PretikaSerial Horrorजिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 1 — पहली रात, जब हवेली ने साँस ली

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 12 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
Chapter
1 of 7
Category
Serial Horror
Reading time
12 min
Words
2240
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

📖 जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 1 — पहली रात, जब हवेली ने साँस ली

✍️ लेखक: योगेश कुमार मौर्य

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

रात के ठीक ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट हुए थे।

बारिश तीन घंटे से लगातार हो रही थी।

आसमान में बादल ऐसे गरज रहे थे जैसे कोई अदृश्य शक्ति पहाड़ों के ऊपर बैठकर अपना क्रोध बरसा रही हो। सड़क पर दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। बिजली के खंभे बहुत पीछे छूट चुके थे और अब कार की हेडलाइट के अलावा अंधेरे को चीरने वाला कोई प्रकाश नहीं था।

कार की पिछली सीट पर बैठा आरव मिश्रा बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।

उसकी उम्र लगभग बत्तीस साल थी।

पेशे से वह पत्रकार था, लेकिन पिछले चार वर्षों से अपराध और रहस्यमयी घटनाओं पर स्वतंत्र लेख लिख रहा था।

उसके सामने लैपटॉप खुला था।

स्क्रीन पर एक ही नाम बार-बार दिखाई दे रहा था—

"काली हवेली।"

आरव ने स्क्रीन बंद कर दी।

उसने खिड़की के बाहर देखा।

कुछ दिखाई नहीं दिया।

सिर्फ बारिश।

काली सड़क।

और पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयाँ।

ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने अचानक कार धीमी कर दी।

आरव ने पूछा,

"क्या हुआ?"

ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

आरव ने आगे झुककर देखा।

सड़क के बीचोंबीच एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

सफेद धोती।

कंधे पर काला गमछा।

सिर झुका हुआ।

बारिश उसके शरीर पर पड़ रही थी, लेकिन वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया।

कार कुछ फीट पहले रुक गई।

आरव ने शीशा नीचे किया।

"बाबा! रास्ते से हट जाइए!"

बूढ़े ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

उसका चेहरा बारिश की धुंध में साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

फिर उसने हाथ उठाया।

लेकिन रास्ते से हटने के लिए नहीं।

उसने कार को वापस जाने का इशारा किया।

ड्राइवर ने शीशा ऊपर कर लिया।

"चलो।"

आरव ने उसकी तरफ देखा।

"क्यों?"

ड्राइवर ने इस बार भी जवाब नहीं दिया।

उसने कार स्टार्ट की और धीरे-धीरे पीछे करने लगा।

आरव ने पलटकर बूढ़े को देखा।

वह अब भी वहीं खड़ा था।

लेकिन अगले ही क्षण—

आरव की साँस अटक गई।

बूढ़ा आदमी वहाँ नहीं था।

सड़क खाली थी।

बारिश वैसे ही गिर रही थी।

आरव ने झटके से दरवाजा खोलने की कोशिश की।

"रुको!"

ड्राइवर ने दरवाजा लॉक कर दिया।

"बाहर मत उतरना।"

"वह आदमी कहाँ गया?"

ड्राइवर की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर काँप रही थीं।

उसने धीमे स्वर में कहा,

"वह आदमी नहीं था।"

आरव चुप हो गया।

कुछ सेकंड तक केवल बारिश की आवाज आती रही।

फिर आरव ने पूछा,

"तो क्या था?"

ड्राइवर ने सामने देखते हुए कहा—

"आप पहली बार काली हवेली जा रहे हैं साहब?"

"हाँ।"

"तो मेरी एक बात मान लीजिए।"

"क्या?"

ड्राइवर ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में डर था।

"अगर रात को हवेली में कोई आपका नाम लेकर बुलाए..."

