PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 2: हरिश्चंद्र घाट का बंद तहखाना और शव-साधना का रहस्य

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
2 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
15 min
Words
2938
Language
Hindi (हिंदी)
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मणिकर्णिका की पथरीली सीढ़ियों पर पछुआ हवा की सांय-सांय किसी विषैले नाग के फुफकारने जैसी लग रही थी। चिताओं से उठती नीली-बैंगनी लपटों की छाया गंगा के काले जल पर ऐसी विद्रूप आकृतियां बना रही थी मानो साक्षात यमलोक के दूत नदी की सतह पर थिरक रहे हों।
वृद्ध अघोरी बालकनाथ ने अपनी लाठी को घाट के गीले पत्थरों पर पूरी ताकत से पटका।
खट!
उस एक आघात से हवा में बिखरी उस सड़ी हुई गंधक की बदबू कुछ पलों के लिए छंट गई। बाबा की सफेद मोतियाबिंद वाली आंखों में कोई दृष्टि नहीं थी, फिर भी वे सीधे रुद्र के चेहरे की ओर इस तरह देख रहे थे मानो उसके अंतर्मन में चल रहे हर विचार को साक्षात पढ़ रहे हों।
"खड़ा क्या देख रहा है, विद्याधर के पोते?" बाबा बालकनाथ की आवाज किसी पुराने कुएं के भीतर से गूंजती हुई प्रतीत हुई। "यह मणिकर्णिका है... यहाँ दिन में शव जलते हैं और रात को वो शक्तियां विचरती हैं जिनका नाम लेने मात्र से जीवित मनुष्य की जह्वा सूख जाती है। अगर दस मिनट और तू यहाँ उस मंदिर की ओट में खड़ा रहा, तो तंत्रेश्वर की ये अशुद्ध योगिनियां तेरी चेतना को यहीं इस नीली आग में होम कर देंगी! चल मेरे पीछे!"
रुद्र ने अपने कंधे पर लटके उस चमड़े के झोले को कसा। झोले के भीतर रखी उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह 200 साल पुरानी डायरी और पारद शिवलिंग लगातार इतना तप रहे थे कि चमड़े के आर-पार भी रुद्र की पसलियों में जलन महसूस हो रही थी।
रुद्र बिना कुछ बोले बाबा बालकनाथ के पीछे हो लिया।
बाबा की उम्र सौ से ऊपर जान पड़ती थी, कमर झुकी हुई थी, लेकिन उनके नंगे पैर घाट की फिसलन भरी, काई जमी सीढ़ियों पर किसी पहाड़ी तेंदुए की तरह फुर्ती से पड़ रहे थे। वे मणिकर्णिका की मुख्य सीढ़ियों को छोड़कर काशी की उन अत्यंत संकरी, अंधेरी गलियों में मुड़ गए जहाँ दिन के उजाले में भी सूरज की एक किरण नहीं पहुंचती थी।
ये काशी की वे प्राचीन गलियां थीं जिन्हें स्थानीय लोग 'यम-वीथिका' कहते थे। दोनों तरफ सौ-दो सौ साल पुराने ऊंचे, काले पत्थरों के मकान खड़े थे। दीवारों पर जगह-जगह सिंदूर से त्रिशूल और तांत्रिक चक्र बने थे। गलियों में हवा बिल्कुल रुक चुकी थी।
अजीब बात यह थी कि काशी की इन गलियों में हमेशा घूमने वाले आवारा कुत्ते आज कहीं नजर नहीं आ रहे थे। दूर किसी बंद हवेली के भीतर से केवल एक कुत्ते के लगातार, दर्दनाक रोने की आवाज आ रही थी—वह रोना जो केवल तब सुनाई देता है जब कोई प्राणी साक्षात मृत्यु को अपनी ओर आते देखता है।
लगभग बीस मिनट तक भूलभुलैया जैसी संकरी गलियों को पार करने के बाद, बाबा बालकनाथ रुद्र को लेकर अस्सी घाट के सबसे अंतिम छोर पर, गंगा किनारे बनी अपनी एक प्राचीन, वीरान कुटिया में पहुंचे।
यह कुटिया मिट्टी और बांस से नहीं, बल्कि श्मशान से चुनकर लाए गए पुराने काले पत्थरों और गंगा की गाद से बनी थी। कुटिया के बाहर नीम के तीन सूखे पेड़ खड़े थे, जिनकी नंगी डालियों पर दर्जनों मिट्टी की मटकियां लाल धागों से बंधी लटक रही थीं। हवा न होने पर भी वे मटकियां आपस में धीरे-धीरे टकरा रही थीं—टन... टन... टन...
