PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 5: लोह-गढ़ कंदरा का पहला पाताल-द्वार, जीवित पाषाण-मूर्तियों का तांडव और तंत्रेश्वर की अमर समाधि

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
5 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
14 min
Words
2605
Language
Hindi (हिंदी)
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विंध्याचल के आकाश पर सुबह के सवा पांच बजे भी सूर्य की कोई कोमल, स्वर्णिम किरण नहीं उतरी थी।
पहाड़ियों के ऊपर केवल एक भारी, मटमैली और तांबई रंग की जहरीली धुंध छाई हुई थी, जो सांसों के साथ भीतर जाते ही हलक में राख का स्वाद घोल रही थी। लोह-गढ़ पर्वत की वह विशाल, काली चट्टानी दीवार किसी पाषाण-दैत्य की तरह खड़ी थी। पर्वत के ठीक मध्य में स्थित उस गुफा का मुहाना हूबहू किसी विशालकाय नरमुंड के खुले हुए जबड़े जैसा प्रतीत हो रहा था, जिसके भीतर अनंत, अथाह अंधकार किसी भूखे पेट की तरह फैला हुआ था।
कंदरा के भीतर से आने वाली वह भारी, गगनभेदी धमक—धम... धम... धम... धम...—अब इतनी तीव्र हो चुकी थी कि रुद्र के पैरों के नीचे के नुकीले पत्थर भी उस लय के साथ कांप रहे थे। यह आवाज किसी सामान्य ढोल या नगाड़े की नहीं थी; यह अघोर पंथ के सबसे गुप्त, भयानक वाद्य की थी, जिसे श्मशान के तांत्रिक 'नर-चर्म महा-डमरू' कहते थे।
रुद्र ने अपने कंधे पर कसे चमड़े के झोले को एक बार फिर परखा।
झोले के भीतर रखा वह पारद शिवलिंग अब इतना गर्म हो चुका था कि झोले के चमड़े से हल्की-हल्की भाप निकल रही थी। उसकी कमर में बंधा अष्टधातु का 'काल-भैरव खड्ग' किसी शिकारी कुत्ते की तरह वातावरण में फैले काले जादू की गंध पाकर लगातार एक तीखी, धातुई कंपन कर रहा था।
रुद्र ने गुफा के मुहाने की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर नजर डाली।
पहाड़ की छाती को काटकर बनाई गई लाल बलुआ पत्थर की कुल 108 सीढ़ियां थीं। हर सीढ़ी पर सूखे और ताजे रक्त के छींटे पड़े थे। सीढ़ियों के दोनों तरफ लोहे के त्रिशूल गड़े थे, जिन पर नरमुंडों की खोपड़ियां टंगी थीं।
और उन 108 सीढ़ियों के ठीक शीर्ष पर, गुफा के विशाल चौखट के दोनों ओर, काले ग्रेनाइट पत्थरों से तराशी गई चौंसठ योगिनियों में से पहली तीन योगिनियों की दस-दस फीट ऊंची पाषाण-प्रतिमाएं खड़ी थीं:
दिव्य-योगिनी — जिनके हाथ में पाषाण का चक्र और नरमुंड-खप्पर था।
महा-योगिनी — जिनकी आठ भुजाएं थीं और प्रत्येक हाथ में नुकीले पाषाण-अस्त्र थे।
सिद्ध-योगिनी — जिनके गले और बांहों पर जीवित दिखने वाले काले नागों की नक्काशी थी।
वे मूर्तियां केवल पत्थर की नहीं थीं।
उनकी पथरीली आंखों के कोटरों से गाढ़ा, ताजा लाल खून किसी सोते की तरह बहकर नीचे की सीढ़ियों पर टपक रहा था—टप... टप... टप...। उनके पत्थर के जबड़े बहुत धीमी, भयानक गति से आपस में टकरा रहे थे, जैसे वे हवा में किसी जीवित मांस की गंध सूंघ रही हों।
रुद्र ने अपने इष्टदेव भगवान महाकाल का स्मरण किया। उसने अपनी जेब से बाबा बालकनाथ द्वारा दी गई सिद्ध अघोर भस्म निकाली और अपने माथे पर तीन आड़ी रेखाओं (त्रिपुंड) के रूप में खींच ली। उसने काल-भैरव खड्ग को अपनी दाहिनी मुट्ठी में और पारद शिवलिंग को अपने बाएं हाथ में थामा।
उसने पहली सीढ़ी पर पैर रखा।
चर्रर्र... कड़ाक!
