PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 13: महाकाल के कोटि-तीर्थ का अमृत-जल, महा-दंडी के रथ का संहार और 84 महादेवों का रक्षा-कवच

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
13 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
13 min
Words
2544
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

चक्रतीर्थ श्मशान के उस विशाल, प्राचीन अखाड़े की परिधि में हवा का एक-एक कण लावे और गंधक के प्रचंड ताप से सुलग उठा था।
कापालिक अघोरेश्वर महा-दंडी की उस विशाल, लोहे और हड्डियों से मढ़ी गदा का प्रहार जैसे ही नीचे उतरा, ऐसा प्रतीत हुआ मानो आकाश से कोई जलता हुआ उल्कापिंड सीधे धरती के सीने से टकरा गया हो।
कड़ाssssक! बूम!
बाबा शमशानेश्वर ने अपने दोनों हाथों से उस भारी लोहे के चिमटे को आगे करके गदा के वार को रोकने का प्रयास किया।
अघोर-अग्नि और पाताल के लावे के उस भयानक टकराव से नीली और लाल चिंगारियों का एक ऐसा विशाल बवंडर उठा जिसने अखाड़े के पत्थरों को चटका दिया। चिमटा मुड़कर आधा टेढ़ा हो गया और बाबा शमशानेश्वर का भारी, झुर्रीदार शरीर उस भीषण आघात के धक्के से दस फीट पीछे फिसलकर सीधे विक्रांत भैरव की पाषाण-प्रतिमा के चबूतरे से जा टकराया। बाबा के मुंह से गाढ़े, लाल रक्त की एक धार फूट पड़ी।
"हाहाहाहाहा!"
चार जलते हुए सांडों के उस प्राचीन तांत्रिक रथ पर खड़े महा-दंडी की गर्जना ने शिप्रा के स्थिर, काले जल में खूनी लहरें पैदा कर दीं।
उसकी छाती पर जड़ा वह 'चौसठ योगिनी महा-चक्र' अब किसी खुले हुए नरक-द्वार की तरह धधक रहा था। उसके मुकुट की खोपड़ियों से काले धुएं के जहरीले फव्वारे छूट रहे थे।
"शमशानेश्वर! तूने काशी के उस बालकनाथ के साथ मिलकर मेरे इस पाताल-जागरण को रोकने का दंभ भरा था? देख... आज तेरी ही खोपड़ी में इस चक्रतीर्थ की चिताओं की राख भरी जाएगी!"
महा-दंडी ने अपने रथ की लगाम खींची।
वे चारों विशाल, काले सांड अपनी जलती हुई लाल आंखों और सींगों से आग उगलते हुए, अपने भारी खुरों से श्मशान की जलती चिताओं को रौंदते हुए सीधे अखाड़े की ओर बढ़ने लगे।
उनके पीछे-पीछे शिप्रा के जल से निकलीं वे चौंसठ जल-योगिनियां और कब्रों से उठे सैकड़ों श्मशान-पिशाच अपनी जलती लकड़ियों और खप्परों को लहराते हुए आगे बढ़ रहे थे।
बाबा शमशानेश्वर ने लड़खड़ाते हुए अपने हाथ से अपनी दाढ़ी पर जमे खून को पोंछा।
उन्होंने अपनी जलती हुई लाल आंखों से रुद्र को देखा, जो अपने हाथ में काल-भैरव खड्ग थामे महा-दंडी पर कूदने ही वाला था।
"रुक जा, रुद्र!" बाबा शमशानेश्वर ने अपने फटे हुए गले से पूरी शक्ति से चिल्लाकर कहा।
बाबा ने आगे बढ़कर रुद्र की कलाई को अपनी कांपती लेकिन फौलादी पकड़ में जकड़ लिया। "मूर्खता मत कर! महा-दंडी की यह देह 1000 वर्ष पुरानी पाताल-समाधि से निकली है। इस पर किसी खड्ग, किसी बाण या किसी नश्वर तांत्रिक अस्त्र का कोई प्रभाव नहीं होगा... जब तक कि इस चक्रतीर्थ की मुख्य धूनी में महाकाल के उस पावन अमृत-जल की आहुति न दी जाए!"
