट ऊंची, धवल चट्टानों के बीच से होकर एक संकरी घाटी में बहती थी। सामान्य दिनों में यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की भीड़, संगमरमर की नक्काशीदार मूर्तियां बेचने वाली दुकानें और नाविकों की चहल-पहल हुआ करती थी।
लेकिन आज, इस अमावस्या की पूर्व-संध्या पर, पूरा भेड़ाघाट किसी शापित श्मशान की तरह वीरान पड़ा था।
सड़क के किनारे बने होटल, विश्राम-गृह और चाय की दुकानें पूरी तरह बंद थीं। घरों के दरवाजों पर ताले लटके थे और खिड़कियों को अंदर से भारी लकड़ी के तख्तों से कील दिया गया था। किसी भी इंसान का नामो-निशान नहीं था।
सड़क पर केवल सूखे पत्तों के उड़ने की 'सर्र-सर्र' आवाज और दूर से आती धुआंधार जलप्रपात की भयानक, कानफोड़ू गर्जना गूंज रही थी:
घड़-घड़-घड़... गड़गड़ाssssहट!
रुद्र ने जीप को नर्मदा के मुख्य नौका-घाट के पास एक पुराने, विशाल पीपल के पेड़ के नीचे रोका।
वह जीप से नीचे उतरा।
हवा का पहला झोंका जैसे ही रुद्र के चेहरे से टकराया, उसके रोंगटे खड़े हो गए। नर्मदा का वह जल, जो अपनी शीतलता और पवित्रता के लिए संपूर्ण भारतवर्ष में पूजा जाता था... उसकी हवा में आज एक असहनीय, दमघोंटू और तीखी दुर्गंध तैर रही थी।
वह दुर्गंध जलती हुई चर्बी, सड़े हुए मांस और कस्तूरी के उस काले मिश्रण जैसी थी जो कापालिक तंत्रेश्वर की साधना से पैदा होती थी!
रुद्र घाट की गीली, सफेद संगमरमरी सीढ़ियों की ओर बढ़ा।
रात के आठ बज चुके थे। आसमान में बादलों की एक घनी, काली चादर छाई थी, जिसके बीच से चौदहवीं का क्षीण, पीला चंद्रमा किसी सड़े हुए घाव की तरह झांक रहा था। चंद्रमा की उस बीमार रोशनी में जब रुद्र ने नर्मदा के जल की ओर देखा, तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई।
नर्मदा का पानी सामान्य रूप से हरा या दूधिया-सफेद होता था।
लेकिन इस समय... नर्मदा का अथाह जल गहरे, मटमैले और चिपचिपे लाल रंग में बह रहा था!
और सबसे खौफनाक बात यह थी कि पानी शांत नहीं था। नदी की सतह से लगातार भारी भाप के विशाल गुबार उठ रहे थे और पानी के भीतर से बुलबुले फूट रहे थे—खद-बद... खद-बद... खद-बद!
पानी खौल रहा था!
तापमान इतना अधिक था कि घाट की सीढ़ियों को छूता हुआ पानी पत्थरों को तपा रहा था। नदी के किनारों पर हजारों मरी हुई मछलियां, कछुए और जलचर उतराए हुए थे, जिनकी चमड़ी उस उबलते हुए तेजाबी पानी से उधड़ चुकी थी।
"यहाँ मत खड़े हो, बाबू... यह मैया का जल नहीं है... यह आज रात साक्षात यमलोक की वैतरणी बन चुकी है!"
अचानक, सीढ़ियों के अंधेरे कोने में बंधी एक पुरानी, जर्जर लकड़ी की नाव की ओट से एक अत्यंत खुरदुरी, कांपती हुई आवाज आई।
रुद्र ने तुरंत अपनी कमर में बंधे उस काल-भैरव खड्ग की मूठ पर हाथ रख लिया। "कौन है वहां? सामने आओ!"