पत्थर की पहली सीढ़ी के नीचे से एक गहरी, भारी कराह की आवाज निकली, मानो किसी जीवित मनुष्य की छाती पर पैर रख दिया गया हो। हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई। रुद्र की हर सांस से निकलता धुआं टॉर्च की रोशनी में तैरने लगा।
रुद्र एक-एक सीढ़ी चढ़ने लगा।
दस... बीस... तीस... चालीस...
जैसे-जैसे वह ऊपर बढ़ रहा था, गुफा के भीतर से आने वाली वह नगाड़े की आवाज तेज होती जा रही थी। हवा में सड़े हुए मांस, कपूर और जलती हुई हड्डियों की ऐसी तीव्र दुर्गंध भर गई थी कि रुद्र को अपने मुंह पर गमछा बांधना पड़ा।
जब रुद्र 54वीं सीढ़ी (ठीक आधे रास्ते) पर पहुंचा, तो अचानक वह भयानक घटना घटी जिसके लिए कोई भी सामान्य मस्तिष्क तैयार नहीं हो सकता था।
कड़कड़ाssssहट! तड़-तड़-तड़!
सीढ़ियों के शीर्ष पर खड़ी उन तीनों दस फीट ऊंची पाषाण-प्रतिमाओं के पत्थरों में भयानक दरारें पड़ने लगीं।
काले ग्रेनाइट के पत्थर चटकने लगे। उन दरारों के भीतर से कोई पत्थर का चूरा नहीं गिरा; बल्कि दरारों से इंसानी नसों की तरह काली-लाल नसें बाहर उभर आईं! उन मूर्तियों की पथरीली त्वचा के भीतर खून दौड़ने लगा।
उनकी विशाल, पाषाण-आंखों में एक साथ रक्त-लाल आग की भयानक ज्वाला जल उठी।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
तीनों दस फीट ऊंची विशाल पाषाण-योगिनियां अपने-अपने आसनों से नीचे कूद पड़ीं! उनके कूदते ही पूरी पहाड़ी किसी 7.0 तीव्रता के भूकंप की तरह हिल उठी।
वे अब केवल पत्थर की मूरतें नहीं थीं; वे पाताल के काले जादू से जाग्रत 'जीवित पाषाण-योगिनियां' बन चुकी थीं! उनकी चाल में सैकड़ों हाथियों का बल था और उनकी आंखों में केवल संहार की भूख थी।
"रक्तं देहि! बलिं देहि!"
तीनों पाषाण-मूर्तियों के खुले जबड़ों से एक साथ ऐसी गगनभेदी, धातुई आवाज निकली जिसने रुद्र के कानों के पर्दे लगभग फाड़ दिए।
सबसे आगे दिव्य-योगिनी बढ़ी। उसके हाथ में मौजूद पत्थर का विशाल चक्र हवा में घूमने लगा। वह चक्र किसी आरी की तरह हवा को काटता हुआ सीधे रुद्र की गर्दन की ओर लपका!
रुद्र ने बिजली की फुर्ती से खुद को सीढ़ियों पर दाईं ओर झुकाया।
सननन!
वह पाषाण-चक्र रुद्र के कान को छूता हुआ पीछे की चट्टान से टकराया। चट्टान का एक विशाल टुकड़ा मक्खन की तरह कटकर नीचे खाई में जा गिरा।
इससे पहले कि रुद्र संभल पाता, आठ भुजाओं वाली महा-योगिनी ने अपनी आठों भुजाओं में थामे पाषाण-त्रिशूलों और भालों से रुद्र के सीने पर एक साथ प्रहार कर दिया।
कड़ाक!
