PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

​भाग 15: रहस्यमयी आगंतुक का पर्दाफाश, तिब्बत सीमा का महा-कपाल कुंड और अंतिम युद्ध की पूर्व-पीठिका

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
15 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
14 min
Words
2785
Language
Hindi (हिंदी)
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​उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान के उस वीरान, मटमैले मुहाने पर भोर की पहली ठंडी किरणें शिप्रा के शांत जल पर हल्के-हल्के कांप रही थीं।
​महाकालेश्वर मंदिर के विशाल शिखरों से गूंजते भस्म-आरती के शंखों और डमरूओं का नाद धीरे-धीरे शांत हो चुका था, लेकिन हवा में अब भी उस एक हजार वर्ष पुराने कापालिक अघोरेश्वर महा-दंडी के जलने से उठी भस्म, कपूर और गंधक की तीखी, नशीली सुगंध तैर रही थी। रात का वह प्रलयंकारी तांडव अब शांत हो चुका था, लेकिन उस शांति के भीतर एक ऐसी गहरी, डरावनी नीरवता पसरी थी मानो पूरी अवंतिका नगरी किसी आने वाले महा-तूफान से पहले अपनी सांसें रोके खड़ी हो।
​रुद्र का हाथ जीप के हैंडल पर ही जड़वत हो चुका था।
​उसकी दाहिनी हथेली अनजाने ही अपनी कमर में बंधे उस अष्टधातु के 'काल-भैरव खड्ग' की मूठ पर जा टिकी थी। उसकी पसलियों में रात के युद्ध के कारण अब भी गहरी टीस उठ रही थी और उसका बायां कंधा खून से सने कपड़े के नीचे जल रहा था।
​जीप की पिछली सीट के घने अंधकार में वह साया बिल्कुल स्थिर, मौन और गतिहीन बैठा था।
​उसके पूरे शरीर पर श्मशान की सूखी भस्म से रंगा हुआ एक लंबा, काला अघोरी लबादा लिपटा हुआ था। उसका भारी हुड आगे की ओर इतना झुका था कि उसका चेहरा पूरी तरह अंधकार में डूबा हुआ था। और उसके दोनों हाथों ने काशी के पूज्य संत अघोरी बालकनाथ की उसी परिचित, पुरानी नीम की लाठी को अपनी छाती से सटाकर अत्यंत आदर से थाम रखा था।
​"कौन हो तुम?" रुद्र की आवाज में श्मशान की भस्म जैसा एक तीखा, संहारक ठहराव था। "बाबा बालकनाथ की यह लाठी तुम्हारे हाथों में कैसे आई? यदि पाताल का कोई नया छलावा हो, तो सावधान रहना... महाकाल की इस पावन धरती पर तुम्हारा यह चोला भी राख बन जाएगा!"
​पिछली सीट पर बैठे उस साए के होंठों से एक बहुत धीमी, कोमल लेकिन अगाध तांत्रिक तेज से भरी हंसी फूटी।
​उस हंसी में कोई आसुरी घुरघुराहट या पिशाची उन्माद नहीं था; उसमें गंगाजल जैसी पावन, निर्मल और सात्विक ध्वनि थी।
​उस साए ने अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाया और बहुत धीरे से अपने चेहरे पर पड़ा वह काला हुड पीछे की ओर खिसका दिया।
​हुड के पीछे से जो चेहरा बाहर निकला, उसे देखकर रुद्र के हाथ की पकड़ खड्ग पर अपने आप ढीली पड़ गई।
​वह कोई पुरुष अघोरी नहीं था।
​वह लगभग पच्चीस-छब्बीस वर्ष की एक अत्यंत रूपवती, तेजस्वी और अघोर संन्यासिन थी। उसका वर्ण कुंदन जैसा दमक रहा था, लेकिन उसके पूरे चेहरे, गले और खुली बांहों पर श्मशान की ताजी, सफेद भस्म का त्रिपुंड खिंचा हुआ था। उसकी काली, घनी जटाएं किसी शांत नागिन की तरह उसकी पीठ पर बंधी थीं और उसके माथे के ठीक मध्य में ताजे सिंदूर और कस्तूरी से बना एक दिव्य 'भैरवी चक्र' दमक रहा था।
