PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 3: चौसठ योगिनी का खूनी घेरा, अघोर-अग्नि का प्रहार और विंध्य अरण्य का गुप्त संदेश

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
3 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
13 min
Words
2484
Language
Hindi (हिंदी)
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हरिश्चंद्र घाट के उस पाताल-कक्ष में रात के बारह बजते ही समय की गति जैसे किसी खूनी दलदल में धंस गई थी। दीवार की प्राचीन घड़ी के घंटों की धातुई गूंज—डोंग... डोंग... डोंग...—तहखाने के एक-एक पत्थर को कंपा रही थी।
रुद्र के दाहिने टखने पर उस 186 वर्ष पुराने मृत शरीर की लोहे जैसी उंगलियों की पकड़ इतनी भयानक थी कि रुद्र को लगा उसकी हड्डी अभी चटककर दो टुकड़ों में बंट जाएगी। विद्याधर शास्त्री के उस संरक्षित शव की त्वचा बर्फ से भी अधिक ठंडी थी, लेकिन उसकी नसों के भीतर से एक अजीब, जहरीली नीली आग रिस रही थी जो रुद्र के जूते और मोजे को चीरती हुई सीधे उसकी पिंडली की त्वचा को झुलसाने लगी थी।
"छोड़ मुझे!" रुद्र ने दांत भींचते हुए अपनी बायीं लात से उस शव के कंधे पर पूरी ताकत से वार किया।
लेकिन वह प्रहार किसी पत्थर की चट्टान पर पैर मारने जैसा साबित हुआ। शव टस से मस नहीं हुआ। उसकी खुली हुई, नीली आग उगलती दोनों पुतलियां बिना पलक झपकाए सीधे रुद्र की आंखों में घूर रही थीं। शव के सूखे, काले होंठों से वही मखमली, फुसफुसाती और रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज निकल रही थी:
"रक्त दे रुद्र... इस वेदी का ऋण चुका... तभी मुझे शांति मिलेगी... तभी तेरे इस कुल की मुक्ति होगी..."
और उस शव की पीठ पर पालथी मारकर बैठा वह विशालकाय कापालिक—तंत्रेश्वर—अपने पीले, नुकीले दांत दिखाते हुए किसी वनैले सुअर की तरह घुरघुरा रहा था।
"हाहाहाहा! देख रुद्र... यह तेरे धर्म, तेरे वेद और तेरे कुल का सबसे बड़ा विद्वान है!" तंत्रेश्वर ने अपने हाथों में थामे नर-कपाल के भीतर जलते हुए कपूर को हवा में उछाला। "जिस विद्याधर ने 1840 में मुझे काशी के श्मशान में बांधा था, आज उसी के हाथ तेरी गर्दन दबाएंगे! चौसठ योगिनियों... जागो! इस अंतिम वंशज का ताजा लहू पीकर अपने पाताल के पिंजरे तोड़ दो!"
तंत्रेश्वर ने अपनी जीभ बाहर निकाली और अपने त्रिशूल की नोक को अपनी ही जीभ पर फेर दिया।
ताजा, काला-लाल खून त्रिशूल के भालों पर बह निकला। तंत्रेश्वर ने उस खून के छींटे तहखाने की चारों गोलाकार दीवारों पर बने उन चौंसठ कोष्ठकों की ओर फेंक दिए।
कड़कड़ाssssहट! चर्रर्र... झनन्नन!
दीवारों में गड़ी लोहे की वे भारी, जंग लगी जंजीरें तिनकों की तरह टूटकर बिखर गईं।
उन चौंसठ आलों के भीतर सिंदूर और काली भस्म से लिपे जो इंसानी कंकाल खड़े थे, उनकी खोपड़ियों की खाली आंखों में एक साथ लाल रंग की अंगारे जैसी लपटें जल उठीं। उनकी रीढ़ की हड्डियों में 'कट-कट-कट' की भयानक आवाजें हुईं और वे कंकाल किसी भूखे लकड़बग्घों के झुंड की तरह एक साथ सीढ़ियों से नीचे उस वेदी की ओर कूद पड़े।
उनके हाथों में लोहे के पुराने खंजर, जंग लगी तलवारें और नुकीली इंसानी पसलियां थीं।
"ॐ क्रीं काल्यै नमः... रक्तं पिब... मांसं भक्षय!" कंकालों के जबड़े हवा में बज रहे थे और उनकी सम्मिलित आवाज तहखाने के सन्नाटे को फाड़ रही थी।
कंकालों का पहला जत्था सीधे रुद्र की छाती को चीरने के लिए आगे बढ़ा।
उस भयानक संकट के क्षण में, जब रुद्र का पैर जकड़ा हुआ था और मौत केवल कुछ इंच दूर थी, रुद्र के भीतर का वह अकादमिक शोधकर्ता पूरी तरह विलीन हो गया। उसकी जगह काशी के उस प्राचीन, तेजस्वी शास्त्री कुल का आत्म-सम्मान और अदम्य साहस धधक उठा।
छनन्नन!
