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भाग 1: मणिकर्णिका की जलती चिताएं और अघोरी का बुलावा

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 6 मिनट

कार्तिक मास की घोर अमावस्या की वह रात बनारस के इतिहास की सबसे भारी और मनहूस रातों में से एक थी।
​गंगा का जल सामान्य मटमैले रंग के बजाय किसी जमे हुए काले तेल की तरह शांत और भारी होकर बह रहा था। घाट की सीढ़ियों को छूकर गुजरने वाली बर्फीली पछुआ हवा में सामान्य ठंड नहीं थी; उसमें सैकड़ों अधजले शवों के मांस, कपूर, सूखी लकड़ियों और सड़े हुए गंधक की ऐसी तीखी गंध घुली हुई थी जो सांस लेते ही फेफड़ों में चुभने लगती थी।
​मणिकर्णिका घाट पर उस रात एक साथ तिरासी चिताएं धधक रही थीं।
​लपटों का लाल और नारंगी प्रकाश घाट की प्राचीन, काई जमी पथरीली दीवारों पर भूतों की तरह नाच रहा था। डोम राजा के परिवार के लोग और शव-यात्री दूर सीढ़ियों पर चुपचाप बैठे थे। आमतौर पर शवों के दाह-संस्कार के समय परिजनों का रोना-बिलखना या 'राम नाम सत्य है' की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन आज पूरी मणिकर्णिका पर एक ऐसा अस्वाभाविक, दमघोंटू सन्नाटा पसरा था मानो चिताओं में जलने वाले मुर्दे भी किसी अदृश्य खौफ के मारे चुपचाप राख बन रहे हों।
​सीढ़ियों के सबसे ऊपरी चबूतरे पर, एक पुराने जर्जर शिव मंदिर की ओट में खड़ा था—रुद्र प्रताप सिंह।
​रुद्र की उम्र बमुश्किल अट्ठाईस वर्ष थी। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान संकाय से प्राचीन पांडुलिपियों और तांत्रिक ग्रंथों पर शोध कर रहा था। लेकिन आज वह यहाँ किसी अकादमिक शोध के लिए नहीं आया था। उसके कंधे पर चमड़े का एक भारी झोला लटका था, जिसके भीतर उसके परदादा—महामहोपाध्याय पंडित विद्याधर शास्त्री—की 1840 की वह गुप्त तांत्रिक डायरी रखी थी, जिसे कल शाम ही उसके पुश्तैनी मकान के तहखाने में दबे लोहे के एक बक्से से निकाला गया था।
​रुद्र के हाथ में एक पुराना, पारद (पारे) से बना भारी त्रिशूल-चिह्नित शिवलिंग था। वह पारद शिवलिंग इस कड़ाके की ठंड में भी किसी जलते हुए अंगारे की तरह गर्म हो रहा था।
​डायरी का अंतिम पन्ना कल रात से रुद्र के मस्तिष्क में हथौड़े की तरह बज रहा था:
​"जब काशी के घाटों पर बिना हवा के चिताओं की आग नीली पड़ने लगे... जब गंगा का जल उल्टी दिशा में बहने का भ्रम दे... तो समझ लेना कि 200 वर्ष पूर्व श्मशान में दिया गया वह रक्त-वचन जाग चुका है। हमारे वंश का अंतिम रक्त ही उस कापालिक की भूख को शांत कर सकता है... या फिर संपूर्ण काशी को श्मशान बना सकता है।"
​रुद्र ने घाट की ओर देखा। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
​सामने जल रही तिरासी चिताओं की सामान्य पीली और नारंगी लपटें अचानक फड़फड़ाने लगीं। हवा का एक भी झोंका नहीं था, फिर भी लपटें एक ही पल में गहरे नीले और बैंगनी रंग में बदल गईं!
​चट-चट... कड़ाक!
​चिता की जलती लकड़ियों से आवाजें आने लगीं। लेकिन वे लकड़ियों के चटकने की आवाजें नहीं थीं; ऐसा लग रहा था मानो चिता के भीतर जलते हुए कंकाल अपने दांत पीस रहे हों।
​दूर घाट के सबसे निचले पायदान पर, जहाँ गंगा की लहरें पत्थरों से टकरा रही थीं, एक चिता बाकी सब से अलग जल रही थी। उस चिता के चारों तरफ कोई परिजन नहीं था, कोई डोम नहीं था।
​उस चिता के ठीक सामने, गंगा के पानी में अपनी कमर तक खड़े होकर एक नग्न अघोरी साधक साधना में लीन था।
​उसकी पूरी देह पर श्मशान की ताजा, सफेद भस्म लिपटी हुई थी। उसकी जटाएं किसी काले नागों के झुंड की तरह कमर से नीचे लटक रही थीं। उसके गले में असली इंसानी पसलियों और रुद्राक्षों की माला थी। उसके दाहिने हाथ में एक नर-कपाल (इंसानी खोपड़ी का कटोरा) था, जिसमें जलता हुआ कपूर रखा था, और बाएं हाथ में लोहे का एक भारी, जंग लगा त्रिशूल था।