रुद्र ने अपनी कमर से काल-भैरव खड्ग को दोनों हाथों से उठाकर आगे कर दिया।
खड्ग और पाषाण-त्रिशूलों के बीच ऐसा भयानक टकराव हुआ कि नीली और पीली चिंगारियों की बारिश हो गई। रुद्र का शरीर उस भीषण झटके से फिसलकर तीन सीढ़ियां नीचे जा गिरा। उसकी हथेलियां छिल गईं और मुंह से खून की एक पतली धार निकल आई।
तीसरी, सिद्ध-योगिनी, जिसके गले में पत्थर के नाग उकेरे गए थे, आगे बढ़ी।
उसकी पाषाण-छाती से वे पत्थर के नाग अचानक जीवित होकर बाहर निकले! वे काले, विषैले कोबरा जैसे नाग हवा में फुफकारते हुए रुद्र के दोनों पैरों और कमर को जकड़ने के लिए लपके।
रुद्र सीढ़ियों पर फंसा हुआ था। ऊपर से तीनों पाषाण-दैत्य रूपी योगिनियां उसे पत्थरों की तरह पीस देने के लिए आगे बढ़ रही थीं।
उस अंतिम, जानलेवा पल में रुद्र को अपने परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की उस गुप्त डायरी का एक अत्यंत गूढ़ तांत्रिक सिद्धांत याद आया:
"चौसठ योगिनियां मूलतः आदिशक्ति की दिव्य शक्तियां हैं। कोई भी तांत्रिक उन्हें मार नहीं सकता, क्योंकि वे अमर हैं। दुष्ट कापालिक केवल अपने अशुद्ध रक्त और काले जादू से उन्हें 'सम्मोहित' और 'विकृत' करके अपना दास बना लेते हैं। यदि योगिनियों पर प्रहार करोगे, तो वे तुम्हें भस्म कर देंगी... उन्हें शांत करने का एकमात्र मार्ग 'शुद्धिकरण' (Re-purification) है। जब शुद्ध पारद और भैरव-अग्नि का स्पर्श उनके मस्तक से होता है, तो काले जादू का आवरण टूट जाता है और वे अपने मूल दिव्य रूप में लौट आती हैं!"
"इन्हें मारना नहीं है... इन्हें मुक्त करना है!" रुद्र के अंतर्मन में ज्ञान का दीप जल उठा।
रुद्र ने अपनी दाहिनी हथेली से काल-भैरव खड्ग की धार को तेजी से पकड़ा और खींच दिया।
छपाक!
उसकी हथेली से पवित्र, शास्त्रीय कुल का ताजा रक्त बह निकला। रुद्र ने उस रक्त को अपनी बाईं मुट्ठी में पकड़े उस पारद शिवलिंग के ऊपर मल दिया।
पारे की धातु और रक्त का मिलन होते ही पारद शिवलिंग किसी छोटे सूर्य की तरह प्रज्वलित हो उठा। उससे सफेद, स्वर्णिम और नीली दिव्य किरणों का एक ऐसा प्रचंड बवंडर फूटा जिसने सीढ़ियों के उस पूरे अंधकार को दिन के उजाले से भी अधिक चमका दिया।
सिद्ध-योगिनी के छोड़े हुए वे काले विषैले नाग उस पवित्र प्रकाश के स्पर्श मात्र से जलकर राख हो गए।
रुद्र ने बिना एक सेकंड गंवाए आगे की ओर छलांग लगाई।
वह सीधे दिव्य-योगिनी के पाषाण-कंधे पर चढ़ा। दिव्य-योगिनी ने अपने विशाल पत्थर के पंजों से रुद्र की खोपड़ी को मसलने के लिए हाथ आगे बढ़ाए। लेकिन रुद्र उससे भी तेज था। उसने अपने बाएं हाथ में चमकते हुए उस पारद शिवलिंग को पूरी ताकत से दिव्य-योगिनी के पत्थर के माथे के ठीक मध्य—'आज्ञा चक्र' पर चिपका दिया!
साथ ही, रुद्र ने अपने कंठ से 'महा-योगिनी शुद्धि मंत्र' का गगनभेदी घोष किया:
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे... पाताल-बंधनं विमुंच विमुंच... स्वरूपं प्रापय स्वाहा!"
भभकssss!