लकड़ी की नाव के भीतर से एक अत्यंत वृद्ध, सत्तर-अस्सी वर्ष का बूढ़ा नाविक बाहर निकला।
उसकी कमर झुकी हुई थी, उसने केवल एक मैली धोती पहन रखी थी और उसके चेहरे पर चेचक के गहरे दाग थे। उसके हाथ में लालटेन थी, जिसकी बत्ती मंद-मंद कांप रही थी। उसकी दोनों आंखें भय से इतनी फैली हुई थीं मानो उसने अपनी आंखों के सामने यमराज को साक्षात देख लिया हो।
वह था भेड़ाघाट का सबसे पुराना नाविक—गंगू केवट।
"बाबू... भाग जाओ यहाँ से," गंगू ने कांपते हाथों से अपनी लालटेन रुद्र के चेहरे के सामने की। "कल दोपहर से इस नदी का पानी उबल रहा है। कल शाम को जब सूरज डूबा, तो उस ऊपर वाली पहाड़ी पर बने चौसठ योगिनी मंदिर के गुंबद से काले धुएं का एक ऐसा बवंडर उठा जिसने पूरे भेड़ाघाट के आकाश को ढक लिया।"
गंगू ने अपनी कांपती उंगली उस ऊंची, खड़ी पहाड़ी की ओर उठाई जो नदी के ठीक ऊपर तीन सौ फीट की ऊंचाई पर सिर उठाए खड़ी थी।
उस पहाड़ी के शिखर पर, घने पेड़ों के बीच वह 10वीं शताब्दी का विशाल, रहस्यमयी और वृत्ताकार (Circular) मंदिर स्थित था—'कलचुरी कालीन चौसठ योगिनी मंदिर' (गोलकी मठ)!
"उस बवंडर के भीतर से किसी दानव के हंसने की आवाजें आ रही थीं बाबू," गंगू की आवाज में रोना आ गया। "और रात के ठीक बारह बजे... उस मंदिर की पहाड़ी से 64 स्त्रियों के एक साथ नाचने, उनके पैरों के भारी घुंघरुओं के छनछनाने और किसी बकरे की तरह इंसानों के काटे जाने की चीखें आने लगीं! सारे पंडे-पुजारी, दुकानदार और नाविक अपने बाल-बच्चों को लेकर शहर भाग गए... केवल मैं अपनी इस नाव के मोह में यहाँ छूट गया।"
रुद्र ने अपने कंधे के झोले को छुआ। पारद शिवलिंग अब इतनी तेजी से धड़क रहा था मानो वह सीधे उस पहाड़ी की ओर खिंच रहा हो।
"गंगू काका, मुझे उस पहाड़ी के नीचे तक जाना है," रुद्र ने दृढ़ स्वर में कहा। "मुझे अपनी नाव से उस संगमरमरी घाटी के रास्ते उस गुप्त घाट तक ले चलो जहाँ से मंदिर की पुरानी सीढ़ियां शुरू होती हैं।"
गंगू ने अपनी दोनों आंखें फाड़कर रुद्र को देखा। "बाबू! तुम पागल हो गए हो? संगमरमर की उन चट्टानों के बीच रात को जाना साक्षात मौत के मुंह में कूदना है! उस संकरी घाटी में पानी खौल रहा है... और पानी के नीचे जो साए तैर रहे हैं, वे नाव को एक ही झटके में पलट देंगे!"
रुद्र ने अपनी जेब से बाबा बालकनाथ की दी हुई पवित्र भस्म निकाली और गंगू के माथे पर लगा दी।
फिर उसने अपने झोले से वह चमकता हुआ पारद शिवलिंग निकालकर गंगू की लालटेन के सामने किया।
पारे की उस दिव्य धातु से निकली शीतल, दूधिया रोशनी जैसे ही गंगू की आंखों और उस खौलते हुए पानी पर पड़ी, घाट की सीढ़ियों के पास उबलता हुआ पानी कुछ पलों के लिए शांत हो गया।
गंगू ने अविश्वास से उस शिवलिंग को देखा। उसने हाथ जोड़ लिए। "बाबू... तुम कोई साधारण मनुष्य नहीं हो। तुम्हारे साथ कोई बहुत बड़ी शक्ति चल रही है। चलो... अगर आज रात मेरी मौत भी लिखी है, तो मैं मैया के इस सेवक को उस पार छोड़कर ही मरूंगा!"
