PretikaSerial Horrorजिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 2 — तीसरी मंज़िल का बंद दरवाज़ा

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 10 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
Chapter
2 of 7
Category
Serial Horror
Reading time
10 min
Words
1915
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

📖 जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 2 — तीसरी मंज़िल का बंद दरवाज़ा

✍️ लेखक: योगेश कुमार मौर्य

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

हवेली में अचानक ऐसा सन्नाटा छा गया था, जैसे कुछ ही क्षण पहले यहाँ कोई आवाज़ थी ही नहीं।

आरव दरवाजे के पास खड़ा था।

उसकी निगाहें अभी भी फर्श पर बने उन गीले पैरों के निशानों पर जमी थीं।

निशान कमरे के बीच से शुरू होते थे।

एक-एक कदम...

धीरे-धीरे...

और फिर सीधे उस जगह तक आते थे जहाँ कुछ सेकंड पहले आरव खड़ा था।

लेकिन उसके बाद कोई निशान नहीं था।

न आगे।

न पीछे।

जैसे वह व्यक्ति अचानक हवा में गायब हो गया हो।

आरव ने मोबाइल की रोशनी उन निशानों पर डाली।

पानी की बूंदें अभी भी चमक रही थीं।

उसने झुककर फर्श को छुआ।

फर्श ठंडा था।

असामान्य रूप से ठंडा।

"ये पानी है?"

उसने धीमे से पूछा।

गोविंद ने उत्तर नहीं दिया।

वह कमरे के बीच खड़ा तीसरी मंजिल की तरफ देख रहा था।

उसका चेहरा इतना सफेद पड़ चुका था कि लालटेन की पीली रोशनी में भी उसकी घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।

आरव ने उसकी ओर देखा।

"गोविंद जी।"

कोई उत्तर नहीं।

"मैं आपसे बात कर रहा हूँ।"

गोविंद ने जैसे अचानक खुद को संभाला।

"क्या?"

"ये पैरों के निशान किसके हैं?"

गोविंद ने फर्श की तरफ देखा।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—

"जिसके हैं... वह अब पैरों से नहीं चलता।"

आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

"सीधी बात कीजिए।"

गोविंद चुप रहा।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"मुझे यहाँ बुलाया गया है। मुझे इस हवेली का सच जानना है। अगर आप जानते हैं तो सब बताइए।"

गोविंद ने उसकी तरफ देखा।

कुछ क्षण तक दोनों की आँखें मिली रहीं।

फिर बूढ़े ने कहा—

"सच जानना चाहते हो?"

"हाँ।"

"तो पहले ये जान लो कि इस हवेली में जो दिखाई देता है, वह हमेशा सच नहीं होता।"

"और जो दिखाई नहीं देता?"

गोविंद ने तुरंत नजरें फेर लीं।

"वह अक्सर सच होता है।"

ऊपर से फिर आवाज आई।

ठक...

फिर—

ठक... ठक...

तीसरी मंजिल से।

आरव ने गर्दन उठाई।

"वह बच्चा फिर दरवाजा पीट रहा है।"

गोविंद ने सिर हिलाया।

"वह दरवाजा नहीं पीट रहा।"

"फिर?"

"वह तुम्हें बुला रहा है।"

आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

फिर उसने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिया।

गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"ऊपर मत जाओ।"

"क्यों?"

"क्योंकि अभी समय नहीं आया।"

"किस चीज का समय?"

गोविंद ने उत्तर नहीं दिया।

आरव ने हाथ छुड़ा लिया।

"मैं पत्रकार हूँ। डराने से रुकने वाला नहीं।"

गोविंद ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

"डर से नहीं रुकोगे..."

वह कुछ क्षण रुका।

"...तो पछतावे से भी नहीं रुक पाओगे।"

आरव सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

तीसरी मंजिल तक जाने वाली सीढ़ियाँ बेहद पुरानी थीं।

लकड़ी पर नमी जम चुकी थी।

हर कदम के साथ सीढ़ियाँ कराहती थीं।

चर्र...

चर्र...

