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भाग 4: विंध्याचल के बीहड़ अरण्य, नरकंकालों का पुल और यक्षिणी का मायाजाल
Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
- Chapter
- 4 of 15
- Category
- Tantrik & Black Magic
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2721
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
काशी के हरिश्चंद्र घाट से निकली महिन्द्रा थार जीप जब नेशनल हाईवे-19 से मुड़कर मिर्जापुर और विंध्याचल की ओर जाने वाले राज्य मार्ग पर प्रविष्ट हुई, तो रात का तीसरा प्रहर बीत रहा था। घड़ी में समय चमक रहा था—रात के 01:45 AM।
सड़क के दोनों ओर से रोशनी और इंसानी बस्तियां धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही थीं।
सामने विंध्य पर्वतमाला की प्राचीन, काली और उबड़-खाबड़ पहाड़ियां किसी सोए हुए विशालकाय अजगर की तरह अंधकार में सिर उठाए खड़ी थीं। यह भारत का वह भू-भाग था जहाँ इतिहास और तंत्र की सीमाएं आपस में घुल-मिल जाती थीं। विंध्याचल का यह इलाका सदियों से तांत्रिकों, कापालिकों और अघोरियों की गुप्त साधनाओं का ऐसा अभेद्य गढ़ रहा था जहाँ आधुनिक कानून, विज्ञान और पुलिस की सीमाएं कभी प्रवेश नहीं कर पाई थीं।
रुद्र ने जीप के वाइपर चलाए। बाहर शीशे पर ओस नहीं, बल्कि एक अजीब सी चिपचिपी, लाल-धुंधली भाप जम रही थी।
जैसे ही जीप ने विंध्य वन प्रभाग के उस बोर्ड को पार किया जिस पर जंग लगे लोहे के अक्षरों में लिखा था—'प्रतिबंधित वन क्षेत्र: लोह-गढ़ बीहड़ — आगे जाना जानलेवा है'—जीप के डैशबोर्ड पर लगा डिजिटल कंपास पागलों की तरह 360 डिग्री पर घूमने लगा। जीप का जीपीएस स्क्रीन पर 'नो सिग्नल' की लाल बत्ती झपकाने लगा और रुद्र के दोनों मोबाइल फोन की स्क्रीन एक झटके में पूरी तरह काली पड़ गई।
गाड़ी की हेडलाइट्स की पीली रोशनी में सड़क अब तारकोल की नहीं, बल्कि नुकीले लाल पत्थरों और सूखी झाड़ियों का एक संकरा, पथरीला ट्रैक बन चुकी थी।
सड़क के दोनों ओर खड़े महुआ, तेंदू और पलाश के विशाल, पुराने पेड़ हवा के बिना भी धीरे-धीरे हिल रहे थे। उन पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी, गांठदार शाखाएं अंधेरे में ऐसी लग रही थीं मानो सैकड़ों कुबड़े, नग्न तांत्रिक दोनों हाथ फैलाकर रुद्र की जीप का रास्ता रोकने के लिए खड़े हों।
रुद्र की बगल वाली सीट पर वह चमड़े का झोला रखा था। झोले के भीतर रखा वह पारद शिवलिंग अब भी धीमी गति से स्पंदित हो रहा था, और उसके साथ रखा वह 'काल-भैरव खड्ग' किसी भूखे शिकारी की तरह एक हल्की, झनझनाती हुई धातुई आवाज निकाल रहा था।
लगभग दो घंटे तक उन खतरनाक, घुमावदार पहाड़ी मोड़ों को पार करने के बाद, अचानक रास्ता एक गहरी, अंधी खाई के मुहाने पर आकर पूरी तरह समाप्त हो गया।
चीssssख!