रात के करीब पौने नौ बज रहे थे।
गंगू की पुरानी लकड़ी की नाव उस उबलते, लाल पानी के सीने को चीरती हुई भेड़ाघाट की उस प्रसिद्ध संगमरमरी घाटी (Marble Rocks Gorge) के भीतर प्रविष्ट हुई।
यह घाटी प्रकृति की एक अद्भुत और डरावनी रचना थी।
दोनों तरफ सौ-सवा सौ फीट ऊंची, बिल्कुल सीधी और खड़ी सफेद संगमरमर की चट्टानें दीवार की तरह तनी हुई थीं। सामान्यतः ये चट्टानें पूर्णिमा की रात में चांदी की तरह दमकती थीं, लेकिन आज उस शापित अमावस्या की पूर्व-संध्या पर, वे सफेद चट्टानें किसी विशालकाय मुर्दे की सूखी हड्डियों जैसी पीली और भयानक दिख रही थीं।
उन सफेद चट्टानों पर जगह-जगह काले और लाल रंग के धब्बे रिस रहे थे, मानो वे पत्थर भी अंदर से खून के आंसू रो रहे हों।
नाव जैसे-जैसे संकरी घाटी के भीतर बढ़ रही थी, दोनों तरफ की चट्टानें इतनी करीब आती जा रही थीं कि दोनों ओर हाथ फैलाकर उन्हें छुआ जा सकता था। घाटी की संकरी छत से केवल आसमान की एक पतली, काली लकीर दिखाई दे रही थी।
हवा का चलना पूरी तरह बंद था। केवल नाव के पतवार के पानी को काटने की 'छपाक... छपाक...' आवाज गूंज रही थी।
अचानक, नाव के पेंदे से कोई बहुत भारी चीज टकराई!
धड़ाम!
लकड़ी की नाव खतरनाक तरीके से एक तरफ झुक गई। गंगू के हाथ से पतवार लगभग छूट ही गया।
"बाबू! नीचे... नीचे देखो!" गंगू की चीख निकल गई। उसने अपनी कांपती लालटेन पानी की सतह पर झुकाई।
रुद्र ने पानी के भीतर देखा। उसका कलेजा मुंह को आ गया।
उस खौलते हुए, लाल पानी के भीतर... केवल पानी नहीं था।
नाव के ठीक नीचे, गहराई में दर्जनों इंसानी चेहरे पानी की सतह की ओर तैरते हुए ऊपर आ रहे थे! वे चेहरे 10वीं शताब्दी से लेकर अब तक इस नदी में डूबे और तंत्रेश्वर की वेदियों पर कटे अभागे लोगों के थे। उनके बाल पानी में काले शैवाल की तरह फैले हुए थे, उनकी आंखें पूरी तरह सफेद और अंधी थीं, और उनके मुंह खुले हुए थे।
वे थे—'जल-पिशाच' (Aquatic Ghouls)!
तड़ाक! तड़ाक!
अचानक, पानी के भीतर से दर्जनों सड़े हुए, नीले और काले हाथ बाहर निकले और उन्होंने गंगू की नाव के दोनों किनारों को अपने नुकीले नाखूनों से जकड़ लिया! नाव पानी में तेजी से डगमगाने लगी। पानी की सतह से उबलता हुआ तेजाबी झाग नाव के भीतर गिरने लगा जिससे लकड़ी सुलगने लगी।
उन जल-पिशाचों के कंठ से एक साथ पानी के भीतर से घुरघुराती हुई आवाज निकली:
"नीचे आ जाओ... हमारी प्यास बुझाओ... तंत्रेश्वर की नई देह को तुम्हारा रक्त चाहिए!"
नाव अब पलटने ही वाली थी। गंगू डर के मारे नाव के फर्श पर गिरकर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा।
रुद्र ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया।
उसने अपनी कमर से उस भारी काल-भैरव खड्ग को बाहर खींचा। उसने अपनी बाईं हथेली को खड्ग की धार पर तेजी से रगड़ दिया। उसका ताजा, तांत्रिक रक्त खड्ग के भालों पर बह निकला।
"ॐ नमः श्मशान-भैरवाय... जल-दोषं नाशय नाशय स्वाहा!"
रुद्र ने अपने जलते हुए खड्ग को सीधे उस पानी के भीतर, उन पिशाचों के हाथों के बीच पूरी ताकत से घोंप दिया!
भभकssss! कड़ाक!