पारद शिवलिंग के स्पर्श होते ही दिव्य-योगिनी के माथे से काले, बदबूदार धुएं का एक विशाल फव्वारा छूटा, जैसे किसी ने खौलते हुए तेजाब में पानी डाल दिया हो।
उस पाषाण-प्रतिमा के भीतर दौड़ती हुई वह अशुद्ध, काली-लाल नसें एक ही सेकंड में जलकर राख हो गईं।
मूर्ति की आंखों से बहता खून रुक गया। उसकी पाषाण-आंखों की लाल आग बुझकर एक अत्यंत शांत, शीतल और दूधिया-सफेद रोशनी में बदल गई। दिव्य-योगिनी का विशाल पाषाण-हाथ, जो रुद्र का सिर कुचलने वाला था, हवा में ही रुक गया और उसने बहुत धीरे से अपना हाथ रुद्र के सिर पर रखकर आशीर्वाद की मुद्रा बना ली।
उस काले जादू का पहला सिरा टूट चुका था!
दिव्य-योगिनी की पाषाण-देह से एक सुंदर, शांत नीली ज्योति बाहर निकली। उस देवी-रूपी रूह ने रुद्र की ओर देखकर मंद मुस्कान बिखेरी:
"साधु वत्स! तूने मुझे तंत्रेश्वर के 186 साल पुराने नरक-बंधन से मुक्त कर दिया... अब इन दोनों बहनों को भी उस पापी के पाश से छुड़ा!"
उस दिव्य ज्योति ने अपनी शक्ति कबीर के पारद शिवलिंग में फूंक दी।
रुद्र की देह में अब असीम ऊर्जा दौड़ रही थी। वह हवा में घूमा। उसने अपने काल-भैरव खड्ग की नोक पर पारद शिवलिंग का स्पर्श कराया और उस जलते हुए खड्ग को सीधे महा-योगिनी और सिद्ध-योगिनी के मस्तक पर एक के बाद एक स्पर्श करा दिया!
कड़ाक! कड़ाक!
दो और भयंकर धमाके हुए। काले धुएं के बवंडर उड़े।
महा-योगिनी और सिद्ध-योगिनी के शरीरों से भी तंत्रेश्वर का वह काला सम्मोहन तिनके की तरह उड़ गया। तीनों विशाल पाषाण-मूर्तियां अब पूरी तरह शांत, पवित्र और अचल ग्रेनाइट की मूर्तियों में बदल चुकी थीं। उनकी आंखों से अब खून नहीं, बल्कि गंगाजल की शीतल बूंदें रिस रही थीं।
तीनों योगिनियों की संयुक्त दिव्य वाणी रुद्र के मस्तिष्क में गूंजी:
"मार्ग खुल चुका है, रुद्र... गुफा के सबसे गहरे पाताल-कक्ष में उस पापी तंत्रेश्वर की मूल देह समाधिस्थ है। वह 80वीं बलि के लिए तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा है... सावधान रहना, उसकी देह अब केवल मनुष्य नहीं, पाताल-असुर का जीवित कंकाल बन चुकी है!"
सीढ़ियों का महा-संग्राम समाप्त हो चुका था।
सुबह के करीब छह बज रहे थे।
रुद्र ने सीढ़ियों के अंतिम पायदान को पार किया और सीधे लोह-गढ़ कंदरा के उस नरमुंड जैसे विशाल मुहाने के भीतर कदम रख दिया।
गुफा के भीतर कदम रखते ही बाहरी दुनिया का हर नामो-निशान मिट गया।
यहाँ न कोई हवा थी, न कोई सामान्य गंध। चारों तरफ केवल सड़ी हुई चर्बी, सूखे खून और किसी प्राचीन श्मशान की बासी भस्म का घना, दमघोंटू वातावरण था। गुफा की छत कम से कम साठ फीट ऊंची थी, जिस पर उल्टे लटके हजारों चमगादड़ों की लाल आंखें टॉर्च की रोशनी में चमक रही थीं।
गुफा का यह मुख्य मार्ग एक विशाल, गोल भूमिगत हॉल में जाकर खुला—'रक्त-कुंड मंडप'।
मंडप का दृश्य देखकर रुद्र का कलेजा कांप उठा।
मंडप की विशाल, अष्टकोणीय दीवारों पर चारों तरफ साठ तांत्रिक कोष्ठक बने थे, जिनके भीतर बची हुई साठ योगिनियों की भयानक, विकृत मूर्तियां स्थापित थीं। उन मूर्तियों के गले में लोहे की जंजीरें बंधी थीं और उनके आगे तांबे के बड़े-बड़े कटोरे रखे थे।
और उस विशाल मंडप के ठीक केंद्र में... एक पचास फीट चौड़ा, अष्टकोणीय 'रक्त-कुंड' बना हुआ था!