"लेकिन बाबा, मैं आपको इस नरक में अकेला छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?" रुद्र की आंखों में पीड़ा और अदम्य रोष एक साथ उमड़ पड़ा।
"यह मेरे जीवन की अंतिम आहुति का समय है, बालक!" बाबा शमशानेश्वर के चेहरे पर एक अत्यंत शांत, तेजस्वी और निर्भय अघोरी का तेज चमक उठा।
बाबा ने विक्रांत भैरव के चरणों में रखी मदिरा का एक बड़ा पात्र उठाया और अपनी पूरी देह पर छिड़क लिया। उन्होंने अपने मुड़े हुए चिमटे को दोनों हाथों से सीधा किया।
"मैं इस पापी और इसके इस रथ को अगले एक प्रहर तक इस श्मशान की सीमा में बांधकर रखूंगा... चाहे मेरी हड्डियों का चूरा ही क्यों न बन जाए! जा रुद्र... अपनी जीप निकाल और सीधे महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में जा! वहां कोटि-तीर्थ कुंड के अमृत-जल को अपने इस तांबे के कलश में भर... और रात के ठीक 03:00 AM से पहले यहाँ लौट आ! यदि तू एक सेकंड भी देर से आया... तो न यह शमशानेश्वर बचेगा, और न ही यह अवंतिका नगरी!"
बाबा शमशानेश्वर ने एक अमानवीय दहाड़ के साथ हवा में छलांग लगाई और सीधे उस आगे बढ़ते हुए तांत्रिक रथ के सबसे आगे वाले सांड के सींगों को अपने दोनों हाथों से पकड़कर रोक दिया!
कड़ाssssक!
बाबा के शरीर से साक्षात विक्रांत भैरव की प्रचंड नीली अग्नि फूट पड़ी जिसने उस रथ के पहियों को वहीं पत्थरों में जमा दिया।
रुद्र ने अपने आंसुओं को पी लिया। यह समय शोक या संकोच का नहीं था; यह समय काल की गति से भी तेज दौड़ने का था।
रुद्र तेजी से पलटा।
वह श्मशान की सीढ़ियों को लांघता हुआ सीधे उस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी अपनी महिन्द्रा थार जीप के पास पहुंचा।
उसने इग्निशन ऑन किया। थार का डीजल इंजन पूरी क्षमता से गरजा और जीप चक्रतीर्थ के पथरीले रास्तों को चीरती हुई सीधे उज्जैन शहर की मुख्य सड़क पर 100 की रफ्तार से दौड़ पड़ी।
रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
उज्जैन की सड़कें अब किसी भयानक, वीरान भूतहा भूलभुलैया जैसी दिख रही थीं।
हवा में एक ऐसा अलौकिक खिंचाव था मानो शहर की सारी दिशाएं एक बिंदु की ओर मुड़ रही हों। महा-दंडी के पाताल-जागरण के कारण उज्जैन के प्राचीन चौरासी महादेवों के मंदिरों के शिखरों पर लगे तांबे के त्रिशूल और ध्वजाएं अपने आप कांप रही थीं।
गलियों के चौराहों पर महा-दंडी के छोड़े हुए प्रेत और पिशाच हवा में तैर रहे थे।
तड़ाक!
एक चौराहे पर तीन विशाल, बिना सिर वाले काले साए जीप के बोनट पर कूद पड़े। उनके सड़े हुए पंजों ने जीप के सामने वाले विंडशील्ड को चटका दिया।
रुद्र ने एक हाथ से स्टीयरिंग संभाला और दूसरे हाथ से अपनी कमर में बंधे उस 'काल-भैरव खड्ग' को बाहर खींचकर खिड़की से बाहर लहरा दिया।
छनन्नन! भभक!