​उसकी दोनों बड़ी, कजरारी आंखों में न कोई मानवीय भय था, न कोई सांसारिक मोह; उन आंखों में साक्षात महाकाली का वह असीम, शांत और अंतस को भेद देने वाला तेज विद्यमान था जिसे देखकर किसी भी साधक की दृष्टि श्रद्धा से झुक जाए।
​रुद्र ने अपने खड्ग को धीरे-धीरे अपनी कमर के बंध में वापस खोंसा। उस संन्यासिन के चारों ओर एक ऐसी अत्यंत पवित्र, सात्विक और साथ ही उग्र अघोर-ऊर्जा का प्रभामंडल था, जो किसी भी पाताल के छल में असंभव था।
​"प्रणाम, रुद्र प्रताप सिंह," उसकी आवाज किसी शांत वीणा के तार जैसी गूंजी। "संशय त्याग दो। मेरा नाम तारा है। काशी के अस्सी घाट पर जिस अघोरी बालकनाथ ने तुम्हें भस्म-कवच देकर विंध्याचल के महा-अरण्य में भेजा था, मैं उन्हीं की मानस-पुत्री और अघोर पीठ की अंतिम शिष्या हूँ।"
​तारा ने अपनी गोद में रखी उस पुरानी नीम की लाठी को बहुत आदर से छुआ। उसकी आंखों में एक क्षण के लिए एक पवित्र उदासी उभरी, जो तुरंत एक दृढ़ संकल्प में बदल गई।
​"जब तुम काशी से विंध्य और नर्मदा के इस खूनी सफर पर निकले थे, तभी बाबा बालकनाथ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख लिया था कि उज्जैन के चक्रतीर्थ में बाबा शमशानेश्वर का नश्वर चोला छूट जाएगा। बाबा बालकनाथ ने कल रात ठीक उसी समय काशी में अपना भौतिक शरीर स्वेच्छा से त्याग दिया, जब यहाँ चक्रतीर्थ में महा-दंडी का रथ जला था।"
​"बाबा बालकनाथ ने... शरीर त्याग दिया?" रुद्र का गला रुंध गया।
​काशी का वह अंधा, लाठी टेकने वाला वृद्ध संत, जिसने मणिकर्णिका की उस भयानक रात में रुद्र को अपनी छाती से लगाकर जीवन-दान दिया था... वह अब इस भौतिक संसार में नहीं था।
​"शोक मत करो, रुद्र," तारा ने शांत स्वर में कहा। "अघोरी कभी मरते नहीं हैं। वे केवल अपनी इस हाड़-मांस की देह को त्यागकर अपने इष्टदेव महाकाल के अनंत श्वास में विलीन हो जाते हैं। बाबा बालकनाथ ने अपने महा-प्रयाण से पूर्व अपनी यह तपो-लाठी मुझे सौंपी थी। यह केवल एक नीम की लकड़ी नहीं है, रुद्र; यह अघोर पंथ की वह 'काल-दण्ड शक्ति' है जो 1840 में तुम्हारे परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री के समय से श्मशान की मर्यादा को बांधे हुए है। बाबा ने मुझे आदेश दिया था कि जैसे ही चक्रतीर्थ में महा-दंडी की राख ठंडी हो, मैं तुम्हारी इस जीप में उपस्थित रहूँ... क्योंकि अब आगे का मार्ग कोई साधारण मनुष्य अकेले तय नहीं कर सकता।"
​तारा की दृष्टि सीधे रुद्र के झोले में रखे उस भारी, काले-तांबई धातु वाले ग्रंथ पर जा टिकी—'अघोर भैरवी कल्प — महा-पाताल खंड'।
​"तुमने महा-दंडी की भस्म से वह ग्रंथ निकाल लिया है, रुद्र?" तारा ने पूछा।
​"हाँ," रुद्र ने झोले से वह भारी ग्रंथ निकाला और जीप के डैशबोर्ड पर रख दिया। "इस ग्रंथ के पहले पन्ने ने जो रहस्य उजागर किया है, उसने मेरे सारे तर्कों को हिलाकर रख दिया है, तारा। अब तक मैं समझ रहा था कि कापालिक तंत्रेश्वर और उसका गुरु महा-दंडी ही इस अभिशाप के जनक थे। लेकिन यह ग्रंथ कहता है कि काशी, विंध्याचल और उज्जैन... ये तीनों केवल एक बाहरी त्रिकोण थे। चौसठ योगिनियों का मूल, अनादि सिंहासन कहीं और है!"