कुटिया के भीतर कदम रखते ही रुद्र को एक अजीब सी शांति और साथ ही भयानक भय का अहसास हुआ।
कमरे के बीचों-बीच एक विशाल 'धूनी' (अखंड पवित्र अग्नि) जल रही थी। धूनी के चारों तरफ श्मशान की सफेद भस्म, सूखे बेलपत्र, धतूरे के फल और त्रिशूल गड़े थे। कमरे की एक दीवार पर अष्टधातु का बना अत्यंत प्राचीन 'महाकाल भैरव' का विग्रह स्थापित था, जिसकी आंखों में दो असली माणिक्य जड़े थे जो आग की रोशनी में खून की तरह चमक रहे थे।
बाबा बालकनाथ ने अपनी लाठी एक कोने में रखी और धूनी के पास मृगछाला पर बैठ गए। उन्होंने धूनी में सूखी समिधा और गुग्गल की आहुति दी।
भभक!
एक मीठी लेकिन नशीली सुगंध से कमरा भर गया। बाबा ने रुद्र की ओर अपना कांपता हुआ हाथ बढ़ाया।
"निकाल उसे बाहर... उस पापी बंधन को धूनी के सामने रख," बाबा ने आदेश दिया।
रुद्र ने कांपते हाथों से अपने झोले से वह भूरे चमड़े की प्राचीन डायरी और वह पारद शिवलिंग निकाला। जैसे ही पारद शिवलिंग को धूनी के चबूतरे पर रखा गया, धूनी की लपटें अचानक तीन फीट ऊंची उठ गईं। पारे की उस धातुई सतह पर बने सूक्ष्म तांत्रिक मंत्र लाल रंग में चमकने लगे।
"बाबा... यह सब क्या है?" रुद्र अब अपने कौतूहल और भय को और अधिक नहीं दबा सका। "मेरे परदादा काशी के प्रकांड मीमांसक और वेदांती थे। उनके पास यह तांत्रिक डायरी और यह पारद शिवलिंग कहाँ से आया? और वह मणिकर्णिका पर खड़ा अघोरी... वह तांत्रिक तंत्रेश्वर, मेरे कुल से किस ऋण की बात कर रहा है?"
बाबा बालकनाथ ने एक गहरी, ठंडी सांस ली। उनकी झुर्रीदार चेहरे की नसें तन गईं।
"इतिहास वही जानता है जो पन्नों पर लिखा जाता है, रुद्र," बाबा की आवाज में दो सदियों का दर्द उतर आया। "लेकिन जो सच श्मशान की राख में दबा होता है, उसे केवल काल-भैरव जानते हैं। बात सन् 1840 की है। आज से ठीक 186 वर्ष पूर्व, जब काशी पर एक भयंकर महामारी और अकाल का साया पड़ा था। सैकड़ों लोग प्रतिदिन बिना किसी रोग के रक्त की उल्टियां करके मर रहे थे। गंगा का जल दूषित हो चुका था।"
बाबा ने धूनी की राख को अपनी उंगलियों में मसला।
"तब तेरे परदादा, पंडित विद्याधर शास्त्री ने नगर की रक्षा के लिए अघोर पंथ के सबसे गुप्त और वर्जित मार्ग का सहारा लिया। उन्होंने विंध्याचल के बीहड़ों से उस समय के सबसे बड़े कापालिक साधक... अघोराचार्य कालभैरवानंद को काशी आमंत्रित किया। दोनों ने मिलकर काशी की रक्षा के लिए 'चौसठ योगिनी महा-यंत्र' की स्थापना करने का निर्णय लिया।"
"फिर अनर्थ कहाँ हुआ बाबा?" रुद्र ने सांस रोककर पूछा।
"अनर्थ तब हुआ जब कालभैरवानंद के सबसे क्रूर और कुटिल शिष्य... तंत्रेश्वर ने अपने ही गुरु के साथ विश्वासघात किया!" बाबा के स्वर में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। "तंत्रेश्वर ने महामारी रोकने के बहाने चौसठ योगिनियों को 'अशुद्ध श्मशान रक्त' से सिद्ध करना शुरू कर दिया। वह काशी को बचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं अमर होकर 'जीवित महाकाल' बनने के लिए अस्सी घाट से लेकर मणिकर्णिका तक अस्सी नरबलियां देना चाहता था!"