खड्ग से निकली स्वर्णिम और नीली दिव्य ज्वाला ने उन तीनों प्रेतों को हवा में ही भस्म कर दिया। जीप मलबे और धुएं को चीरती हुई सीधे महाकालेश्वर मंदिर के विशाल कोटि-तीर्थ कुंड और मुख्य सिंह-द्वार के सामने आकर रुकी।
रुद्र जीप से कूदा।
उसके एक हाथ में वह तांबे का पवित्र कलश था, सीने पर बंधी थी कुल-देवी 'मां रक्त-दंतिका भैरवी' की सिद्ध अष्टधातु मूर्ति, और दूसरे हाथ में चमक रहा था काल-भैरव खड्ग।
मंदिर के मुख्य द्वार पर सामान्य समय के सुरक्षा गार्ड नहीं थे; वहां खड़े थे महाकाल मंदिर के मुख्य अर्चक—पंडित नर्मदेश्वर व्यास!
पंडित व्यास की उम्र सत्तर के करीब थी। उनके माथे पर भस्म का त्रिपुंड चमक रहा था और उनके हाथ में रुद्राक्ष की माला थी। वे रुद्र के परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री के परिवार के पुराने यजमान और इस तांत्रिक रहस्य के मर्मज्ञ थे।
"आ गए, विद्याधर के पौत्र!" पंडित व्यास ने रुद्र का हाथ पकड़कर तेजी से मंदिर के भीतरी परकोटे की ओर खींचा।
"हम पिछले तीन घंटों से तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे। महाकाल की इस पावन पीठ के नीचे पाताल की नाड़ियां उबल रही हैं। चलो... कोटि-तीर्थ का मार्ग खुला है!"
दोनों तेजी से मंदिर के विशाल पत्थरों के प्रांगण को पार करते हुए उस प्राचीन, विशालकाय 'कोटि-तीर्थ कुंड' के तट पर पहुंचे।
कोटि-तीर्थ... महाकाल मंदिर के भीतर स्थित वह अति-प्राचीन जल-कुंड, जिसके जल के बारे में शास्त्रों में लिखा है कि इसमें कोटि (करोड़ों) तीर्थों की पावन ऊर्जा समाहित है।
लेकिन आज रात, उस कुंड का पानी सामान्य रूप से शांत नहीं था। कुंड के जल के भीतर से नीले और सुनहरे रंग की सूक्ष्म प्रकाश-तरंगें उठ रही थीं जो सीधे नीचे स्थित मुख्य ज्योतिर्लिंग के गर्भगृह की ओर जा रही थीं।
पंडित व्यास रुद्र को लेकर कोटि-तीर्थ के सबसे निचले, गुप्त तांत्रिक घाट की सीढ़ियों पर उतरे।
"रुद्र, यह वह गुप्त जल-मार्ग है जो सीधे उस स्वयंभू ज्योतिर्लिंग की मूल पाषाण-जड़ से जुड़ता है," पंडित व्यास ने कहा।
"जब आज सुबह महाकाल की भस्म-आरती हुई थी, तो उस दिव्य आरती के समय चिता-भस्म और गंगाजल का जो महा-अभिषेक जल नीचे उतरा था, वह इसी कुंड के इस गुप्त संदूक में एकत्र हुआ है। इसे अपने कलश में भरो!"
रुद्र अपने घुटनों के बल झुका।
उसने अपने दोनों हाथों से उस तांबे के कलश को थामा और उस गुप्त जलधारा के भीतर डुबो दिया।
छपाक... भभकssss!
जैसे ही वह पवित्र जल कलश के भीतर भरा, तांबे का वह पात्र किसी छोटे सूर्य की तरह चमक उठा। पानी से निकलती हुई कपूर, कस्तूरी और महाकाल की ताजी चिता-भस्म की अलौकिक सुगंध ने रुद्र के मन और आत्मा के सारे संशय, सारी थकान को एक ही सेकंड में मिटा दिया।
और ठीक उसी पल...