जैसे ही पहले दो कंकालों के खंजर रुद्र के सीने के पास पहुंचे, बाबा बालकनाथ द्वारा लगाया गया वह 'अघोर भस्म-कवच' अचानक एक प्रचंड नीली ढाल बनकर चमक उठा।
कंकालों के लोहे के हथियार उस अदृश्य नीली दीवार से टकराए।
कड़ाक!
बिजली का ऐसा भीषण झटका लगा कि दोनों कंकाल हवा में उछलकर दस फीट दूर दीवार से टकराए और उनकी हड्डियां बिखरकर पत्थरों पर बिखर गईं। लेकिन बाकी बासठ कंकाल रुके नहीं। वे एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हुए, एक विशाल नर-कंकाल के बवंडर की तरह रुद्र के उस सुरक्षा-कवच पर अपने पंजों से प्रहार करने लगे।
नीली ढाल पर दरारें पड़ने लगीं। रुद्र की छाती पर वह भस्म-लेप असहनीय रूप से तपने लगा।
रुद्र जानता था कि यह कवच केवल कुछ मिनटों का मेहमान है। अगर उसने अपने परदादा के उस जीवित शव के बंधन को नहीं तोड़ा, तो वह यहीं जिंदा नोच लिया जाएगा।
रुद्र ने अपने दाहिने हाथ में पकड़े उस भारी, गर्म पारद शिवलिंग को देखा।
पारे की उस चिकनी सतह पर वे सूक्ष्म तांत्रिक मंत्र अब किसी उबलते हुए लावे की तरह चमक रहे थे। रुद्र को अचानक विद्याधर शास्त्री की उस डायरी का एक गुप्त श्लोक याद आया जो उसने कल शाम पढ़ा था:
"पारद साक्षात शिव का वीर्य है... यह श्मशान के किसी भी प्रेत-बंधन को क्षण भर में भस्म करने की सामर्थ्य रखता है। यदि प्रेत अपना ही रक्त हो, तो पारद को उसके ब्रह्मरंध्र पर स्थापित करो... वह बंधन टूट जाएगा!"
"परदादा... यदि आप सचमुच मेरे पूर्वज हैं, तो इस पापी तांत्रिक के इस नरक-जाल को पहचानिए!" रुद्र चिल्लाया।
उसने अपने शरीर को पूरी ताकत से आगे की ओर झुकाया। कंकालों के नुकीले पंजे उसकी जैकेट को फाड़ते हुए उसकी पीठ की त्वचा को खुरच रहे थे, लेकिन रुद्र ने परवाह नहीं की। उसने अपने दोनों हाथों से उस तपते हुए पारद शिवलिंग को थामा और अपनी पूरी जान लगाकर सीधे उस लेटे हुए शव के सिर के ठीक बीचों-बीच—'ब्रह्मरंध्र' (खोपड़ी के शिखर)—पर दबा दिया!
भभकssss!
पारद शिवलिंग के उस मृत खोपड़ी से छूते ही एक ऐसा भीषण आध्यात्मिक धमाका हुआ मानो किसी ने उस तहखाने के भीतर बिजली का नंगा तार गिरा दिया हो।
शिवलिंग से सुनहरी और दूधिया-सफेद रोशनी की सैकड़ों सूक्ष्म किरणें फूटीं और वे उस 186 साल पुराने शव की त्वचा के भीतर नसों की तरह फैलने लगीं। शव के भीतर जो काली, जहरीली नीली आग दौड़ रही थी, वह उस पवित्र पारद के तेज से जलने लगी।
"आaaaaah!"
शव के मुंह से किसी जीवित मनुष्य जैसी दर्दनाक, असहनीय चीख निकली। शव के जबड़े फटने लगे। लेकिन इस बार वह आवाज किसी प्रेत की नहीं थी; वह एक अत्यंत वृद्ध, विद्वान और शुद्ध आत्मा का रुदन था!
शव की उंगलियां, जो रुद्र के टखने को जकड़े हुए थीं, एक झटके में ढीली पड़ गईं और पीछे हट गईं।
शव का दाहिना हाथ, जो अब सुनहरी रोशनी से चमक रहा था, तेजी से ऊपर उठा और उसने अपनी पीठ पर बैठे उस भीमकाय कापालिक तंत्रेश्वर की जांघ को पूरी ताकत से पकड़ लिया!