​तारा ने उस ग्रंथ के धातुई आवरण पर अपनी उंगली से एक सूक्ष्म भैरवी-मुद्रा बनाई।
​ग्रंथ के पन्ने अपने आप फड़फड़ाए और उस नक्शे पर जाकर रुक गए जो रक्त और सिंदूर से उकेरा गया था।
​"ग्रंथ का एक-एक अक्षर सत्य है, रुद्र," तारा ने अत्यंत गंभीर स्वर में समझाना शुरू किया। "आज से ठीक एक हजार वर्ष पूर्व, जब महा-दंडी ने इस पृथ्वी पर अपना काला जादू फैलाया था, तो उसने तंत्र की उस सबसे आदिम, वर्जित शक्ति को जाग्रत किया था जिसे वेदों में 'रक्त-भैरवेंद्र' (The Primordial Nether-Lord) कहा गया है। वह कोई साधारण भूत या पिशाच नहीं है; वह सृष्टि के सृजन से पहले फैले उस अंधकार का जीवित, भूखा अंश है जो पृथ्वी के पाताल-गर्भ में समाया हुआ है।"
​तारा ने नक्शे के उस सुदूर, उत्तर-पूर्वी कोने की ओर इशारा किया जहाँ भारत, भूटान और तिब्बत की सीमाएं एक अत्यंत संकरे, बीहड़ और हिमाच्छादित गर्त में जाकर मिलती थीं।
​"यह स्थान है—'महा-कपाल कुंड' (The Primordial Nether-Altar)," तारा की आवाज में एक गहरा, कंपकपा देने वाला खौफ था।
​"यह पूर्वोत्तर के उन शापित जंगलों में स्थित है जिन्हें प्राचीन तिब्बती और तांत्रिक ग्रंथों में 'काल-द्रोण घाटी' कहा गया है। तंत्रेश्वर और महा-दंडी के भस्म होने के बाद, उनकी बची हुई सारी आसुरी चेतना और चौसठ योगिनियों की वह अशुद्ध ऊर्जा सीधे उस महा-कपाल कुंड के भीतर खिंच चुकी है। वहां पाताल का वह आदि-असुर अपने पूर्ण प्रलयंकारी रूप में बाहर आने के लिए छटपटा रहा है। यदि आज से ठीक सात दिन बाद आने वाली 'कार्तिक पूर्णिमा' की मध्यरात्रि तक हम उस महा-कुंड तक नहीं पहुंचे... तो उस कुंड से निकलने वाला रक्त-लावा पूरे हिमालय को पिघला देगा और इस धरती का कोई भी प्राणी जीवित नहीं बचेगा!"
​रुद्र ने अपने घायल बाएं कंधे को देखा। उसकी बांह में सूजन आ चुकी थी और रीढ़ की हड्डी में हर सांस के साथ असहनीय टीस उठ रही थी।
​"हमारे पास केवल सात दिन हैं, तारा," रुद्र ने कहा। "और उज्जैन से पूर्वोत्तर की उस काल-द्रोण घाटी की दूरी कम से कम ढाई हजार किलोमीटर है। मेरा यह शरीर..."
​तारा ने अपनी जटाओं से एक छोटी सी, प्राचीन चांदी की डिबिया निकाली।
​उसने डिबिया खोली। उसके भीतर एक अत्यंत सुगंधित, हरे और सुनहरे रंग का लेप रखा था, जिसकी खुशबू से पूरी जीप एक ही पल में किसी हिमालयी उपवन की तरह महक उठी। वह मानसरोवर की दुर्लभ 'संजीवनी-अपामार्ग भस्म' थी।
​"अपनी आंखें बंद करो, रुद्र," तारा ने अत्यंत कोमल लेकिन आज्ञाकारी स्वर में कहा।
​रुद्र ने अपनी आंखें मूंद लीं।
​तारा ने अपनी हथेलियों में वह लेप लिया और रुद्र के घायल कंधे, उसकी झुलसी हुई हथेलियों और उसकी गर्दन पर जहां तंत्रेश्वर के नाखूनों के जलते हुए घाव थे, बहुत श्रद्धा और एकाग्रता से मलना शुरू किया।
​छनन्नन!