रुद्र का कलेजा कांप उठा। "अस्सी नरबलियां?!"
"हाँ!" बाबा ने कहा। "जब तेरे परदादा विद्याधर शास्त्री को इस कुचक्र का पता चला, तो उन्होंने कालभैरवानंद के साथ मिलकर तंत्रेश्वर के उस भयानक अनुष्ठान को अंतिम चरण में खंडित कर दिया। तंत्रेश्वर की 79 बलियां पूरी हो चुकी थीं... केवल 80वीं बलि बची थी। विद्याधर ने अपने तपोबल और इस पारद शिवलिंग की शक्ति से तंत्रेश्वर की उस अधूरी साधना को हरिश्चंद्र घाट के एक भूमिगत गुप्त तहखाने में कील दिया!"
बाबा बालकनाथ ने अपनी अंधी आंखें सीधे रुद्र के चेहरे पर गड़ा दीं।
"लेकिन तंत्र का एक अटल नियम है, बालक। जब कोई रक्त-यज्ञ अधूरा छूटता है, तो वह काल के चक्रव्यूह में बंध जाता है। विद्याधर शास्त्री ने अपने प्राण त्यागते समय इस पारद शिवलिंग पर अपने रक्त की मुहर लगाई थी और तंत्रेश्वर को शाप दिया था कि वह 186 वर्षों तक उस तहखाने से बाहर नहीं निकल पाएगा। लेकिन आज... कार्तिक मास की इस महा-अमावस्या की रात को, वह 186 वर्षों की समय-सीमा पूरी हो रही है!"
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि रुद्र को अपनी ही छाती के भीतर दिल के धड़कने की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
"इसका मतलब..." रुद्र का गला पूरी तरह सूख गया। "तंत्रेश्वर उस 80वीं अंतिम बलि को पूरा करने के लिए मुझे बुला रहा है?"
"हाँ," बाबा ने कहा। "तू विद्याधर का अंतिम वंशज है। तेरे रक्त में वही तांत्रिक डीएनए और संकल्प है जो उस पारद शिवलिंग को अनलॉक (मुक्त) कर सकता है। तंत्रेश्वर स्वयं इस शिवलिंग को नहीं छू सकता क्योंकि इस पर तेरे परदादा का रक्त-कवच लगा है। वह तुझे हरिश्चंद्र घाट के उस गुप्त तहखाने में बुलाकर, तेरे ही हाथों इस शिवलिंग का बंधन खुलवाना चाहता है... और फिर तेरी ही बलि देकर उस चौसठ योगिनी चक्र को पूर्ण करना चाहता है!"
रुद्र ने उस पारद शिवलिंग को देखा। शिवलिंग अब इतनी तेजी से स्पंदित हो रहा था मानो उसके भीतर कोई तरल धातु किसी बंद ज्वालामुखी की तरह उबल रही हो।
"अगर मैं वहां न जाऊं तो?" रुद्र ने पूछा। "अगर मैं यह शिवलिंग गंगा की अथाह गहराई में फेंक दूं और काशी छोड़कर भाग जाऊं?"
बाबा बालकनाथ एक भयानक, दर्दनाक हंसी हंसे।
"भागना चाहेगा? देख बाहर!"
बाबा ने अपनी लाठी से कुटिया की खिड़की का बांस का पर्दा एक झटके में गिरा दिया।
रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा। जो दृश्य उसने देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए।
कुटिया के बाहर खड़े उन तीनों सूखे नीम के पेड़ों की डालियों पर बंधी वे दर्जनों मिट्टी की मटकियां अब फूट चुकी थीं। उन मटकियों के भीतर से निकला हुआ गाढ़ा, काला-लाल तरल जमीन पर बह रहा था।
और उस तरल के भीतर से... अनगिनत पारदर्शी, सफेद और नीली प्रेत-छायाएं बाहर निकल रही थीं!