आरव ऊपर चढ़ता गया।

उसके पीछे गोविंद भी आ रहा था।

लालटेन की रोशनी मुश्किल से आगे के चार-पाँच कदमों तक पहुँच रही थी।

पहली मंजिल पार हुई।

दूसरी मंजिल पार हुई।

और फिर—

तीसरी मंजिल।

यहाँ हवा अचानक ठंडी हो गई।

इतनी ठंडी कि आरव की साँस से धुंध निकलने लगी।

उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

लंबा गलियारा।

दोनों तरफ बंद दरवाजे।

दीवारों पर पुराने चित्र।

और गलियारे के बिल्कुल अंत में—

एक काला दरवाजा।

उस दरवाजे पर मोटी लोहे की जंजीर लिपटी हुई थी।

आरव वहीं रुक गया।

"यही है?"

गोविंद ने सिर झुका लिया।

"हाँ।"

"जिस कमरे की बात कर रहे थे?"

"हाँ।"

आरव धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

जैसे-जैसे वह करीब गया, उसे अंदर से बहुत धीमी आवाज सुनाई देने लगी।

किसी बच्चे के रोने की।

"माँ..."

आरव ने दरवाजे पर हाथ रखा।

दरवाजा बर्फ जैसा ठंडा था।

उसने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।

"अंदर कोई है।"

गोविंद ने कहा—

"नहीं।"

"तो आवाज कहाँ से आ रही है?"

"यही तो रहस्य है।"

आरव ने जंजीर देखी।

उस पर धूल जमी थी।

लेकिन बीच में एक हिस्सा साफ था।

जैसे किसी ने हाल ही में उसे छुआ हो।

आरव ने पूछा,

"इस कमरे को आखिरी बार कब खोला गया था?"

गोविंद ने कहा—

"सत्रह साल पहले।"

"और उसके बाद?"

"कभी नहीं।"

"चाबी?"

गोविंद ने अपनी जेब टटोली।

फिर दूसरी जेब।

फिर कमर के पास बंधी छोटी थैली खोली।

उसमें से एक पुरानी चाबी निकली।

आरव की नजर चाबी पर टिक गई।

"तो चाबी आपके पास है।"

"हाँ।"

"फिर दरवाजा खोलिए।"

गोविंद पीछे हट गया।

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि इसे खोलने वाला आखिरी आदमी..."

गोविंद की आवाज काँप गई।

"...सुबह तक जिंदा नहीं रहा था।"

आरव ने कहा,

"लेकिन आपने अभी कहा था कि सत्रह साल पहले एक आदमी जिंदा मिला था।"

गोविंद ने उसकी तरफ देखा।

"मैंने कहा था कि छह लोग थे और सुबह एक आदमी जिंदा मिला।"

"हाँ।"

"मैंने यह नहीं कहा था कि वह आदमी इस कमरे से बाहर आया था।"

आरव चुप हो गया।

उसी समय अंदर से बच्चे की आवाज आई—

"अंकल..."

आरव ने दरवाजे के बिल्कुल पास कान लगा दिया।

"कौन हो?"

कुछ क्षण सन्नाटा।

फिर—

"आपको मेरी माँ ने बुलाया है।"

आरव का चेहरा बदल गया।

"तुम्हारी माँ कौन है?"

अंदर से आवाज आई—

"जो आपके पीछे खड़ी है।"

आरव का शरीर जम गया।

उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

गलियारा खाली था।

गोविंद वहाँ खड़ा था।

उसके अलावा कोई नहीं।

आरव ने राहत की साँस ली।

फिर गोविंद के चेहरे की ओर देखा।

बूढ़ा आदमी उसे नहीं देख रहा था।

वह आरव के पीछे...

गलियारे के दूसरे छोर की तरफ देख रहा था।

आरव ने धीरे से पूछा—

"क्या हुआ?"

गोविंद ने होंठों पर उंगली रख दी।

"शांत।"

"क्या?"

गोविंद ने फुसफुसाकर कहा—

"पीछे मत देखना।"

आरव की धड़कन तेज हो गई।

"क्यों?"

