Pretika › Tantrik & Black Magic › रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 6: रक्त भैरवी यंत्र का विखंडन, कापालिक की काल-माया और चौसठ योगिनियों का महा-आह्वान

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 12 मिनट

समय का पहिया उस एक भयानक, जानलेवा पल पर आकर जैसे जड़वत हो गया था।
लोह-गढ़ कंदरा के उस अष्टकोणीय रक्त-कुंड के ऊपर हवा में उछले रुद्र के सीने के ठीक सामने कापालिक तंत्रेश्वर का वह भारी, काले लोहे का त्रिशूल काल-सर्प की तरह फुफकारता हुआ नीचे उतर रहा था। त्रिशूल के भालों पर उन 79 नरबलियों का सड़ा हुआ, जहरीला खून इस कदर खौल रहा था कि उसके वायु को चीरने से तीखी चिंगारियां छूट रही थीं।
सननन!
रुद्र ने अपने प्राणों का मोह एक ही सेकंड में त्याग दिया था। उसने अपने शरीर को हवा में थोड़ा सा तिरछा मोड़ा। त्रिशूल की दाहिनी नोक रुद्र के बाएं कंधे की चमड़ी और मांस को चीरती हुई, पसलियों को खुरचकर निकल गई।
छपाक!
ताजा, लाल रक्त की एक धार रुद्र के कंधे से फूट पड़ी। असहनीय, तीखे दर्द की एक ज्वाला रुद्र के पूरे स्नायुतंत्र में कौंध गई। लेकिन उस जानलेवा पीड़ा ने रुद्र के संकल्प को तोड़ा नहीं, बल्कि और अधिक वज्र बना दिया। उसने अपने दोनों हाथों से उस दहकते हुए पारद शिवलिंग को अपनी पूरी आत्मा की शक्ति के साथ आगे झोंक दिया।
कड़ाssssक!
वह पारद शिवलिंग सीधे तंत्रेश्वर की चौड़ी, तांबई छाती के ठीक मध्य में जड़े उस स्वर्ण 'रक्त भैरवी महा-यंत्र' के केंद्र से पूरी ताकत से टकराया!
उस महा-टकराव का प्रभाव ऐसा था मानो किसी ने श्मशान के उस बंद तहखाने के भीतर बिजली का नंगा वज्र गिरा दिया हो। एक सेकंड के दसवें हिस्से के लिए उस पूरी कंदरा का घुप्प अंधकार एक अंधा कर देने वाली, दूधिया-सफेद और नीली रोशनी के प्रचंड महा-विस्फोट में विलीन हो गया।
पारद साक्षात भगवान शिव का तरल स्वरूप था, जो असीम शुद्धता का प्रतीक था; और वह स्वर्ण यंत्र 186 वर्षों के काले जादू, विश्वासघात और अशुद्ध नरबलि के रक्त से रंगा हुआ था। दो विपरीत ब्रह्मांडीय शक्तियों के टकराते ही उस सोने की तांत्रिक प्लेट के बीचों-बीच एक गहरी दरार पड़ गई।
चर्रर्र... तड़ाक!
सोने का वह अभेद्य तांत्रिक यंत्र शीशे की तरह चटक गया।
उस यंत्र के भीतर 1840 से कैद 79 अभागे मनुष्यों का वह काला, बासी और जहरीला रक्त किसी फटे हुए पाइप की तरह फव्वारा बनकर बाहर फूटा। वह बदबूदार खून तंत्रेश्वर की ही दाढ़ी, जटाओं और आंखों पर जा गिरा।
"आaaaaah! मेरी वेदी! मेरा अमरत्व!"
तंत्रेश्वर के कंठ से निकली वह चीख किसी एक मनुष्य की नहीं थी। ऐसा लगा मानो उस कंदरा के पत्थरों के भीतर से एक साथ अस्सी भूखे, तड़पते हुए भेड़ियों के गले काटे जा रहे हों। तंत्रेश्वर का वह आठ फीट लंबा भीमकाय शरीर उस आध्यात्मिक आघात के झटके से लड़खड़ाकर अपने ही सिंहासन पर जा गिरा।
रुद्र भी उस भीषण प्रतिघात (Recoil) के कारण हवा में उछलकर दस फीट दूर, रक्त-कुंड की पथरीली मुंडेर पर आ गिरा। उसका बायां कंधा खून से लथपथ था और पसलियों में सांस लेना भी दूभर हो रहा था। लेकिन उसकी मुट्ठी में वह पारद शिवलिंग अब भी एक अंगारे की तरह जल रहा था।
"तूने... तूने मेरी जीवन-धुरी को तोड़ दिया, विद्याधर के कीड़े!"