वह कुछ पल रुका।

"...तो जवाब मत देना।"

आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"आप भी अजीब बातें कर रहे हैं।"

ड्राइवर ने मुस्कुराने की कोशिश की।

लेकिन उसके होंठ काँप रहे थे।

"अजीब बातें नहीं साहब। वहाँ के नियम हैं।"

"किसके नियम?"

ड्राइवर ने कोई उत्तर नहीं दिया।

कार आगे बढ़ती रही।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

लगभग पंद्रह मिनट बाद सड़क अचानक समाप्त हो गई।

सामने कच्चा रास्ता था।

दोनों तरफ घने पेड़।

बीच में कीचड़।

कार धीरे-धीरे उस रास्ते पर बढ़ने लगी।

आरव ने मोबाइल निकाला।

नेटवर्क गायब था।

उसने मैप देखा।

स्क्रीन पर एक ही संदेश था—

"ऑफलाइन।"

आरव ने मोबाइल जेब में रख लिया।

कुछ दूर जाने के बाद ड्राइवर ने कार रोक दी।

सामने लोहे का एक विशाल गेट था।

गेट के दोनों ओर पत्थर के ऊँचे खंभे थे।

एक खंभे पर जंग लगी पट्टिका टंगी थी।

उस पर लिखा था—

"रुद्राक्ष हवेली"

लेकिन उसके नीचे किसी ने लाल रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—

"रात में यहाँ मत रुकना।"

आरव ने पट्टिका को देखा।

फिर ड्राइवर की तरफ।

"यही है?"

ड्राइवर ने सिर हिला दिया।

"हाँ।"

"आप अंदर नहीं आएँगे?"

"नहीं।"

"क्यों?"

ड्राइवर ने जेब से आरव का सामान बाहर निकाला।

फिर बोला,

"सुबह होने से पहले मैं यहाँ नहीं रुकता।"

"मुझे तो लगा था आपने कहा था कि हवेली तक छोड़ेंगे।"

"गेट तक।"

"अंदर?"

"नहीं।"

आरव ने हल्की नाराजगी से कहा,

"आपको पैसे पूरे मिलेंगे। डरने की जरूरत नहीं है।"

ड्राइवर ने उसकी ओर देखा।

"पैसे का डर नहीं है साहब।"

"फिर?"

ड्राइवर ने गेट की तरफ देखा।

"जिंदा रहने की आदत है।"

यह कहकर वह कार में बैठा और बिना पीछे देखे वापस चला गया।

आरव कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

बारिश अब धीमी हो गई थी।

उसने गेट को धक्का दिया।

कर्कश आवाज के साथ गेट खुल गया।

और तभी—

हवेली के भीतर कहीं बहुत दूर से घंटी बजी।

टन...

आरव रुक गया।

फिर—

टन...

उसने घड़ी देखी।

रात के बारह बजने में केवल पाँच मिनट बाकी थे।

उसने खुद को समझाया।

"पुरानी हवेली है। कहीं घंटी लगी होगी। हवा से बज गई होगी।"

वह आगे बढ़ा।

लेकिन जैसे-जैसे वह हवेली के करीब पहुँचता गया, उसके कदम अपने आप धीमे होते गए।

हवेली बहुत बड़ी थी।

तीन मंजिल।

काली दीवारें।

ऊँची खिड़कियाँ।

कुछ खिड़कियों पर लकड़ी के पट बंद थे।

कुछ पूरी तरह काली थीं।

और सबसे ऊपर—

तीसरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

आरव ने गर्दन उठाकर देखा।

उस खिड़की के पीछे किसी की परछाईं खड़ी थी।

एक औरत की परछाईं।

लंबे बाल।

स्थिर शरीर।

आरव ने आँखें मिचमिचाईं।

परछाईं गायब हो गई।

उसने फिर देखा।

खिड़की खाली थी।

"भ्रम है।"

वह खुद से बोला।

तभी हवेली का मुख्य दरवाजा खुल गया।

आरव के कदम वहीं जम गए।

दरवाजे के भीतर घना अंधेरा था।

कुछ सेकंड बाद एक बूढ़ा आदमी हाथ में लालटेन लिए बाहर आया।

उसकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष रही होगी।

चेहरा झुर्रियों से भरा।

आँखें गहरी।

वह धीरे-धीरे आरव के पास आया।

"आरव मिश्रा?"