महाकालेश्वर मंदिर के विशाल मुख्य शिखर पर लगे उस प्राचीन, स्वर्ण-कलश के ऊपर से एक ऐसी अमानवीय, गगनभेदी डमरू-ध्वनि गूंजी जिसने पूरी अवंतिका नगरी के आकाश को हिलाकर रख दिया:
डम... डम... डम-डम-डम!
उस डमरू-नाद के साथ ही, उज्जैन नगर के चारों कोनों में स्थापित चौरासी महादेवों (84 Mahadevas) के मंदिरों के शिखरों से एक साथ नीली, श्वेत और स्वर्णिम प्रकाश की चौरासी प्रचंड रश्मियां फूटीं!
वे सभी चौरासी प्रकाश-किरणें आकाश में जाकर आपस में जुड़ गईं और उन्होंने पूरी उज्जैन नगरी के ऊपर एक विशाल, अभेद्य और धधकती हुई दिव्य ढाल—'महाकाल चक्र-कवच' बना दिया!
उस कवच के बनते ही, महा-दंडी के वे हजारों प्रेत और पिशाच जो शहर के भीतर घुसने की कोशिश कर रहे थे, उस दिव्य प्रकाश के स्पर्श मात्र से हवा में ही जलकर भस्म होने लगे।
"महाकाल का सुरक्षा-कवच जाग चुका है!" पंडित व्यास ने हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखा।
"लेकिन रुद्र... यह कवच केवल नगर की रक्षा करेगा। चक्रतीर्थ का वह श्मशान इस कवच की परिधि से बाहर है... क्योंकि श्मशान स्वयं महाकाल का निजी आसन है! महा-दंडी को वहीं उस श्मशान की धूनी में ही भस्म करना होगा। भागो रुद्र... समय बहुत कम है!"
रुद्र ने कलश को अपने सीने से लगाया।
उसने अपनी घड़ी देखी—रात के 01:15 AM।
काल-प्रहर (03:00 AM) में अब केवल एक घंटा और पैंतालीस मिनट शेष थे!
रात के करीब सवा एक बज रहे थे जब रुद्र अपनी जीप लेकर वापस चक्रतीर्थ श्मशान के मुहाने पर पहुंचा।
श्मशान का दृश्य देखकर रुद्र का कलेजा फट पड़ा।
अखाड़े की वह सुरक्षा-दीवार पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी।
चारों तरफ की 84 चिताओं की लकड़ियां और हड्डियां बिखर चुकी थीं। और अखाड़े के टूटे हुए चबूतरे पर, विक्रांत भैरव की पाषाण-प्रतिमा के ठीक आगे बाबा शमशानेश्वर खून से लथपथ पड़े थे। उनका शरीर दर्जनों त्रिशूलों के घावों से फटा हुआ था, उनकी सांसें अत्यंत धीमी और उखड़ी हुई चल रही थीं।
और उनके ठीक सामने...
कापालिक अघोरेश्वर महा-दंडी का वह सोने और हड्डियों से मढ़ा तांत्रिक रथ खड़ा था।
रथ के चारों काले सांड अपने जलते हुए खुरों को बाबा शमशानेश्वर की छाती पर रखने ही वाले थे ताकि उनका सिर कुचल सकें। रथ पर खड़ा महा-दंडी अपनी भारी गदा को हवा में उठाए हुए था:
"मर जा, शमशानेश्वर! आज तेरे खून से इस चक्रतीर्थ का अंतिम तर्पण होगा!"
"महा-दंडी!"
श्मशान के सन्नाटे को फाड़ती हुई रुद्र की सिंह-गर्जना गूंज उठी।
रुद्र ने जीप की गति को 100 तक पहुंचा दिया। उसने जीप का स्टीयरिंग सीधे उस तांत्रिक रथ की ओर मोड़ दिया और एक्सीलेटर को फर्श तक दबा दिया!
बूमssss! कड़ाssssक!
महिन्द्रा थार जीप का भारी फौलादी बंपर सीधे उस तांत्रिक रथ के अगले पहियों और उन चारों जलते हुए सांडों के पैरों से पूरी ताकत से जा टकराया!