सिंहासन से एक ऐसी भयानक, घुरघुराती हुई आवाज आई जिसने रुद्र के रोंगटे खड़े कर दिए।
रुद्र ने अपने कंधे के घाव को हाथ से दबाते हुए सिर उठाया।
सामने सिंहासन पर बैठा तंत्रेश्वर अब पहले जैसा नहीं था। उसकी छाती पर जड़ा वह स्वर्ण यंत्र पिघलकर काले कीचड़ की तरह बह चुका था। उसकी तांबई त्वचा जगह-जगह से फट रही थी और उन दरारों के भीतर से काला धुआं और बैंगनी रंग की विषैली लपटें बाहर निकल रही थीं।
लेकिन तंत्रेश्वर मरा नहीं था!
186 वर्षों की घोर तांत्रिक साधना और पाताल के असुरों के संसर्ग ने उसकी देह को साधारण जैविक सीमाओं से परे एक 'जीवित प्रेत-कंकाल' (Undead Lich) बना दिया था।
तंत्रेश्वर अपनी जगह से उठा। उसकी दोनों अंधी, सफेद आंखें अब पूरी तरह से गहरे, गड्ढेदार गर्त में बदल चुकी थीं, जिनके भीतर से रक्त-लाल आग की लपटें नाच रही थीं। उसने अपने दोनों हाथों के छह-छह इंच लंबे काले नाखूनों को अपनी ही जांघों में गड़ा दिया।
"यदि मेरी यह भौतिक देह नष्ट भी हो जाए, रुद्र... तो भी इस कंदरा से तू जीवित बाहर नहीं जाएगा!" तंत्रेश्वर ने अपनी दोनों बाहें फैलाईं।
उसने अपने फटे हुए सीने से बहते काले रक्त को अपने दोनों हाथों में भरा और उस विशाल कंदरा की अष्टकोणीय दीवारों पर बने उन साठ कोष्ठकों की ओर फेंक दिया, जहाँ बची हुई साठ योगिनियों की विकृत, पाषाण-प्रतिमाएं स्थापित थीं।
"हे श्मशान की साठ भैरवियों! जागो! इस गुफा की छत को पाताल में मिला दो! इसके हाड़-मांस को चबाकर मेरी अंतिम आहुति पूर्ण करो!" तंत्रेश्वर ने अपने कंठ से तांत्रिक 'महा-मारण मंत्र' का अंतिम, उन्मादी घोष किया।
कड़कड़ाssssहट! धड़ाम! धड़ाम!
कंदरा की साठ फीट ऊंची छत से चट्टानों के विशाल खंड टूट-टूटकर नीचे गिरने लगे।
दीवारों पर बने वे साठ तांत्रिक आले एक साथ थरथराने लगे। उन आलों में खड़ी साठ योगिनियों की पत्थर की मूर्तियां—जिनके हाथ में खप्पर, तलवारें, पाश और त्रिशूल थे—अपनी पाषाण-जकड़न से बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगीं। उनके पत्थर के जबड़े 'कट-कट-कट' की आवाज करते हुए खुलने लगे और उनकी आंखों से काले धुएं के बवंडर छूटने लगे।
पूरी लोहे जैसी मजबूत कंदरा किसी भूकंप के केंद्र की तरह डोलने लगी।
रक्त-कुंड का वह खौलता हुआ रक्त अपनी मुंडेरों को तोड़कर बाहर पत्थरों पर फैलने लगा। जहाँ-जहाँ वह तेजाबी रक्त पड़ रहा था, वहां-वहां पत्थर पिघलकर धुआं छोड़ रहे थे।
रुद्र लड़खड़ाते हुए उठा। उसके सामने दो रास्ते थे—या तो वह पीछे मुड़कर गुफा के मुहाने की ओर भागे, या फिर तंत्रेश्वर के इस अंतिम तांत्रिक बवंडर को यहीं समाप्त करे।
लेकिन अगर वह भागता, तो वे साठ योगिनियां जाग्रत होकर विंध्याचल के पूरे अंचल और काशी की ओर कूच कर जातीं।
"नहीं... पलायन कोई मार्ग नहीं है," रुद्र ने अपने दांत भींच लिए।
उसने अपनी कमर में बंधे उस अष्टधातु के काल-भैरव खड्ग को बाहर खींच लिया। खड्ग की मूठ पर बना वह नरमुंड अब नीली दिव्य ज्वाला से दहक रहा था।
तभी, उस गिरते हुए मलबे और धुएं के बीच, कंदरा की हवा में एक जानी-पहचानी, शांत और अलौकिक सुगंध तैर गई। वह सुगंध श्मशान की सूखी भस्म, ताजे गंगाजल और नीम की पत्तियों की थी।
रुद्र के ठीक पीछे, हवा में नीली रोशनी का एक पारदर्शी चक्रव्यूह बना।
उस चक्रव्यूह के भीतर... काशी के अस्सी घाट पर बैठे अघोरी बालकनाथ की सूक्ष्म-काया (Astral Form) प्रकट हो गई!