​जैसे ही तारा के हाथों का स्पर्श रुद्र के घावों से हुआ, रुद्र के पूरे शरीर में बिजली की एक अत्यंत शीतल, सुखद लहर दौड़ गई।
​असहनीय दर्द एक ही सेकंड में कपूर की तरह उड़ गया। रुद्र को ऐसा लगा मानो किसी ने अमृत की ठंडी धारा उसकी टूटी हुई हड्डियों और जली हुई नसों में प्रवाहित कर दी हो। उसकी त्वचा के सारे घाव पलक झपकते ही भर गए और उसकी बांह की वह हेयरलाइन फ्रैक्चर की हड्डी अपने आप जुड़कर लोहे जैसी मजबूत हो गई।
​रुद्र ने विस्मय से अपनी आंखें खोलीं। उसने अपने कंधे को घुमाकर देखा। वहां अब कोई दर्द नहीं था; केवल एक सुनहरी, हल्की सी रेखा बची थी।
​"अद्भुत... यह कैसा चमत्कार है तारा?" रुद्र ने कहा।
​"यह चमत्कार नहीं, अघोर की 'काया-कल्प विद्या' है, रुद्र," तारा ने मुस्कुराते हुए अपनी डिबिया बंद की। "तुम्हारा यह शरीर केवल तुम्हारा नहीं है; यह विद्याधर शास्त्री के उस 200 साल पुराने संकल्प का वाहन है। इस देह को अंतिम युद्ध तक टूटने की अनुमति नहीं है।"
​तारा जीप की अगली सीट पर, रुद्र के बगल में आकर बैठ गई। उसने बाबा बालकनाथ की उस नीम की लाठी को अपने दोनों घुटनों पर सीधा टिका लिया।
​"अब गाड़ी चलाओ, रुद्र," तारा ने पूर्व दिशा की ओर संकेत किया। "हमारा पहला पड़ाव मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा को पार करके सीधे असम और अरुणाचल की उस काल-द्रोण घाटी की तलहटी होगी। समय काल-सर्प की तरह अपनी जीभ लपलपा रहा है!"
​रुद्र ने थार जीप का इग्निशन ऑन किया।
​डीजल इंजन की भारी दहाड़ के साथ जीप चक्रतीर्थ श्मशान के पत्थरों को पीछे छोड़ती हुई सीधे हाईवे की ओर दौड़ पड़ी।
​अगले तीन दिन किसी निरंतर, थका देने वाले तांत्रिक दुस्वप्न की तरह बीते।
​रुद्र और तारा बिना रुके, दिन-रात जीप को दौड़ाते रहे। देवास, भोपाल, सागर, रीवा, बनारस के बाहरी बाईपास, बिहार के बक्सर, पटना, पूर्णिया और सिलीगुड़ी के संकरे चिकन-नेक कॉरिडोर को पार करते हुए जीप असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में प्रविष्ट हुई।
​रास्ते में अपशकुन लगातार बढ़ते जा रहे थे।
​जैसे-जैसे वे पूर्वोत्तर की ओर बढ़ रहे थे, दिन का उजाला छोटा होता जा रहा था और रातें अस्वाभाविक रूप से लंबी और डरावनी होती जा रही थीं। आसमान में लगातार सैकड़ों काले गिद्धों और चीलों का एक विशाल झुंड जीप के ठीक ऊपर-ऊपर चक्कर काट रहा था। जीप के रेडियो पर कोई भी सामान्य स्टेशन नहीं पकड़ रहा था; हर फ्रीक्वेंसी पर केवल 64 योगिनियों के घुंघरुओं की छनछनाहट और किसी खौलते हुए खून के कुंड की गड़गड़ाहट गूंज रही थी।
​चौथे दिन की शाम होते-होते जीप असम के गुवाहाटी और तेजपुर को पार करके अरुणाचल प्रदेश की उस अत्यंत बीहड़, रहस्यमयी सीमा पर पहुंच गई जहाँ से 'काल-द्रोण घाटी' का प्रतिबंधित पर्वतीय क्षेत्र शुरू होता था।
​यहाँ सड़कें पूरी तरह समाप्त हो चुकी थीं।
​सामने केवल नुकीले, काले पत्थरों, विशालकाय देवदार के पेड़ों और बर्फ के तूफानों से घिरा एक ऐसा दुर्गम पहाड़ खड़ा था जिसकी चोटियां बादलों के पार असीम अंधकार में विलीन हो रही थीं।
​शाम के करीब सात बज रहे थे जब जीप बर्फ के एक विशाल टीले के सामने आकर रुक गई। आगे गाड़ी का जाना असंभव था।
​रुद्र और तारा जीप से नीचे उतरे।
​बाहर का तापमान शून्य से पंद्रह डिग्री नीचे (-15°C) जा चुका था। हवा इतनी तेज थी कि वह सीधे हड्डियों को चीर रही थी।
​लेकिन सबसे भयावह बात यह थी कि आसमान से जो बर्फ गिर रही थी... वह सफेद नहीं थी!