आरव चौंका।

"आप मुझे जानते हैं?"

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने सिर्फ दरवाजे की तरफ इशारा किया।

"अंदर आइए।"

आरव ने पूछा,

"आप कौन हैं?"

"गोविंद।"

"हवेली के मालिक?"

गोविंद ने सिर हिलाया।

"मालिक?"

बूढ़ा हल्का मुस्कुराया।

"यहाँ मालिक कोई नहीं है।"

आरव ने उसकी तरफ देखा।

"मतलब?"

गोविंद मुड़ा और अंदर जाने लगा।

"आपको सब समझ में आ जाएगा।"

आरव उसके पीछे अंदर चला गया।

दरवाजा उसके पीछे अपने आप बंद हो गया।

धड़ाम!

आरव ने पलटकर देखा।

उसने दरवाजा पकड़कर खींचा।

दरवाजा नहीं खुला।

"ये लॉक है?"

गोविंद ने बिना पीछे देखे कहा,

"हाँ।"

"तो खोलिए।"

"अभी नहीं।"

"क्यों?"

गोविंद रुक गया।

उसने धीरे से पीछे मुड़कर आरव को देखा।

"क्योंकि अभी रात शुरू हुई है।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

हवेली के भीतर हवा बिल्कुल अलग थी।

बाहर बारिश और हवा की आवाज थी।

लेकिन अंदर—

सन्नाटा।

ऐसा सन्नाटा जिसमें आदमी को अपनी साँस भी किसी दूसरे व्यक्ति की साँस जैसी लगने लगे।

दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

ज्यादातर चित्रों में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

एक आदमी।

एक औरत।

तीन बच्चे।

और हर चित्र में एक बात समान थी—

सभी की आँखें कैमरे की तरफ नहीं, बल्कि चित्र देखने वाले की तरफ देख रही थीं।

आरव एक चित्र के सामने रुक गया।

उसमें लगभग पचास वर्ष की एक औरत थी।

उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे।

गले में काला हार।

आरव ने पूछा,

"ये कौन हैं?"

गोविंद का चेहरा अचानक कठोर हो गया।

"उन्हें मत देखिए।"

"क्यों?"

"क्योंकि कुछ तस्वीरें देखने के लिए नहीं होतीं।"

आरव ने चित्र से नजर हटाई।

"आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?"

गोविंद ने लालटेन मेज पर रखी।

"मैंने नहीं बुलाया।"

आरव चौंका।

"क्या?"

"आपको पत्र मिला था।"

आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।

उसने जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।

"हाँ।"

उस पत्र पर केवल तीन पंक्तियाँ थीं—

"अगर सच जानना है तो रुद्राक्ष हवेली आओ।
रात के बाद मत जाना।
और अगर तीसरी मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आए तो दरवाजा मत खोलना।"

नीचे कोई नाम नहीं था।

सिर्फ एक तारीख।

17 अगस्त 1999

आरव ने पत्र गोविंद को दिखाया।

बूढ़े ने पत्र देखते ही नजरें झुका लीं।

"आप इसे पहचानते हैं?"

"हाँ।"

"किसने लिखा था?"

गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

आरव ने दोबारा पूछा।

"किसने?"

गोविंद ने धीरे से कहा—

"जिसने लिखा था... वह अब इस दुनिया में नहीं है।"

"कब मरा?"

"सत्रह साल पहले।"

आरव ने तुरंत गणना की।

"1999?"

गोविंद ने सिर हिलाया।

"हाँ।"

आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

"लेकिन पत्र मुझे इसी साल मिला है।"

गोविंद चुप रहा।

"कैसे?"