उस कुंड में पानी नहीं था।
उसमें 1840 से लेकर अब तक दी गई उन 79 नरबलियों का गाढ़ा, सड़ा हुआ और खौलता हुआ काला-लाल रक्त भरा हुआ था! उस कुंड की सतह से लगातार बुलबुले फूट रहे थे—खद-बद... खद-बद...—और हर बुलबुले के फूटने के साथ हवा में किसी तड़पते हुए मनुष्य की अंतिम चीख गूंजती थी।
और उस खौलते हुए रक्त-कुंड के ठीक पार... काले ग्रेनाइट पत्थरों के एक विशाल, भयानक सिंहासन पर वह बैठा था।
वह था—कापालिक तंत्रेश्वर की मूल, जीवित भौतिक देह!
काशी के हरिश्चंद्र घाट पर जो रुद्र ने देखा था, वह केवल तंत्रेश्वर की एक 'छाया' थी। लेकिन यहाँ... यहाँ उसका असली, 186 साल पुराना शरीर साक्षात उपस्थित था।
उसका शरीर आठ फीट लंबा और अत्यंत विशाल था। उसकी त्वचा किसी तांबे की चादर जैसी सख्त, काली और झुर्रीदार थी। उसके बाल फर्श तक जटाओं के रूप में फैले थे, जिनमें इंसानी खोपड़ियां और हड्डियां गूंथी हुई थीं। उसके दोनों हाथों के नाखून छह-छह इंच लंबे और काले खंजरों जैसे नुकीले थे।
उसकी छाती पर, जहाँ दिल होना चाहिए, शुद्ध सोने की एक भारी तांत्रिक प्लेट जड़ी हुई थी, जिस पर रक्त से उकेरा गया था—'रक्त भैरवी महा-यंत्र'!
तंत्रेश्वर पद्मासन में बैठा था। उसकी दोनों आंखें बंद थीं। उसकी सांसें नहीं चल रही थीं। वह 186 वर्षों से एक ऐसी 'मृत-समाधि' (Suspended Animation) में था जहाँ समय का कोई प्रभाव उसकी देह पर नहीं पड़ रहा था।
सिंहासन के ठीक पीछे वह विशाल 'नर-चर्म महा-डमरू' लगा था, जिसकी डोरियां अपने आप हिल रही थीं और वही भयानक धमक पैदा कर रही थीं:
धम... धम... धम... धम...
रुद्र ने अपने कदम आगे बढ़ाए। वह उस खौलते हुए रक्त-कुंड की मुंडेर के पास पहुंचा।
जैसे ही रुद्र के बूट की आहट उस सिंहासन तक पहुंची, अचानक वह महा-डमरू एक भयानक, कानफोड़ू धमाके के साथ रुक गया।
सन्नाटा... घोर, अमानवीय सन्नाटा!
और उस सन्नाटे के बीच... सिंहासन पर बैठे उस आठ फीट लंबे कापालिक तंत्रेश्वर की बंद आंखें एक झटके में पूरी तरह खुल गईं!
वे आंखें इंसानी नहीं थीं।
उन आंखों में न कोई पुतली थी, न कोई सफेद भाग; वे साक्षात पाताल के दो सुलगते हुए, खूनी अंगारे थे!
तंत्रेश्वर की गर्दन में 'कड़कड़ाहट' की आवाज हुई। उसकी 186 साल पुरानी सूखी त्वचा से काले धुएं का एक विशाल बवंडर छूटा। वह धीरे-धीरे अपने विशाल सिंहासन से उठकर सीधा खड़ा हो गया।
"हाहाहाहाहा!"