टक्कर इतनी भयानक थी कि रथ के आगे जुते हुए दो सांड हवा में उछलकर दूर शिप्रा के पानी में जा गिरे। रथ का सोने और हड्डियों का ढांचा चरमराकर एक तरफ पलट गया।
महा-दंडी का वह बारह फीट ऊंचा भीमकाय शरीर रथ से उछलकर सीधे श्मशान के उस विशाल, पथरीले चबूतरे पर आ गिरा।
रुद्र जीप की टूटी हुई खिड़की से बाहर कूदा।
उसके एक हाथ में वह महाकाल के कोटि-तीर्थ के अमृत-जल का कलश था और दूसरे हाथ में काल-भैरव खड्ग।
वह तेजी से दौड़कर बाबा शमशानेश्वर के पास पहुंचा। उसने बाबा के सिर को अपने घुटनों पर रखा।
"बाबा! मैं आ गया... महाकाल का अमृत-जल मेरे पास है!" रुद्र ने रुंधे हुए गले से कहा।
बाबा शमशानेश्वर ने अपनी आधी खुली आंखों से रुद्र को देखा। उनके होंठों पर एक अत्यंत तृप्त, विजयी मुस्कान तैर गई।
"रुद्र... देर मत कर..." बाबा के मुंह से खून का कतरा बह निकला। उन्होंने कांपती उंगली से अखाड़े की उस मुख्य, बुझती हुई 'अघोर धूनी' की ओर इशारा किया।
"इस अमृत-जल को सीधे उस धूनी में उड़ेल... और जब धूनी से महाकाल की वह 'रुद्र-ज्वाला' प्रस्फुटित हो... तो अपने खड्ग से सीधे उस पापी के ललाट के उस तीसरे नेत्र पर प्रहार कर... जा रुद्र... इस 1000 साल के पाप को राख बना दे!"
इन अंतिम शब्दों के साथ बाबा शमशानेश्वर की आंखें शांत हो गईं। उनके प्राण महाकाल के चरणों में विलीन हो गए।
"बाबा!" रुद्र की आंखों से आंसुओं की दो बूंदें टपकीं और उसके गाल पर जमे खून को धोती हुई नीचे गिर गईं।
लेकिन उस शोक को रुद्र ने तुरंत अपने भीतर एक प्रचंड, संहारक क्रोध में बदल लिया।
सामने मलबे के बीच से वह बारह फीट ऊंचा कापालिक दैत्य—महा-दंडी उठ खड़ा हुआ था।
उसकी गदा टूट चुकी थी, लेकिन उसके चारों हाथों में अब चार जलते हुए तांत्रिक त्रिशूल प्रकट हो चुके थे। उसकी छाती पर वह 'चौसठ योगिनी महा-चक्र' पागलों की तरह घूम रहा था।
"तूने मेरा रथ तोड़ा, कीड़े!" महा-दंडी अपने भारी, जलते हुए कदमों के साथ रुद्र की ओर बढ़ा। "अब इस पूरे श्मशान की राख में तेरा नामो-निशान भी नहीं मिलेगा!"
महा-दंडी ने अपने चारों त्रिशूलों से एक साथ रुद्र पर लावे और काले विषैले तीरों की बौछार कर दी।
रुद्र अपनी जगह से हिला भी नहीं।
उसने अपने दोनों हाथों से उस तांबे के कलश को उठाया, जिसके भीतर महाकाल के कोटि-तीर्थ का वह पावन अमृत-जल भरा हुआ था।
रुद्र ने अपने कंठ की संपूर्ण शक्ति से महामृत्युंजय और कालभैरव गायत्री का एक साथ उद्घोष किया:
"ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ फट्... ॐ नमो महाकालाय स्वाहा!"
रुद्र ने अपनी पूरी आत्मा की शक्ति झोंकते हुए उस कलश के संपूर्ण अमृत-जल को सीधे उस मुख्य 'अघोर धूनी' के दहकते हुए अंगारों पर पलट दिया!
