PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 14: 108 नरमुंडों का संहार, महा-दंडी का अंतिम पतन और उज्जैन के 84 महादेवों का महा-मोक्ष

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 10 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
14 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
10 min
Words
1938
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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चक्रतीर्थ श्मशान के उस खूनी आकाश में समय का हर एक सेकंड किसी जलते हुए शीशे की तरह पिघल रहा था।
हवा में बीस फीट की ऊंचाई पर लटके रुद्र के चारों ओर उन 108 जलते हुए नरमुंडों के जबड़े इतनी क्रूरता से भींच चुके थे कि उसकी त्वचा से रक्त की सैकड़ों महीन फुहारें छूट रही थीं। वे नरमुंड केवल कंकाल नहीं थे; वे पिछले एक हजार वर्षों में कापालिक अघोरेश्वर महा-दंडी द्वारा बलि चढ़ाए गए उन 108 अभागे तांत्रिक साधकों की प्रेत-खोपड़ियां थीं, जिन्हें महा-दंडी ने काले जादू के पाश में बांधकर अपना रक्षा-कवच बना लिया था।
कटकटाssssहट! चर्रर्र!
वे 108 खोपड़ियां एक साथ अपने दांत पीस रही थीं। उनकी खाली, अंगारे जैसी आंखों से निकलती विषैली नीली आग रुद्र के दोनों बाजुओं, पैरों और उसकी रीढ़ की हड्डी को सुन्न कर रही थी।
और नीचे से...
वह बारह फीट ऊंचा प्राचीन कापालिक दैत्य—महा-दंडी—अपने दोनों विशाल पाषाण-त्रिशूलों को हवा में तान चुका था। त्रिशूलों के भालों पर धधकती हुई पाताल-ज्वाला सीधे रुद्र के सीने के आर-पार उतरने के लिए केवल तीन फीट की दूरी पर थी।
"मर जा, विद्याधर के कीड़े!"
महा-दंडी का वह भयानक, दाढ़ी वाला चेहरा किसी साक्षात यमराज की तरह विकृत हो चुका था।
"आज की इस रात, इस चक्रतीर्थ के श्मशान में तेरे रक्त की अंतिम बूंद पीकर मेरी यह 1000 साल की पाताल-साधना सदा-सदा के लिए अमर हो जाएगी!"
रुद्र हवा में जकड़ा हुआ था। उसके हाथ में मौजूद उस अष्टधातु के 'काल-भैरव खड्ग' की धार भी उन 108 खोपड़ियों के सामूहिक तांत्रिक दबाव से थरथरा रही थी।
कलाई की घड़ी ने समय दर्शाया—रात के 02:53:15 AM!
अंतिम काल-प्रहर (03:00 AM) में केवल छह मिनट और पैंतालीस सेकंड शेष थे!
यदि 03:00 बजे से पहले महा-दंडी का वह तीसरा पाताल-नेत्र नहीं फूटा, तो चौरासी महादेवों का वह आकाशीय रक्षा-कवच टूट जाएगा और संपूर्ण मालवा अंचल पाताल के उस खौलते लावे में समा जाएगा।
रुद्र ने अपनी आंखें बंद कीं।
उसने अपने शरीर के असहनीय दर्द, उन 108 खोपड़ियों के नुकीले दांतों की चुभन और अपनी बहती हुई रक्त-धारा को अपनी चेतना से पूरी तरह अलग कर दिया। उसने अपने मन को अपनी छाती के ठीक केंद्र में—जहाँ उसकी कुल-देवी 'मां रक्त-दंतिका भैरवी' की 200 साल पुरानी सिद्ध अष्टधातु की मूर्ति बंधी थी—वहां एकाग्र कर दिया।
रुद्र ने अपने अंतर्मन के सबसे गहरे तल से अपनी कुल-देवी का आह्वान किया:
"हे मां रक्त-दंतिका! हे श्मशान-वासिनी कुल-तारिणी! यदि मेरे पूर्वज विद्याधर शास्त्री ने तुम्हारी सेवा में अपना जीवन समर्पित किया था... यदि काशी के मणिकर्णिका से लेकर इस शिप्रा के तट तक मेरा संकल्प पवित्र है... तो जागो मां! इस आसुरी पाश का संहार करो!"
जैसे ही रुद्र के अंतर्मन का यह अंतिम समर्पण पूर्ण हुआ, एक ऐसा महा-चमत्कार घटा जिसने चक्रतीर्थ के पूरे आकाश को स्तब्ध कर दिया।
रुद्र की छाती पर बंधी वह छोटी सी अष्टधातु की मूर्ति अचानक एक सूर्य की तरह प्रज्वलित हो उठी।
छनन्नन... भभकssss!