"क्योंकि वह अभी तुम्हारे पीछे है।"

आरव के माथे पर पसीना आ गया।

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई खड़ा है।

बहुत करीब।

इतना करीब कि उसकी गर्दन पर ठंडी हवा महसूस हो रही थी।

फिर किसी ने बहुत धीरे से उसके कान के पास फुसफुसाया—

"तुम्हें बहुत देर हो गई..."

आरव ने झटके से पीछे घूमकर देखा।

कुछ नहीं।

सिर्फ खाली गलियारा।

गोविंद अब भी वहीं खड़ा था।

लेकिन उसके हाथ से लालटेन गिर चुकी थी।

लालटेन फर्श पर पड़ी थी।

और उसकी लौ बुझ गई थी।

अंधेरा।

घना अंधेरा।

फिर—

किसी ने आरव के कंधे को छुआ।

आरव ने चीख दबा ली।

गोविंद ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

आरव के कंधे पर एक गीला हाथ का निशान था।

पाँच उंगलियाँ।

छोटी उंगलियाँ।

जैसे किसी बच्चे का हाथ हो।

आरव पीछे हट गया।

"यह क्या है?"

गोविंद ने आँखें बंद कर लीं।

"वह तुम्हें पहचान चुका है।"

"कौन?"

गोविंद ने दरवाजे की तरफ देखा।

"अंदर वाला।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

आरव ने अपनी जेब से कैमरा निकाला।

"मैं इसे रिकॉर्ड कर रहा हूँ।"

गोविंद ने रोकना चाहा।

"नहीं।"

"क्यों?"

"कुछ चीजें कैमरे में कैद नहीं करनी चाहिए।"

"क्यों?"

"क्योंकि कभी-कभी कैमरा जो दिखाता है, आँखें उसे नहीं देख पातीं।"

आरव ने कैमरा ऑन किया।

दरवाजे की तस्वीर ली।

फिर गलियारे की।

फिर गोविंद की।

कैमरे की स्क्रीन पर सब सामान्य दिखाई दिया।

लेकिन जब उसने ली गई तस्वीरें देखीं—

उसकी उंगलियाँ रुक गईं।

तीसरी तस्वीर।

गलियारे की।

गोविंद पीछे खड़ा था।

आरव सामने।

लेकिन दोनों के बीच—

एक छोटा बच्चा खड़ा था।

सफेद कपड़े।

झुका हुआ सिर।

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

आरव ने कैमरा नीचे कर दिया।

उसने अपनी आँखों से गलियारा देखा।

वहाँ बच्चा नहीं था।

फिर कैमरे की स्क्रीन देखी।

बच्चा अभी भी था।

वह धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठा रहा था।

आरव ने स्क्रीन पर उंगली रख दी।

तस्वीर बदल गई।

अब बच्चे का चेहरा दिखाई दे रहा था।

आरव की साँस रुक गई।

वह बच्चा लगभग दस साल का था।

चेहरा पीला।

आँखें पूरी तरह काली।

और उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान।

लेकिन सबसे डरावनी बात—

आरव उस चेहरे को पहचानता था।

"ये..."

उसने कैमरा गोविंद की ओर कर दिया।

"आप इसे जानते हैं?"

गोविंद ने स्क्रीन देखी।

उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।

"इसे बंद करो।"

"ये कौन है?"

"इसे बंद करो!"

"नाम क्या है इसका?"

गोविंद अचानक चीख पड़ा—

"बंद करो!"

आरव चौंक गया।

गोविंद ने कैमरा उसके हाथ से छीन लिया।

कुछ सेकंड बाद उसने उसे बंद कर दिया।

फिर बोला—

"उसका नाम मत लेना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जिसने भी उसका नाम लिया..."

वह रुक गया।

"क्या?"

"उसने अगली रात उसे अपने सामने देखा।"

आरव ने पूछा,

"और फिर?"

गोविंद ने धीरे से कहा—

"फिर वह दिखाई नहीं दिया।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

अचानक दरवाजे के पीछे से तेज आवाज आई।

धड़ाम!

दोनों पीछे हट गए।

फिर—

धड़ाम!

जंजीर हिलने लगी।

गोविंद ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

"चलो।"

"नहीं।"

"चलो!"

"मुझे अंदर देखना है।"

"तुम समझ नहीं रहे!"