बूढ़े ने लालटेन उठाई।

"यही तो पता लगाने आए हैं आप।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

रात के बारह बज चुके थे।

गोविंद आरव को एक कमरे तक ले गया।

कमरे में एक पुराना पलंग था।

एक मेज।

एक कुर्सी।

दीवार पर बंद घड़ी।

और खिड़की पर मोटे पर्दे।

गोविंद ने कहा,

"आज रात आप इसी कमरे में सोएँगे।"

आरव ने कमरे को देखा।

"और आप?"

"मैं नीचे रहता हूँ।"

"हवेली में और कोई है?"

गोविंद ने एक पल सोचा।

"नहीं।"

"कोई नौकर?"

"नहीं।"

"परिवार?"

"नहीं।"

"फिर इतनी बड़ी हवेली में आप अकेले रहते हैं?"

गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"मैं अकेला नहीं रहता।"

आरव कुछ कहता, उससे पहले गोविंद कमरे से बाहर निकल गया।

दरवाजा बंद हो गया।

आरव कुछ देर तक चुप खड़ा रहा।

फिर उसने अपना बैग खोला।

कैमरा निकाला।

लैपटॉप रखा।

मोबाइल चार्ज पर लगाया।

और रिकॉर्डर चालू किया।

"रात 12 बजकर 13 मिनट। मैं रुद्राक्ष हवेली में हूँ। हवेली लगभग सौ वर्ष पुरानी है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले बीस वर्षों में यहाँ कई लोग गायब हुए हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि—"

ठक...

आरव रुक गया।

आवाज दरवाजे से आई थी।

उसने रिकॉर्डर बंद कर दिया।

कुछ सेकंड इंतजार किया।

फिर—

ठक... ठक...

दरवाजे पर दस्तक हुई।

आरव धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया।

"कौन?"

कोई जवाब नहीं।

उसने दरवाजे की कुंडी पकड़ी।

तभी बाहर से एक बच्चे की आवाज आई—

"अंकल..."

आरव का हाथ वहीं रुक गया।

आवाज बहुत धीमी थी।

"अंकल... दरवाजा खोलो..."

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

उसे गोविंद की बात याद आई।

"अगर तीसरी मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आए तो दरवाजा मत खोलना।"

लेकिन यह आवाज रोने की नहीं थी।

यह आवाज दरवाजे के ठीक बाहर थी।

"कौन हो?"

कुछ क्षण सन्नाटा।

फिर आवाज आई—

"मुझे ठंड लग रही है।"

आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उसने दरवाजे के नीचे देखा।

दरवाजे के नीचे की छोटी-सी जगह से बाहर का फर्श दिखाई दे रहा था।

वहाँ किसी के पैर होने चाहिए थे।

लेकिन वहाँ कोई पैर नहीं थे।

आरव पीछे हट गया।

फिर बच्चे ने कहा—

"अंकल..."

इस बार आवाज कमरे के अंदर से आई।

आरव का दिल जैसे रुक गया।

उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

कमरे में कोई नहीं था।

लेकिन मेज पर रखा उसका रिकॉर्डर—

अपने आप चालू हो चुका था।

और उसमें से एक बच्चे की धीमी आवाज सुनाई दे रही थी—

"दरवाजा मत खोलना..."