मूर्ति के मस्तक पर स्थित उस सूक्ष्म त्रिनेत्र से साक्षात आदि-शक्ति की रक्त-ज्वाला का एक ऐसा प्रचंड, गगनभेदी महा-विस्फोट हुआ जिसने उन 108 नरमुंडों के जबड़ों को एक ही सेकंड में लोहे की तरह तपा दिया।
हवा में एक साक्षात महा-काली की दहाड़ गूंज उठी।
उस दिव्य तेज के स्पर्श होते ही वे 108 नरमुंड असहनीय पीड़ा से चीख उठे।
कड़ाक! कड़ाक! तड़-तड़-तड़!
उन सभी 108 खोपड़ियों की हड्डियां पटाखों की तरह फटने लगीं। उनका 1000 साल पुराना तांत्रिक बंधन एक ही झटके में जलकर राख हो गया।
वे खोपड़ियां रुद्र के शरीर को छोड़कर हवा में ही सफेद धूल बनकर बिखर गईं।
रुद्र हवा में पूरी तरह स्वतंत्र हो गया!
नीचे खड़े महा-दंडी के चेहरे पर पहली बार अगाध, सच्चा और अमानवीय खौफ छा गया। उसकी तीनों सुलगती आंखें अविश्वास से फैल गईं।
"नहीं! यह शक्ति... यह साधारण मनुष्य की नहीं हो सकती!" महा-दंडी चिल्लाया।
उसने अपने दोनों त्रिशूलों को पूरी ताकत से ऊपर की ओर फेंका ताकि रुद्र को हवा में ही छलनी किया जा सके।
लेकिन रुद्र अब नीचे गिरते हुए किसी बाज की गति से भी दस गुना तेज हो चुका था।
उसने हवा में अपने शरीर को एक परिक्रमा दी। उसके दोनों हाथों ने उस दहकते हुए काल-भैरव खड्ग को थाम लिया, जिसके भालों पर महाकाल के उस कोटि-तीर्थ की अमृत-अग्नि नाच रही थी।
रुद्र ने अपने दोनों पैरों को महा-दंडी के दोनों त्रिशूलों के डंडों पर जमाया, उन्हें एक ही झटके में नीचे की ओर दबा दिया, और अपने खड्ग की नोक को सीधे उस बारह फीट ऊंचे दैत्य के ललाट के ठीक मध्य में स्थित उस तीसरे 'पाताल-नेत्र' पर पूरी दैवी शक्ति से झोंक दिया!
कड़ाssssक! चर्रर्र!
अष्टधातु का वह सिद्ध खड्ग महा-दंडी की खोपड़ी के पत्थर जैसे सख्त ललाट और उस तीसरे नेत्र को चीरता हुआ उसकी खोपड़ी के पीछे तक उतर गया!
उस प्रहार का प्रभाव ऐसा था मानो किसी ने चलते हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर महा-वज्र का प्रहार कर दिया हो।
"आaaaaah! महाकाल... मेरी समाधि... मेरा अमरत्व!"
महा-दंडी के मुख से निकली अंतिम चीख शिप्रा नदी के उस काले जल को चीरती हुई पाताल लोक की गहराइयों तक गूंज उठी।
उसके ललाट के उस फूटे हुए तीसरे नेत्र से कोई रक्त नहीं निकला; बल्कि 1000 वर्षों से संचित काला लावा, पिघला हुआ तांबा और सड़े हुए गंधक का एक विशाल फव्वारा छूटा। उस विषैले लावे की गर्मी से श्मशान के पत्थर तड़कने लगे।
लेकिन रुद्र रुका नहीं।
उसे अपने परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की उस डायरी का अंतिम गोपनीय श्लोक याद था:
"जब तक उस कापालिक की छाती पर जड़ा वह 'चौसठ योगिनी महा-चक्र' खंडित नहीं होगा... उसकी आत्मा पाताल से नया शरीर खींचती रहेगी!"
रुद्र ने खड्ग को ललाट से खींचा। वह महा-दंडी के विशाल कंधे से नीचे की ओर फिसला।
और हवा में घूमते हुए उसने अपने खड्ग की पूरी धार से महा-दंडी की चौड़ी छाती पर जड़े उस धधकते हुए 'चौसठ योगिनी महा-चक्र' पर एक तिरछा, प्रचंड प्रहार कर दिया!
तड़ाक... खनन्नन!