खड्ग के पानी में उतरते ही पानी की सतह पर नीली और सुनहरी बिजली का एक प्रचंड जाल फैल गया।
वह पवित्र अघोर-अग्नि उस दूषित, उबलते पानी के भीतर किसी करंट की तरह दौड़ गई। जल-पिशाच असहनीय दर्द से चीख उठे। उनके हाथ जलकर राख होने लगे और वे सब छटपटाते हुए वापस नदी की अथाह गहराइयों में समा गए।
पानी का उबलना कुछ पलों के लिए थम गया।
"गंगू काका! पूरी ताकत से पतवार चलाओ! सामने वह घाट आ गया है!" रुद्र ने चिल्लाकर कहा।
गंगू ने अपनी सारी बची हुई ताकत लगा दी। नाव तेजी से आगे बढ़ी और घाटी के मोड़ पर स्थित उस प्राचीन, टूटे हुए पत्थर के घाट से जा टकराई।
रुद्र नाव से कूदकर घाट के पत्थरों पर उतरा। उसने गंगू के कंधे पर हाथ रखा। "काका, तुम तुरंत नाव लेकर वापस लौट जाओ और हनुमान जी के मंदिर में शरण लो। जब तक सुबह का सूरज न निकले, बाहर मत आना!"
गंगू ने हाथ जोड़कर सिर हिलाया और तेजी से नाव को उल्टी दिशा में मोड़ लिया।
रात के करीब साढ़े नौ बज रहे थे।
रुद्र अब उस विशाल पहाड़ी की तलहटी में खड़ा था, जिसके शिखर पर वह ऐतिहासिक चौसठ योगिनी मंदिर स्थित था।
नीचे घाट से लेकर ऊपर मंदिर के मुख्य सिंह-द्वार तक कुल 150 सीधी, खड़ी सीढ़ियां बनी थीं। ये सीढ़ियां 10वीं शताब्दी के कलचुरी राजाओं ने काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर बनवाई थीं।
सीढ़ियों के दोनों तरफ कोई रेलिंग नहीं थी; केवल घना, कांटेदार जंगल और गहरी खाइयां थीं। हर सीढ़ी पर सिंदूर के ताजे छापे पड़े थे और उन पर काली उड़द, राई और सूखे खून के निशान बिखरे हुए थे।
रुद्र ने काल-भैरव खड्ग को अपने हाथ में सीधा ताना और सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया।
हर सीढ़ी के साथ हवा का दबाव बढ़ रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य, विशाल हाथ रुद्र के सीने को पीछे की ओर धकेल रहा हो। उसके घायल कंधे की पट्टी फिर से खून से भीग चुकी थी, लेकिन रुद्र की आंखों में केवल एक ही लक्ष्य था—तंत्रेश्वर की उस प्रेत-आत्मा का अंतिम संहार।
जब रुद्र ने 150वीं सीढ़ी पार की, तो वह मंदिर के विशाल, खुले प्रांगण के सामने आकर खड़ा हो गया।
सामने का दृश्य देखकर किसी भी तांत्रिक या इतिहासकार की रूह कांप सकती थी।
यह मंदिर भारत के अन्य मंदिरों जैसा बिल्कुल नहीं था। यह पूरी तरह से गोलाकार (Circular Cloister) था, जिसकी कोई छत नहीं थी; केवल खुला आसमान था।
मंदिर की बाहरी परिधि में एक विशाल गोल बरामदा बना था, जिसमें कुल चौंसठ खुले कक्ष (Cells) बने हुए थे। और उन 64 कक्षों के भीतर 10वीं शताब्दी की 64 योगिनियों की विशाल, पाषाण-प्रतिमाएं विभिन्न आसनों में स्थापित थीं।
लेकिन इस समय... वे 64 मूर्तियां केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं थीं।
तंत्रेश्वर की प्रेत-आत्मा ने विंध्याचल से यहाँ पहुंचकर इस पूरे मंदिर को अपने काले जादू के घेरे में ले लिया था।
उन चौंसठ योगिनियों की पत्थर की मूर्तियों के स्तनों, कंठ और हथेलियों से गाढ़ा, ताजा लाल रक्त रिस रहा था। हर मूर्ति के आगे रखे पत्थरों के आलों में इंसानी खोपड़ियों के भीतर काली आग के दीये जल रहे थे। हवा में एक साथ चौंसठ औरतों के फुसफुसाने, हंसने और रोने की ध्वनियां गूंज रही थीं:
"आ गया... 80वीं आहुति आ गई... हमारा नया स्वामी जन्म ले रहा है..."