​अचानक, उस अघोरी ने गंगा के भीतर से अपना सिर उठाया।
​उसकी दोनों आंखें पूरी तरह से लाल थीं—उनमें कोई पुतली या सफेद हिस्सा नहीं दिख रहा था, केवल सुलगते हुए अंगारे थे। उसने घाट की सैकड़ों सीढ़ियों के ऊपर, अंधेरे में खड़े रुद्र की ओर सीधे देखा।
​दूरी कम से कम दो सौ मीटर थी, लेकिन रुद्र को ऐसा लगा मानो वह अघोरी उसकी आंखों के ठीक सामने खड़ा होकर उसकी आत्मा को घूर रहा हो।
​अघोरी के सूखे, काले होंठ हिले। सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी, गूंजती और धातुई आवाज सीधे रुद्र के मस्तिष्क के भीतर गूंज उठी:
"रुद्र... तू आ गया! तेरे पुरखों ने जो ऋण 1840 में श्मशान भैरवी के सामने बांधा था... आज उसकी वसूली की रात है। नीचे उतर... अपनी बलि की वेदी पर कदम रख!"
​रुद्र के रोंगटे खड़े हो गए। उसके पैरों की मांसपेशियों ने जैसे अपना नियंत्रण खो दिया। कोई अदृश्य, प्रचंड शक्ति उसके कदमों को सीढ़ियों से नीचे की ओर खींचने लगी।
​रुद्र ने अपने दांत भींचे। उसने अपनी जेब से गंगाजल की एक छोटी तांबे की शीशी निकाली और कुछ बूंदें अपनी आंखों और माथे पर छिड़क लीं। उसने मन ही मन महामृत्युंजय मंत्र का तीव्र पाठ शुरू किया:
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्... उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्..."
​गंगाजल और वैदिक मंत्र के प्रभाव से उसके मस्तिष्क पर छाया वह तांत्रिक सम्मोहन एक पल के लिए ढीला पड़ा।
​रुद्र ने पीछे मुड़कर भागने की कोशिश की।
​लेकिन जैसे ही वह पलटा, उसके ठीक सामने का रास्ता बंद हो चुका था।
​मंदिर की पुरानी पथरीली दीवार पर ताजे, गाढ़े लाल खून से एक भयानक चक्रव्यूह बना हुआ था—'चौसठ योगिनी यंत्र'। और उस यंत्र के ठीक बीच में कोयले से एक ताजा संदेश लिखा था:
"रात ठीक 12:00 बजे... हरिश्चंद्र घाट का गुप्त तहखाना तेरा इंतजार कर रहा है, रुद्र। यदि तू नहीं आया, तो काशी की हर जलती चिता से एक प्रेत निकलकर नगर की गलियों में रक्तपात करेगा!"
​घड़ी ने रात के ठीक ग्यारह बजे का घंटा बजाया—टन... टन... टन...
​रुद्र के पास अब केवल साठ मिनट बचे थे।
​तभी, सीढ़ियों के अंधेरे कोने से किसी के धीमे, नंगे पैरों के चलने की आवाज आई।
​एक अत्यंत वृद्ध, झुकी हुई कमर वाले साधु, जिनकी आंखों में मोतियाबिंद का सफेद जाला था लेकिन चेहरे पर अलौकिक तेज था, लाठी टेकते हुए रुद्र के सामने आकर खड़े हो गए। उनके हाथ में नीम की टहनियां और काली सरसों की पोटली थी।
​वे थे अस्सी घाट के प्राचीन कुटिया वाले अघोरी बालकनाथ।
​"संभल जा बालक!" वृद्ध अघोरी की आवाज खुरदुरी लेकिन वज्र जैसी स्थिर थी। "जो सामने खड़ा है, वह कोई साधारण तांत्रिक नहीं है। वह अघोर पंथ का सबसे बड़ा कलंक... कापालिक तंत्रेश्वर है! उसने श्मशान की चौसठ योगिनियों को अशुद्ध रक्त से बांध लिया है। यदि आज की रात तूने अपने कुल की उस गुप्त 'महा-भैरवी संहिता' का रहस्य नहीं समझा... तो कल का सूर्योदय देखने के लिए काशी का कोई प्राणी जीवित नहीं बचेगा!"
​रुद्र ने कांपते हाथों से अपने झोले में रखी उस 200 साल पुरानी पांडुलिपि को छुआ।
​पांडुलिपि की चमड़े की जिल्द के भीतर से एक धीमी, धड़कती हुई ऊष्मा बाहर निकलने लगी थी... मानो उस पुस्तक के भीतर किसी का कटा हुआ दिल अभी भी जिंदा हो!

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
1 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
6 min
Words
1144
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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