"विद्याधर! तू मर चुका है! तू मेरे वश में है!" तंत्रेश्वर खौफ और क्रोध से दहाड़ा। उसने अपना त्रिशूल उठाकर उस शव की छाती में घोंपने की कोशिश की।
लेकिन शव के चेहरे पर अब एक अलौकिक, दिव्य क्रोध उभर आया था। शव के मुंह से सीधे रुद्र के मस्तिष्क में एक स्पष्ट, भारी आवाज गूंजी:
"रुद्र... मेरे कुल के दीपक! यह तंत्रेश्वर का केवल एक 'छाया-विग्रह' (Astral Clone) है... इसका मूल, जीवित पापी शरीर विंध्याचल के घने जंगलों में स्थित 'चौसठ योगिनी महा-पीठ' की गुफा में समाधिस्थ है! वह काशी को केवल अपनी बलि-भूमि बनाना चाहता है... इस वेदी को आग दे रुद्र! जब तक यह शव जलेगा नहीं, काशी की चिताएं शांत नहीं होंगी... मुझे अग्नि दे पुत्र!"
"नहीं! मेरी 80वीं आहुति!" तंत्रेश्वर पागलों की तरह चीखा।
तंत्रेश्वर ने अपने दोनों हाथों से उस पारद शिवलिंग को छीनने के लिए अपने लंबे, काले नाखूनों वाले पंजे आगे बढ़ाए।
लेकिन इससे पहले कि तंत्रेश्वर के हाथ शिवलिंग को छू पाते, तहखाने की पथरीली छत पर एक भयंकर धमाका हुआ।
बूमssss!
छत के भारी पत्थर टूटकर नीचे गिरे। धूल और मलबे के बवंडर के बीच, हाथ में जलती हुई धूनी का खप्पर और लोहे की लाठी लिए एक साया सीधे ऊपर से नीचे वेदी पर आ कूदा।
वह थे—अघोरी बालकनाथ!
बाबा बालकनाथ के बाल हवा में उड़ रहे थे, उनकी अंधी आंखों से एक विचित्र, क्रूर तेज निकल रहा था और उनकी छाती पर लटकी नरमुंडों की माला हवा में लहरा रही थी।
"हर हर महादेव! ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः... सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः!"
बाबा बालकनाथ ने अपने कंठ से अघोर पंथ के सबसे संहारक 'अघोर रुद्र मंत्र' का ऐसा गगनभेदी घोष किया कि तहखाने की चारों दीवारों पर खड़े कंकाल एक ही सेकंड में अपने सिर पकड़कर जमीन पर लोटने लगे।
बाबा ने अपने हाथ में पकड़े खप्पर से धूनी के दहकते हुए अंगारे, श्मशान की सिद्ध भस्म और काली सरसों का एक विशाल मुट्ठा हवा में उड़ा दिया।
भक-भक-भक!
वे अंगारे हवा में जाते ही आग के विशाल गोलों में बदल गए। जैसे ही वे अंगारे उन चौंसठ कंकालों पर पड़े, कंकाल सूखे पत्तों की तरह धू-धू करके जलने लगे। उनकी हड्डियां पटाखों की तरह फटने लगीं और तहखाने में जलते हुए मांस और हड्डियों की भयानक बदबू भर गई।
"बालकनाथ!" तंत्रेश्वर ने अपनी अंधी, सफेद आंखों को सिकोड़ते हुए चीखा। "तू उस समय भी मेरे रास्ते का कांटा था... और आज भी!"
"तू तांत्रिक नहीं, तंत्र का कलंक है तंत्रेश्वर!" बाबा बालकनाथ ने अपनी लाठी को पूरी ताकत से तंत्रेश्वर के सीने पर दे मारा।
कड़ाक!
उस आघात से तंत्रेश्वर का वह विशालकाय शरीर वेदी से फिसलकर पीछे जा गिरा। उसके सीने से काले धुएं का एक गुबार निकला।
"रुद्र! देख क्या रहा है?" बाबा बालकनाथ ने चिल्लाकर कहा। उनकी आवाज में असीम तात्कालिकता थी। "धूनी की यह पवित्र अग्नि इस शव पर उड़ेल दे! तेरे परदादा के इस पार्थिव शरीर को 186 साल बाद उसकी अंतिम गति दे... जल्दी कर!"