और उस विशाल गोलाकार प्रांगण के ठीक केंद्र में... मुख्य मंदिर खड़ा था—'गौरी-शंकर मंदिर'।
उस मंदिर के गर्भगृह के भीतर भगवान शिव और नंदी पर सवार माता पार्वती की एक अत्यंत सुंदर पाषाण-प्रतिमा थी।
लेकिन उस गर्भगृह के ठीक आगे, पत्थर के फर्श पर एक विशाल, गोल पाषाण-शिला हटी हुई थी। उस खुली हुई दरार से गहरे लाल रंग का धुआं और खौलते हुए पानी की गड़गड़ाहट बाहर आ रही थी।
वह था मंदिर का गुप्त भूमिगत तलघर—'नर्मदा पाताल-कुंड'!
और उस पाताल-कुंड के मुहाने पर, हवा में दस फीट ऊपर वह तैर रहा था।
वह था—कापालिक तंत्रेश्वर का प्रेत-स्वरूप (Astral Wraith)!
उसका भौतिक शरीर विंध्याचल में जल चुका था, लेकिन यहाँ... यहाँ वह नर्मदा के उस खौलते हुए रक्त-जल, श्मशान की भस्म और चौंसठ योगिनियों की दूषित ऊर्जा को खींचकर अपने लिए एक नई, और अधिक भयानक देह का निर्माण कर रहा था!
वह देह अब धीरे-धीरे आकार ले रही थी।
वह कटी हुई हड्डियों, पिघले हुए लावे और जमे हुए काले खून से बनी एक दस फीट ऊंची, दैत्याकार 'रक्त-अस्थि काया' (Gore Golem) बन रही थी! उसकी रीढ़ की हड्डी से लाल लपटें फूट रही थीं और उसके दोनों हाथों में दो विशाल पाषाण-त्रिशूल आकार ले रहे थे।
जैसे ही रुद्र के कदम मंदिर के मुख्य द्वार की चौखट पर पड़े, तंत्रेश्वर की उस आधी बन चुकी देह की दोनों लाल-सुलगती आंखें एक झटके में रुद्र पर टिक गईं।
"हाहाहाहाहा!"
तंत्रेश्वर का अट्टहास उस पूरे गोलाकार प्रांगण की 64 दीवारों से टकराकर गूंज उठा।
"स्वागत है, रुद्र प्रताप सिंह! तूने सोचा था कि तू विंध्याचल में मेरी मिट्टी की काया को जलाकर जीत गया? मूर्ख! वह तो केवल एक पुराना खोल था। यहाँ... इस चौसठ योगिनी महा-पीठ के केंद्र में, नर्मदा के इस पाताल-कुंड की ऊर्जा से मैं अपनी वह 'अमर वज्र-देह' बना रहा हूँ जिसे स्वयं काल भी नहीं छू सकता!"
अचानक, मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार का भारी, लोहे का जंग लगा कपाट एक भयानक धमाके के साथ अपने आप बंद हो गया—धड़ाम!
लोहे की भारी सलाखें अपने आप ताले में गिर गईं।
और उसी क्षण, उस वृत्ताकार बरामदे के 64 कक्षों में स्थापित वे चौंसठ पाषाण-योगिनियां एक साथ अपने-अपने स्थानों पर हिलने लगीं!
उनकी पत्थर की गर्दनें एक झटके में मुड़ीं और उन सभी 64 मूर्तियों ने अपने-अपने हाथों में थामे पाषाण-खड्ग, चक्र, गदा और त्रिशूल सीधे प्रांगण के बीच खड़े रुद्र की ओर तान दिए!
चारों तरफ से रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था।
सामने नर्मदा के पाताल-कुंड से जन्म लेता वह दस फीट का रक्त-दैत्य था, और चारों ओर घेरा डाले खड़ी थीं चौंसठ जीवित पाषाण-भैरवियां!
तंत्रेश्वर की उस गर्जना ने भेड़ाघाट के आकाश को कपा दिया:
"कल रात सोमवती अमावस्या की ठीक मध्यरात्रि को मेरा यह नया अवतार पूर्ण होगा, रुद्र... और तेरी ही खोपड़ी इस वेदी का पहला खप्पर बनेगी!"
रुद्र अकेला खड़ा था... और चौसठ योगिनियों का महा-चक्रव्यूह अपने खूनी शिकंजे को कसने के लिए आगे बढ़ रहा था...
(कहानी जारी है...)
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भाग 8: चौसठ योगिनियों का चक्रव्यूह-नृत्य, गौरी-शंकर गर्भगृह का रक्षा-कवच और पाताल-कुंड का रहस्य।
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