​आसमान से गिरने वाले बर्फ के फाहे हल्के लाल और मटमैले रंग के थे! जमीन पर बिछी बर्फ की चादर ऐसी दिख रही थी मानो किसी ने सफेद कफन पर ताजा खून छिड़क दिया हो।
​"यह 'रक्त-हिम' है," तारा ने अपने काले लबादे के हुड को कसते हुए कहा। उसकी आवाज इस कड़ाके की ठंड में भी बिल्कुल स्थिर थी।
​"जब पाताल का कोई महा-असुर जागता है, तो आकाश के मेघ भी रक्त उगलने लगते हैं। हम काल-द्रोण घाटी के पहले चक्रव्यूह में प्रवेश कर चुके हैं।"
​रुद्र ने अपने कंधे पर चमड़े का झोला कसा, अपनी कमर में काल-भैरव खड्ग को जांचा और अपनी छाती पर बंधी कुल-देवी की उस अष्टधातु की मूर्ति को एक बार फिर स्पर्श किया।
​दोनों ने उन बर्फीली, खतरनाक और फिसलन भरी पहाड़ी पगडंडियों पर पैदल चढ़ना शुरू किया।
​पगडंडी के दोनों तरफ तिब्बती बौद्ध लामाओं और प्राचीन तांत्रिकों द्वारा बनाए गए पत्थरों के सैकड़ों पुराने स्तूप (Chortens) टूटे पड़े थे। उन पत्थरों पर लगे तांत्रिक प्रार्थना-ध्वज (Prayer Flags) हवा में फड़फड़ा रहे थे, जिन पर खून से अघोर बीजाक्षर उकेरे गए थे।
​जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ रहे थे, हवा में एक अत्यंत अजीब, धीमी और सामूहिक फुसफुसाहट गूंजने लगी।
​वह आवाज हवा की नहीं थी।
​घाटी की दोनों तरफ खड़े उन विशाल देवदार के पेड़ों की काली, बर्फीली शाखाओं के पीछे से अनगिनत सफेद और पारदर्शी साए झांक रहे थे!
​वे साए उन तिब्बती और असमिया तांत्रिकों के थे जो पिछली सदियों में उस महा-कपाल कुंड की साधना करने आए थे और अपनी बलि देकर वहीं प्रेत बन चुके थे। उनकी आंखें नहीं थीं; उनकी खाली आंखों से नीली आग की लकीरें निकल रही थीं और वे दोनों हाथ फैलाकर रुद्र और तारा की ओर बढ़ रहे थे।
​वे थे उस घाटी के 'छाया-भैरव' और 'रक्त-पिशाच'!
​"रुद्र, खड्ग मत निकालना," तारा ने अपनी नीम की लाठी को आगे करते हुए शांत स्वर में कहा। "ये आत्माएं पापी नहीं हैं; ये उस पाताल-असुर के सम्मोहन में बंधी अभागे साधकों की रूहें हैं। इन्हें मारना नहीं, इन्हें केवल मार्ग से हटाना है।"
​तारा ने अपनी नीम की लाठी के निचले सिरे को उस रक्त-रंजित बर्फ पर पूरी ताकत से ठोक दिया।
​खट!
​लाठी के उस एक आघात से जमीन पर नीली दिव्य ज्वाला का एक विशाल अर्ध-वृत्त खिंच गया।
​तारा ने अपने कंठ से तारा-पीठ का वह अति-गोपनीय 'उग्र-तारा महा-मंत्र' फूंका:
"ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्... श्मशान-वासिनी तारायै नमः... मार्गं देहि देहि स्वाहा!"