तंत्रेश्वर की हंसी किसी फटे हुए लाउडस्पीकर की तरह उस पूरी कंदरा की दीवारों को हिलाकर रख दी।
"आ गया... 80वीं आहुति का पात्र स्वयं चलकर मेरी वेदी पर आ गया!" तंत्रेश्वर की भारी, पाताल जैसी आवाज गूंजी।
"विद्याधर ने सोचा था कि वह उस पारद शिवलिंग से मुझे बांध देगा... लेकिन वह मूर्ख यह नहीं जानता था कि जिस दिन उसका अंतिम वंशज इस शिवलिंग को लेकर मेरी कंदरा में कदम रखेगा, उसी दिन मेरी अमरता का अंतिम चक्र पूर्ण होगा!"
तंत्रेश्वर ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया।
सननन!
रक्त-कुंड के भीतर से खौलते हुए खून की एक विशाल, बीस फीट ऊंची लहर उठी। उस लहर ने किसी विशालकाय अजगर की तरह हवा में छलांग लगाई और रुद्र के दोनों पैरों को इतनी क्रूरता से जकड़ लिया कि रुद्र का शरीर जमीन से घिसटता हुआ सीधे उस खौलते हुए रक्त-कुंड के किनारे की ओर खिंचने लगा!
रुद्र की पीठ पत्थरों से रगड़ाने लगी। वह पारद शिवलिंग को सीने से चिपकाए हुए था।
तंत्रेश्वर अपने सिंहासन से नीचे उतरा। उसके हाथों में काले लोहे का एक विशाल, प्राचीन त्रिशूल प्रकट हो चुका था, जिसके भालों पर ताजे खून की बूंदें चमक रही थीं।
"आज की इस अमावस्या की भोर में... तेरा रक्त इस कुंड में गिरेगा रुद्र!" तंत्रेश्वर अपने भारी, जलते हुए कदमों के साथ रुद्र की ओर बढ़ा।
"और तेरे रक्त की अंतिम बूंद गिरते ही... ये बची हुई साठ योगिनियां मेरे आदेश पर जागेंगी और संपूर्ण काशी, संपूर्ण भारतवर्ष के श्मशानों को चीरकर एक ऐसा रक्त-साम्राज्य स्थापित करेंगी जो कभी समाप्त नहीं होगा!"
तंत्रेश्वर ने अपना विशाल त्रिशूल दोनों हाथों से उठाया और सीधे रुद्र की छाती के आर-पार उतारने के लिए हवा में तान दिया!
रुद्र के पास केवल एक सांस का समय था।
तभी, रुद्र के कंधे पर लटके उस झोले के भीतर से... उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह प्राचीन डायरी अचानक नीली दिव्य ज्वाला से जल उठी!
डायरी के पन्नों से विद्याधर शास्त्री की गूंजती हुई, तेजस्वी वाणी सीधे रुद्र के कानों में चीख पड़ी:
"रुद्र! इसके शरीर पर जो सोने का 'रक्त भैरवी यंत्र' जड़ा है... वही इसके प्राणों की धुरी है! उस यंत्र पर पारद शिवलिंग का सीधा प्रहार करो... अपने प्राणों का भय छोड़ो रुद्र... महाकाल का नाम लो और वार करो!"
तंत्रेश्वर का त्रिशूल पूरी गति से रुद्र के सीने की ओर नीचे उतर रहा था...
रुद्र की आंखों में मृत्यु का सारा भय समाप्त हो गया। उसकी नसों में काशी के 200 साल पुराने तपस्वी कुल का प्रचंड रक्त खौल उठा।
रुद्र ने अपने दोनों हाथों से उस तपते हुए पारद शिवलिंग को उठाया, और नीचे से ऊपर की ओर एक ऐसी आत्मघाती छलांग लगाई कि उसका सीना सीधे तंत्रेश्वर के उस विशालकाय, जलते हुए त्रिशूल के मुहाने के सामने आ गया...
समय का पहिया उस अंतिम, महा-विनाशकारी क्षण पर आकर थम गया!

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