यद्यपि बाबा बालकनाथ का भौतिक शरीर काशी की अपनी कुटिया में था, लेकिन उन्होंने अपनी तांत्रिक साधना के बल पर अपनी चेतना का एक हिस्सा इस कंदरा में उतार दिया था।
"रुद्र!" बाबा बालकनाथ की गूंजती हुई आवाज सीधे रुद्र की चेतना में प्रविष्ट हुई। "समय आ गया है! तंत्रेश्वर की अमरता का कवच टूट चुका है... अब उसकी छाती के भीतर केवल एक खुला, सड़ा हुआ घाव है! उस घाव के भीतर उसके प्राणों की वह अंतिम काली ग्रंथि है। अपने काल-भैरव खड्ग को पारद की शक्ति से सिद्ध कर... और सीधे उसकी छाती के उस पार उतार दे!"
"बाबा... यह साठ योगिनियां गुफा को गिरा रही हैं!" रुद्र ने चिल्लाकर कहा।
"इन योगिनियों को मैं बांधता हूँ!" बाबा बालकनाथ की सूक्ष्म-आकृति हवा में दस फीट ऊपर उठी।
बाबा ने अपने पारदर्शी हाथों से हवा में 'महा-अघोर बंधन मुद्रा' बनाई। उनके कंठ से भैरव-कवच के महा-मंत्र गूंज उठे:
"ॐ नमः श्मशान-वासिने... सर्व-भूत-प्रेत-योगिनी-मुखं स्तंभय स्तंभय स्वाहा!"
बाबा के उस मंत्र के प्रभाव से कंदरा की दीवारों पर हिलती हुई वे साठ पाषाण-मूर्तियां हवा में ही स्तब्ध होकर जम गईं। उनकी गति रुक गई, जैसे किसी ने समय को फ्रीज (जड़) कर दिया हो।
कर्नल रणवीर या किसी सेना की सहायता के बिना, केवल काशी के उस अघोरी के आत्मबल ने रुद्र के लिए एक अंतिम मार्ग खोल दिया था।
रुद्र ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया।
उसने अपनी बाईं हथेली में पकड़े उस दहकते हुए पारद शिवलिंग को अपने दाहिने हाथ के काल-भैरव खड्ग की तीखी धार पर तेजी से रगड़ दिया।
छनन्नन!
पारे की दिव्य धातु और खड्ग के अष्टधातु का मिलन होते ही, खड्ग की धार से सूर्य के समान प्रचंड सुनहरी और श्वेत लपटें फूट पड़ीं।
रुद्र घायल कंधे के असहनीय दर्द को भूलकर, रक्त-कुंड के जलते हुए कीचड़ के ऊपर से एक छलांग लगाकर सीधे तंत्रेश्वर के सिंहासन के चबूतरे पर जा पहुंचा।
तंत्रेश्वर ने अपने काले लोहे के त्रिशूल को दोनों हाथों से उठाकर रुद्र की गर्दन काटने के लिए नीचे गिराया।
लेकिन रुद्र की गति इस बार किसी नश्वर मनुष्य की नहीं थी; वह अपने परदादा विद्याधर शास्त्री और अघोरी बालकनाथ के संयुक्त संकल्प की गति थी। रुद्र ने त्रिशूल के वार के नीचे से झुकते हुए खुद को आगे की ओर धकेला।
और दोनों हाथों से उस जलते हुए काल-भैरव खड्ग को सीधे तंत्रेश्वर की खुली हुई, यंत्र-विहीन छाती के ठीक मध्य में घोंप दिया!