छनन्नन... भभकssss! बूम!
जैसे ही महाकाल के कोटि-तीर्थ का वह पावन अमृत-जल उस श्मशान-धूनी की पवित्र अग्नि से मिला, एक ऐसा अकल्पनीय, ब्रह्मांडीय महा-विस्फोट हुआ जिसने पूरे चक्रतीर्थ श्मशान को एक सेकंड में दूधिया-सफेद और स्वर्णिम दिव्य अग्नि से नहला दिया!
धूनी से एक हजार सूर्यों जैसी प्रचंड, शीतल और संहारक 'रुद्र-ज्वाला' का एक गगनचुंबी स्तंभ फूटा!
वह ज्वाला किसी पवित्र सुनामी की तरह फैली।
शिप्रा के पानी से निकलीं वे चौंसठ जल-योगिनियां उस प्रकाश के स्पर्श होते ही अपने पाषाण-बंधनों से मुक्त होकर शांत हो गईं, और वे सैकड़ों श्मशान-पिशाच उस दिव्य अग्नि में जलकर एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गए।
महा-दंडी का वह बारह फीट ऊंचा अभेद्य शरीर उस रुद्र-ज्वाला के ताप से झुलसने लगा।
"आaaaaah! यह अग्नि... यह महाकाल की साक्षात दृष्टि है!" महा-दंडी दर्द से छटपटाने लगा। उसकी त्वचा की खुरदरी छाल फटने लगी।
रुद्र ने एक सेकंड भी व्यर्थ नहीं किया।
उसने अपनी कमर से उस काल-भैरव खड्ग को उठाया और सीधे उस धधकती हुई रुद्र-ज्वाला के भीतर से होकर हवा में बीस फीट ऊंची छलांग लगा दी!
उसका खड्ग अब साक्षात सूर्य की किरण बन चुका था।
वह हवा में उड़ता हुआ सीधे महा-दंडी के विशाल कंधे के ऊपर पहुंचा।
रुद्र ने अपनी कलाई की घड़ी पर अंतिम नजर डाली।
समय हो रहा था—रात के 02:50:00 AM!
अंतिम काल-प्रहर में केवल दस मिनट बाकी थे!
रुद्र ने अपने दोनों हाथों से उस जलते हुए काल-भैरव खड्ग को थामा और अपनी पूरी दैवी शक्ति से सीधे महा-दंडी के ललाट के ठीक मध्य में स्थित उस तीसरे तांत्रिक पाताल-नेत्र पर वार करने के लिए नीचे की ओर झोंक दिया!
लेकिन ठीक उसी समय...
जब खड्ग की नोक महा-दंडी के ललाट से केवल दो इंच दूर थी, महा-दंडी ने अपने गले में लटकी उस 108 नरमुंडों की जीवित माला को हवा में उछाल दिया!
चर्रर्र... कटकटाssssहट!
वे 108 नरमुंड हवा में अलग-अलग होकर उड़ने लगे और उन्होंने 108 जलते हुए प्रेत-मुखों का एक ऐसा चक्रव्यूह बना लिया जिसने हवा में ही रुद्र के दोनों हाथों, पैरों और उसकी गर्दन को चारों तरफ से जकड़ लिया!
रुद्र हवा में ही स्थिर जम गया!
और नीचे खड़े महा-दंडी का वह विशाल, जलता हुआ पाषाण-त्रिशूल सीधे रुद्र के खुले हुए सीने की ओर पूरी ताकत से उठने लगा...
"तेरा खेल समाप्त हुआ, रुद्र!" महा-दंडी की भयानक आवाज गूंजी...
क्या रुद्र इस 108 प्रेतों के चक्रव्यूह को तोड़ पाएगा... या महाकाल की इस पावन नगरी में उसकी अंतिम सांसें थम जाएंगी?
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 14: 108 नरमुंडों का संहार, महा-दंडी का अंतिम पतन और उज्जैन के 84 महादेवों का महा-मोक्ष।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप · सभी भाग →