सोने और हड्डियों से बना वह 1000 साल पुराना तांत्रिक महा-चक्र दो टुकड़ों में कटकर नीचे पत्थरों पर गिर पड़ा।
चक्र के कटते ही महा-दंडी के उस बारह फीट ऊंचे भीमकाय शरीर का संतुलन पूरी तरह समाप्त हो गया।
उसकी नसों में दौड़ता हुआ वह पाताल-लावा अंदर ही अंदर विस्फोटित होने लगा। उसकी चमड़ी जलकर काली राख बनने लगी, उसकी पसलियां टूटकर बिखरने लगीं।
धड़ाम!
महा-दंडी का वह विशालकाय शरीर सीधे उस अखाड़े की जलती हुई 'अघोर धूनी' के दहकते हुए अंगारों के ऊपर जा गिरा!
धूनी में पहले से ही महाकाल के कोटि-तीर्थ का अमृत-जल समर्पित था।
जैसे ही वह पापी शरीर उस अमृत-अग्नि से टकराया, धूनी से सौ फीट ऊंची दूधिया-सफेद और स्वर्णिम लपटें उठीं। उस दिव्य अग्नि ने महा-दंडी के उस 1000 साल पुराने कापालिक शरीर को महज दस सेकंड के भीतर पूरी तरह जलाकर सफेद और काली राख के एक छोटे से ढेर में तब्दील कर दिया!
उसका नाम, उसका अहंकार और उसका 1000 साल पुराना काला जादू सदा-सदा के लिए भस्म हो चुका था।
घड़ी ने ठीक तीन बजाए—03:00:00 AM!
अंतिम काल-प्रहर की अंतिम सीमा पर विजय प्राप्त हो चुकी थी।
और ठीक उसी पल, चक्रतीर्थ श्मशान और पूरी अवंतिका नगरी में एक ऐसा महा-चमत्कार घटा जिसे देखकर किसी भी साधक की आंखें श्रद्धा से नम हो जाएं।
शिप्रा नदी का वह स्थिर, काला और जमा हुआ जल... अचानक एक मधुर, कलकल ध्वनि के साथ अपनी स्वाभाविक गति से बहने लगा!
नदी के पानी पर तैरती हुई वे सैकड़ों काली मटकियां और उल्टे तांबे के त्रिशूल जल की पवित्र धारा में विलीन होकर गायब हो गए।
श्मशान की उन चौरासी चिता-वेदियों पर जलती हुई वह भयानक, अप्राकृतिक नीली और खूनी-लाल आग अपने आप शांत हो गई। चिताओं से अब केवल पवित्र, मंद-मंद धुआं उठ रहा था।
उज्जैन के आकाश पर बना वह 84 महादेवों का आकाशीय रक्षा-कवच अब एक कोमल, स्वर्णिम चांदनी की तरह पूरे शहर पर अमृत की वर्षा कर रहा था।
तभी, अखाड़े की उस जलती हुई धूनी के ऊपर हवा में एक अत्यंत शांत, तेजस्वी और प्रकाशमान आकृति प्रकट हुई।
वह थे—अघोरी शमशानेश्वर!
बाबा शमशानेश्वर का सूक्ष्म-शरीर अब किसी घाव या पीड़ा से ग्रस्त नहीं था। वे एक सिद्ध, मुक्त महा-अघोरी के रूप में साक्षात विक्रांत भैरव के चरणों के पास हवा में तैर रहे थे।
उनके चेहरे पर एक असीम, दिव्य वात्सल्य था।
उन्होंने अपना हाथ उठाकर नीचे घुटनों के बल बैठे, लहूलुहान रुद्र के सिर पर रखा।
"साधु वत्स! आयुष्मान भव!"
बाबा शमशानेश्वर की आवाज किसी मधुर शंख-नाद की तरह रुद्र के अंतर्मन में उतरी।
"तूने केवल अपने पूर्वजों का ऋण नहीं चुकाया... तूने इस अवंतिका, इस शिप्रा और संपूर्ण भारतवर्ष के तंत्र-मंडल को उस 1000 साल पुराने अंधकार से मुक्त करा दिया। मेरा यह नश्वर चोला छूटा, लेकिन मेरी आत्मा अब सदा के लिए इस चक्रतीर्थ के भैरव-चरणों में लीन हो गई है।"
बाबा शमशानेश्वर ने धूनी की उस राख की ओर इशारा किया जहाँ महा-दंडी का शरीर भस्म हुआ था।
"परंतु सावधान रुद्र... यह युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। तंत्रेश्वर और महा-दंडी तो केवल उस महा-अंधकार के सेनापति थे। उस राख के ढेर के भीतर देख... वहां वह गुप्त ग्रंथ छिपा है जो इस 25 भागों की महा-साधना के अंतिम और सबसे बड़े रहस्य का द्वार खोलेगा!"