रुद्र ने दोनों पैरों से ब्रेक दबाया। जीप के अगले पहिये खाई की कगार से महज दो फीट पहले चीखते हुए रुक गए।
कबीर ने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और जीप की हेडलाइट्स की रोशनी में सामने देखा।
सामने लगभग तीन सौ फीट चौड़ी और पांच सौ फीट गहरी एक विशालकाय, पथरीली दरार थी। उस दरार की तलहटी में विंध्य की प्राचीन, गुप्त पहाड़ी नदी बह रही थी—'कर्णावती'। लेकिन उस नदी में पानी नहीं बह रहा था; दरार की गहराइयों से उठने वाली गंधक और सड़े हुए मांस की असहनीय बदबू बता रही थी कि नीचे केवल गाढ़ा, चिपचिपा काला-लाल कीचड़ खौल रहा था।
और उस गहरी खाई के आर-पार जाने के लिए केवल एक ही रास्ता था।
वह था—एक प्राचीन, झूलता हुआ सस्पेंशन ब्रिज (झूला पुल)।
लेकिन जब रुद्र ने अपनी शक्तिशाली सर्चलाइट की रोशनी उस पुल पर डाली, तो खौफ की एक ऐसी ठंडी लहर उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई जिसने उसके पैरों की ताकत छीन ली।
वह पुल किसी लोहे के तार या लकड़ी के तख्तों से नहीं बना था।
पुल की मुख्य रस्सियां इंसानी नसों, बालों और जंग लगी तांत्रिक जंजीरों को आपस में गूंथकर बनाई गई थीं। और जिन पटरों पर पैर रखकर उस खाई को पार करना था... वे कोई लकड़ी के पटरे नहीं थे; वे सैकड़ों इंसानी कंकालों की चौड़ी छाती की पसलियां, जांघों की हड्डियां और खोपड़ियां थीं, जिन्हें तांबे के मोटे तारों से आपस में कसा गया था!
यह था विंध्य अरण्य का वह कुख्यात, तंत्र-ग्रंथों में वर्णित—'नरकंकाल सेतु' (The Bone Bridge of Karnavati)!
पुल के इस पार वाले दोनों खंभों पर दो आदमकद पत्थर के त्रिशूल गड़े थे, जिन पर काले-लाल कपड़े बंधे थे और उन पर दर्जनों सड़े हुए, काले पड़ चुके नींबू और सिंदूर से सनी इंसानी उंगलियां टंगी थीं।
पुल के प्रवेश द्वार पर पत्थर पर प्राचीन तिब्बती-संस्कृत लिपि में उकेरा गया था:
"जो नश्वर देह इस सेतु पर पैर रखेगी, उसकी आत्मा की हर सांस का हिसाब नीचे बहती कर्णावती की प्रेत-नदी लेगी!"
रुद्र ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी।
समय हो रहा था—सुबह के 04:15 AM।
तंत्रेश्वर की दी गई 24 घंटे की समय-सीमा का पहला पहर बीतने को था। यदि वह इस पुल को पार करके लोह-गढ़ की कंदरा तक नहीं पहुंचा, तो तंत्रेश्वर की योगिनियां काशी में उसके कुल की कुल-देवी के मंदिर में पहला नरसंहार शुरू कर देंगी।
"पीछे लौटने का कोई विकल्प नहीं है," रुद्र ने अपने मन में कहा।
उसने जीप की डिग्गी से एक मजबूत टॉर्च, अपना झोला, और अपनी कमर की पेटी में उस भारी 'काल-भैरव खड्ग' को कस लिया। उसने पारद शिवलिंग को अपनी बाईं मुट्ठी में मजबूती से भींचा।
रुद्र ने उस झूलते हुए नरकंकाल पुल की पहली पायदान पर अपना दाहिना बूट रखा।
चर्रर्र... कटकट!
इंसानी हड्डियों का वह ढांचा रुद्र के 75 किलो के वजन से चरमरा उठा। नीचे 500 फीट गहरी अंधी खाई में बहती उस खूनी कर्णावती नदी से एक भयानक, बर्फीली हवा का झोंका ऊपर उठा जिसने उस पूरे झूलते पुल को किसी झूले की तरह हवा में झुला दिया।
पुल दायें-बायें खतरनाक तरीके से डोलने लगा।
रुद्र ने अपने दोनों हाथों से उन नसों और जंजीरों से बनी रस्सियों को जकड़ लिया। रस्सी को छूते ही रुद्र के हाथों में ऐसी तीखी, बिजली जैसी जलन हुई मानो हजारों चींटियां एक साथ उसकी त्वचा को काट रही हों।
टप... टप... टप...