कड़ाssssक!
खड्ग तंत्रेश्वर की सड़ी हुई पसलियों और उसकी उस काली प्राण-ग्रंथि को चीरता हुआ उसकी रीढ़ की हड्डी के आर-पार निकल गया!
एक ऐसा भयानक, कानफोड़ू धमाका हुआ जिससे कंदरा के पत्थरों से खून के फव्वारे छूट पड़े।
"आaaaaah! महाकाल... यह नहीं हो सकता!"
तंत्रेश्वर के मुख से निकली अंतिम चीख किसी ढहते हुए पहाड़ की तरह गूंजी। खड्ग से निकली पवित्र अघोर-अग्नि तंत्रेश्वर की नसों के भीतर तेजाब की तरह फैलने लगी। उसकी 186 साल पुरानी सूखी देह अंदर से जलने लगी।
उसकी त्वचा जलकर काली राख बनने लगी, उसकी हड्डियां पटाखों की तरह चटकने लगीं।
लेकिन अपनी देह के पूरी तरह भस्म होने से ठीक पहले, तंत्रेश्वर के जलते हुए कंकाल से एक अत्यंत काली, विशाल और भयानक छाया-रूह (Astral Wraith) बाहर निकली।
वह तंत्रेश्वर की मूल, अमर प्रेत-चेतना थी!
उस काली रूह ने कंदरा की छत की ओर उड़ान भरी। उसके चेहरे पर मरते हुए भी वही कुटिल, शैतानी हंसी तैर रही थी।
"रुद्र... तूने मेरी इस माटी की देह को जला दिया... लेकिन मेरा असली साम्राज्य यहाँ विंध्याचल में नहीं है!" उस काली रूह की आवाज बादलों की गड़गड़ाहट की तरह गूंजी।
"चौसठ योगिनी की असली महा-पीठ मध्य प्रदेश के 'भेड़ाघाट' (जबलपुर) के नर्मदा तट पर और 'मितावली' (मुरैना) के 64-कमरों वाले तांत्रिक चक्रव्यूह में दबी है! मेरी यह प्रेत-आत्मा अब सीधे नर्मदा के उन संगमरमरी श्मशानों की ओर जा रही है... जहाँ चौसठ योगिनियों का मूल रक्त-सिंहासन स्थापित है! यदि तूने वहां आने का साहस किया... तो नर्मदा का हर जल-कण तेरे लिए खौलता हुआ रक्त बन जाएगा! हाहाहाहा!"
बूमssss!
एक भयानक विस्फोट के साथ वह काली रूह कंदरा की पथरीली छत को चीरती हुई सीधे दक्षिण-पश्चिम की दिशा में, मध्य प्रदेश के आसमान की ओर उड़ गई।
सिंहासन पर पड़ा तंत्रेश्वर का भौतिक शरीर पूरी तरह जलकर सफेद और काली राख के एक छोटे से ढेर में तब्दील हो चुका था।
उसके मरते ही, दीवारों पर बंधी वे साठ पाषाण-मूर्तियां शांत हो गईं। उनके जबड़े बंद हो गए और वे फिर से साधारण, निर्जीव पत्थर बन गईं। रक्त-कुंड का वह खौलता हुआ रक्त धीरे-धीरे सूखकर सूखी काली मिट्टी में बदलने लगा।
बाबा बालकनाथ की सूक्ष्म-आकृति ने हवा में हाथ उठाकर रुद्र को अंतिम आशीष दिया:
"साधु वत्स! तूने विंध्याचल के इस द्वार को मुक्त कर दिया... लेकिन अब तेरा असली युद्ध नर्मदा के तट पर होगा। जा... और उस पापी की आत्मा को भी मोक्ष या महा-विनाश की ओर भेज!"