तीसरी बार दरवाजा जोर से हिला।

इस बार जंजीर फर्श पर गिर गई।

खनननन...

दोनों की आँखें फैल गईं।

दरवाजा अब केवल कुंडी से बंद था।

गोविंद ने काँपते हुए कहा—

"मैंने इसे कभी बिना चाबी के खुलते नहीं देखा।"

आरव ने धीरे-धीरे दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया।

"तो आज देख लीजिए।"

उसने कुंडी पर हाथ रखा।

दरवाजा अपने आप खुल गया।

क्रीईईई...

अंदर घुप्प अंधेरा था।

आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

कमरे में धूल जमी थी।

एक टूटी हुई लकड़ी की मेज।

एक पुराना पलंग।

दीवार पर बच्चों की कुछ तस्वीरें।

और कमरे के बीचोंबीच—

एक छोटी लकड़ी की कुर्सी।

कुर्सी पर कोई बैठा था।

आरव का दिल जोर से धड़का।

एक बच्चा।

पीठ उसकी तरफ।

सिर झुका हुआ।

बाल कंधों तक।

आरव ने कहा,

"तुम कौन हो?"

बच्चा हिला नहीं।

गोविंद ने आरव को पीछे खींचा।

"नहीं।"

"क्यों?"

"उससे बात मत करो।"

आरव ने बच्चे के पास कदम बढ़ाया।

"तुम्हें यहाँ किसने बंद किया?"

बच्चा धीरे-धीरे सिर उठाने लगा।

गोविंद काँप उठा।

"आरव!"

बच्चा अचानक बोल पड़ा—

"मैं बंद नहीं हूँ।"

आरव रुक गया।

बच्चे ने सिर घुमाया।

उसका चेहरा अभी भी दिखाई नहीं दे रहा था।

फिर उसने कहा—

"आप बंद हैं।"

उसी क्षण दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

धड़ाम!

आरव ने पलटकर देखा।

गोविंद बाहर रह गया था।

दरवाजा बंद।

गोविंद बाहर से चिल्लाया—

"आरव!"

आरव ने कुंडी खींची।

नहीं खुली।

"गोविंद जी!"

बाहर से आवाज आई—

"पीछे मत देखना!"

आरव की साँस रुक गई।

बच्चा अब भी कुर्सी पर बैठा था।

उसने धीरे से कहा—

"मत देखना..."

आरव स्थिर हो गया।

"क्यों?"

बच्चे ने उत्तर दिया—

"क्योंकि वह तुम्हारे पीछे खड़ी है।"

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

उसे फिर वही ठंडी हवा महसूस हुई।

उसकी गर्दन के पास किसी के बाल छुए।

एक स्त्री की धीमी साँस उसके कान के पास सुनाई दी।

फिर आवाज आई—

"आरव..."

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

उसने पलटने की कोशिश नहीं की।

बच्चा फुसफुसाया—

"अगर उसने तुम्हारा नाम तीसरी बार लिया..."

आरव ने काँपते हुए पूछा—

"तो?"

बच्चा चुप रहा।

"बोलो!"

कुछ सेकंड बाद बच्चे ने कहा—

"तो तुम्हारा नाम इस हवेली की दीवार पर लिख दिया जाएगा।"

पीछे से फिर आवाज आई—

"आरव..."

दूसरी बार।

आरव ने दाँत भींच लिए।

और तभी कमरे की दीवार पर कहीं से खरोंचने की आवाज आई।

कrrrr...

फिर दूसरी।

कrrrr...

आरव ने आँखें बंद रखीं।

लेकिन आवाज साफ थी।

जैसे कोई पत्थर से दीवार पर कुछ लिख रहा हो।

बच्चे ने फुसफुसाकर कहा—

"वह लिख रही है।"

आरव ने पूछा—

"क्या?"

"तुम्हारा नाम।"

पीछे से तीसरी बार आवाज आई—

"आरव..."