पुल के तख्तों से खून की बूंदें टपककर नीचे खाई में गिर रही थीं।
रुद्र ने एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना शुरू किया।
दस कदम... बीस कदम... तीस कदम...
जब वह पुल के ठीक मध्य में—लगभग 150 फीट की दूरी पर—पहुंचा, तो हवा का चलना अचानक एक सेकंड में पूरी तरह रुक गया।
चारों तरफ एक ऐसा भारी, असहनीय सन्नाटा छा गया मानो पूरी सृष्टि की सांसें थम गई हों।
तभी, पुल के ठीक नीचे, उस 500 फीट गहरी अंधी खाई से आवाजें आने लगीं।
शुरुआत में वह आवाज केवल किसी पानी के बुलबुलों जैसी थी। लेकिन धीरे-धीरे वह आवाज सैकड़ों इंसानों के एक साथ रोने, चिल्लाने और दया की भीख मांगने की चीखों में बदल गई:
"रुद्र... नीचे देख! हम तेरे पुरखों के समय से इस खाई में सड़ रहे हैं... हमें अपनी हथेली दे... हमें बाहर खींच ले रुद्र!"
रुद्र ने अपनी नजरें नीचे नहीं कीं। वह जानता था कि तंत्र-मार्ग पर चलते समय पीछे या नीचे देखना सीधे अपनी आत्मा को प्रेतों के हवाले करना होता है।
लेकिन तभी, उन कंकालों के तख्तों के बीच की दरारों से... अनगिनत सड़े हुए, मांस-विहीन काले कंकाल के हाथ बाहर निकल आए!
सटाक!
चार कंकालों के हाथों ने एक साथ रुद्र के दोनों बूटों और उसकी पतलून के निचले हिस्से को अपनी फौलादी उंगलियों से जकड़ लिया! उनकी पकड़ इतनी जबरदस्त थी कि रुद्र का अगला कदम हवा में ही जम गया।
पुल और जोर से थरथराने लगा।
कंकालों के वे हाथ रुद्र के पैरों को खींचकर उस पुल की दरारों के भीतर से नीचे उस खूनी खाई में गिराने की कोशिश कर रहे थे। रुद्र का संतुलन बिगड़ने लगा। उसके हाथ से टॉर्च छूटकर नीचे खाई में जा गिरी।
रुद्र ने बिना एक पल गंवाए अपनी कमर से वह काल-भैरव खड्ग बाहर खींच लिया।
छनन्नन!
काले लोहे और अष्टधातु का वह खंजर रात के अंधकार में नीली स्वर्णिम आभा से चमक उठा। रुद्र ने खड्ग की धार को सीधे अपने पैरों को जकड़े उन कंकालों के हाथों पर पूरी ताकत से चला दिया!
कड़ाक! कड़ाक!
खड्ग का स्पर्श होते ही उन कंकालों के हाथों से नीली चिंगारियां छूटीं और वे हाथ राख बनकर बिखर गए।
रुद्र ने एक सेकंड भी व्यर्थ नहीं किया। उसने अपनी पूरी जान लगाकर दौड़ लगा दी। उसके हर कदम के साथ नीचे की हड्डियां टूटकर खाई में गिर रही थीं, लेकिन रुद्र रुका नहीं।
उसने एक अंतिम, लंबी छलांग लगाई और पुल के उस पार की पथरीली जमीन पर जा गिरा!
धड़ाम!
जैसे ही रुद्र के पैर उस पार की जमीन पर पड़े, उसके पीछे का वह पूरा 300 फीट लंबा नरकंकाल पुल एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ टूटकर नीचे खाई के उस खूनी दलदल में समा गया।
वापसी का एकमात्र रास्ता भी अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।
रुद्र ने हांफते हुए अपने घुटनों के बल बैठकर अपनी सांसों को सामान्य किया। उसकी हथेलियों पर छालें पड़ चुके थे और उसकी पतलून खून से सनी थी।
उसने सिर उठाकर सामने देखा।
सामने जो दृश्य था, उसने उसके होश उड़ा दिए।
खाई के उस पार का बीहड़, भयानक और पथरीला जंगल अब कहीं नजर नहीं आ रहा था।
उसकी जगह... चारों तरफ एक अत्यंत सुंदर, स्वप्निल और दिव्य वातावरण फैला हुआ था!