रुद्र ने एक पल भी नहीं गंवाया।
उसने बाबा के हाथ से वह जलता हुआ खप्पर लिया। उसने अपनी दोनों आंखें बंद कीं, अपने महान परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री के चरणों का मन ही मन ध्यान किया, और उस पवित्र श्मशान-अग्नि को सीधे उस शव की छाती और उस पारद शिवलिंग के ऊपर पलट दिया!
स्वाहा! भभकssss!
एक सेकंड के भीतर उस शव के चारों ओर सुनहरी और नारंगी लपटों का एक विशाल स्तंभ खड़ा हो गया।
विद्याधर शास्त्री का वह 186 साल पुराना शरीर किसी चंदन की लकड़ी की तरह सुगंधित लपटों में जलने लगा। जैसे-जैसे वह शरीर राख में बदल रहा था, उस आग के भीतर से एक अत्यंत शांत, तेजस्वी और श्वेत वस्त्रों में लिपटी दिव्य आत्मा बाहर निकली।
वह पंडित विद्याधर शास्त्री की वास्तविक, शुद्ध जीवात्मा थी।
उनके चेहरे पर एक दिव्य शांति थी। उन्होंने हवा में हाथ उठाकर रुद्र के सिर पर अपना हाथ रखा।
"आयुष्मान भव, वत्स... तूने इस कुल को उस भयानक ऋण से मुक्त कर दिया," विद्याधर शास्त्री की आवाज किसी शीतल बयार की तरह रुद्र के अंतर्मन में उतरी। "लेकिन तंत्रेश्वर का असली संहार अभी बाकी है। वह विंध्याचल के 'लोह-गढ़ अरण्य' में छुपा है। उसके पास चौसठ योगिनियों की वह 'रक्त-मुद्रिका' है जिससे वह पूरे भारतवर्ष के श्मशानों को जाग्रत कर सकता है। यह पारद शिवलिंग अब तेरा अस्त्र है... जा, और उस पापी के मूल शरीर को उसी के हवन-कुंड में भस्म कर दे!"
इन अंतिम शब्दों के साथ, वह दिव्य आत्मा प्रकाश की एक सुंदर रेखा बनकर तहखाने की छत को चीरती हुई सीधे काशी के आकाश और मोक्ष के धाम की ओर विलीन हो गई।
जैसे ही विद्याधर शास्त्री का शव पूरी तरह जलकर भस्म हुआ, जमीन पर पड़ा वह कापालिक तंत्रेश्वर दर्द से छटपटाने लगा।
उसका वह भीमकाय शरीर धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसकी त्वचा काले तारकोल की तरह बहने लगी।
"रुद्र... बालकनाथ..." तंत्रेश्वर का वह पिघलता हुआ चेहरा एक भयानक, शैतानी हंसी हंसा। "तुमने मेरी एक छाया नष्ट की है... लेकिन मेरी मूल चेतना विंध्याचल में जाग चुकी है! आओ... आओ विंध्य के उस खूनी अरण्य में... वहां चौसठ योगिनियां तुम्हारी खाल खींचकर अपने नगाड़े मढ़ेंगी! हाहाहाहा!"
एक भयानक धमाके के साथ तंत्रेश्वर का वह छाया-विग्रह काले धुएं और सड़े हुए खून के बदबूदार कीचड़ में तब्दील हो गया।
उसी क्षण, पूरे तहखाने की छत भरभराकर गिरने लगी। दीवारों में चौड़ी दरारें पड़ गईं। गंगा का पानी उन दरारों से तेजी से भीतर घुसने लगा।
"रुद्र! बाहर भाग! यह पाताल-कक्ष अब गंगा में समाने वाला है!" बाबा बालकनाथ ने रुद्र का हाथ पकड़कर सीढ़ियों की ओर खींचा।
दोनों पागलों की तरह उन संकरी, गीली सीढ़ियों पर दौड़ पड़े। पीछे तहखाने की छत पूरी तरह ढह गई; लाखों टन मलबा और गंगा का पानी उस पूरे 186 साल पुराने काल-भैरव कक्ष को हमेशा के लिए दफन कर चुका था।
रात के करीब साढ़े बारह (12:30 AM) बज रहे थे।
कबीर और बाबा बालकनाथ हांफते हुए, भीगे कपड़ों और कालिख से सने चेहरों के साथ हरिश्चंद्र घाट की खुली सीढ़ियों पर आकर गिरे।
घाट पर अब हवा शांत हो चुकी थी।