उसी क्षण कमरे में तेज हवा चली।

लालटेन जो बंद पड़ी थी, अपने आप जल उठी।

आरव ने अनजाने में आँखें खोल दीं।

सामने की दीवार पर ताजा लाल निशान थे।

किसी ने लिखा था—

आरव मिश्रा

और उसके नीचे—

एक तारीख।

10 अगस्त 2026

आरव ने तारीख देखते ही मोबाइल निकाला।

आज तारीख थी—

9 अगस्त 2026।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

"ये कल की तारीख है..."

बच्चा कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।

वही काली आँखें।

वही पीला चेहरा।

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

उसने कहा—

"कल तुम मरोगे।"

आरव पीछे हट गया।

"नहीं..."

बच्चे ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

आरव ने उसकी ओर देखा।

"क्या?"

बच्चे ने धीरे से कहा—

"कल तुम नहीं मरोगे।"

आरव की आँखों में उम्मीद जगी।

लेकिन बच्चे ने अगला वाक्य बोलते ही उसके भीतर का खून जमा दिया—

"कल तुम किसी और को मारोगे।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

बाहर गोविंद दरवाजा पीट रहा था।

"आरव! दरवाजा खोलो!"

अंदर आरव दीवार पर लिखी अपनी तारीख देख रहा था।

10 अगस्त 2026।

फिर उसकी नजर कमरे के कोने में रखी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

तस्वीर में छह लोग खड़े थे।

वही छह लोग...

जिनका जिक्र गोविंद ने किया था।

लेकिन तस्वीर के पीछे किसी ने पेंसिल से कुछ लिखा था।

आरव ने तस्वीर उठाई।

पीछे लिखा था—

"छह अंदर गए थे।
एक बाहर आया था।
लेकिन वह भी इंसान नहीं रहा।"

आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

उसी क्षण बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

"आप सच जानना चाहते थे न?"

आरव ने धीरे से सिर उठाया।

"हाँ।"

बच्चे ने कमरे के फर्श की ओर इशारा किया।

"तो नीचे देखिए।"

आरव ने नीचे देखा।

लकड़ी के फर्श के बीच एक चौकोर हिस्सा था।

उस पर लोहे का छोटा हैंडल लगा था।

बच्चे ने कहा—

"हवेली के नीचे एक और हवेली है।"

आरव ने हैंडल पकड़ लिया।

उसी समय दरवाजे के बाहर गोविंद की चीख सुनाई दी—

"आरव! उस तहखाने को मत खोलना!"

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

आरव ने लोहे का हैंडल खींच दिया।

फर्श का हिस्सा धीरे-धीरे खुलने लगा।

नीचे गहरा अंधेरा था।

और उस अंधेरे से...

किसी के रोने की आवाज आ रही थी।

फिर एक आवाज आई—

"गोविंद..."

गोविंद बाहर अचानक चुप हो गया।

आवाज फिर आई—

"गोविंद... तुमने मुझे सत्रह साल तक यहाँ क्यों रखा?"

गोविंद की चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।

और पहली बार आरव ने उसे टूटते हुए देखा।

गोविंद दरवाजे के बाहर घुटनों के बल गिर पड़ा था।

वह रोते हुए सिर्फ एक ही बात कह रहा था—

"वह मर चुकी थी..."

नीचे अंधेरे से उत्तर आया—

"नहीं गोविंद..."

कुछ क्षण का सन्नाटा।

फिर—

"मैं कभी मरी ही नहीं थी।"

आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

तहखाने के अंधेरे में अचानक दो लाल आँखें चमकीं।

और उसी क्षण ऊपर तीसरी मंजिल की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

बाहर तूफान शुरू हो चुका था।

हवेली जैसे साँस ले रही थी।

धीरे...

बहुत धीरे...

और उस साँस के साथ दीवारों से एक फुसफुसाहट निकली—

"पहली रात खत्म होने वाली है..."

फिर उसी आवाज ने कहा—

"...लेकिन असली खेल अब शुरू होगा।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

भाग 2 समाप्त

अगले भाग में — भाग 3: "हवेली के नीचे दूसरी हवेली"

तहखाने में आरव को क्या मिलेगा?

गोविंद सत्रह साल से किस सच को छिपा रहा था?

और वह आवाज किसकी थी जिसने कहा था—

"मैं कभी मरी ही नहीं थी।"

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता · सभी भाग →