जमीन पर सफेद संगमरमर की चिकनी सीढ़ियां बनी थीं। हवा से वह सड़ी हुई गंधक और खून की बदबू पूरी तरह गायब हो चुकी थी; उसकी जगह अत्यंत मादक, तीव्र और सम्मोहक चमेली, कस्तूरी और ताजे लाल गुलाबों की सुगंध तैर रही थी।
सामने घने देवदार और अशोक के सुंदर बगीचे के बीच एक विशाल, प्राचीन राजस्थानी शैली का श्वेत संगमरमर का महल खड़ा था। महल के झरोखों से सुनहरी, कोमल रोशनी छनकर बाहर आ रही थी और हवा में वीणा, पायल की रुनझुन और किसी अत्यंत मधुर स्त्री-कंठ से निकलती हुई राग भैरवी की तान गूंज रही थी।
रुद्र चौंककर खड़ा हो गया। उसने अपनी आंखें मींचीं।
क्या वह विंध्याचल के बीहड़ों में था? या किसी भ्रम में?
तभी, महल के विशाल नक्काशीदार द्वार से वह बाहर निकली।
वह कोई साधारण स्त्री नहीं थी; वह साक्षात कामदेव की रति जैसी अद्वितीय, अमानवीय सुंदरता की मल्लिका थी।
उसकी आयु बमुश्किल बीस वर्ष प्रतीत हो रही थी। उसने गहरे लाल और सुनहरे रंग का पारदर्शी राजसी लहंगा पहना हुआ था। उसकी कमर किसी नागिन की तरह पतली थी, आंखें कमल की पंखुड़ियों जैसी विशाल और कजरारी थीं, और उसके खुले, घने काले बाल उसके टखनों तक लहरा रहे थे। उसकी चाल में ऐसा नशीला सम्मोहन था कि किसी भी ऋषि या तपस्वी का तपोबल एक ही पल में धूल में मिल जाए।
उसके हाथों में मणिरत्नों से जड़ा एक स्वर्ण-थाल था, जिसमें शुद्ध जल, चंदन और ताजे फूल रखे थे।
वह मंद-मंद मुस्कुराती हुई, अपनी पायलों को छनकाती हुई सीधे रुद्र के सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी सांसों से निकलती हुई महक सीधे रुद्र के मस्तिष्क की नसों में उतरकर उसे सुन्न करने लगी।
"स्वागत है, रुद्र प्रताप सिंह..." उसकी आवाज किसी पिघले हुए शहद जैसी मीठी और कानों में अमृत घोलने वाली थी।
"मैं सदियों से इस वीरान अरण्य में तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। तुम्हारे पूर्वज विद्याधर ने मुझे यहाँ तुम्हारा पथ-प्रदर्शन करने के लिए छोड़ा था।"
वह स्त्री दो कदम और पास आई। उसकी आंखों की गहराइयों में एक अजीब, असीम आकर्षण तैर रहा था।
"तुम बहुत थक चुके हो, मेरे स्वामी," उसने अपना कोमल, मखमली हाथ रुद्र के सीने पर रख दिया। उस स्पर्श में एक अजीब, अचेत कर देने वाली गर्मी थी।
"वह तंत्रेश्वर, वह अघोरी, वह कंकालों का युद्ध... सब केवल एक दुस्वप्न था। इस महल के भीतर तुम्हारा साम्राज्य है, असीम संपदा है, और मेरी यह देह सदा-सदा के लिए तुम्हारी दासी है। आओ... अपने उस भारी झोले को, उस तपते हुए पारद शिवलिंग को मुझे सौंप दो... और मेरे आलिंगन में इस संसार के सारे दुखों को भूल जाओ..."
रुद्र की पलकें भारी होने लगीं।
उसका मस्तिष्क कह रहा था कि वह अपनी सारी थकान इस कोमल देह के चरणों में उड़ेल दे। उसका हाथ अनजाने ही अपने कंधे के झोले की ओर बढ़ने लगा ताकि वह उस भारी शिवलिंग को इस सुंदरी के स्वर्ण-थाल में रख सके।
उस सुंदरी के चेहरे पर एक अत्यंत सूक्ष्म, कुटिल और विजयी मुस्कान तैर गई। उसके लाल होंठों के पीछे से उसके नुकीले, जहरीले दांत हल्के से बाहर झांकने लगे।
लेकिन ठीक उसी क्षण...