वे साए केवल कुटिया के बाहर नहीं थे; दूर मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के ऊपर का आकाश हजारों उड़ते हुए कंकालों और प्रेतों से भर चुका था। वे साए काशी की छतों पर मंडरा रहे थे। दूर गलियों से लोगों के घरों के दरवाजे पीटने, बर्तनों के गिरने और औरतों के चीखने की दबी हुई आवाजें हवा में तैरने लगी थीं।
"तंत्रेश्वर ने काशी की हर चिता को जाग्रत कर दिया है," बाबा की आवाज में गंभीर चेतावनी थी। "अगर रात के ठीक 12:00 बजे तक तू उस तहखाने की दहलीज पर नहीं पहुंचा, तो वे सभी अतृप्त प्रेत काशी के हर घर में घुसकर मासूमों का रक्त पिएंगे। तू भाग नहीं सकता रुद्र... यह तेरा कुल-ऋण है। तुझे जाना ही होगा!"
रुद्र की मुट्ठियां खिंच गईं। उसके पूर्वजों की मर्यादा और काशी के निर्दोष लोगों की रक्षा का दायित्व अब केवल उसके कंधों पर था। उसका डर धीरे-धीरे एक ठंडे, अडिग संकल्प में बदलने लगा।
"मैं जाऊंगा बाबा," रुद्र ने अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करते हुए कहा। "बताइए, मुझे क्या करना होगा?"
बाबा बालकनाथ के चेहरे पर एक तृप्त, शांत भाव उभरा।
वे उठे और अपनी कुटिया के कोने में रखे एक पुराने तांबे के पात्र के पास गए। उन्होंने उस पात्र से काले रंग का एक गाढ़ा लेप निकाला। वह लेप श्मशान की भस्म, काली हल्दी, अपामार्ग की जड़ और सिद्ध कस्तूरी का मिश्रण था।
बाबा ने अपनी उंगलियों से वह लेप रुद्र के माठे, दोनों कंधों और उसकी छाती के ठीक बीच—जहाँ अनाहत चक्र होता है—पूरी ताकत से मल दिया।
छनन्नन!
जैसे ही वह लेप रुद्र की त्वचा से छुआ, रुद्र को ऐसा लगा मानो किसी ने बर्फ का ठंडा पानी उसकी जलती हुई नसों में उतार दिया हो। उसके शरीर के चारों ओर नीले रंग की एक सूक्ष्म, अदृश्य सुरक्षा-दीवार खिंच गई।
"यह 'अघोर भस्म-कवच' है," बाबा ने कहा। "यह तंत्रेश्वर की योगिनियों के सीधे प्रहार को तेरे प्राणों तक पहुंचने से रोकेगा। लेकिन याद रखना... यह केवल आधी रात के एक बजे तक ही काम करेगा। तेरे पास केवल एक घंटा होगा।"
बाबा ने अपने त्रिशूल से एक छोटी, लोहे की प्राचीन ताबीज निकाली और रुद्र के गले में पहना दी।
"इस पारद शिवलिंग को अपने दाहिने हाथ में रखना। जब तू हरिश्चंद्र घाट के उस गुप्त तहखाने में पहुंचेगा, तो वहां तुझे 'शव-साधना' की सबसे वीभत्स अवस्था मिलेगी। तंत्रेश्वर किसी ताजे शव पर बैठकर अपना अंतिम अनुष्ठान कर रहा होगा। वह तुझसे छल करेगा, तेरे पूर्वजों के रूप में सामने आएगा, तेरे मन में मोह और खौफ पैदा करेगा। लेकिन तुझे विचलित नहीं होना है। इस पारद शिवलिंग को उस वेदी के केंद्र में लगे त्रिशूल पर तभी स्पर्श कराना जब तू उस शव के नेत्रों में जलती नीली आग को बुझा सके!"