​उस पवित्र मंत्र और लाठी के कंपन से उन छाया-भैरवों और पिशाचों के कदम वहीं जम गए। उनकी आंखों की वह नीली आसुरी आग कुछ पलों के लिए शांत हो गई और वे दोनों हाथ जोड़कर उस संकरी पगडंडी के दोनों तरफ झुक गए, मानो किसी महारानी के आने पर पहरेदार नतमस्तक हो रहे हों।
​रुद्र और तारा तेजी से उन सायों के बीच से होते हुए आगे बढ़े।
​लगभग दो घंटे की जानलेवा चढ़ाई के बाद, रात के करीब नौ बजे, वे उस पर्वत के सबसे ऊपरी दर्रे—'काल-कपाल दर्रा' पर पहुंचे।
​जैसे ही उन्होंने दर्रे के मोड़ को पार किया, उनके सामने जो दृश्य खुला, उसने रुद्र की आत्मा को हिलाकर रख दिया।
​सामने पर्वत के बीचों-बीच एक विशाल, लगभग आधा किलोमीटर चौड़ा और एक हजार फीट गहरा एक ऐसा भयानक, गोलाकार गड्ढा था जिसकी तलहटी में साक्षात पाताल का महा-नरक खौल रहा था!
​वही था—'महा-कपाल कुंड' (The Primordial Nether-Altar)!
​उस कुंड के चारों तरफ काले पत्थरों की चौंसठ विशाल मीनारें खड़ी थीं, और उन मीनारों के बीच में खौलता हुआ रक्त और नीले लावे का एक विशाल महासागर हिलोरें मार रहा था।
​और उस कुंड के ठीक केंद्र में... एक बहुत बड़ा, तैरता हुआ सोने और हड्डियों का सिंहासन था, जिसके ऊपर वह पाताल का अंतिम और आदिम अधिपति—'रक्त-भैरवेंद्र' अपनी पूर्ण, पचास फीट ऊंची, सौ भुजाओं वाली भयानक छाया के रूप में जागने की अंतिम प्रक्रिया में था!
​तभी, अचानक...
​कड़कड़ाssssहट! बूम!
​जिस पथरीले चबूतरे पर रुद्र और तारा खड़े थे, उसके ठीक आगे की जमीन एक भयानक धमाके के साथ बीच से फट गई!
​पचास फीट चौड़ी एक विशाल, अंधी खाई उनके पैरों के ठीक आगे खुल गई, जिसके भीतर से खौलती हुई लाल आग के फव्वारे और सैकड़ों योगिनियों की एक साथ चीखने की आवाजें बाहर आने लगीं:
"आ गए... हमारे अंतिम संहारक आ गए!"
​तारा ने अपनी नीम की लाठी को खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसकी आंखों में एक अदम्य, दिव्य ज्योति जल उठी।
​उसने रुद्र की ओर देखा।
​"रुद्र... यह महा-कपाल कुंड की अंतिम दहलीज है," तारा की आवाज हवा के तूफानों को चीरती हुई गूंजी। "इस खाई के पार कदम रखने का अर्थ है कि या तो हम दोनों इस पूरी सृष्टि को उस आदि-अंधकार से मुक्त कराएंगे... या हमारी अस्थियां भी इसी कुंड की समिधा बन जाएंगी!"
​रुद्र ने अपने काल-भैरव खड्ग को बाहर निकाला। उसकी धार उस लाल बर्फ के बीच साक्षात सूर्य की तरह चमक उठी।
​"पीछे लौटने के सारे रास्ते बहुत पहले छूट चुके हैं, तारा," रुद्र ने दृढ़ स्वर में कहा। "अब केवल एक ही मार्ग है—आगे का महा-संग्राम!"
​दोनों ने उस दहकती हुई खाई के पार, उस महा-कपाल कुंड के अंतिम चक्रव्यूह की ओर अपने कदम बढ़ा दिए...
​25 भागों के इस महा-उपन्यास का अंतिम, सबसे भयानक और निर्णायक अध्याय अब शुरू होने वाला था!
​अगले भाग का संकेत:
​भाग 16: महा-कपाल कुंड का रक्त-विस्फोट, सौ भुजाओं वाले रक्त-भैरवेंद्र का जागरण और तारा का उग्र-तारा रूप।

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