जब रुद्र की उंगलियां झोले के फीते को खोलने ही वाली थीं, रुद्र के गले में बंधी बाबा बालकनाथ की वह लोहे की तांत्रिक ताबीज अचानक सुई की तरह उसकी त्वचा में चुभ गई!
तीव्र चुभन!
उस दर्द के झटके ने रुद्र की चेतना के पर्दे को एक ही सेकंड में फाड़ दिया।
रुद्र के मस्तिष्क में उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की पांडुलिपि का वह गुप्त तांत्रिक नियम बिजली की तरह कौंध गया:
"कामाख्या और विंध्याचल के श्मशानों में जब अत्यंत भयानक दुर्गंध के तुरंत बाद तीव्र चमेली और कस्तूरी की सुगंध आने लगे... तो सावधान हो जाना! वह कोई अप्सरा नहीं, तंत्र की सबसे खतरनाक 'रक्त-यक्षिणी' (कर्ण-पिशाचिनी) का मायाजाल है। यक्षिणी की देह कितनी भी सुंदर क्यों न हो... उसकी परछाईं कभी जमीन पर नहीं पड़ती, और उसकी आंखें कभी पलकें नहीं झपकातीं!"
रुद्र ने तुरंत अपनी नजरें नीचे झुकाईं।
महल की उस सफेद संगमरमर की सीढ़ियों पर... अपनी खुद की परछाईं तो साफ दिख रही थी, लेकिन उस अद्वितीय सुंदरी के नीचे... जमीन पर कोई परछाईं नहीं थी!
और जब रुद्र ने झटके से ऊपर देखा, तो उस सुंदरी की आंखें पूरी तरह से स्थिर थीं; उसने पिछले दो मिनट में एक बार भी अपनी पलकें नहीं झपकाई थीं!
"मायाजाल!" रुद्र अपने दांत भींचते हुए चिल्लाया।
उस सुंदरी ने देखा कि उसका रहस्य खुल चुका है। उसका चेहरा एक ही सेकंड में बदल गया।
उसका वह रूपवती, कोमल चेहरा किसी सड़ी हुई लाश की तरह फटने लगा। उसकी चिकनी गोरी त्वचा काली और फफोलेदार पड़ गई। उसकी खूबसूरत कजरारी आंखें बाहर निकलकर लाल अंगारे बन गईं, और उसके हाथों की कोमल उंगलियां आठ इंच लंबे, काले और जहरीले नाखूनों वाले पंजों में बदल गईं!
"मूर्ख मानव! तूने मेरी माया को पहचान लिया... लेकिन तू जीवित यहाँ से नहीं जाएगा!"
वह रक्त-यक्षिणी किसी भयानक चील की तरह हवा में छह फीट ऊपर उड़ी और उसने अपने दोनों जहरीले पंजे सीधे रुद्र की दोनों आंखों और गले की ओर झोंक दिए!
उसी क्षण, वह विशाल श्वेत संगमरमर का महल, वह बगीचा और वह वीणा का संगीत हवा में धुएं की तरह गायब हो गया।
वास्तविकता सामने आई—रुद्र किसी महल में नहीं, बल्कि विंध्याचल की एक अत्यंत घनी, कांटेदार झाड़ियों और सड़े हुए नरकंकालों से पटी एक अंधी घाटी के मुहाने पर खड़ा था!
सननन!
यक्षिणी के पंजे रुद्र के चेहरे से केवल चार इंच दूर थे।
रुद्र पीछे नहीं हटा। उसने अपनी कमर से उस काल-भैरव खड्ग को दोनों हाथों से थाम लिया।
उसने अपने बाएं हाथ के अंगूठे को खड्ग की धार पर तेजी से फेर दिया।
छपाक!