इन अंतिम वचनों के साथ, बाबा शमशानेश्वर की वह दिव्य आत्मा प्रकाश की एक सुंदर रेखा बनकर शिप्रा के आकाश और मोक्ष के परम धाम की ओर विलीन हो गई।
रुद्र ने अपने दोनों हाथ जोड़कर उस पावन आत्मा को अंतिम नमन किया।
रात के करीब साढ़े तीन बज रहे थे।
रुद्र लड़खड़ाते हुए उस धूनी के चबूतरे के पास पहुंचा। उसने अपने काल-भैरव खड्ग की नोक से उस महा-दंडी की राख के ढेर को धीरे से हटाया।
राख के ठीक मध्य में, जहाँ महा-दंडी का हृदय जला था, एक अत्यंत भारी, प्राचीन और काले-तांबई रंग की धातु की जिल्द वाला ग्रंथ सुरक्षित रखा था!
अग्नि की इतनी भीषण लपटों के बावजूद उस ग्रंथ का एक कोना भी नहीं जला था।
रुद्र ने झुककर उस ग्रंथ को अपने हाथों में उठाया।
ग्रंथ की धातुई जिल्द पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था:
'अघोर भैरवी कल्प — महा-पाताल खंड'
रुद्र ने उस ग्रंथ का पहला पृष्ठ खोला।
पृष्ठ पर खून और सिंदूर के ताजे बीजाक्षरों से जो सत्य लिखा था, उसने रुद्र के पैरों तले की जमीन एक बार फिर हिला दी।
ग्रंथ में लिखा था:
"काशी का मणिकर्णिका, विंध्याचल की लोह-गढ़ कंदरा और उज्जैन का चक्रतीर्थ... ये तीनों केवल 'त्रिकोण' के तीन बाहरी कोने थे। चौसठ योगिनियों का मूल, अनादि सिंहासन न तो काशी में है, न विंध्याचल में और न ही मालवा में... वह भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर, असम और तिब्बत के दुर्गम हिमालयी शिखरों के बीच स्थित उस वर्जित महा-तीर्थ में दफन है जिसे 'महा-कपाल कुंड' (The Primordial Nether-Altar) कहा जाता है! जब तक उस महा-कुंड में 'रक्त भैरवी' का अंतिम महा-तर्पण नहीं होगा... यह अभिशाप हर 100 वर्ष बाद नए रूप में जागता रहेगा!"
रुद्र ने एक गहरी, लंबी सांस ली।
वह समझ गया कि उसका यह सफर अभी समाप्त नहीं हुआ था; वह अब अपनी इस 25 भागों की महा-यात्रा के अंतिम, सर्वोच्च और सबसे खतरनाक पड़ाव—'महा-कपाल खंड' के मुहाने पर खड़ा था।
रुद्र ने उस प्राचीन ग्रंथ को अपने झोले में सुरक्षित रखा।
उसने अपनी कुल-देवी की मूर्ति को अपने सीने से लगाया और काल-भैरव खड्ग को अपनी कमर में कस लिया।
वह चक्रतीर्थ श्मशान की सीढ़ियों को पार करके बाहर सड़क पर खड़ी अपनी महिन्द्रा थार जीप के पास पहुंचा।
भोर के करीब चार बज रहे थे।
पूर्व दिशा के क्षितिज पर पौ फटने लगी थी और उज्जैन के महाकाल मंदिर से भस्म-आरती के पहले शंखों की दिव्य गूंज वातावरण में तैरने लगी थी।
लेकिन जैसे ही रुद्र ने अपनी जीप का दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, उसके कदम अचानक वहीं जम गए।
जीप की पिछली सीट पर...
अंधेरे में एक साया पहले से ही चुपचाप बैठा हुआ था!
उसने काले रंग का लंबा अघोरी लबादा पहन रखा था, उसका चेहरा हुड के भीतर छुपा था, और उसके दोनों हाथों में वही जानी-पहचानी, पुरानी नीम की लकड़ी की लाठी थी... जो काशी के अघोरी बालकनाथ की पहचान थी!
उस साए ने धीरे-धीरे अपना हुड पीछे किया।
हुड के पीछे से जो चेहरा बाहर निकला, उसने रुद्र के दिल की धड़कनें एक सेकंड के लिए रोक दीं...
वह कौन था?
क्या वह साक्षात अघोरी बालकनाथ थे... या पाताल के किसी नए, अंतिम षड्यंत्र का कोई भयानक दूत?
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 15: रहस्यमयी आगंतुक का पर्दाफाश, तिब्बत सीमा का महा-कपाल कुंड और अंतिम युद्ध की पूर्व-पीठिका।

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