आरव ने रिकॉर्डर उठाया।

उसकी स्क्रीन पर समय दिखाई दे रहा था—

00:17:13

फिर रिकॉर्डर में वही आवाज दोबारा आई—

"क्योंकि जो बाहर खड़ा है... वह बच्चा नहीं है।"

आरव के हाथ काँपने लगे।

उसी क्षण कमरे की लाइट बुझ गई।

अंधेरा।

पूरा अंधेरा।

फिर खिड़की के पास—

किसी के खड़े होने की आवाज आई।

कपड़े की हल्की सरसराहट।

आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

खिड़की बंद थी।

लेकिन पर्दा हिल रहा था।

बाहर हवा नहीं थी।

पर्दा धीरे-धीरे ऊपर उठा।

और खिड़की के शीशे पर किसी ने अंदर की तरफ से उंगली से लिखा—

"तुम बहुत देर से आए हो।"

आरव पीछे हट गया।

उसने खिड़की के पास जाने की हिम्मत नहीं की।

फिर अचानक—

पूरी हवेली में घंटी बजने लगी।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

फिर लगातार—

टन... टन... टन... टन...

आरव ने कान बंद कर लिए।

और उसी शोर के बीच उसे किसी और की आवाज सुनाई दी।

एक औरत की आवाज।

बहुत धीमी।

बहुत करीब।

"आरव..."

उसका शरीर जम गया।

"आरव..."

आवाज उसके पीछे थी।

आरव ने पलटकर देखा।

कमरे के कोने में एक औरत खड़ी थी।

सफेद साड़ी।

लंबे खुले बाल।

चेहरा बालों से ढका हुआ।

आरव की साँस अटक गई।

उसने मोबाइल की रोशनी उस पर डाली।

औरत धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाने लगी।

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

लेकिन तभी—

दरवाजे पर जोरदार चोट हुई।

धड़ाम!

"आरव!"

यह गोविंद की आवाज थी।

"दरवाजा खोलो!"

आरव ने आँखें खोलीं।

कोना खाली था।

औरत गायब थी।

दरवाजा अब भी बंद था।

गोविंद बाहर से चिल्ला रहा था—

"दरवाजा खोलो!"

आरव ने कुंडी खोली।

गोविंद अंदर घुस आया।

उसके हाथ में लालटेन थी।

उसने कमरे में चारों तरफ देखा।

फिर आरव के पास आकर बोला,

"तुमने उसे देखा?"

आरव ने काँपते हुए पूछा,

"किसे?"

गोविंद की आँखें दरवाजे के ऊपर टिक गईं।

"उसे..."

"कौन है वह?"

गोविंद ने कोई उत्तर नहीं दिया।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"कौन है वह?"

गोविंद ने धीरे से कहा—

"इस हवेली की पहली औरत।"

"मतलब?"

"जिस रात वह मरी थी..."

गोविंद की आवाज टूट गई।

"...उस रात इस हवेली में छह लोग थे।"

आरव ने पूछा,

"फिर?"

गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"सुबह केवल एक आदमी जिंदा मिला था।"

"कौन?"

गोविंद कुछ बोलने ही वाला था कि—

ऊपर तीसरी मंजिल से बच्चे के रोने की आवाज आई।

"माँ..."

आरव और गोविंद दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।

फिर आवाज आई—

"माँ... मुझे बाहर निकालो..."

गोविंद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

आरव ने पूछा,

"तीसरी मंजिल पर क्या है?"

गोविंद ने धीमे स्वर में कहा—

"वह कमरा..."

"कौन-सा कमरा?"

गोविंद पीछे हट गया।

"जहाँ से कोई कभी वापस नहीं आया।"

उसी क्षण तीसरी मंजिल की खिड़की में रोशनी जल उठी।

और उस रोशनी के सामने—

एक छोटे बच्चे की परछाईं दिखाई दी।

बच्चा खिड़की के पीछे खड़ा था।

उसने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

और शीशे पर हथेली रख दी।

आरव ने देखा—

उसकी हथेली के नीचे काँच पर लाल निशान उभर आया।

फिर बच्चे ने अपनी उंगली से शीशे पर कुछ लिखा।

आरव दूर से भी उसे पढ़ सकता था।

सिर्फ तीन शब्द थे—

"आरव, भाग जाओ।"

आरव ने गोविंद की ओर देखा।

"ये बच्चा कौन है?"

गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

क्योंकि उसी समय—

उसकी जेब में रखा पुराना मोबाइल बज उठा।

गोविंद ने मोबाइल निकाला।

स्क्रीन देखकर उसका चेहरा बदल गया।

आरव ने पूछा,

"किसका फोन है?"

गोविंद ने स्क्रीन उसकी तरफ कर दी।

कॉलर का नाम देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

स्क्रीन पर लिखा था—

"गोविंद — खुद"

आरव ने मोबाइल को घूरते हुए पूछा,

"ये कैसे हो सकता है?"

गोविंद ने काँपते हाथों से कॉल रिसीव कर लिया।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ साँसों की आवाज आती रही।

फिर एक बच्चा बोला—

"गोविंद काका..."

गोविंद की आँखों से आँसू निकल आए।

बच्चे ने कहा—

"आपने फिर किसी को अंदर बुला लिया।"

कॉल कट गया।

और उसी क्षण—

हवेली की सारी घड़ियाँ एक साथ चल पड़ीं।

टिक... टिक... टिक... टिक...

लेकिन वे सभी एक ही समय पर रुकी थीं।

12 बजकर 17 मिनट।

गोविंद ने आरव की तरफ देखा।

उसकी आवाज फुसफुसाहट से भी धीमी थी—

"अब तुम यहाँ से नहीं जा सकते।"

आरव ने पूछा,

"क्यों?"

गोविंद ने ऊपर तीसरी मंजिल की ओर देखा।

फिर कहा—

"क्योंकि हवेली ने तुम्हें देख लिया है।"

ऊपर से फिर बच्चे की आवाज आई—

"अंकल..."

आरव ने सिर उठाया।

"क्या?"

बच्चे की आवाज अब बहुत साफ थी।

"आप अकेले नहीं आए थे।"

आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

"क्या मतलब?"

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर तीसरी मंजिल की खिड़की पर वही बच्चा दिखाई दिया।

उसने पीछे की ओर इशारा किया।

आरव ने खिड़की के अंधेरे में देखा।

बच्चे के पीछे—

एक दूसरी परछाईं खड़ी थी।

बहुत लंबी।

बहुत पतली।

और वह धीरे-धीरे बच्चे के कंधे पर हाथ रख रही थी।

बच्चे ने आखिरी बार शीशे पर उंगली रखी।

इस बार उसने लिखा—

"वह तुम्हारे साथ आई है।"

आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

कमरा खाली था।

लेकिन उसके पीछे फर्श पर—

गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

वे निशान दरवाजे से नहीं आए थे।

वे कमरे के बीच से शुरू होकर—

सीधे आरव के पीछे तक पहुँचे थे।

और सबसे भयावह बात यह थी कि—

उन पैरों के निशान में केवल एक दिशा थी।

वे बाहर से अंदर नहीं आए थे।

वे...

अंदर से बाहर जा रहे थे।

आरव ने काँपते हुए गोविंद की तरफ देखा।

गोविंद ने सिर्फ इतना कहा—

"पहली रात अभी खत्म नहीं हुई है।"

और तभी हवेली के सबसे अंदरूनी हिस्से से किसी औरत की चीख गूँजी—

"उसे मत जगाना!"

इसके बाद पूरी हवेली की खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

धड़ाम!

और तीसरी मंजिल से बच्चे की हँसी सुनाई दी।

एक ऐसी हँसी...

जिसमें बचपन नहीं था।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

भाग 1 समाप्त

अगले भाग में — "तीसरी मंजिल का बंद दरवाजा"

रात के 12:17 पर हवेली में आखिर क्या जाग गया था?

और आरव के साथ हवेली तक वास्तव में कौन आया था?

सबसे बड़ा सवाल—

अगर हवेली में कोई और मौजूद नहीं था, तो कमरे के भीतर से बाहर जाते हुए गीले पैरों के निशान किसके थे?

अगला भाग →

जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता · सभी भाग →