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट की चिताओं की वह भयानक, अप्राकृतिक नीली और बैंगनी आग अब पूरी तरह बुझ चुकी थी। चिताओं से अब सामान्य, पवित्र नारंगी लपटें उठ रही थीं। गंगा का जल, जो काले तेल जैसा स्थिर था, अब अपनी चिर-परिचित कलकल ध्वनि के साथ शांत होकर बह रहा था। आसमान में मंडरा रहे वे हजारों प्रेत और कंकाल धुएं की तरह गायब हो चुके थे।
काशी का पहला महा-संकट टल चुका था।
लेकिन रुद्र जानता था कि यह केवल युद्ध के पहले मोर्चे की समाप्ति थी; मुख्य युद्ध तो अभी शुरू होने वाला था।
बाबा बालकनाथ सीढ़ियों पर बैठ गए। उनकी सांसें बेहद भारी चल रही थीं। तंत्रेश्वर के तांत्रिक प्रहार ने उनके वृद्ध शरीर को अंदर से काफी कमजोर कर दिया था।
बाबा ने अपनी कमर में बंधी मृगछाला के भीतर से एक प्राचीन, भारी वस्तु निकाली और रुद्र के हाथों में रख दी।
वह काले लोहे और अष्टधातु से बना एक प्राचीन, डेढ़ फीट लंबा खंजर था—'काल-भैरव खड्ग'! उस खंजर की मूठ पर एक नरमुंड की आकृति बनी थी और उसकी धार पर अघोर पंथ के गुप्त बीज-मंत्र उकेरे गए थे।
"यह खंजर अघोराचार्य कालभैरवानंद का है," बाबा ने कांपती आवाज में कहा। "जब तू विंध्याचल के उस 'लोह-गढ़ अरण्य' में तंत्रेश्वर के असली शरीर के सामने पहुंचेगा, तो केवल यह खड्ग ही उस पापी की अमरता के कवच को काट पाएगा।"
"बाबा, आप मेरे साथ नहीं चलेंगे?" रुद्र ने चिंतित होकर पूछा।
बाबा बालकनाथ ने मंद मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया।
"नहीं बालक... मेरा कार्य काशी के इस द्वार की रक्षा करना था। विंध्याचल की वह भूमि तंत्र का महा-अरण्य है। वहां केवल वही कदम रख सकता है जिसके रक्त में भैरवी का आह्वान हो। और वह आह्वान तेरे भीतर जाग चुका है।"
रुद्र ने उस भारी खंजर को अपनी बेल्ट में खोंसा और पारद शिवलिंग को अपने झोले में सुरक्षित रख लिया।
वह घाट से बाहर निकला और अपनी पुरानी महिन्द्रा थार जीप के पास पहुंचा, जो दशाश्वमेध घाट की पार्किंग में खड़ी थी।
जैसे ही रुद्र ड्राइविंग सीट पर बैठा और उसने अपनी जेब से परदादा की वह चमड़े की डायरी निकाली, एक चमत्कारी घटना घटी।
डायरी के पीले, पुराने पन्ने किसी अदृश्य हवा के झोंके से अपने आप तेजी से पलटने लगे—सर्र-सर्र-सर्र!
पन्नों का पलटना एक बिल्कुल कोरे, सादे पन्ने पर जाकर रुक गया।
और उस कोरे पन्ने पर... किसी अदृश्य खूनी उंगली से ताजे, गाढ़े लाल अक्षरों में एक नया नक्शा और संदेश खिंचता चला गया!
नक्शे के शीर्ष पर रक्त-चंदन से लिखा था:
"विंध्य अरण्य — लोह-गढ़ कंदरा: चौसठ योगिनी महा-पीठ"
और नीचे तंत्रेश्वर की वही भयानक, गूंजती हुई चेतावनी लिखी थी:
"काशी का सवेरा मुबारक हो रुद्र... लेकिन विंध्याचल के जंगलों में कभी सूरज नहीं उगता! यदि तूने अगले 24 घंटों के भीतर इस कंदरा की चौखट पर कदम नहीं रखा... तो चौसठ योगिनियों का पहला खूनी भोग तेरी अपनी कुल-देवी के मंदिर में चढ़ेगा!"
रुद्र ने जीप का इंजन स्टार्ट किया।
इंजन की भारी गर्जना काशी की शांत गलियों में गूंज उठी। रुद्र ने जीप का रुख दक्षिण-पश्चिम की ओर, मिर्जापुर और विंध्याचल के उन बीहड़, खतरनाक और रहस्यमयी जंगलों की ओर मोड़ दिया...
काले जादू और अघोर तंत्र का दूसरा, कहीं अधिक खूनी और भयानक अध्याय अब शुरू होने वाला था!
(कहानी जारी है...)
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भाग 4: विंध्याचल के बीहड़ अरण्य, नरकंकालों का पुल और यक्षिणी का मायाजाल।

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