रुद्र का ताजा, पवित्र रक्त उस काले लोहे के खड्ग पर बह निकला। जैसे ही विद्याधर शास्त्री के वंशज का रक्त उस खड्ग पर चढ़ा, खड्ग के भालों से साक्षात महाकाल भैरव की लाल-नीली प्रचंड ज्वाला प्रस्फुटित हो उठी!
"ॐ ह्रीं भैरवाय नमः... यक्षिणी-बंधनाय संहारय संहारय स्वाहा!"
रुद्र ने अपनी पूरी आत्मा की शक्ति झोंकते हुए उस जलते हुए खड्ग से हवा में एक विशाल, अर्धचंद्राकार वार कर दिया!
कड़ाssssक!
खड्ग की धार सीधे उस उड़ती हुई रक्त-यक्षिणी की छाती के आर-पार उतर गई।
यक्षिणी के मुंह से एक ऐसी अमानवीय, कानफोड़ू और दर्दनाक चीख निकली जिसने विंध्याचल की पहाड़ियों को हिलाकर रख दिया। उसकी काली देह के भीतर से नीली आग के फव्वारे फूट पड़े।
"तंत्रेश्वर... मुझे बचाओ!" यक्षिणी हवा में तड़पने लगी।
कुछ ही पलों में वह भयानक प्रेत-योनि जलकर काली राख का एक ढेर बन गई और हवा के झोंके के साथ उस अंधी घाटी में बिखर गई।
चारों तरफ फिर से वही पुराना, भयानक और घना सन्नाटा छा गया।
सुबह के करीब पांच बज रहे थे।
यक्षिणी के मायाजाल के नष्ट होते ही, घाटी के ऊपर छाया वह अप्राकृतिक, गहरा कुहासा धीरे-धीरे फटने लगा।
रुद्र ने अपनी जेब से परदादा की वह डायरी निकाली। डायरी का वह नक्शा अब चमक रहा था।
रुद्र ने सिर उठाकर उस दिशा में देखा जहाँ यक्षिणी की राख उड़ी थी।
सामने, लगभग आधा किलोमीटर दूर, विंध्य पर्वतमाला की सबसे ऊंची, अभेद्य और काली पहाड़ी खड़ी थी—'लोह-गढ़ पर्वत'।
उस पहाड़ी के ठीक मध्य में, एक विशालकाय नरमुंड के खुले हुए जबड़े के आकार की एक अत्यंत भयानक, अंधेरी और विशाल गुफा का मुहाना दिखाई दे रहा था—'लोह-गढ़ कंदरा'!
लेकिन सबसे खौफनाक बात यह थी कि उस गुफा के मुहाने पर... दोनों तरफ काले ग्रेनाइट पत्थरों से तराशी गई चौंसठ योगिनियों में से पहली तीन योगिनियों की विशाल, दस-दस फीट ऊंची पाषाण-प्रतिमाएं खड़ी थीं:
दिव्य-योगिनी
महा-योगिनी
सिद्ध-योगिनी
वे पत्थर की मूर्तियां निर्जीव नहीं थीं।
दूर से देखने पर भी रुद्र साफ देख सकता था कि उन तीनों विशाल मूर्तियों की पाषाण-आंखों से गाढ़ा, ताजा लाल खून बहकर गुफा की सीढ़ियों पर गिर रहा था... और उन मूर्तियों के जबड़े नियमित रूप से किसी जीवित प्राणी की तरह हल्के-हल्के हिल रहे थे!
और उस गहरी कंदरा के भीतर से... किसी विशाल, पाताल-रूपी नगाड़े के बजने की भारी, गगनभेदी धमक आ रही थी:
धम... धम... धम... धम...
हर धमक के साथ रुद्र के हाथ में मौजूद वह पारद शिवलिंग और अधिक तपने लगा था।
तंत्रेश्वर की वह मुख्य साधना-स्थली अब केवल कुछ सौ मीटर दूर थी... और चौसठ योगिनियों का पहला खूनी द्वार रुद्र के सामने अपने खूनी दांत फैलाए खड़ा था!
(कहानी जारी है...)
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भाग 5: लोह-गढ़ कंदरा का पहला पाताल-द्वार, जीवित पाषाण-मूर्तियों का तांडव और तांत्रिक तंत्रेश्वर की अमर देह।
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