घड़ी की टिक-टिक ने समय की गति को और तेज कर दिया।
कुटिया के कोने में रखी पुरानी दीवार घड़ी ने साढ़े ग्यारह बजाए—11:30 PM।
अंतिम प्रलय में केवल तीस मिनट बाकी थे।
रुद्र ने पारद शिवलिंग को अपने दाहिने हाथ में मजबूती से थामा, चमड़े के झोले को सीने से बांधा और कुटिया का दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया।
बाहर का वातावरण अब किसी जीवित नर्क जैसा बन चुका था।
गंगा के घाटों पर तापमान इतना गिर चुका था कि पत्थरों पर पाले की सफेद चादर जमने लगी थी। आसमान में बादलों के बीच से झांकता हुआ अमावस्या का चंद्रमा किसी सड़े हुए, पीले घाव जैसा दिखाई दे रहा था। हवा में सीटी जैसी आवाजें गूंज रही थीं, मानो हवा खुद किसी भयानक दर्द से तड़प रही हो।
रुद्र तेजी से हरिश्चंद्र घाट की ओर दौड़ पड़ा।
हरिश्चंद्र घाट... काशी का वह दूसरा महा-श्मशान, जहाँ राजा हरिश्चंद्र ने सत्य की रक्षा के लिए चांडाल का दासत्व स्वीकार किया था।
जब रुद्र घाट की अंतिम सीढ़ियों पर पहुंचा, तो वहां का दृश्य मणिकर्णिका से भी अधिक भयावह था।
पूरा हरिश्चंद्र घाट वीरान था। वहां न कोई शव-यात्री था, न कोई डोम। घाट के ठीक बीचों-बीच केवल एक चिता जल रही थी।
लेकिन वह चिता किसी सामान्य लकड़ी से नहीं जल रही थी। चिता की आग लकड़ियों से ऊपर उठने के बजाय... उल्टी दिशा में, जमीन के भीतर पाताल की ओर खिंच रही थी! आग की लपटें गहरे काले और नीले रंग की थीं, और उन लपटों के भीतर से किसी लोहे की भारी जंजीरों के घिसटने की आवाज आ रही थी—झन... झन... घसीट...
रुद्र उस चिता के पास पहुंचा।
चिता के ठीक नीचे, घाट के पत्थरों के बीच एक विशाल, चौकोर दरार बनी हुई थी। वह दरार किसी पुराने कुएं जैसी थी, जिसके भीतर काले पत्थरों की फिसलन भरी सीढ़ियां पाताल की ओर उतर रही थीं।
उस अंधेरे गड्ढे के मुहाने पर पत्थर पर ताजे खून से लिखा था:
"प्रवेश करो रुद्र... तुम्हारी बलि की वेदी सज चुकी है!"
रुद्र ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी छाती पर बने उस अघोर भस्म-कवच को छुआ, पारद शिवलिंग को मुट्ठी में भींचा, और उन सीढ़ियों से नीचे उस असीम अंधकार में उतरना शुरू कर दिया।
सीढ़ियां बेहद संकरी और गीली थीं। दीवारों से इंसानी चर्बी और गंधक का बदबूदार तेल रिस रहा था। हर दस कदम पर लोहे के स्टैंड लगे थे, जिनमें इंसानी खोपड़ियों के भीतर दीये जल रहे थे। उन दीयों की रोशनी पीली और कांपती हुई थी।
लगभग पचास सीढ़ियां नीचे उतरने के बाद, सीढ़ियां एक विशाल, गुंबददार भूमिगत तहखाने में जाकर खुलीं।
यह था—हरिश्चंद्र घाट का गुप्त काल-भैरव तहखाना!
तहखाने का दृश्य देखकर रुद्र के पैरों तले की जमीन खिसक गई।
तहखाने की गोलाकार दीवारों पर चारों तरफ चौंसठ तांत्रिक कोष्ठक बने थे, और हर कोष्ठक के भीतर एक-एक इंसानी कंकाल सिंदूर से लिपटा हुआ खड़ा था। उन कंकालों के गले में लोहे की कीलें ठुकी थीं और उनकी खोपड़ियों की खाली आंखों से लाल धुआं निकल रहा था।
और उस तहखाने के ठीक केंद्र में... एक गोलाकार तांत्रिक वेदी बनी थी।
वेदी के ऊपर कोई चबूतरा नहीं था; वहां एक ताजी, नग्न इंसानी लाश औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी। उस लाश की पीठ पूरी तरह से काली पड़ चुकी थी और उस पर तांत्रिक यंत्र खुदे हुए थे।
और उस लाश की पीठ पर... पद्मासन में बैठा था वह भयानक दैत्य।
वह था—कापालिक तंत्रेश्वर!