इन शब्दों के साथ बाबा की सूक्ष्म-काया हवा में विलीन हो गई।
सुबह के करीब सात बज रहे थे।
रुद्र लड़खड़ाते कदमों के साथ, अपने बाएं कंधे पर गमछा बांधे हुए लोह-गढ़ कंदरा के उस विशाल मुहाने से बाहर खुली हवा में निकला।
बाहर का दृश्य देखकर रुद्र की थकी हुई आंखों में आंसू छलक आए।
विंध्याचल के पहाड़ों पर 186 वर्षों के बाद पहली बार वह जहरीली, तांबई धुंध पूरी तरह छंट चुकी थी।
पूर्व के क्षितिज से निकलती हुई सुबह की ताजी, सुनहरी धूप महुआ और पलाश के पेड़ों पर मोतियों जैसी चमक रही थी। जंगल में अब कोई सड़ांध नहीं थी; हवा में गीली मिट्टी, जंगली फूलों और पलाश की मनमोहक, प्राकृतिक सुगंध तैर रही थी। पक्षी चहचहा रहे थे और कर्णावती नदी का पानी अब शांत, स्वच्छ होकर नीचे घाटी में बह रहा था।
विंध्य अरण्य का वह भयानक अभिशाप अब हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो चुका था।
रुद्र सीढ़ियों से नीचे उतरा।
वह उस पार अपनी महिन्द्रा थार जीप के पास पहुंचा, जहाँ अब उस नरकंकाल पुल की जगह एक प्राकृतिक, मजबूत पथरीला मार्ग उभर आया था।
रुद्र ने जीप की डिग्गी से प्राथमिक चिकित्सा किट निकाली। उसने अपने कंधे के गहरे घाव को एंटीसेप्टिक से साफ किया और उस पर बाबा बालकनाथ की दी हुई सिद्ध भस्म लगाकर कसकर पट्टी बांध ली। भस्म के लगते ही कंधे का असहनीय दर्द एक ठंडी, सुखद अनुभूति में बदल गया।
उसने ड्राइविंग सीट पर बैठकर एक गहरी, लंबी सांस ली।
उसने अपने झोले से परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह चमड़े की प्राचीन डायरी निकाली।
जैसे ही रुद्र ने डायरी को अपनी हथेली पर रखा, डायरी के पन्ने एक बार फिर अपने आप फड़फड़ाने लगे—सर्र-सर्र-सर्र!
पन्ने पलटना एक नए पृष्ठ पर जाकर रुका।
उस पृष्ठ पर किसी अदृश्य, स्वर्णिम स्याही से एक नया तांत्रिक नक्शा और संदेश उभर आया:
"मध्य प्रदेश खंड — नर्मदा तट: भेड़ाघाट एवं मितावली का 64 योगिनी चक्रव्यूह"
नक्शे के नीचे विद्याधर शास्त्री की अपनी हस्तलिखित चेतावनी दर्ज थी:
"विंध्याचल केवल द्वार था... असली तांत्रिक चक्रव्यूह नर्मदा के उस संगमरमरी गर्त (भेड़ाघाट) में है जहाँ 10वीं शताब्दी के कलचुरी राजाओं ने चौसठ योगिनियों के 64 गुप्त मंदिर बनवाए थे। तंत्रेश्वर की आत्मा उस मुख्य मंदिर के नीचे स्थित 'नर्मदा पाताल-कुंड' में अपनी नई देह धारण करने का प्रयास करेगी। वहाँ पहुँचने के लिए केवल तीन दिन का समय है... यदि तीन दिन बाद आने वाली 'सोमवती अमावस्या' तक वह चक्रव्यूह नहीं टूटा... तो चौसठ योगिनियां साक्षात जीवित होकर संपूर्ण भारतवर्ष में काल-भैरवी का तांडव करेंगी!"
रुद्र ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी।
समय हो रहा था—सुबह के 07:30 AM।
उसके पास केवल बहत्तर घंटे (72 Hours) बचे थे।
रुद्र ने जीप का इग्निशन ऑन किया। थार जीप का भारी डीजल इंजन एक अदम्य दहाड़ के साथ गूंज उठा। रुद्र ने स्टीयरिंग व्हील को दोनों हाथों से मजबूती से थामा और जीप को विंध्याचल के जंगलों से बाहर, मध्य प्रदेश के जबलपुर और भेड़ाघाट की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर मोड़ दिया...
काले जादू, अघोर तंत्र और चौसठ योगिनियों का यह महा-युद्ध अब अपने दूसरे और सबसे भयानक चरण—'नर्मदा खंड' में प्रविष्ट होने जा रहा था!
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 7: नर्मदा का संगमरमरी श्मशान, भेड़ाघाट का 64 योगिनी मंदिर और उबलते पानी का रहस्य।

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
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Category
Tantrik & Black Magic
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12 min
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2367
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Hindi (हिंदी)
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