उसका शरीर किसी भीमकाय दानव जैसा था, जिस पर श्मशान की राख और सूखे खून की पपड़ियां जमी हुई थीं। उसकी जटाएं जमीन पर सांपों की तरह फैली थीं। उसके गले में ताजा कटे हुए इंसानी कानों और उंगलियों की माला झूल रही थी। उसकी दोनों आंखें पूरी तरह से अंधी, सफेद और सुलगती हुई थीं।
तंत्रेश्वर उस लाश की खोपड़ी के बालों को अपने बाएं हाथ से पकड़े हुए था और अपने दाहिने हाथ की अनामिका उंगली से उस लाश के माथे पर खून से मंत्र लिख रहा था।
ॐ क्रीं क्रीं श्मशान भैरव्यै नमः...
तंत्रेश्वर के मंत्रोच्चार के साथ ही उस मृत शरीर की रीढ़ की हड्डी में अमानवीय कंपन हो रहा था—कड़कड़... कड़ाक!—मानो वह लाश किसी भी क्षण उठकर खड़ी होने वाली हो।
जैसे ही रुद्र के कदमों की आहट हुई, तंत्रेश्वर ने अपना सिर धीरे-धीरे उठाया।
उसकी सफेद, भयानक आंखें सीधे रुद्र के चेहरे पर टिक गईं। उसके चेहरे पर एक ऐसी घिनौनी, वीभत्स मुस्कान फैल गई जिससे उसके नुकीले, पीले दांत बाहर निकल आए।
"आ गया... विद्याधर का रक्त आ गया!" तंत्रेश्वर की आवाज तहखाने की दीवारों को फाड़ती हुई गूंजी।
"तूने बहुत प्रतीक्षा करवाई, रुद्र! देख... तेरी 80वीं आहुति के लिए यह शव-वेदी सज चुकी है। इस शव के प्राण वायु में विलीन होने से पहले, जैसे ही तेरा रक्त इस पारद शिवलिंग पर गिरकर इस शव के मुख में जाएगा... चौसठ योगिनियां पाताल के बंधनों को तोड़कर इस काशी की भूमि पर तांडव करेंगी!"
"तेरा यह नरक-यज्ञ आज यहीं समाप्त होगा, तंत्रेश्वर!" रुद्र ने अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाकर कहा। उसने पारद शिवलिंग को आगे किया। "मेरे पुरखों ने तुझे 186 साल पहले कीला था... आज मैं तुझे इस श्मशान की राख में हमेशा के लिए भस्म कर दूंगा!"
"हाहाहाहा!" तंत्रेश्वर का अट्टहास पूरे पाताल-कक्ष में गूंज उठा। "तू मुझे भस्म करेगा? तू जानता भी है कि यह शव किसका है जिस पर मैं बैठा हूँ?"
तंत्रेश्वर ने एक झटके में उस लाश के बालों को खींचकर उसका सिर ऊपर उठाया और उसका चेहरा रुद्र की ओर घुमा दिया।
रुद्र की नजर जैसे ही उस मृत चेहरे पर पड़ी, उसके हाथ से पारद शिवलिंग लगभग छूट ही गया। उसका पूरा शरीर बर्फ की तरह सुन्न हो गया।
वह मृत चेहरा किसी अज्ञात शव का नहीं था...
उस चेहरे की नाक, आंखें, माथा और जबड़ा बिल्कुल... बिल्कुल रुद्र के अपने चेहरे जैसा था! वह शव किसी और का नहीं, बल्कि 1840 में मरे उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री का था, जिसे तंत्रेश्वर ने अपने काले जादू से पिछले 186 वर्षों से बिना सड़े इस तहखाने में संरक्षित कर रखा था!
और उसी क्षण... उस 186 साल पुराने मृत शरीर की दोनों आंखें एक झटके में खुल गईं!
उन आंखों में नीली, भयानक आग जल रही थी। उस शव का हाथ बिजली की तेजी से आगे बढ़ा और उसने रुद्र के दाहिने टखने को अपनी बर्फीली, लोहे जैसी उंगलियों से जकड़ लिया!
शव के सूखे, फटे हुए होंठ हिले और उसके कंठ से एक रुंधती हुई, भयानक आवाज निकली:
"रुद्र... मुझे मुक्ति दे... या मेरा रक्त बनकर इसी वेदी पर समा जा!"
घड़ी ने रात के ठीक बारह बजे (12:00 AM) का घंटा बजाया—डोंग... डोंग... डोंग!
तहखाने के चारों तरफ खड़े वे चौंसठ कंकाल एक साथ अपनी जंजीरें तोड़कर रुद्र की ओर झपट पड़े...

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